महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 261–270
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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कश्यप उवाच इदं सरो महापुण्यं देवलोकेऽपि विश्रुतम् ॥ १३ ॥
कश्यपजी बोले- बेटा! यह महान् पुण्यदायक सरोवर है, जो देवलोकमें भी विख्यात है ॥ १३ ॥
यत्र कूर्माग्रजं हस्ती सदा कर्षत्यवाङ्मुखः ।
तयोर्जन्मान्तरे वैरं सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १४ ॥
तन्मे तत्त्वं निबोधत्स्व यत्प्रमाणौ च तावुभौ । उसमें एक हाथी नीचेको मुँह किये सदा सूँड़से पकड़कर एक कछुएको खींचता रहता है । वह कछुआ पूर्वजन्ममें उसका बड़ा भाई था । दोनोंमें पूर्वजन्मका वैर चला आ रहा है । उनमें यह वैर क्यों और कैसे हुआ तथा उन दोनोंके शरीरकी लम्बाई-चौड़ाई और ऊँचाई
कितनी है, ये सारी बातें मैं ठीक - ठीक बता रहा हूँ । तुम ध्यान देकर सुनो ॥ १४ ॥
आसीद् विभावसुर्नाम महर्षिः कोपनो भृशम् ॥ १५ ॥
भ्राता तस्यानुजश्चासीत् सुप्रतीको महातपाः ।
स नेच्छति धनं भ्राता सहैकस्थं महामुनिः ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें विभावसु नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे । वे स्वभावके बड़े क्रोधी थे । उनके छोटे भाईका नाम था सुप्रतीक । वे भी बड़े तपस्वी थे । महामुनि सुप्रतीक अपने धनको बड़े भाईके साथ एक जगह नहीं रखना चाहते थे ॥ १५-१६ ॥
विभागं कीर्तयत्येव सुप्रतीको हि नित्यशः ।
अथाब्रवीच्च तं भ्राता सुप्रतीकं विभावसुः ॥ १७ ॥
सुप्रतीक प्रतिदिन बँटवारेके लिये आग्रह करते ही रहते थे । तब एक दिन बड़े भाई विभावसुने सुप्रतीकसे कहा— ॥ १७ ॥
विभागं बहवो मोहात् कर्तुमिच्छन्ति नित्यशः ।
ततो विभक्तास्त्वन्योन्यं विक्रुध्यन्तेऽर्थमोहिताः ॥ १८ ॥
' भाई! बहुत - से मनुष्य मोहवश सदा धनका बँटवारा कर लेनेकी इच्छा रखते हैं । तदनन्तर बँटवारा हो जानेपर धनके मोहमें फँसकर वे एक- दूसरेके विरोधी हो परस्पर क्रोध करने लगते हैं ॥ १८ ॥
ततः स्वार्थपरान् मूढान् पृथग्भूतान् स्वकैर्धनैः ।
विदित्वा भेदयन्त्येतानमित्रा मित्ररूपिणः ॥ १ ९ ॥
‘ वे स्वार्थपरायण मूढ़ मनुष्य अपने धनके साथ जब अलग- अलग हो जाते हैं, तब उनकी यह अवस्था जानकर शत्रु भी मित्ररूपमें आकर मिलते और उनमें भेद डालते रहते हैं ॥ १ ९ ॥ विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्त्यथ ।
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भिन्नानामतुलो नाशः क्षिप्रमेव प्रवर्तते ॥ २० ॥
' दूसरे लोग, उनमें फूट हो गयी है, यह जानकर उनके छिद्र देखा करते हैं एवं छिद्र मिल जानेपर उनमें परस्पर वैर बढ़ानेके लिये स्वयं बीचमें आ पड़ते हैं । इसलिये जो लोग अलग- अलग होकर आपसमें फूट पैदा कर लेते हैं, उनका शीघ्र ही ऐसा विनाश हो जाता है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥
तस्माद् विभागं भ्रातॄणां न प्रशंसन्ति साधवः ।
गुरुशास्त्रे निबद्धानामन्योन्येनाभिशङ्किनाम् ॥ २१ ॥
‘ अतः साधु पुरुष भाइयोंके बिलगाव या बँटवारेकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि इस प्रकार बँट जानेवाले भाई गुरुस्वरूप शास्त्रकी अलंघनीय आज्ञाके अधीन नहीं रह जाते और एक- दूसरेको संदेहकी दृष्टिसे देखने लगते हैं ' ॥ २१ ॥ *
नियन्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि ।
यस्मात् तस्मात् सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यसि ॥ २२ ॥
' सुप्रतीक! तुम्हें वशमें करना असम्भव हो रहा है और तुम भेदभावके कारण ही बँटवारा करके धन लेना चाहते हो, इसलिये तुम्हें हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ेगा' ॥ २२ ॥
