महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2231–2240
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2231–2240
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( ततः सम्प्रस्थिते तत्र धर्मराजे तदा नृपे ।
जनाः समस्तास्तं द्रष्टुं समारुरुहुरातुराः ॥
ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च ।
गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्च सर्वशः ॥
अधिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् । तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर जब वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब उस नगरके समस्त निवासी दुःखसे आतुर हो उन्हें देखनेके लिये महलों, मकानकी छतों, समस्त गोपुरों और
वृक्षोंपर चढ़ गये । वहाँसे सब लोग उदास होकर उन्हें देखने लगे ।
न हि रथ्यास्ततः शक्या गन्तुं बहुजनाकुलाः ॥
आरुह्यते स्म तान्यत्र दीनाः पश्यन्ति पाण्डवम् । उस समय सड़कें मनुष्योंकी भारी भीड़से इतनी भर गयी थीं कि उनपर चलना असम्भव हो गया था । इसीलिये लोग ऊँचे चढ़कर अत्यन्त दीनभावसे पाण्डुनन्दन
युधिष्ठिरको देख रहे थे ।
पदातिं वर्जितच्छत्रं चेलभूषणवर्जितम् ॥
वल्कलाजिनसंवीतं पार्थं दृष्ट्वा जनास्तदा ।
ऊचुर्बहुविधा वाचो भृशोपहतचेतसः ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर छत्ररहित एवं पैदल ही चल रहे थे । उनके शरीरपर राजोचित वस्त्रों और आभूषणोंका भी अभाव था। वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे । उन्हें इस
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दशामें देखकर लोगोंके हृदयमें गहरी चोट पहुँची और वे सब लोग नाना प्रकारकी बातें करने लगे । जना ऊचुः
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् ।
तमेवं कृष्णया सार्धमनुयान्ति स्म पाण्डवाः ॥
चत्वारो भ्रातरश्चैव पुरोधाश्च विशाम्पतिम् । नगरनिवासी मनुष्य बोले- अहो! यात्रा करते समय जिनके पीछे विशाल चतुरंगिणी सेना चलती थी, आज वे ही राजा युधिष्ठिर इस प्रकार जा रहे हैं और उनके पीछे द्रौपदीके
साथ केवल चार भाई पाण्डव तथा पुरोहित चल रहे हैं ।
या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि ॥
तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः । जिसे आजसे पहले आकाशचारी प्राणीतक नहीं देख पाते थे, उसी द्रुपदकुमारी
कृष्णाको अब सड़कपर चलनेवाले साधारण लोग भी देख रहे हैं ।
अङ्गरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ॥
वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् । सुकुमारी द्रौपदीके अंगोंमें दिव्य अंगराग शोभा पाता था । वह लाल चन्दनका सेवन करती थी, परंतु अब वनमें सर्दी, गर्मी और वर्षा लगनेसे उसकी अंगकान्ति शीघ्र ही फीकी
पड़ जायगी ।
अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते ॥
पुत्रान् स्तुषां च देवी तु द्रष्टुमद्याथ नार्हति ॥
निश्चय ही आज कुन्तीदेवी बड़े भारी धैर्यका आश्रय लेकर अपने पुत्रों और पुत्रवधूसे वार्तालाप करती हैं; अन्यथा इस दशामें वे इनकी ओर देख भी नहीं सकतीं ।
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् दुःखदर्शनम् ।
किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् ॥
गुणहीन पुत्रका भी दुःख मातासे कैसे देखा जायगा; फिर जिस पुत्रके सदाचारमात्रसे यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसपर कोई दुःख आये तो उसकी माता वह कैसे देख सकती है?
