महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 251–260

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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तदा भूरभवच्छन्ना जलोर्मिभिरनेकशः ।

रामणीयकमागच्छन् मात्रा सह भुजङ्गमाः ॥ ८ ॥

उस समय सारा भूतल जलकी असंख्य तरंगोंसे आच्छादित हो गया था । इस प्रकार वर्षासे संतुष्ट हुए सर्प अपनी माताके साथ रामणीयक द्वीपमें आ गये ॥ ८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

पृष्ठ 252

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सप्तविंशोऽध्यायः रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना सौतिरुवाच

सम्प्रहृष्टास्ततो नागा जलधाराप्लुतास्तदा ।

सुपर्णेनोह्यमानास्ते जग्मुस्तं द्वीपमाशु वै ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— गरुडपर सवार होकर यात्रा करनेवाले वे नाग उस समय जलधारासे नहाकर अत्यन्त प्रसन्न हो शीघ्र ही रामणीयक द्वीपमें जा पहुँचे ॥ १ ॥

तं द्वीपं मकरावासं विहितं विश्वकर्मणा ।

तत्र ते लवणं घोरं ददृशुः पूर्वमागताः ॥ २ ॥

विश्वकर्माजीके बनाये हुए उस द्वीपमें, जहाँ अब मगर निवास करते थे, जब पहली बार नाग आये थे तो उन्हें वहाँ भयंकर लवणासुरका दर्शन हुआ था ॥ २ ॥

सुपर्णसहिताः सर्पाः काननं च मनोरमम् ।

सागराम्बुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिनादितम् ॥३ ॥

सर्प गरुडके साथ उस द्वीपके मनोरम वनमें आये, जो चारों ओरसे समुद्रद्वारा घिरकर

उसके जलसे अभिषिक्त हो रहा था । वहाँ झुंड के झुंड पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ३ ॥

विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम् ।

भवनैरावृतं रम्यैस्तथा पद्माकरैरपि ॥ ४ ॥

विचित्र फूलों और फलोंसे भरी हुई वनश्रेणियाँ उस दिव्य वनको घेरे हुए थीं । वह वन बहुत - से रमणीय भवनों और कमलयुक्त सरोवरोंसे आवृत था ॥ ४ ॥

प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्रदैर्दिव्यैर्विभूषितम् ।

दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम् ॥ ५ ॥

स्वच्छ जलवाले कितने ही दिव्य सरोवर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । दिव्य सुगन्धका भार वहन करनेवाली पावन वायु मानो वहाँ चँवर डुला रही थी ॥ ५ ॥

उत्पतद्भिरिवाकाशं वृक्षैर्मलयजैरपि ।

शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धतैः ॥ ६ ॥

वहाँ ऊँचे - ऊँचे मलयज वृक्ष ऐसे प्रतीत होते थे, मानो आकाशमें उड़े जा रहे हों । वे वायुके वेगसे विकम्पित हो फूलोंकी वर्षा करते हुए उस प्रदेशकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ६ ॥

वायुविक्षिप्तकुसुमैस्तथान्यैरपि पादपैः ।

किरद्भिरिव तत्रस्थान् नागान् पुष्पाम्बुवृष्टिभिः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 253

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हवाके झोंकेसे दूसरे - दूसरे वृक्षोंके भी फूल झड़ रहे थे, मानो वहाँके वृक्षसमूह वहाँ उपस्थित हुए नागोंपर फूलोंकी वर्षा करते हुए उनके लिये अर्घ्य दे रहे हों ॥ ७ ॥

मनःसंहर्षजं दिव्यं गन्धर्वाप्ससां प्रियम् ।

मत्तभ्रमरसंघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम् ॥ ८ ॥

वह दिव्य वन हृदयके हर्षको बढ़ानेवाला था । गन्धर्व और अप्सराएँ उसे अधिक पसंद करती थीं । मतवाले भ्रमर वहाँ सब ओर गूँज रहे थे। अपनी मनोहर छटाके द्वारा वह अत्यन्त दर्शनीय जान पड़ता था ॥ ८ ॥

रमणीयं शिवं पुण्यं सर्वैर्जनमनोहरैः ।

नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रूपुत्रप्रहर्षणम् ॥ ९ ॥

वह वन रमणीय, मंगलकारी और पवित्र होनेके साथ ही लोगोंके मनको मोहनेवाले सभी उत्तम गुणोंसे युक्त था । भाँति भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त एवं परम सुन्दर होनेके कारण वह कद्रूके पुत्रोंका आनन्द बढ़ा रहा था ॥ ९ ॥

