महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 331–340

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 331 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सौतिरुवाच

भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा ।

भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! नागराजके तेजसे भस्म हुए उस वृक्षकी सारी भस्मराशिको एकत्र करके काश्यपने कहा- ॥ ७ ॥

विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पतौ ।

अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ॥ ८ ॥

‘ नागराज! इस वनस्पतिपर आज मेरी विद्याका बल देखो । भुजंगम! मैं तुम्हारे देखते-देखते इस वृक्षको जीवित कर देता हूँ' ॥ ८ ॥

ततः स भगवान् विद्वान् काश्यपो द्विजसत्तमः ।

भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत् ॥ ९ ॥

तदनन्तर सौभाग्यशाली विद्वान् द्विजश्रेष्ठ काश्यपने भस्मराशिके रूपमें विद्यमान उस वृक्षको विद्याके बलसे जीवित कर दिया ॥ ९ ॥

अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम् ।

पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ॥ १० ॥

पहले उन्होंने उसमेंसे अंकुर निकाला, फिर उसे दो पत्तेका कर दिया । इसी प्रकार क्रमशः पल्लव, शाखा और प्रशाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षको पुनः पूर्ववत् खड़ा कर दिया ॥ १० ॥

तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना ।

उवाच तक्षको ब्रह्मन् नैतदत्यद्भुतं त्वयि ॥ ११ ॥

महात्मा काश्यपद्वारा जिलाये हुए उस वृक्षको देखकर तक्षकने कहा— ‘ ब्रह्मन्! तुम-जैसे मन्त्रवेत्तामें ऐसे चमत्कारका होना कोई अद्भुत बात नहीं है ॥ ११ ॥

द्विजेन्द्र यद् विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा ।

कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ॥ १२ ॥

‘ तपस्याके धनी द्विजेन्द्र! जब तुम मेरे या मेरे - जैसे दूसरे सर्पके विषको अपनी विद्याके बलसे नष्ट कर सकते हो तो बताओ, तुम कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो ॥ १२ ॥

यत् तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् ।

अहमेव प्रदास्यामि तत् ते यद्यपि दुर्लभम् ॥ १३ ॥

‘ उस श्रेष्ठ राजासे जो फल प्राप्त करना तुम्हें अभीष्ट है, वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं ही तुम्हें दे दूँगा ॥ १३ ॥

विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे ।

घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशयिता भवेत् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 332

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 332 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ विप्रवर! महाराज परीक्षित् ब्राह्मणके शापसे तिरस्कृत हैं और उनकी आयु भी समाप्त हो चली है । ऐसी दशामें उन्हें जिलानेके लिये चेष्टा करनेपर तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी, इसमें संदेह है ॥ १४ ॥

ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

निरंशुरिव धर्मांशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ॥ १५ ॥

'यदि तुम सफल न हुए तो तीनों लोकोंमें विख्यात एवं प्रकाशित तुम्हारा यश किरणरहित सूर्यके समान इस लोकसे अदृश्य हो जायगा' ॥ १५ ॥

काश्यप उवाच

धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम ।

ततोऽहं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ॥ १६ ॥

काश्यपने कहा — नागराज तक्षक! मैं तो वहाँ धनके लिये ही जाता हूँ, वह तुम्हीं मुझे दे दो तो उस धनको लेकर मैं घर लौट जाऊँगा ॥ १६ ॥

तक्षक उवाच

यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद् राज्ञस्ततोऽधिकम् ।

अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ॥ १७ ॥

तक्षक बोला —द्विजश्रेष्ठ! तुम राजा परीक्षित्से जितना धन पाना चाहते हो, उससे अधिक मैं ही दे दूँगा, अतः लौट जाओ ॥ १७ ॥

सौतिरुवाच

तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः ।

प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् ॥ १८ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— तक्षककी बात सुनकर परम बुद्धिमान् महातेजस्वी विप्रवर काश्यपने राजा परीक्षित्के विषयमें कुछ देर ध्यान लगाकर सोचा ॥ १८ ॥

दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा ।

क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ॥ १ ९ ॥

लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद् यावदीप्सितम् ।

निवृत्ते काश्यपे तस्मिन् समयेन महात्मनि ॥ २० ॥

जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् ।

अथ शुश्राव गच्छन् स तक्षको जगतीपतिम् ॥ २१ ॥

मन्त्रैर्गदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः ।

पृष्ठ 333

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 333 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तेजस्वी काश्यप दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थे । उस समय उन्होंने जान लिया कि पाण्डववंशी राजा परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो गयी है, अतः वे मुनिश्रेष्ठ तक्षकसे अपनी रुचिके अनुसार धन लेकर वहाँसे लौट गये । महात्मा काश्यपके समय रहते लौट जानेपर तक्षक तुरंत हस्तिनापुर नगरमें जा पहुँचा । वहाँ जानेपर उसने सुना, राजा परीक्षित्की मन्त्रों तथा विष उतारनेवाली ओषधियोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जा रही है ॥ १ ९ –२१ ॥ सौतिरुवाच सचिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिवः ॥ २२ ॥

मया वञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति ।

ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत् स भुजङ्गमान् ॥ २३ ॥

फलदर्भोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः । उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! तब तक्षकने विचार किया, मुझे मायाका आश्रय लेकर राजाको ठग लेना चाहिये; किंतु इसके लिये क्या उपाय हो? तदनन्तर तक्षक नागने फल, दर्भ ( कुशा ) और जल लेकर कुछ नागोंको तपस्वीरूपमें राजाके पास जानेकी आज्ञा दी ॥ २२-२३३ ॥ तक्षक उवाच गच्छध्वं यूयमव्यग्रा राजानं कार्यवत्तया ॥ २४ ॥

फलपुष्पोदकं नाम प्रतिग्राहयितुं नृपम् । तक्षकने कहा — तुमलोग कार्यकी सफलताके लिये राजाके पास जाओ, किंतु तनिक भी व्यग्र न होना । तुम्हारे जानेका उद्देश्य है- महाराजको फल, फूल और जल भेंट करना ॥ २४ ॥

सौतिरुवाच ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः ॥ २५ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— तक्षकके आदेश देनेपर उन नागोंने वैसा ही किया ॥ २५ ॥

उपनिन्युस्तथा राज्ञे दर्भानापः फलानि च ।

तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ॥ २६ ॥

वे राजाके पास कुश, जल और फल लेकर गये । परम पराक्रमी महाराज परीक्षित्ने उनकी दी हुई वे सब वस्तुएँ ग्रहण कर लीं ॥ २६ ॥

कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् ।

गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु ॥ २७ ॥

अमात्यान् सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः ।

भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 334

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 334 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया ।

ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत ॥ २ ९ ॥

- तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा– ' अब आपलोग जायँ । ' तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसे कहा — ‘ ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं । इन्हें मेरे साथ आपलोग भी खायँ। ' ऐसा कहकर मन्त्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की ॥ २७–२९ ॥

विधिना सम्प्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु ।

यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवाभक्षयत् स्वयम् ॥ ३० ॥

विधाताके विधान एवं महर्षिके वचनसे प्रेरित होकर राजाने वही फल स्वयं खाया, जिसपर तक्षक नाग बैठा था ॥ ३० ॥

ततो भक्षयतस्तस्य फलात् कृमिरभूदणुः ।

ह्रस्वकः कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोऽथ शौनक ॥ ३१ ॥

शौनकजी! खाते समय राजाके हाथमें जो फल था, उससे एक छोटा - सा कीट प्रकट हुआ । देखनेमें वह अत्यन्त लघु था, उसकी आँखें काली और शरीरका रंग ताँबेके समान था ॥ ३१ ॥

सतं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत् ।

अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ॥ ३२ ॥

नृपश्रेष्ठ परीक्षित्‌ने उस कीड़ेको हाथमें लेकर मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ' अब सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये इस समय मुझे सर्पके विषसे कोई भय नहीं है ॥ ३२ ॥

सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मां दशतामयम् ।

तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ॥ ३३ ॥

' वे मुनि सत्यवादी हों, इसके लिये यह कीट ही तक्षक नाम धारण करके मुझे डँस ले ।

ऐसा करनेसे मेरे दोषका परिहार हो जायगा ॥ ३३ ॥

ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः ।

एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह ॥ ३४ ॥

कृमिकं प्राहसत् तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः ।

प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्ट्यत ॥ ३५ ॥

तस्मात् फलाद् विनिष्क्रम्य यत् तद् राज्ञे निवेदितम् ।

वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम् ।

अदशत् पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः ॥ ३६ ॥

कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बात कहकर राजाधिराज परीक्षित् उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर- जोर से हँसने लगे । वे