आनृशंस्यमनुक्रोशो धृतिः शीलं दमः शमः ।
पाण्डवं शोभयन्त्येते षड् गुणाः पुरुषोत्तमम् ॥
तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः । पुरुषरत्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको कोमलता, दया, धैर्य, शील, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह — ये छः सद्गुण सुशोभित करते हैं । अतः उनकी हानिसे आज सारी प्रजाको
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बड़ी पीड़ा हो रही है ।
औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ॥
पीडया पीडितं सर्वं जगत् तस्य जगत्पतेः ।
मूलस्यैवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः ॥
जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी घट जानेसे जलचर जीव - जन्तु व्यथित हो उठते हैं एवं जड़ कट जानेसे फल और फूलोंसे युक्त वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्के पालक महाराज युधिष्ठिरकी पीड़ासे सारा संसार पीड़ित हो गया है ।
मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युतिः ।
पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जनाः ॥
ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्राः सहबान्धवाः ।
गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डवः ॥
महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिर मनुष्योंके मूल हैं । जगत्के दूसरे लोग उन्हींकी शाखा, पत्र, पुष्प और फल हैं । आज हम अपने पुत्रों और भाई- बन्धुओंको साथ लेकर चारों भाई पाण्डवोंकी भाँति शीघ्र उसी मार्गसे उनके पीछे - पीछे चलें, जिससे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं ।
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च ।
एकदुःखसुखाः पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् ॥
आज हम अपने खेत, बाग- बगीचे और घर-द्वार छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके साथ चल दें और उन्हींके सुख-दुःखको अपना सुख-दुःख समझें ।
समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च ।
उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः ॥
रजसाप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः ।
मूषकैः परिधावद्भिरुद्विलैरावृतानि च ॥
अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च ।
प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ॥
दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च ।
अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबलः प्रतिपद्यताम् ॥
हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें । आँगनकी फर्श खोद डालें । सारा धन धान्य साथ ले लें । सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें । इनमें चारों ओर धूल भर जाय । देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ । चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें । इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय । मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये
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सारे घर ढह जायँ । इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें – ऐसी दशामें इन घरोंपर कपटी सुबलपुत्र शकुनि आकर अधिकार कर ले ।
वनं नगरमद्यास्तु यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः ।
अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् ॥
अब जहाँ पाण्डव जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर ही वनके रूपमें परिणत हो जाय ।
बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे वनानि मृगपक्षिणः ।
त्यजन्त्वस्मद्भयाद् भीता गजाः सिंहा वनान्यपि ॥
वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ, मृग और पक्षी जंगलोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी वहाँसे दूर चले जायँ ।
अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च ।
तृणमाषफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्विजाः ॥
वयं पार्थैर्वने सम्यक् सह वत्स्याम निर्वृताः । हमलोग तृण ( साग - पात), अन्न और फलका उपयोग करनेवाले हैं । जंगलके हिंसक पशु और पक्षी हमारे रहनेके स्थानोंको छोड़कर चले जायँ । वे ऐसे स्थानका आश्रय लें, जहाँ हम न जायँ और वे उन स्थानोंको छोड़ दें, जिनका हम सेवन करें । हमलोग वनमें कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़े सुखसे रहेंगे । वैशम्पायन उवाच
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः ।
शुश्राव पार्थः श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार भिन्न-भिन्न मनुष्योंकी कही हुई भाँति - भाँतिकी बातें युधिष्ठिरने सुनीं । सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं आया ।
ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्ताद् वै गृहे गृहे ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषितः ॥
ततः प्रासादजालानामुत्पाट्यावरणानि च ।
ददृशुः पाण्डवान् दीनान् रौरवाजिनवाससः ॥
कृष्णां त्वदृष्टपूर्वां तां व्रजन्तीं पद्भिरेव च ।
एकवस्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम् ॥
दृष्ट्वा तदा स्त्रियः सर्वा विवर्णवदना भृशम् ।
विलप्य बहुधा मोहाद् दुःखशोकेन पीडिताः ॥
हा हा धिग् धिग् धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन् । )
