महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2191–2200
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2191–2200
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(अनुद्यूतपर्व) चतुःसप्ततितमोऽध्यायः दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुनः द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति जनमेजय उवाच
अनुज्ञातांस्तान् विदित्वा सरत्नधनसंचयान् ।
पाण्डवान् धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! जब कौरवोंको यह मालूम हुआ कि पाण्डवोंको रथ और धनके संग्रहसहित खाण्डवप्रस्थ जानेकी आज्ञा मिल गयी, तब उनके मनकी अवस्था कैसी हुई? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अनुज्ञातांस्तान् विदित्वा धृतराष्ट्रेण धीमता ।
राजन् दुःशासनः क्षिप्रं जगाम भ्रातरं प्रति ॥ २ ॥
दुर्योधनं समासाद्य सामात्यं भरतर्षभ ।
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - भरतकुलभूषण जनमेजय! परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे दी, यह जानकर दुःशासन शीघ्र ही अपने भाई भरतश्रेष्ठ दुर्योधनके पास, जो अपने मन्त्रियों ( कर्ण एवं शकुनि ) के साथ बैठा था, गया और दुःखसे पीड़ित होकर इस प्रकार बोला ॥ २-३ ॥ दुःशासनउवाच
दुःखेनैतत् समानीतं स्थविरो नाशयत्यसौ ।
शत्रुसाद् गमयद् द्रव्यं तद् बुध्यध्वं महारथाः ॥ ४ ॥
दुःशासनने कहा — महारथियो! आपलोगोंको यह मालूम होना चाहिये कि हमने बड़े दुःखसे जिस धनराशिको प्राप्त किया था, उसे हमारा बूढ़ा बाप नष्ट कर रहा है । उसने सारा धन शत्रुओंके अधीन कर दिया ॥ ४ ॥
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अथ दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः ।
मिथः संगम्य सहिताः पाण्डवान् प्रति मानिनः ॥ ५ ॥
वैचित्रवीर्यं राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
अभिगम्य त्वरायुक्ताः श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन् ॥ ६ ॥
यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि, जो बड़े ही अभिमानी थे, पाण्डवोंसे बदला लेनेके लिये परस्पर मिलकर सलाह करने लगे । फिर उन सबने बड़ी उतावलीके साथ विचित्रवीर्यनन्दन मनीषी राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर मधुर वाणीमें कहा ॥ ५-६ ॥ (दुर्योधन उवाच
अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके धनुर्धरः ।
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ॥
दुर्योधन बोला- पिताजी! संसारमें अर्जुनके समान पराक्रमी धनुर्धर दूसरा कोई नहीं है । ये दो बाहुवाले अर्जुन सहस्र भुजाओंवाले कार्तवीर्य अर्जुनके समान शक्तिशाली हैं ।
शृणु राजन् पुराचिन्त्यानर्जुनस्य च साहसान् ।
अर्जुनो धन्विनां श्रेष्ठो दुष्कृतं कृतवान् पुरा ॥
द्रुपदस्य पुरे राजन् द्रौपद्याश्च स्वयंवरे । महाराज! अर्जुनने पहले जो- जो अचिन्त्य साहसपूर्ण कार्य किये हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनिये । राजन्! पहले राजा द्रुपदके नगरमें द्रौपदीके स्वयंवरके समय धनुर्धरोंमें
श्रेष्ठ अर्जुनने वह पराक्रम कर दिखाया था, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है ।