तत् ते वनं समासाद्य विजहुः पन्नगास्तदा ।

अब्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगेश्वरम् ॥ १० ॥

उस वनमें पहुँचकर वे सर्प उस समय सब ओर विहार करने लगे और महापराक्रमी पक्षिराज गरुडसे इस प्रकार बोले - ॥ १० ॥

वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं विमलोदकम् ।

त्वं हि देशान् बहून् रम्यान् व्रजन् पश्यसि खेचर ॥ ११ ॥

‘ खेचर! तुम आकाशमें उड़ते समय बहुत से रमणीय प्रदेश देखा करते हो; अतः हमें निर्मल जलवाले किसी दूसरे रमणीय द्वीपमें ले चलो ' ॥ ११ ॥

स विचिन्त्याब्रवीत् पक्षी मातरं विनतां तदा ।

किं कारणं मया मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम् ॥ १२ ॥

गरुडने कुछ सोचकर अपनी माता विनतासे पूछा- ' माँ! क्या कारण है कि मुझे सर्पोंकी आज्ञाका पालन करना पड़ता है? ' ॥ १२ ॥

विनतोवाच

दासीभूतास्मि दुर्योगात् सपत्न्याः पतगोत्तम ।

पणं वितथमास्थाय सर्पैरुपधिना कृतम् ॥ १३ ॥

विनता बोली- बेटा पक्षिराज! मैं दुर्भाग्यवश सौतकी दासी हूँ, इन सर्पोंने छल करके मेरी जीती हुई बाजीको पलट दिया था ॥ १३ ॥

तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः ।

उवाच वचनं सर्पांस्तेन दुःखेन दुःखितः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 254

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माताके यह कारण बतानेपर आकाशचारी गरुडने उस दुःखसे दुःखी होकर सर्पोंसे कहा— ॥ १४ ॥

किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम् ।

दास्याद् वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहाः ॥ १५ ॥

‘ जीभ लपलपानेवाले सर्पो! तुमलोग सच- सच बताओ मैं तुम्हें क्या लाकर दे दूँ? किस विद्याका लाभ करा दूँ अथवा यहाँ कौन - सा पुरुषार्थ करके दिखा दूँ; जिससे मुझे तथा मेरी माताको तुम्हारी दासतासे छुटकारा मिल जाय ' ॥ १५ ॥

सौतिरुवाच

श्रुत्वा तमब्रुवन् सर्पा आहरामृतमोजसा ।

ततो दास्याद् विप्रमोक्षो भविता तव खेचर ॥ १६ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं -गरुडकी बात सुनकर सर्पोंने कहा – ' गरुड! तुम पराक्रम

करके हमारे लिये अमृत ला दो । इससे तुम्हें दास्यभावसे छुटकारा मिल जायगा' ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

पृष्ठ 255

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अष्टाविंशोऽध्यायः गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना सौतिरुवाच

इत्युक्तो गरुडः सर्पैस्ततो मातरमब्रवीत् ।

गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ॥१ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— सर्पोंकी यह बात सुनकर गरुड अपनी मातासे बोले — '‘ माँ! मैं अमृत लानेके लिये जा रहा हूँ, किंतु मेरे लिये भोजन-सामग्री क्या होगी? यह मैं जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥

विनतोवाच

समुद्रकुक्षावेकान्ते निषादालयमुत्तमम् ।

निषादानां सहस्राणि तान् भुक्त्वामृतमानय ॥ २ ॥

विनताने कहा – समुद्रके बीचमें एक टापू है, जिसके एकान्त प्रदेशमें निषादों (जीवहिंसकों ) - का निवास है । वहाँ सहस्रों निषाद रहते हैं । उन्हींको मारकर खा लो और अमृत ले आओ ॥ २ ॥

न च ते ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कथंचन ।

अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो ह्यनलोपमः ॥ ३ ॥

किंतु तुम्हें किसी प्रकार ब्राह्मणको मारनेका विचार नहीं करना चाहिये; क्योंकि ब्राह्मण

समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है । वह अग्निके समान दाहक होता है ॥ ३ ॥

अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः ।

गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥

कुपित किया हुआ ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष एवं शस्त्रके समान भयंकर होता है ।