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तदनन्तर चारों ओर महलोंमें रहनेवाली ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी स्त्रियाँ अपने - अपने भवनोंकी खिड़कियोंके पर्दे हटाकर दीन पाण्डवोंको देखने लगीं । सब पाण्डवोंने मृगचर्ममय वस्त्र धारण कर रखा था । उनके साथ द्रौपदी भी पैदल ही चली जा रही थी । उसे उन स्त्रियोंने पहले कभी नहीं देखा था । उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था, केश खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और रोती चली जा रही थी । उसे देखकर उस समय सब स्त्रियोंका मुख उदास हो गया । वे क्षोभ एवं मोहके कारण नाना प्रकारसे विलाप करती हुई दुःख- शोकसे पीड़ित हो गयीं और ' हाय हाय! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको बार- बार धिक्कार है, धिक्कार है ' ऐसा कहकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ।
धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ताश्च निखिलेनोपलभ्य तत् ।
गमनं परिकर्षं च कृष्णाया द्यूतमण्डले ॥ ३२ ॥
रुरुदुः सुस्वनं सर्वा विनिन्दन्त्यः कुरून् भृशम् ।
दध्युश्च सुचिरं कालं करासक्तमुखाम्बुजाः ॥ ३३ ॥
धृतराष्ट्रपुत्रोंकी स्त्रियाँ द्रौपदीके द्यूतसभामें जाने और उसके वस्त्र खींचे जाने ( एवं वनमें जाने ) आदिका सारा वृत्तान्त सुनकर कौरवोंकी अत्यन्त निन्दा करती हुई फूट- फूटकर रोने लगीं और अपने मुखारविन्दको हथेलीपर रखकर बहुत देरतक गहरी चिन्तामें डूबी रहीं ॥
राजा च धृतराष्ट्रस्तु पुत्राणामनयं तदा ।
ध्यायन्नुद्विग्नहृदयो न शान्तिमधिजग्मिवान् ॥ ३४ ॥
उस समय अपने पुत्रोंके अन्यायका चिन्तन करके राजा धृतराष्ट्रका भी हृदय उद्विग्न हो उठा । उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली ॥ ३४ ॥
स चिन्तयन्ननेकाग्रः शोकव्याकुलचेतनः ।
क्षत्तुः सम्प्रेषयामास शीघ्रमागम्यतामिति ॥ ३५ ॥
चिन्तामें पड़े - पड़े उनकी एकाग्रता नष्ट हो गयी । उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था । उन्होंने विदुरके पास संदेश भेजा कि तुम शीघ्र मेरे पास चले आओ ॥ ३५ ॥
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् ।
तं पर्यपृच्छत् संविग्नो धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ ३६ ॥
तब विदुर राजा धृतराष्ट्रके महलमें गये । उस समय महाराज धृतराष्ट्रने अत्यन्त उद्विग्न होकर उनसे पूछा ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि द्रौपदीकुन्तीसंवादे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें द्रौपदीकुन्तीसंवादविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
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( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ ९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं ) Fac
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अशीतितमोऽध्यायः वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन वैशम्पायन उवाच
तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
साशङ्क इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित- सा होकर पूछा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनः सव्यसाची माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ २ ॥
धृतराष्ट्र बोले- विदुर! कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव – ये चारों पाण्डव भी किस प्रकार यात्रा करते हैं? ॥ २ ॥
धौम्यश्चैव कथं क्षत्तर्द्रौपदी च यशस्विनी ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं तेषां शंस विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
पुरोहित धौम्य तथा यशस्विनी द्रौपदी भी कैसे जा रही है? मैं उन सबकी पृथक् - पृथक् चेष्टाओंको सुनना चाहता हूँ, तुम मुझसे कहो ॥ ३ ॥
विदुर उवाच
वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
बाहू विशालौ सम्पश्यन् भीमो गच्छति पाण्डवः ॥ ४ ॥
विदुर बोले – कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वस्त्रसे मुँह ढँककर जा रहे हैं । पाण्डुकुमार भीमसेन अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए जाते हैं ॥ ४ ॥
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति ।
माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति ॥ ५ ॥
सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा युधिष्ठिरके पीछे - पीछे जा रहे हैं । माद्रीकुमार सहदेव अपने मुँहपर मिट्टी पोतकर जाते हैं ॥ ५ ॥
पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलश्चित्तविह्वलः ।
दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति ॥ ६ ॥
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लोकमें अत्यन्त दर्शनीय मनोहर रूपवाले नकुल अपने सब अंगोंमें धूल लपेटकर व्याकुलचित हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे हैं ॥ ६ ॥
कृष्णा तु केशौः: प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना ।
दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति ॥ ७ ॥
परम सुन्दरी विशाललोचना कृष्णा अपने केशोंसे ही मुँह ढँककर रोती हुई राजाके पीछे - पीछे जा रही है ॥ ७ ॥
धौम्यौ रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते ।
गायन् गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना ॥ ८ ॥
महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथमें कुश लेकर रुद्र तथा यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए आगे- आगे मार्गपर चल रहे हैं ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः ।
तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा - विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ । वे क्यों इस प्रकार जा रहे हैं? ॥ विदुर उवाच
निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च ।
न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः ॥ १० ॥