शप्तस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमथाब्रवीत् ।
त्वमप्यन्तर्जलचरः कच्छपः सम्भविष्यसि ॥ २३ ॥
इस प्रकार शाप मिलनेपर सुप्रतीकने विभावसुसे कहा – ' तुम भी पानीके भीतर विचरनेवाले कछुए होओगे' ॥ २३ ॥
एवमन्योन्यशापात् तौ सुप्रतीकविभावसू ।
गजकच्छपतां प्राप्तावर्थार्थं मूढचेतसौ ॥ २४ ॥
इस प्रकार सुप्रतीक और विभावसु मुनि एक-दूसरेके शापसे हाथी और कछुएकी योनिमें पड़े हैं । धनके लिये उनके मनमें मोह छा गया था ॥ २४ ॥
रोषदोषानुषङ्गेण तिर्यग्योनिगतावुभौ ।
परस्परद्वेषरतौ प्रमाणबलदर्पितौ ॥ २५ ॥
सरस्यस्मिन् महाकायौ पूर्ववैरानुसारिणौ ।
तयोरन्यतरः श्रीमान् समुपैति महागजः ॥ २६ ॥
यस्य बृंहितशब्देन कूर्मोऽप्यन्तर्जलेशयः ।
उत्थितोऽसौ महाकायः कृत्स्नं विक्षोभयन् सरः ॥ २७ ॥
रोष और लोभरूपी दोषके सम्बन्धसे उन दोनोंको तिर्यक् - योनिमें जाना पड़ा है । वे दोनों विशालकाय जन्तु पूर्व जन्मके वैरका अनुसरण करके अपनी विशालता और बलके घमण्डमें चूर हो एक- दूसरेसे द्वेष रखते हुए इस सरोवरमें रहते हैं । इन दोनोंमें एक जो सुन्दर महान् गजराज है, वह जब सरोवरके तटपर आता है, तब उसके चिग्घाड़नेकी आवाज
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सुनकर जलके भीतर शयन करनेवाला विशालकाय कछुआ भी पानीसे ऊपर उठता है ।
उस समय वह सारे सरोवरको मथ डालता है ॥ २५—२७ ॥
यं दृष्ट्वा वेष्टितकरः पतत्येष गजो जलम् ।
दन्तहस्ताग्रलाङ्गूलपादवेगेन वीर्यवान् ॥ २८ ॥
विक्षोभयंस्ततो नागः सरो बहुझषाकुलम् ।
कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धायाभ्येति वीर्यवान् ॥ २ ९ ॥
उसे देखते ही यह पराक्रमी हाथी अपनी सूँड़ लपेटे हुए जलमें टूट पड़ता है तथा दाँत, सूँड़, पूँछ और पैरोंके वेगसे असंख्य मछलियोंसे भरे हुए समूचे सरोवरमें हलचल मचा देता है । उस समय पराक्रमी कच्छप भी सिर उठाकर युद्धके लिये निकट आ जाता है ॥ २८-२९ ॥
षडुच्छ्रितो योजनानि गजस्तद्विगुणायतः ।
कूर्मस्त्रियोजनोत्सेधो दशयोजनमण्डलः ॥ ३० ॥
हाथीका शरीर छः योजन ऊँचा और बारह योजन लंबा है । कछुआ तीन योजन ऊँचा और दस योजन गोल है ॥ ३० ॥
तावुभौ युद्धसम्मत्तौ परस्परवधैषिणौ ।
उपयुज्याशु कर्मेदं साधयेप्सितमात्मनः ॥ ३१ ॥
वे दोनों एक- दूसरेको मारनेकी इच्छासे युद्धके लिये मतवाले बने रहते हैं । तुम शीघ्र जाकर उन्हीं दोनोंको भोजनके उपयोगमें लाओ और अपने इस अभीष्ट कार्यका साधन करो ॥ ३१ ॥
महाभ्रघनसंकाशं तं भुक्त्वामृतमानय ।
महागिरिसमप्रख्यं घोररूपं च हस्तिनम् ॥ ३२ ॥
कछुआ महान् मेघ- खण्डके समान है और हाथी भी महान् पर्वतके समान भयंकर है ।
उन्हीं दोनोंको खाकर अमृत ले आओ ॥ ३२ ॥
सौतिरुवाच
इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत् तदा ।
युध्यतः सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम् ॥ ३३ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनकजी! कश्यपजी गरुडसे ऐसा कहकर उस समय उनके लिये मंगल मनाते हुए बोले- ' गरुड! युद्धमें देवताओंके साथ लड़ते हुए तुम्हारा मंगल हो ॥ ३३ ॥
पूर्णकुम्भो द्विजा गावो यच्चान्यत् किंचिदुत्तमम् ।
शुभं स्वस्त्ययनं चापि भविष्यति तवाण्डज ॥ ३४ ॥
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‘ पक्षिप्रवर! भरा हुआ कलश, ब्राह्मण, गौएँ तथा और जो कुछ भी मांगलिक वस्तुएँ हैं, वे तुम्हारे लिये कल्याणकारी होंगी ॥ ३४ ॥
युध्यमानस्य संग्रामे देवैः सार्धं महाबल ।
ऋचो यजूंषि सामानि पवित्राणि हवींषि च ॥ ३५ ॥
रहस्यानि च सर्वाणि सर्वे वेदाश्च ते बलम् ।
इत्युक्तो गरुडः पित्रा गतस्तं ह्रदमन्तिकात् ॥ ३६ ॥