स दृष्ट्वा पार्थिवान् सर्वान् क्रुद्धान् पार्थो महाबलः ॥
वारयित्वा शरैस्तीक्ष्णैरजयत् तत्र स स्वयम् ।
जित्वा तु तान् महीपालान् सर्वान् कर्णपुरोगमान् ॥
लेभे कृष्णां शुभां पार्थो युद्ध्वा वीर्यबलात् तदा ।
सर्वक्षत्रसमूहेषु अम्बां भीष्मो यथा पुरा ॥
उस समय महाबली अर्जुनने सब राजाओंको कुपित देख तीखे बाणोंके प्रहारसे उन्हें जहाँके तहाँ रोक दिया और स्वयं ही सबपर विजय पायी । कर्ण आदि सभी राजाओंको अपने बल और पराक्रमसे युद्धमें जीतकर कुन्तीकुमार अर्जुनने उस समय शुभलक्षणा द्रौपदीको प्राप्त किया; ठीक वैसे ही जैसे पूर्वकालमें भीष्मजीने सम्पूर्ण क्षत्रियसमुदायमें अपने बल- पराक्रमसे काशिराजकी कन्या अम्बा आदिको प्राप्त किया था ।
ततः कदाचिद् बीभत्सुस्तीर्थयात्रां ययौ स्वयम् ।
अथोलूपीं शुभां जातां नागराजसुतां तदा ॥
नागेष्ववाप चाग्रयेषु प्रार्थितोऽथ यथातथम् । ततो गोदावरीं वेण्णां कावेरीं चावगाहत ।
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तदनन्तर अर्जुन किसी समय स्वयं तीर्थयात्राके लिये गये । उस यात्रामें ही उन्होंने नागलोकमें पहुँचकर परम सुन्दरी नागराजकन्या उलूपीको उसके प्रार्थना करनेपर विधिपूर्वक पत्नीरूपमें ग्रहण किया । फिर क्रमशः अन्य तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए दक्षिणदिशामें जाकर गोदावरी, वेण्णा तथा कावेरी आदि नदियोंमें स्नान किया ।
स दक्षिणं समुद्रान्तं गत्वा चाप्सरसां च वै ।
कुमारीतीर्थमासाद्य मोक्षयामास चार्जुनः ॥
ग्राहरूपान्विताः पञ्च अतिशौर्येण वै बलात् । दक्षिणसमुद्रके तटपर कुमारीतीर्थमें पहुँचकर अर्जुनने अत्यन्त शौर्यका परिचय देते हुए
ग्राहरूपधारिणी पाँच अप्सराओंका बलपूर्वक उद्धार किया ।
कन्यातीर्थं समभ्येत्य ततो द्वारवतीं ययौ ॥
तत्र कृष्णनिदेशात् स सुभद्रां प्राप्य फाल्गुनः ।
तामारोप्य रथोपस्थे प्रययौ स्वपुरीं प्रति ॥
तत्पश्चात् कन्याकुमारीतीर्थकी यात्रा करके वे दक्षिणसे लौट आये और अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए द्वारकापुरी जा पहुँचे । वहाँ भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे अर्जुनने सुभद्राको लेकर रथपर बिठा लिया और अपनी नगरी इन्द्रप्रस्थकी ओर प्रस्थान किया ।
भूयः शृणु महाराज फाल्गुनस्य तु साहसम् ।
ददौ च वह्नेर्बीभत्सुः प्रार्थितं खाण्डवं वनम् ॥
लब्धमात्रे तु तेनाथ भगवान् हव्यवाहनः ।
भक्षितुं खाण्डवं राजंस्ततः समुपचक्रमे ॥
महाराज! अर्जुनके साहसका और भी वर्णन सुनिये; उन्होंने अग्निदेवको उनके माँगनेपर खाण्डववन समर्पित किया था । राजन्! उनके द्वारा उपलब्ध होते ही भगवान् अग्निदेवने उस वनको अपना आहार बनाना आरम्भ किया ।
ततस्तं भक्षयन्तं वै सव्यसाची विभावसुम् ।
रथी धन्वी शरान् गृह्य स कलापयुतः प्रभुः ॥
पालयामास राजेन्द्र स्ववीर्येण महाबलः ॥
राजेन्द्र! जब अग्निदेव खाण्डववनको जलाने लगे, उस समय ( अग्निदेवसे ) रथ, धनुष, बाण और कवच आदि लेकर महान् बल तथा प्रभावसे युक्त सव्यसाची अर्जुन अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करने लगे ।
ततः श्रुत्वा महेन्द्रस्तं मेघांस्तान् संदिदेश ह ।
तेनोक्ता मेघसङ्घास्ते ववर्षुरतिवृष्टिभिः ॥