ब्राह्मणको समस्त प्राणियोंका गुरु कहा गया है ॥ ४ ॥

एवमादिस्वरूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणो मतः ।

स ते तात न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वथा ॥ ५ ॥

इन्हीं रूपोंमें सत्पुरुषोंके लिये ब्राह्मण आदरणीय माना गया है । तात! तुम्हें क्रोध आ जाय तो भी ब्राह्मणकी हत्यासे सर्वथा दूर रहना चाहिये ॥ ५ ॥

ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन ।

न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात् तथानघ ॥ ६ ॥

यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः ।

पृष्ठ 256

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तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ॥ ७ ॥

भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः । ब्राह्मणोंके साथ किसी प्रकार द्रोह नहीं करना चाहिये । अनघ! कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण क्रोधमें आनेपर अपराधीको जिस प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, उस तरह अग्नि और सूर्य भी नहीं जला सकते । इस प्रकार विविध चिह्नोंके द्वारा तुम्हें ब्राह्मणको पहचान लेना चाहिये । ब्राह्मण समस्त प्राणियोंका अग्रज, सब वर्णोंमें श्रेष्ठ, पिता और गुरु है ॥ ६-७ ॥ गरुड उवाच किंरूपो ब्राह्मणो मातः किंशीलः किंपराक्रमः ॥ ८ ॥

गरुडने पूछा — माँ! ब्राह्मणका रूप कैसा होता है? उसका शील स्वभाव कैसा है? तथा उसमें कौन - सा पराक्रम है ॥ ८ ॥

किंस्विदग्निनिभो भाति किंस्वित् सौम्यप्रदर्शनः ।

यथाहमभिजानीयां ब्राह्मणं लक्षणैः शुभैः ॥ ९ ॥

तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि । वह देखनेमें अग्नि -जैसा जान पड़ता है? अथवा सौम्य दिखायी देता है? माँ! जिस प्रकार शुभ लक्षणोंद्वारा मैं ब्राह्मणको पहचान सकूँ, वह सब उपाय मुझे बताओ ॥ ९ ३ ॥ विनतोवाच यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं बडिशं यथा ॥ १० ॥

दहेदङ्गारवत् पुत्र तं विद्या ब्राह्मणर्षभम् ।

विप्रस्त्वया न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ॥ ११ ॥

विनता बोली- बेटा! जो तुम्हारे कण्ठमें पड़नेपर अंगारकी तरह जलाने लगे और मानो बंसीका काँटा निगल लिया गया हो, इस प्रकार कष्ट देने लगे, उसे वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण समझना । क्रोधमें भरे होनेपर भी तुम्हें ब्रह्महत्या नहीं करनी चाहिये ॥ १०-११ ॥

प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वचः ।

जठरे न च जीर्येद् यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम् ॥ १२ ॥

विनताने पुत्रके प्रति स्नेह होनेके कारण पुनः इस प्रकार कहा - ' बेटा! जो तुम्हारे पेटमें पच न सके, उसे ब्राह्मण जानना' ॥ १२ ॥

पुनः प्रोवाच विनता पुत्रहार्दादिदं वचः ।

जानन्त्यप्यतुलं वीर्यमाशीर्वादपरायणा ॥ १३ ॥

प्रीता परमदुःखार्ता नागैर्विप्रकृता सती ।

पृष्ठ 257

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पुत्रके प्रति स्नेह होनेके कारण विनताने पुनः इस प्रकार कहा-वह पुत्रके अनुपम बलको जानती थी तो भी नागोंद्वारा ठगी जानेके कारण बड़े भारी दुःखसे आतुर हो गयी थी । अतः अपने पुत्रको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देने लगी ॥ १३३ ॥

विनतोवाच पक्षौ ते मारुतः पातु चन्द्रसूर्यौ च पृष्ठतः ॥ १४ ॥

विनताने कहा- बेटा! वायु तुम्हारे दोनों पंखोंकी रक्षा करें, चन्द्रमा और सूर्य पृष्ठभागका संरक्षण करें ॥ १४ ॥