‘ महाबली पक्षिराज! संग्राममें देवताओंके साथ युद्ध करते समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, पवित्र हविष्य, सम्पूर्ण रहस्य तथा सभी वेद तुम्हें बल प्रदान करें । ' पिताके ऐसा कहनेपर गरुड उस सरोवरके निकट गये ॥ ३५-३६ ॥
अपश्यन्निर्मलजलं नानापक्षिसमाकुलम् ।
स तत् स्मृत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः ॥ ३७ ॥
नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् ।
समुत्पपात चाकाशं तत उच्चैर्विहंगमः ॥ ३८ ॥
उन्होंने देखा, सरोवरका जल अत्यन्त निर्मल है और नाना प्रकारके पक्षी इसमें सब ओर चहचहा रहे हैं । तदनन्तर भयंकर वेगशाली अन्तरिक्षगामी गरुडने पिताके वचनका स्मरण करके एक पंजेसे हाथीको और दूसरेसे कछुएको पकड़ लिया । फिर वे पक्षिराज आकाशमें ऊँचे उड़ गये ॥ ३७-३८ ॥
सोऽलम्बं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् ।
ते भीताः समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहताः ॥ ३ ९ ॥
नो भञ्ज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः ।
प्रचलाङ्गान् स तान् दृष्ट्वा मनोरथफलद्रुमान् ॥ ४० ॥
अन्यानतुलरूपाङ्गानुपचक्राम खेचरः ।
काञ्चने राजतैश्चैव फलैर्वैदूर्यशाखिनः ।
सागराम्बुपरिक्षिप्तान् भ्राजमानान् महाद्रुमान् ॥ ४१ ॥
उड़कर वे फिर अलम्बतीर्थमें जा पहुँचे । वहाँ ( मेरुगिरिपर) बहुत - से दिव्य वृक्ष अपनी सुवर्णमय शाखा- प्रशाखाओंके साथ लहलहा रहे थे । जब गरुड उनके पास गये, तब उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर वे सभी दिव्य वृक्ष इस भयसे कम्पित हो उठे कि कहीं ये हमें तोड़ न डालें । गरुड रुचिके अनुसार फल देनेवाले उन कल्पवृक्षोंको काँपते देख अनुपम रूप-रंग तथा अंगोंवाले दूसरे- दूसरे महावृक्षोंकी ओर चल दिये । उनकी शाखाएँ वैदूर्य मणिकी थीं और वे सुवर्ण तथा रजतमय फलोंसे सुशोभित हो रहे थे । वे सभी महावृक्ष समुद्रके जलसे अभिषिक्त होते रहते थे ॥ ३ ९ –४१ ॥
तमुवाच खगश्रेष्ठं तत्र रौहिणपादपः ।
अतिप्रवृद्धः सुमहानापतन्तं मनोजवम् ॥ ४२ ॥
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वहीं एक बहुत बड़ा विशाल वटवृक्ष था । उसने मनके समान तीव्र- वेगसे आते हुए पक्षियोंके सरदार गरुडसे कहा ॥ ४२ ॥
रौहिणउवाच
यैषा मम महाशाखा शतयोजनमायता ।
एतामास्थाय शाखां त्वं खादेमौ गजकच्छपौ ॥ ४३ ॥
वटवृक्ष बोला — पक्षिराज! यह जो मेरी सौ योजनतक फैली हुई सबसे बड़ी शाखा है, इसीपर बैठकर तुम इस हाथी और कछुएको खा लो ॥ ४३ ॥
ततो द्रुमं पतगसहस्रसेवितं महीधरप्रतिमवपुः प्रकम्पयन् । खगोत्तमो द्रुतमभिपत्य वेगवान् बभञ्ज तामविरलपत्रसंचयाम् ॥ ४४ ॥
तब पर्वतके समान विशाल शरीरवाले, पक्षियोंमें श्रेष्ठ, वेगशाली गरुड सहस्रों विहंगमोंसे सेवित उस महान् वृक्षको कम्पित करते हुए तुरंत उसपर जा बैठे । बैठते ही अपने असह्य वेगसे उन्होंने सघन पल्लवोंसे सुशोभित उस विशाल शाखाको तोड़ डाला ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्र-विषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ * ‘ कनिष्ठान् पुत्रवत् पश्येज्ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः ' अर्थात् ' बड़ा भाई पिताके समान होता है । वह अपने छोटे भाइयोंको पुत्रके समान देखे । ' यह शास्त्रकी आज्ञा है । जिनमें फूट हो जाती है, वे पीछे इस आज्ञाका पालन नहीं कर पाते ।
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त्रिंशोऽध्यायः गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना सौतिरुवाच
स्पृष्टमात्रा तु पद्भयां सा गरुडेन बलीयसा ।
अभज्यत तरोः शाखा भग्नां चैनामधारयत् ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकादि महर्षियो! महाबली गरुडके पैरोंका स्पर्श होते ही उस वृक्षकी वह महाशाखा टूट गयी; किंतु उस टूटी हुई शाखाको उन्होंने फिर पकड़ लिया ॥ १ ॥