खाण्डववनके दाहका समाचार सुनकर देवराज इन्द्रने मेघोंको आग बुझानेकी आज्ञा दी । उनकी प्रेरणासे मेघोंने बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की । ततो मेघगणान् पार्थः शरव्रातैः समन्ततः ।
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खगमैर्वारयामास तदाश्चर्यमिवाभवत् ॥ यह देख अर्जुनने आकाशगामी बाणसमूहोंद्वारा सब ओरसे बादलोंको रोक दिया । वह एक अद्भुत - सी घटना हुई ।
वारितान् मेघसङ्घांश्च श्रुत्वा क्रुद्धः पुरंदरः ।
पाण्डरं गजमास्थाय सर्वदेवगणैर्वृतः ॥
ययौ पार्थेन संयोद्धुं रक्षार्थं खाण्डवस्य च ॥
मेघोंको रोका गया सुनकर इन्द्रदेव कुपित हो उठे । श्वेतवर्णवाले ऐरावत हाथीपर आरूढ हो वे समस्त देवताओंके साथ खाण्डववनकी रक्षाके निमित्त अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये गये ।
रुद्राश्च मरुतश्चैव वसवश्चाश्विनौ तदा ।
आदित्याश्चैव साध्याश्च विश्वेदेवाश्च भारत ॥
गन्धर्वाश्चैव सहिता अन्ये सुरगणाश्च ये ।
ते सर्वे शस्त्रसम्पन्ना दीप्यमानाः स्वतेजसा ।
धनंजयं जिघांसन्तः प्रपेतुर्विबुधाधिपाः ॥
भारत! उस समय रुद्र, मरुद्गण, वसु, अश्विनीकुमार, आदित्य, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व तथा अन्य देवगण अपने - अपने तेजसे देदीप्यमान एवं अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये गये । वे सभी देवेश्वर अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर टूट पड़े । ततो देवगणाः सर्वे युद्ध्वा पार्थेन वै मुहुः ।
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रणे जेतुमशक्यं तं ज्ञात्वा ते भरतर्षभ ॥ शान्तास्ते विबुधाः सर्वे पार्थबाणाभिपीडिताः । भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ बारंबार युद्ध करके जब देवताओंने यह समझ लिया कि इन्हें समरांगणमें पराजित करना असम्भव है, तब वे अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण युद्धसे विरत हो गये ( भाग खड़े हुए) ।
युगान्ते यानि दृश्यन्ते निमित्तानि महान्त्यपि ।
सर्वाणि तत्र दृश्यन्ते सुघोराणि महीपते ॥
महाराज! प्रलयकालमें जो विनाशसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन दिखायी देते हैं, वे सभी उस समय प्रत्यक्ष दीखने लगे । ततो देवगणाः सर्वे पार्थं समभिदुद्रुवुः ।
असम्भ्रान्तस्तु तान् दृष्ट्वा स तां देवमयीं चमूम् ।
त्वरितः फाल्गुनो गृह्य तीक्ष्णांस्तानाशुगांस्तदा ॥
शक्रं देवांश्च सम्प्रेक्ष्य तस्थौ काल इवात्यये ॥
तदनन्तर सब देवताओंने एक साथ अर्जुनपर धावा किया; परंतु उस देवसेनाको देखकर अर्जुनके मनमें घबराहट नहीं हुई । वे तुरंत ही तीखे बाण हाथमें लेकर इन्द्र और देवताओंकी ओर देखते हुए प्रलयकालमें सर्वसंहारक कालकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये ।
ततो देवगणाः सर्वे बीभत्सुं सपुरंदराः ।
अवाकिरञ्छरव्रातैर्मानुषं तं महीपते ॥
राजन्! अर्जुनको मानव समझकर इन्द्रसहित सब देवता उनपर बाणसमूहोंकी बौछार
करने लगे ।
ततः पार्थो महातेजा गाण्डीवं गृह्य सत्वरः ॥
वारयामास देवानां शरव्रातैः शरांस्तदा । परंतु महातेजस्वी पार्थने शीघ्रतापूर्वक गाण्डीव धनुष लेकर अपने बाणसमूहोंकी
वर्षासे देवताओंके बाणोंको रोक दिया ।