शिरश्च पातु वह्निस्ते वसवः सर्वतस्तनुम् ।

अहं च ते सदा पुत्र शान्तिस्वस्तिपरायणा ॥ १५ ॥

इहासीना भविष्यामि स्वस्तिकारे रता सदा ।

अरिष्टं व्रज पन्थानं पुत्र कार्यार्थसिद्धये ॥ १६ ॥

अग्निदेव तुम्हारे सिरकी और वसुगण तुम्हारे सम्पूर्ण शरीरकी सब ओरसे रक्षा करें । पुत्र! मैं भी तुम्हारे लिये शान्ति एवं कल्याणसाधक कर्ममें संलग्न हो यहाँ निरन्तर कुशल मनाती रहूँगी। वत्स! तुम्हारा मार्ग विघ्नरहित हो, तुम अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये यात्रा करो ॥ १५-१६ ॥ सौतिरुवाच ततः स मातुर्वचनं निशम्य वितत्य पक्षौ नभ उत्पपात । ततो निषादान् बलवानुपागतो बुभुक्षितः काल इवान्तकोऽपरः ॥ १७ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनकादि महर्षियो! माताकी बात सुनकर महाबली गरुड पंख पसारकर आकाशमें उड़ गये तथा क्षुधातुर काल या दूसरे यमराजकी भाँति उन निषादोंके पास जा पहुँचे ॥ १७ ॥

स तान् निषादानुपसंहरंस्तदा रजः समुद्धूय नभःस्पृशं महत् । समुद्रकुक्षौ च विशोषयन् पयः समीपजान् भूधरजान् विचालयन् ॥ १८ ॥

उन निषादोंका संहार करनेके लिये उन्होंने उस समय इतनी अधिक धूल उड़ायी, जो पृथ्वीसे आकाशतक छा गयी । वहाँ समुद्रकी कुक्षिमें जो जल था, उसका शोषण करके उन्होंने समीपवर्ती पर्वतीय वृक्षोंको भी विकम्पित कर दिया ॥ १८ ॥

ततः स चक्रे महदाननं तदा निषादमार्गं प्रतिरुध्य पक्षिराट् ।

पृष्ठ 258

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ततो निषादास्त्वरिताः प्रवव्रजुः यतो मुखं तस्य भुजङ्गभोजिनः ॥ १ ९ ॥ इसके बाद पक्षिराजने अपना मुख बहुत बड़ा कर लिया और निषादोंका मार्ग रोककर खड़े हो गये । तदनन्तर वे निषाद उतावलीमें पड़कर उसी ओर भागे, जिधर सर्पभोजी गरुडका मुख था ॥ १ ९ ॥ तदाननं विवृतमतिप्रमाणवत् समभ्ययुर्गगनमिवार्दिताः खगाः । सहस्रशः पवनरजोविमोहिता यथानिलप्रचलितपादपे वने ॥ २० । जैसे आँधीसे कम्पित वृक्षवाले वनमें पवन और धूलसे विमोहित एवं पीड़ित सहस्रों पक्षी उन्मुक्त आकाशमें उड़ने लगते हैं, उसी प्रकार हवा और धूलकी वर्षासे बेसुध हुए हजारों निषाद गरुडके खुले हुए अत्यन्त विशाल मुखमें समा गये ॥ २० ॥

ततः खगो वदनममित्रतापनः समाहरत् परिचपलो महाबलः । निषूदयन् बहुविधमत्स्यजीविनो बुभुक्षितो गगनचरेश्वरस्तदा ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले, अत्यन्त चपल, महाबली और क्षुधातुर पक्षिराज गरुडने मछली मारकर जीविका चलानेवाले उन अनेकानेक निषादोंका विनाश करनेके लिये अपने मुखको संकुचित कर लिया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २८ ॥

पृष्ठ 259

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना सौतिरुवाच

तस्य कण्ठमनुप्राप्तो ब्राह्मणः सह भार्यया ।

दहन् दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षगः ॥ १ ॥

द्विजोत्तम विनिर्गच्छ तूर्णमास्यादपावृतात् ।

न हि मे ब्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ॥ २ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं - निषादोंके साथ एक ब्राह्मण भी भार्यासहित गरुडके कण्ठमें चला गया था । वह दहकते हुए अंगारकी भाँति जलन पैदा करने लगा । तब आकाशचारी गरुडने उस ब्राह्मणसे कहा- ' द्विजश्रेष्ठ! तुम मेरे खुले हुए मुखसे जल्दी निकल जाओ । ब्राह्मण पापपरायण ही क्यों न हो मेरे लिये सदा अवध्य है ' ॥ १-२ ॥