तां भङ्क्त्वा स महाशाखां स्मयमानो विलोकयन् ।
अथात्र लम्बतोऽपश्यद् वालखिल्यानधोमुखान् ॥ २ ॥
उस महाशाखाको तोड़कर गरुड मुसकराते हुए उसकी ओर देखने लगे । इतनेहीमें उनकी दृष्टि वालखिल्य नामवाले महर्षियोंपर पड़ी, जो नीचे मुँह किये उसी शाखामें लटक रहे थे ॥ २ ॥
ऋषयो ह्यत्र लम्बन्ते न हन्यामिति तानृषीन् ।
तपोरतान् लम्बमानान् ब्रह्मर्षीनभिवीक्ष्य सः ॥ ३ ॥
हन्यादेतान् सम्पतन्ती शाखेत्यथ विचिन्त्य सः ।
नखैर्दृढतरं वीरः संगृह्य गजकच्छपौ ॥ ४ ॥
स तद्विनाशसंत्रासादभिपत्य खगाधिपः ।
शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षया ॥ ५ ॥
तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा - ' इसमें ऋषि लटक रहे हैं । मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी। ' यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली । उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अद्भुत पराक्रम किया था ॥ ३–५ ॥
अतिदैवं तु तत् तस्य कर्म दृष्ट्वा महर्षयः ।
विस्मयोत्कम्पहृदया नाम चक्रुर्महाखगे ॥ ६ ॥
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जिसे देवता भी नहीं कर सकते थे, गरुडका ऐसा अलौकिक कर्म देखकर वे महर्षि आश्चर्यसे चकित हो उठे । उनके हृदयमें कम्प छा गया और उन्होंने उस महान् पक्षीका नाम इस प्रकार रखा ( उनके गरुड नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की )- ॥ ६ ॥
गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगमः ।
गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात् पन्नगभोजनः ॥ ७ ॥
ये आकाशमें विचरनेवाले सर्पभोजी पक्षिराज भारी भार लेकर उड़े हैं; इसलिये ( ‘ गुरुम् आदाय उड्डीन इति गरुडः ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ) ये गरुड कहलायेंगे ॥ ७ ॥
ततः शनैः पर्यपतत् पक्षैः शैलान् प्रकम्पयन् ।
एवं सोऽभ्यपतद् देशान् बहून् सगजकच्छपः ॥ ८ ॥
तदनन्तर गरुड अपने पंखोंकी हवासे बड़े - बड़े पर्वतोंको कम्पित करते हुए धीरे - धीरे उड़ने लगे । इस प्रकार वे हाथी और कछुएको साथ लिये हुए ही अनेक देशोंमें उड़ते फिरे ॥ ८ ॥
दयार्थं वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत ।
स गत्वा पर्वतश्रेष्ठं गन्धमादनमञ्जसा ॥ ९ ॥
वालखिल्य ऋषियोंके ऊपर दयाभाव होनेके कारण ही वे कहीं बैठ न सके और उड़ते-उड़ते अनायास ही पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर जा पहुँचे ॥ ९ ॥
ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् ।
ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम् ॥ १० ॥
तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम् ।
शैलशृङ्गप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥ ११ ॥
वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा । पिताने भी अपने पुत्रको देखा । पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था । वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे । उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था । वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे ॥ १०-११ ॥
अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् ।
महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम् ॥ १२ ॥
उनका स्वरूप ऐसा था, जो चिन्तन और ध्यानमें नहीं आ सकता था । वे समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न कर रहे थे । उन्होंने अपने भीतर महान् पराक्रम धारण कर रखा था । वे बहुत भयंकर प्रतीत होते थे । जान पड़ता था, उनके रूपमें स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये हैं ॥ १२ ॥
अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसैः ।
भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां समुद्रजलशोषणम् ॥ १३ ॥
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देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी न तो उन्हें दबा सकता था और न जीत ही सकता था । वे पर्वत -शिखरोंको विदीर्ण करने और समुद्रके जलको सोख लेनेकी शक्ति रखते थे ॥ १३ ॥
लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम् ।
तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान् कश्यपस्तदा ।
विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
वे समस्त संसारको भयसे कम्पित किये देते थे । उनकी मूर्ति बड़ी भयंकर थी । वे साक्षात् यमराजके समान दिखायी देते थे । उन्हें आया देख उस समय भगवान् कश्यपने उनका संकल्प जानकर इस प्रकार कहा ॥ १४ ॥
कश्यप उवाच
पुत्र मा साहसं कार्षीर्मा सद्यो लप्स्यसे व्यथाम् ।
मा त्वां दहेयुः संक्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपाः ॥ १५ ॥
कश्यपजी बोले- बेटा! कहीं दुःसाहसका काम न कर बैठना, नहीं तो तत्काल भारी दुःखमें पड़ जाओगे । सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य महर्षि कुपित होकर तुम्हें भस्म न कर डालें ॥ १५ ॥
सौतिरुवाच
ततः प्रसादयामास कश्यपः पुत्रकारणात् ।
वालखिल्यान् महाभागांस्तपसा हतकल्मषान् ॥ १६ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - तदनन्तर पुत्रके लिये महर्षि कश्यपने तपस्यासे निष्पाप हुए महाभाग वालखिल्य मुनियोंको इस प्रकार प्रसन्न किया ॥ १६ ॥
कश्यप उवाच
प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधनाः ।
चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ १७ ॥
कश्यपजी बोले – तपोधनो! गरुडका यह उद्योग प्रजाके हितके लिये हो रहा है । ये महान् पराक्रम करना चाहते हैं, आपलोग इन्हें आज्ञा दें ॥ १७ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययुः ।
मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिनः ॥ १८ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— भगवान् कश्यपके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे वालखिल्य मुनि उस शाखाको छोड़कर तपस्या करनेके लिये परम पुण्यमय हिमालयपर चले गये ॥ १८ ॥
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ततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुतः ।
शाखाव्याक्षिप्तवदनः पर्यपृच्छत कश्यपम् ॥ १ ९ ॥
उनके चले जानेपर विनतानन्दन गरुडने, जो मुँहमें शाखा लिये रहनेके कारण कठिनाईसे बोल पाते थे, अपने पिता कश्यपजीसे पूछा— ॥ १ ९ ॥
भगवन् क्व विमुञ्चामि तरोः शाखामिमामहम् ।
वर्जितं मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान् मम ॥ २० ॥
‘ भगवन्! इस वृक्षकी शाखाको मैं कहाँ छोड़ दूँ? आप मुझे ऐसा कोई स्थान बतावें जहाँ बहुत दूरतक मनुष्य न रहते हों ' ॥ २० ॥
ततो निःपुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम् ।
अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्याचख्यौ स कश्यपः ॥ २१ ॥
तब कश्यपजीने उन्हें एक ऐसा पर्वत बता दिया, जो सर्वथा निर्जन था । जिसकी कन्दराएँ बर्फसे ढँकी हुई थीं और जहाँ दूसरा कोई मनसे भी नहीं पहुँच सकता था ॥ २१ ॥
तं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखगः ।
जवेनाभ्यपतत् तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः ॥ २२ ॥
उस बड़े पेटवाले पर्वतका पता पाकर महान् पक्षी गरुड उसीको लक्ष्य करके शाखा, हाथी और कछुएसहित बड़े वेगसे उड़े ॥ २२ ॥