पुनः क्रुद्धाः सुराः सर्वे मर्त्यं संख्ये महाबलाः ॥
नानाशस्त्रैर्ववर्षुस्तं सव्यसाचिं महीपते ॥
पिताजी! यह देख समस्त महाबली देवता पुनः कुपित हो गये और उस युद्धमें मरणधर्मा अर्जुनपर नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंकी बौछार करने लगे ।
तान् पार्थः शस्त्रवर्षान् वै विसृष्टान् विबुधैस्तदा ।
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव निशितैः शरैः ॥
अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा देवताओंके छोड़े हुए उन अस्त्र- शस्त्रोंके आकाशमें ही दो - दो तीन - तीन टुकड़े कर दिये ।
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पुनश्च पार्थः संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुकः ।
देवसङ्घाञ्छरैस्तीक्ष्णैरार्पयद् वै समन्ततः ॥
फिर अधिक क्रोधमें भरकर अर्जुनने अपने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार दिखायी देने लगा और उसके द्वारा सब ओर तीखे सायकोंकी वृष्टि करके सब देवताओंको घायल कर दिया ।
विद्रुतान् देवसङ्घांस्तान् रणे दृष्ट्वा पुरंदरः ।
ततः क्रुद्धो महातेजाः पार्थं बाणैरवाकिरत् ॥
देवताओंको युद्धसे भागा हुआ देख महातेजस्वी इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो पार्थपर
बाणोंकी झड़ी लगा दी ।
पार्थोऽपि शक्रं विव्याध मानुषो विबुधाधिपम् ॥
ततः सोऽश्ममयं वर्षं व्यसृजद् विबुधाधिपः ।
तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षणः ॥
अथ संवर्धयामास तद् वर्षं देवराडपि ।
भूय एव तदा वीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः ॥
पार्थने मनुष्य होकर भी देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपने सायकोंसे बींध डाला । तब देवेश्वरने अर्जुनपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ की । यह देख अर्जुन अत्यन्त अमर्षमें भर गये और अपने बाणोंद्वारा उन्होंने इन्द्रकी उस पाषाण- वर्षाका निवारण कर दिया । तदनन्तर देवराज इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुनः उस पाषाण -वर्षाको पहलेसे भी अधिक बढ़ा दिया ।
सोऽश्मवर्षं महावेगमिषुभिः पाण्डवोऽपि च ।
विलयं गमयामास हर्षयन् पाकशासनम् ॥
यह देख पाण्डुनन्दन अर्जुनने इन्द्रका हर्ष बढ़ाते हुए उस अत्यन्त वेगशालिनी पाषाणवर्षाको अपने बाणोंसे विलीन कर दिया ।
उपादाय तु पाणिभ्यामङ्गदं नाम पर्वतम् ।
सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः श्वेतवाहनम् ॥
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलमानैरजिह्मगैः ।
बाणैर्विध्वंसयामास गिरिराजं सहस्रशः ॥
शक्रं च वारयामास शरैः पार्थो बलाद् युधि । तब इन्द्रने श्वेतवाहन अर्जुनको कुचल डालनेकी इच्छासे वृक्षोंसहित अंगद नामक पर्वत ( जो मन्दराचलका एक शिखर है ) को दोनों हाथोंसे उठाकर उनके ऊपर छोड़ दिया । यह देख अर्जुनने अग्निके समान प्रज्वलित और सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले सहस्रों वेगशाली बाणोंद्वारा उस पर्वतराजको खण्ड-खण्ड कर दिया । साथ ही पार्थने उस युद्धमें बलपूर्वक बाण मारकर इन्द्रको स्तब्ध कर दिया ।