ब्रुवाणमेवं गरुडं ब्राह्मणः प्रत्यभाषत ।

निषादी मम भार्येयं निर्गच्छतु मया सह ॥ ३ ॥

ऐसी बात कहनेवाले गरुडसे वह ब्राह्मण बोला- ' यह निषाद - जातिकी कन्या मेरी भार्या है; अतः मेरे साथ यह भी निकले ( तभी मैं निकल सकता हूँ) ' ॥ ३ ॥

गरुड उवाच

एतामपि निषादीं त्वं परिगृह्याशु निष्पत ।

तूर्णं सम्भावयात्मानमजीर्णं मम तेजसा ॥ ४ ॥

गरुडने कहा- ब्राह्मण! तुम इस निषादीको भी लेकर जल्दी निकल जाओ । तुम अभीतक मेरी जठराग्निके तेजसे पचे नहीं हो; अतः शीघ्र अपने जीवनकी रक्षा करो ॥ ४ ॥

सौतिरुवाच

ततः स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा ।

वर्धयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह ॥ ५ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— उनके ऐसा कहनेपर वह ब्राह्मण निषादीसहित गरुडके मुखसे निकल आया और उन्हें आशीर्वाद देकर अभीष्ट देशको चला गया ॥ ५ ॥

सहभार्ये विनिष्क्रान्ते तस्मिन् विप्रे च पक्षिराट् ।

पृष्ठ 260

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वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ॥ ६ ॥

भार्यासहित उस ब्राह्मणके निकल जानेपर पक्षिराज गरुड पंख फैलाकर मनके समान तीव्र वेगसे आकाशमें उड़े ॥ ६ ॥

ततोऽपश्यत् स पितरं पृष्टश्चाख्यातवान् पितुः ।

यथान्यायममेयात्मा तं चोवाच महानृषिः ॥ ७ ॥

तदनन्तर उन्हें अपने पिता कश्यपजीका दर्शन हुआ । उनके पूछनेपर अमेयात्मा गरुडने

पितासे यथोचित कुशल- समाचार कहा । महर्षि कश्यप उनसे इस प्रकार बोले ॥ ७ ॥

कश्यप उवाच

कच्चिद् वः कुशलं नित्यं भोजने बहुलं सुत ।

कच्चिच्च मानुषे लोके तवान्नं विद्यते बहु ॥ ८ ॥

कश्यपजीने पूछा — बेटा! तुमलोग कुशलसे तो हो न? विशेषतः प्रतिदिन भोजनके सम्बन्धमें तुम्हें विशेष सुविधा है न? क्या मनुष्यलोकमें तुम्हारे लिये पर्याप्त अन्न मिल जाता ॥ ८ ॥

गरुड उवाच

माता मेमे कुशला शाश्वत् तथा भ्राता तथा ह्यहम् ।

न हि मे कुशलं तात भोजने बहुले सदा ॥ ९ ॥

गरुडने कहा — मेरी माता सदा कुशलसे रहती हैं । मेरे भाई तथा मैं दोनों सकुशल हैं ।

परंतु पिताजी! पर्याप्त भोजनके विषयमें तो सदा मेरे लिये कुशलका अभाव ही है ॥ ९ ॥

अहं हि सर्पः प्रहितः सोममाहर्तुमुत्तमम् ।

मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिष्ये तमद्य वै ॥ १० ॥

मुझे सर्पोंने उत्तम अमृत लानेके लिये भेजा है। माताको दासीपनसे छुटकारा दिलानेके लिये आज मैं निश्चय ही उस अमृतको लाऊँगा ॥ १० ॥

मात्रा चात्र समादिष्टो निषादान् भक्षयेति ह ।

न च मे तृप्तिरभवद् भक्षयित्वा सहस्रशः ॥ ११ ॥

भोजनके विषयमें पूछने पर माताने कहा –' निषादोंका भक्षण करो', परंतु हजारों निषादोंको खा लेनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई है ॥ ११ ॥

तस्माद् भक्ष्यं त्वमपरं भगवन् प्रदिशस्व मे I यद् भुक्त्वामृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ॥ १२ ॥

क्षुत्पिपासाविघातार्थं भक्ष्यमाख्यातु मे भवान् । अतः भगवन्! आप मेरे लिये कोई दूसरा भोजन बताइये । प्रभो! वह भोजन ऐसा हो जिसे खाकर मैं अमृत लानेमें समर्थ हो सकूँ। मेरी भूख- प्यासको मिटा देनेके लिये आप पर्याप्त भोजन बताइये ॥ १२३ ॥