न तां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुभ् ।
शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खगः ॥ २३ ॥
गरुड वटवृक्षकी जिस विशाल शाखाको चोंचमें लेकर जा रहे थे, वह इतनी मोटी थी कि सौ पशुओंके चमड़ोंसे बनायी हुई रस्सी भी उसे लपेट नहीं सकती थी ॥ २३ ॥
स ततः शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः ।
कालेन नातिमहता गरुडः पतगेश्वरः ॥ २४ ॥
पक्षिराज गरुड उसे लेकर थोड़ी ही देरमें वहाँसे एक लाख योजन दूर चले आये ॥ २४ ॥
स तं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात् पितुः ।
अमुञ्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचरः ॥ २५ ॥
पिताके आदेशसे क्षणभरमें उस पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने वह विशाल शाखा वहीं छोड़ दी । गिरते समय उससे बड़ा भारी शब्द हुआ ॥ २५ ॥
पक्षानिलहतश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट् ।
मुमोच पुष्पवर्षं च समागलितपादपः ॥ २६ ॥
वह पर्वतराज उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर काँप उठा । उसपर उगे हुए बहुतेरे वृक्ष गिर पड़े और वह फूलोंकी वर्षा - सी करने लगा ॥ २६ ॥
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शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्ततः ।
मणिकाञ्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम् ॥ २७ ॥
उस पर्वतके मणिकांचनमय विचित्र शिखर, जो उस महान् शैलकी शोभा बढ़ा रहे थे, सब ओरसे चूर- चूर होकर गिर पड़े ॥ २७ ॥
शाखिनो बहवश्चापि शाखयाभिहतास्तया ।
काञ्चनैः कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदाः ॥ २८ ॥
उस विशाल शाखासे टकराकर बहुत- से वृक्ष भी धराशायी हो गये । वे अपने सुवर्णमय फूलोंके कारण बिजलीसहित मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे ॥ २८ ॥
ते हेमविकचा भूमौ युताः पर्वतधातुभिः ।
व्यराजञ्छाखिनस्तत्र सूर्यांशुप्रतिरञ्जिताः ॥ २ ९ ॥
सुवर्णमय पुष्पवाले वे वृक्ष धरतीपर गिरकर पर्वतके गेरू आदि धातुओंसे संयुक्त हो सूर्यकी किरणोंद्वारा रँगे हुए- से सुशोभित होते थे ॥ २ ९ ॥
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गमास्थाय स खगोत्तमः ।
भक्षयामास गरुडस्तावुभौ गजकच्छपौ ॥ ३० ॥
तदनन्तर पक्षिराज गरुडने उसी पर्वतकी एक चोटीपर बैठकर उन दोनों - हाथी और कछुएको खाया ॥ ३० ॥
तावुभौ भक्षयित्वा तु स तार्क्ष्यः कूर्मकुञ्जरौ ।
ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजवः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार कछुए और हाथी दोनोंको खाकर महान् वेगशाली गरुड पर्वतकी उस चोटीसे ही ऊपरकी ओर उड़े ॥ ३१ ॥
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशंसिनः ।
इन्द्रस्य वज्रं दयितं प्रजज्वाल भयात् ततः ॥ ३२ ॥
उस समय देवताओंके यहाँ बहुत - से भयसूचक उत्पात होने लगे । देवराज इन्द्रका प्रिय आयुध वज्र भयसे जल उठा ॥ ३२ ॥
सधूमा न्यपतत् सार्चिर्दिवोल्का नभसश्च्युता ।
तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः ॥ ३३ ॥
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणाः ।
स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत् ॥ ३४ ॥
अभूतपूर्वं संग्रामे तदा देवासुरेऽपि च ।
ववुर्वाताः सनिर्घाताः पेतुरुल्काः सहस्रशः ॥ ३५ ॥
आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी । वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुद्गण तथा और जो - जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था । देवासुर संग्रामके समय भी ऐसी