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ततः शक्रो महाराज रणे वीरं धनंजयम् ॥ ज्ञात्वा जेतुमशक्यं तं तेजोबलसमन्वितम् ॥ परां प्रीतिं ययौ तत्र पुत्रशौर्येण वासवः । महाराज! तदनन्तर तेज और बलसे सम्पन्न वीर धनंजयको युद्धमें जीतना असम्भव
जानकर इन्द्रको अपने पुत्रके पराक्रमसे वहाँ बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ।
तदा तत्र न तस्यासीद् दिवि कश्चिन्महायशाः ॥
समर्थो निर्जये राजन्नपि साक्षात् प्रजापतिः ॥
राजन्! उस समय वहाँ स्वर्गका कोई भी महायशस्वी वीर, चाहे साक्षात् प्रजापति ही क्यों न हों, ऐसा नहीं था, जो अर्जुनको जीतनेमें समर्थ हो सके ।
ततः पार्थः शरैर्हत्वा यक्षराक्षसपन्नगान् ।
दीप्ते चाग्नौ महातेजाः पातयामास संततम् ॥
प्रतिप्रेक्षयितुं पार्थं न शेकुस्तत्र केचन ।
दृष्ट्वा निवारितं शक्रं दिवि देवगणैः सह ॥
तदनन्तर महातेजस्वी अर्जुन अपने बाणोंसे यक्ष, राक्षस और नागोंको मारकर उन्हें लगातार प्रज्वलित अग्निमें गिराने लगे । स्वर्गवासी देवताओंसहित इन्द्रको अर्जुनने युद्धसे विरत कर दिया, यह देख उस समय कोई भी उनकी ओर दृष्टिपात नहीं कर पाते थे ।
यथा सुपर्णः सोमार्थं विबुधानजयत् पुरा ।
तथा जित्वा सुरान् पार्थस्तर्पयामास पावकम् ॥
ततोऽर्जुनः स्ववीर्येण तर्पयित्वा विभावसुम् ।
रथं ध्वजं हयांश्चैव दिव्यास्त्राणि सभां च वै ॥
गाण्डीवं च धनुःश्रेष्ठं तूणी चाक्षयसायकौ ।
एतान्यवाप बीभत्सुर्लेभे कीर्तिं च भारत ॥
भारत! जैसे पूर्वकालमें गरुड़ने अमृतके लिये देवताओंको जीत लिया था, उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुनने भी देवताओंको जीतकर खाण्डववनके द्वारा अग्निदेवको तृप्त किया । इस प्रकार पार्थने अपने पराक्रमसे अग्निदेवको तृप्त करके उनसे रथ, ध्वजा, अश्व, दिव्यास्त्र, उत्तम धनुष गाण्डीव तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर प्राप्त किये । इनके सिवा अनुपम यश और मयासुरसे एक सभाभवन भी उन्हें प्राप्त हुआ ।
भूयोऽपि शृणु राजेन्द्र पार्थो गत्वोत्तरां दिशम् ।
विजित्य नववर्षांश्च सपुरांश्च सपर्वतान् ॥
जम्बूद्वीपं वशे कृत्वा सर्वं तद् भरतर्षभ ।
बलाज्जित्वा नृपान् सर्वान् करे च विनिवेश्य च ॥
रत्नान्यादाय सर्वाणि गत्वा चैव पुनः पुरीम् ।
ततो ज्येष्ठं महात्मानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥
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राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं कारयामास भारत ॥ राजेन्द्र! अर्जुनके पराक्रमकी कथा अभी और सुनिये । उन्होंने उत्तरदिशामें जाकर नगरों और पर्वतोंसहित जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंपर विजय पायी। भरतश्रेष्ठ! उन्होंने समस्त जम्बूद्वीपको वशमें करके सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया और सबपर कर लगाकर उनसे सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट ले वे पुनः अपनी पुरीको लौट आये । भारत! तदनन्तर अर्जुनने अपने बड़े भाई महात्मा धर्मराज युधिष्ठिरसे क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करवाया ।
स तान्यन्यानि कर्माणि कृतवानर्जुनः पुरा ।
अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके पुमान् क्वचित् ॥