पृष्ठ 335

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 335 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्काल ही मरनेवाले थे; अतः उनकी बुद्धि मारी गयी थी । राजा अभी हँस ही रहे थे कि उन्हें जो निवेदित किया गया था उस फलसे निकलकर तक्षक नागने अपने शरीरसे उनको जकड़ लिया । इस प्रकार वेगपूर्वक उनके शरीरमें लिपटकर नागराज तक्षकने बड़े जोरसे गर्जना की और भूपाल परीक्षित्को डँस लिया ॥ ३४–३६ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि तक्षकदंशे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें तक्षक-दंशनविषयक तैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 336

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 336 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः जनमेजयका राज्याभिषेक और विवाह सौतिरुवाच

ते तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम् ।

विषण्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! मन्त्रीगण राजा परीक्षित्‌को तक्षक नागसे जकड़ा हुआ देख अत्यन्त दुःखी हो गये । उनके मुखपर विषाद छा गया और वे सब - के--सब रोने लगे ॥ १ ॥

तंतु नादं ततः श्रुत्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः ।

अपश्यन्त तथा यान्तमाकाशे नागमद्भुतम् ॥ २ ॥

सीमन्तमिव कुर्वाणं नभसः पद्मवर्चसम् ।

तक्षकं पन्नगश्रेष्ठं भृशं शोकपरायणाः ॥ ३ ॥

तक्षककी फुंकारभरी गर्जना सुनकर मन्त्रीलोग भाग चले । उन्होंने देखा लाल कमलकी - सी कान्ति- वाला वह अद्भुत नाग आकाशमें सिन्दूरकी रेखा- सी खींचता हुआ चला जा रहा है । नागोंमें श्रेष्ठ तक्षकको इस प्रकार जाते देख वे राजमन्त्री अत्यन्त शोकमें डूब गये ॥ २-३ ॥ ततस्तु ते तद् गृहमग्निनाऽऽवृतं प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः । भयात् परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे पपात राजाशनिताडितो यथा ॥ ४ ॥

वह राजमहल सर्पके विषजनित अग्निसे आवृत हो धू- धू करके जलने लगा । यह देख उन सब मन्त्रियोंने भयसे उस स्थानको छोड़कर भिन्न - भिन्न दिशाओंकी शरण ली तथा राजा परीक्षित् वज्रके मारे हुएकी भाँति धरतीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

ततो नृपे तक्षकतेजसा हते प्रयुज्य सर्वाः परलोकसत्क्रियाः । शुचिर्द्विजो राजपुरोहितस्तदा तथैव ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः ॥ ५ ॥

नृपं शिशुं तस्य सुतं प्रचक्रिरे समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः । नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनं

पृष्ठ 337

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 337 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कुरुप्रवीरं जनमेजयं जनाः ॥ ६ ॥

तक्षककी विषाग्निद्वारा राजा परीक्षित्के दग्ध हो जानेपर उनकी समस्त पारलौकिक क्रियाएँ करके पवित्र ब्राह्मण राजपुरोहित, उन महाराजके मन्त्री तथा समस्त पुरवासी मनुष्योंने मिलकर उन्हींके पुत्रको, जिसकी अवस्था अभी बहुत छोटी थी, राजा बना दिया । कुरुकुलका वह श्रेष्ठ वीर अपने शत्रुओंका विनाश करनेवाला था । लोग उसे राजा जनमेजय कहते थे ॥ ५-६ ॥ स बाल एवार्यमतिर्नृपोत्तमः सहैव तैर्मन्त्रिपुरोहितैस्तदा । शशास राज्यं कुरुपुङ्गवाग्रजो यथास्य वीरः प्रपितामहस्तथा ॥ ७ ॥