विदुर बोले- महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है । पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है ॥ १० ॥
योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत ।
निकृत्या भ्रंशितः क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने ॥ ११ ॥
भारत! राजा युधिष्ठिर आपके पुत्रोंपर सदा दयाभाव बनाये रखते थे, किंतु इन्होंने छलपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उन्हें राज्यसे वंचित किया है, इससे उनके मनमें बड़ा क्रोध है और इसीलिये वे अपनी आँखोंको नहीं खोलते हैं ॥
नाहं जनं निर्दहेयं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा ।
स पिधाय मुखं राजा तस्माद् गच्छति पाण्डवः ॥ १२ ॥
' मैं भयानक दृष्टिसे देखकर किसी ( निरपराधी ) मनुष्यको भस्म न कर डालूँ' इसी भयसे पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपना मुँह ढँककर जा रहे हैं ॥ १२ ॥
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदतः शृणु ।
बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ ॥ १३ ॥
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अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ॥ १३ ॥
बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमोऽपि गच्छति ।
बाहू विदर्शयन् राजन् बाहुद्रविणदर्पितः ॥ १४ ॥
चिकीर्षन् कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपतः । इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं । राजन्! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है । अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं ॥ १४३ ॥
प्रदिशञ्छरसम्पातान् कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा ॥ १५ ॥
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति ।
असक्ताः सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत ।
असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु ॥ १६ ॥
कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे - पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे । भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे ॥ १५-१६ ॥
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत ।
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ॥ १७ ॥
भारत! ‘ आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले' यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं ॥ १७ ॥
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो ।
पांसूलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ॥ १८ ॥
प्रभो! ‘ मार्गमें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ' इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं ॥ १८ ॥
एकवस्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला ।
शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त ( रज) -का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी ॥ १ ९ ॥
यत्कृतेऽहमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे ।
हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रियाः ॥ २० ॥
बहुशोणितदिग्धाङ्गयो मुक्तकेशयो रजस्वलाः ।
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एवं कृतोदका भार्याः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वयम् ॥ २१ ॥
‘ जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट- लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे - सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी' ॥ २०-२१ ॥
कृत्वा तु नैरृतान् दर्भान् धीरो धौम्यः पुरोहितः ।
सामानि गायन् याम्यानि पुरतो याति भारत ॥ २२ ॥
भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नैर्ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम- मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे- आगे जा रहे हैं ॥
हतेषु भारतेष्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा ।
एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति ॥ २३ ॥
धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ॥
हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् ।
अहो धिक् कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम् ॥ २४ ॥
राष्ट्रेभ्यः पाण्डुदायादाँल्लोभान्निर्वासयन्ति ये ।
अनाथाः स्म वयं सर्वे वियुक्ताः पाण्डुनन्दनैः ॥ २५ ॥
दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीतिः कौरवेषु नः ।
इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म पुनः पुनः ॥ २६ ॥
महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार- बार चिल्लाकर कह रहे थे कि ‘ हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं । अहो! कौरवोंमें जो बड़े - बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी- सी चेष्टा तो देखो । धिक्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं । इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये । इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है? ॥ २४–२६ ॥
एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम् ।
कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विनः ॥ २७ ॥
महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्नोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं ॥ २७ ॥
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् ।
अनभ्रे विद्युतश्चासन् भूमिश्च समकम्पत ॥ २८ ॥
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते ।
उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ॥ २ ९ ॥