पिताजी! इस प्रकार अर्जुनने पूर्वकालमें ये तथा और भी बहुत - से पराक्रम कर दिखाये हैं । संसारमें कहीं कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो बल और पराक्रममें अर्जुनकी समानता कर सके ।
देवदानवयक्षाश्च पिशाचोरगराक्षसाः ।
भीष्मद्रोणादयः सर्वे कुरवश्च महारथाः ॥
लोके सर्वनृपाश्चैव वीराश्चान्ये धनुर्धराः ।
एते चान्ये च बहवः परिवार्य महीपते ॥
एकं पार्थं रणे यत्ताः प्रतियोद्धुं न शक्नुयुः ॥
देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस एवं भीष्म, द्रोण आदि समस्त कौरव महारथी, भूमण्डलके सम्पूर्ण नरेश तथा अन्य धनुर्धर वीर - ये तथा अन्य बहुत - से शूरवीर युद्धभूमिमें अकेले अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर पूरी सावधानीके साथ खड़े हो जायँ तो भी उनका सामना नहीं कर सकते ।
अहं हि नित्यं कौरव्य फाल्गुनं प्रति सत्तमम् ।
अनिशं चिन्तयित्वा तं समुद्विग्नोऽस्मि तद्भयात् ॥
कुरुश्रेष्ठ! मैं साधुशिरोमणि अर्जुनके विषयमें नित्य - निरन्तर चिन्तन करते हुए उनके भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाता हूँ ।
गृहे गृहे च पश्यामि तात पार्थमहं सदा ।
शरगाण्डीवसंयुक्तं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥
अपि पार्थसहस्राणि भीतः पश्यामि भारत ।
पार्थभूतमिदं सर्वं नगरं प्रतिभाति मे ॥
पिताजी! मुझे प्रत्येक घरमें सदा हाथमें पाश लिये यमराजकी भाँति गाण्डीव धनुषपर बाण चढ़ाये अर्जुन दिखायी देते हैं । भारत! मैं इतना डर गया हूँ कि मुझे सहस्रों अर्जुन दृष्टिगोचर होते हैं । यह सारा नगर मुझे अर्जुनरूप ही प्रतीत होता है । पार्थमेव हि पश्यामि रहिते तात भारत ।
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दृष्ट्वा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि ह्यचेतनः ॥ भारत! मैं एकान्तमें अर्जुनको ही देखता हूँ। स्वप्नमें भी अर्जुनको देखकर मैं अचेत और उद्भ्रान्त हो उठता हूँ ।
अकारादीनि नामानि अर्जुनत्रस्तचेतसः ।
अश्वाश्चार्था ह्यजाश्चैव त्रासं संजनयन्ति मे ॥
मेरा हृदय अर्जुनसे इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अर्थ और अज आदि अकारादि नाम मेरे मनमें त्रास उत्पन्न कर देते हैं ।
नास्ति पार्थादृते तात परवीराद् भयं मम ।
प्रह्लादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ॥
तस्मात् तेन महाराज युद्धमस्मज्जनक्षयम् ।
अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ॥
तात! अर्जुनके सिवा शत्रुपक्षके दूसरे किसी वीरसे मुझे डर नहीं लगता है । महाराज! मेरा विश्वास है कि अर्जुन युद्धमें प्रह्लाद अथवा बलिको भी मार सकते हैं; अतः उनके साथ किया हुआ युद्ध हमारे सैनिकोंके ही संहारका कारण होगा । मैं अर्जुनके प्रभावको जानता हूँ। इसीलिये सदा दुःखके भारसे दबा रहता हूँ ।
पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम् ।
भवेद्रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ॥
जैसे पूर्वकालमें दण्डकारण्यवासी महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे मारीचको भय हो गया था, उसी प्रकार अर्जुनसे मुझे भय हो रहा है । धृतराष्ट्रउवाच