बचपनमें ही नृपश्रेष्ठ जनमेजयकी बुद्धि श्रेष्ठ पुरुषोंके समान थी । अपने वीर प्रपितामह महाराज युधिष्ठिरकी भाँति कुरुश्रेष्ठ वीरोंके अग्रगण्य जनमेजय भी उस समय मन्त्री और पुरोहितोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगे ॥ ७ ॥

ततस्तु राजानममित्रतापनं समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः । सुवर्णवर्माणमुपेत्य काशिपं वपुष्टमार्थं वरयाम्प्रचक्रमुः ॥ ८ ॥

राजमन्त्रियोंने देखा, राजा जनमेजय शत्रुओंको दबानेमें समर्थ हो गये हैं, तब उन्होंने काशिराज सुवर्णवर्माके पास जाकर उनकी पुत्री वपुष्टमाके लिये याचना की ॥ ८ ॥

ततः स राजा प्रददौ वपुष्टमां

कुरुप्रवीराय परीक्ष्य धर्मतः ।

स चापि तां प्राप्य मुदायुतोऽभव- न्न चान्यनारीषु मनोदधे क्वचित् ॥ ९ ॥

काशिराजने धर्मकी दृष्टिसे भलीभाँति जाँच- पड़ताल करके अपनी कन्या वपुष्टमाका विवाह कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर जनमेजयके साथ कर दिया । जनमेजयने भी वपुष्टमाको पाकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया और दूसरी स्त्रियोंकी ओर कभी अपने मनको नहीं जाने दिया ॥ ९ ॥

सरःसु फुल्लेषु वनेषु चैव हि प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान् । तथा स राजन्यवरो विजह्निवान् यथोर्वशीं प्राप्य पुरा पुरूरवाः ॥ १० ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी जनमेजयने प्रसन्न -चित्त होकर सरोवरों तथा पुष्पशोभित उपवनोंमें रानी वपुष्टमाके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे पूर्वकालमें उर्वशीको पाकर

पृष्ठ 338

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 338 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाराज पुरूरवाने किया था ॥ १० ॥

वपुष्टमा चापि वरं पतिव्रता प्रतीतरूपा समवाप्य भूपतिम् । भावेन रामा रमयाम्बभूव सा विहारकालेष्ववरोधसुन्दरी ॥ ११ ॥

वपुष्टमा पतिव्रता थी । उसका रूपसौन्दर्य सर्वत्र विख्यात था । वह राजाके अन्तःपुरमें सबसे सुन्दरी रमणी थी । राजा जनमेजयको पतिरूपमें प्राप्त करके वह विहारकालमें बड़े अनुरागके साथ उन्हें आनन्द प्रदान करती थी ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जनमेजयराज्याभिषेके चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जनमेजयराज्याभिषेकसम्बन्धी चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 339

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 339 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप सौतिरुवाच

एतस्मिन्नेव काले तु जरत्कारुर्महातपाः ।

चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसायंगृहो मुनिः ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं -इन्हीं दिनोंकी बात है, महातपस्वी जरत्कारु मुनि सम्पूर्ण

पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे । जहाँ सायंकाल हो जाता, वहीं वे ठहर जाते थे ॥ १ ॥

चरन् दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः ।

तीर्थेष्वाप्लवनं कृत्वा पुण्येषु विचचार ह ॥ २ ॥

उन महातेजस्वी महर्षिने ऐसे कठोर नियमोंकी दीक्षा ले रखी थी, जिनका पालन करना दूसरे अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये सर्वथा कठिन था । वे पवित्र तीर्थोंमें स्नान करते हुए विचर रहे थे ॥ २ ॥

वायुभक्षो निराहारः शुष्यन्नहरहर्मुनिः ।

स ददर्श पितॄन् गर्ते लम्बमानानधोमुखान् ॥ ३ ॥

एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान् ।

तं तन्तुं च शनैराखुमाददानं बिलेशयम् ॥ ४ ॥

वे मुनि वायु पीते और निराहार रहते थे; इसलिये दिन - पर-दिन सूखते चले जाते थे । एक दिन उन्होंने पितरोंको देखा, जो नीचे मुँह किये एक गड्ढेमें लटक रहे थे । उन्होंने खश