जानाम्येव महद् वीर्यं जिष्णोरेतद् दुरासदम् ।
तात वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम् ॥
द्यूतं वा शस्त्रयुद्धं वा दुर्वाक्यं वा कदाचन ।
एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत् ॥
तस्मात् त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
यश्च पार्थेन सम्बन्धाद् वर्तते च नरो भुवि ।
तस्य नास्ति भयं किंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ॥
तस्मात् त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
धृतराष्ट्र बोले- बेटा! अर्जुनके महान् पराक्रमको तो मैं जानता ही हूँ । उनके इस पराक्रमका सामना करना अत्यन्त कठिन है । अतः तुम वीर अर्जुनका कोई अपराध न करो । उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्रयुद्ध अथवा कटु वचनका प्रयोग कभी न करो; क्योंकि इन्हींके कारण उनका तुमलोगोंके साथ विवाद हो सकता है । अतः बेटा! तुम अर्जुनके साथ सदा
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स्नेहपूर्ण बर्ताव करो । भारत! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर अर्जुनके साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रखते हुए उनसे सद्व्यवहार करता है, उसे तीनों लोकोंमें तनिक भी भय नहीं है; अतः वत्स! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो । दुर्योधन उवाच
द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृतिः कृता ।
तस्माद्धि तं जहि सदा त्वन्योपायेन नो भवेत् ॥
- दुर्योधन बोला –कुरुश्रेष्ठ! जूएमें हमलोगोंने अर्जुनके प्रति छल- कपटका बर्ताव किया था, अतः आप किसी दूसरे उपायसे उन्हें मार डालें। इसीसे हमलोगोंका सदा भला होगा । धृतराष्ट्रउवाच
उपायश्च न कर्तव्यः पाण्डवान् प्रति भारत ।
पार्थान् प्रति पुरा वत्स बहूपायाः कृतास्त्वया ॥
तानुपायान् हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमुः ॥
तस्माद्धितं जीविताय नः कुलस्य जनस्य च ।
त्वं चिकीर्षसि चेद् वत्स समित्रः सहबान्धवः ।
सभ्रातृकस्त्वं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
धृतराष्ट्रने कहा— भारत! पाण्डवोंके प्रति किसी अनुचित उपायका प्रयोग नहीं करना चाहिये । बेटा! तुमने उन सबको मारनेके लिये पहले बहुत से उपाय किये हैं । कुन्तीके पुत्र तुम्हारे उन सभी प्रयत्नोंका उल्लंघन करके बहुत बार आगे बढ़ गये हैं; अतः वत्स! यदि तुम अपने कुल और आत्मीयजनोंकी जीवनरक्षाके लिये किसी हितकर उपायका अवलम्बन करना चाहते हो तो मित्र, बन्धु- बान्धव तथा भाइयोंसहित तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो । वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु विधिना चोदितोऽब्रवीत् ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं - धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधन दो घड़ीतक कुछ सोच - विचार करके विधातासे प्रेरित हो इस प्रकार बोला । दुर्योधन उवाच
न त्वयेदं श्रुतं राजन् यज्जगाद बृहस्पतिः ।
शक्रस्य नीतिं प्रवदन् विद्वान् देवपुरोहितः ॥ ७ ॥
दुर्योधन बोला- राजन्! देवगुरु विद्वान् बहस्पतिजीने इन्द्रको नीतिका उपदेश करते हुए जो बात कही है, उसे शायद आपने नहीं सुना है ॥ ७ ॥