नामक तिनकोंके समूहको पकड़ रखा था, जिसकी जड़में केवल एक तन्तु बच गया था ।

उस बचे हुए तन्तुको भी वहीं बिलमें रहनेवाला एक चूहा धीरे- धीरे खा रहा था ॥ ३-४ ॥

निराहारान् कृशान् दीनान् गर्ते स्वत्राणमिच्छतः ।

उपसृत्य स तान् दीनान् दीनरूपोऽभ्यभाषत ॥ ५ ॥

वे पितर निराहार, दीन और दुर्बल हो गये थे और चाहते थे कि कोई हमें इस गड्ढेमें गिरनेसे बचा ले । जरत्कारु उनकी दयनीय दशा देखकर दयासे द्रवित हो स्वयं भी दीन हो गये और उन दीन- दुःखी पितरोंके समीप जाकर बोले— ॥ ५ ॥

के भवन्तोऽवलम्बन्ते वीरणस्तम्बमाश्रिताः ।

दुर्बलं खादितैर्मूलैराखुना बिलवासिना ॥ ६ ॥

‘ आपलोग कौन हैं जो खशके गुच्छेके सहारे लटक रहे हैं? इस खशकी जड़ें यहाँ बिलमें रहनेवाले चूहेने खा डाली हैं, इसलिये यह बहुत कमजोर है ॥ ६ ॥

वीरणस्तम्बके मूलं यदप्येकमिह स्थितम् ।

तदप्ययं शनैराखुरादत्ते दशनैः शितैः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 340

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 340 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ खशके इस गुच्छेमें जो मूलका एक तन्तु यहाँ बचा है, उसे भी यह चूहा अपने तीखे दाँतोंसे धीरे - धीरे कुतर रहा है ॥ ७ ॥

छेत्स्यतेऽल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव ।

ततस्तु पतितारोऽत्र गर्ते व्यक्तमधोमुखाः ॥ ८ ॥

‘ उसका स्वल्प भाग शेष है, वह भी बात की- बातमें कट जायगा । फिर तो आपलोग नीचे मुँह किये निश्चय ही इस गड्ढे में गिर जायँगे ॥ ८ ॥

तस्य मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युष्मानधोमुखान् ।

कृच्छ्रमापदमापन्नान् प्रियं किं करवाणि वः ॥ ९ ॥

तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुनः ।

अर्धेन वापि निस्तर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम् ॥ १० ॥

' आपको इस प्रकार नीचे मुँह किये लटकते देख मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है । आपलोग बड़ी कठिन विपत्तिमें पड़े हैं । मैं आपलोगोंका कौन प्रिय कार्य करूँ? आपलोग मेरी इस तपस्याके चौथे, तीसरे अथवा आधे भागके द्वारा भी इस विपत्तिसे बचाये जा सकें तो शीघ्र बतलावें ॥ ९ -१० ॥

अथवापि समग्रेण तरन्तु तपसा मम ।

भवन्तः सर्व एवेह काममेवं विधीयताम् ॥ ११ ॥

‘ अथवा मेरी सारी तपस्याके द्वारा भी यदि आप सभी लोग यहाँ इस संकटसे पार हो सकें तो भले ही ऐसा कर लें ' ॥ ११ ॥

पितर ऊचुः

वृद्धो भवान् ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि ।

न तु विप्राग्रय तपसा शक्यते तद् व्यपोहितुम् ॥ १२ ॥

पितरोंने कहा — विप्रवर! आप बूढ़े ब्रह्मचारी हैं, जो यहाँ हमारी रक्षा करना चाहते हैं; किंतु हमारा संकट तपस्यासे नहीं टाला जा सकता ॥ १२ ॥

अस्ति नस्तात तपसः फलं प्रवदतां वर ।

संतानप्रक्षयाद् ब्रह्मन् पताम निरयेऽशुचौ ॥ १३ ॥

तात! तपस्याका बल तो हमारे पास भी है । वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! हम तो वंशपरम्पराका विच्छेद होनेके कारण अपवित्र नरकमें गिर रहे हैं ॥ १३ ॥

संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामहः ।

लम्बतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै ॥ १४ ॥

ब्रह्माजीका वचन है कि संतान ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है । तात! यहाँ लटकते हुए हमलोगोंकी सुध- बुध प्रायः खो गयी है, हमें कुछ ज्ञात नहीं होता ॥ १४ ॥

येन त्वा नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम् ।