श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 321–330
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
पृष्ठ 321
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः ।
यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् ॥ २२ ॥
शमीक बोले- वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है । यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है । हमलोग उन महाराज परीक्षित्के राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है । अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है । हमारे - जैसे साधु पुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये । बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है । यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है ॥ २०–२२ ॥
न शक्नुयाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम् ।
रक्ष्यमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः ॥ २३ ॥
चरामो विपुलं धर्मं तेषां भागोऽस्ति धर्मतः ।
सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ॥ २४ ॥
पुत्र! हम राजाके बिना सुखपूर्वक धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकते । तात! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाओंके द्वारा सुरक्षित होकर हम अधिक- से - अधिक धर्मका आचरण कर पाते हैं । अतः हमारे पुण्यकर्मोंमें धर्मतः उनका भी भाग है । इसलिये वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको तो क्षमा ही कर देना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
परिक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहः ।
रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो ॥ २५ ॥
परीक्षित् तो विशेषरूपसे अपने प्रपितामह युधिष्ठिर आदिकी भाँति हमारी रक्षा करते हैं । शक्तिशाली पुत्र! प्रत्येक राजाको इसी प्रकार प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २५ ॥
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना ।
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ २६ ॥
वे आज भूखे और थके - माँदे यहाँ आये थे । वे तपस्वी नरेश मेरे इस मौन- व्रतको नहीं जानते थे; मैं समझता हूँ इसीलिये उन्होंने मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर दिया ॥ २६ ॥
अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा ।
उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥ २७ ॥
जिस देशमें राजा न हो वहाँ अनेक प्रकारके दोष (चोर आदिके भय ) पैदा होते हैं । धर्मकी मर्यादा त्यागकर उच्छृंखल बने हुए लोगोंको राजा अपने दण्डके द्वारा शिक्षा देता है ॥ २७ ॥
दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा ।
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥ २८ ॥
दण्डसे भय होता है, फिर भयसे तत्काल शान्ति स्थापित होती है । जो चोर आदिके भयसे उद्विग्न है, वह धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता । वह उद्विग्न पुरुष यज्ञ, श्राद्ध आदि
पृष्ठ 322
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शास्त्रीय कर्मोंका आचरण भी नहीं कर सकता ॥ २८ ॥
राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः ।
राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥ २ ९ ॥
राजासे धर्मकी स्थापना होती है और धर्मसे स्वर्गलोककी प्रतिष्ठा (प्राप्ति ) होती है । राजासे सम्पूर्ण यज्ञकर्म प्रतिष्ठित होते हैं और यज्ञसे देवताओंकी प्रतिष्ठा होती है ॥ २ ९ ॥
देवाद् वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः ।
ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन् सततं हितम् ॥ ३० ॥
मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः ।
दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥ ३१ ॥
देवताके प्रसन्न होनेसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न पैदा होता है और अन्नसे निरन्तर मनुष्योंके हितका पोषण करते हुए राज्यका पालन करनेवाला राजा मनुष्योंके लिये विधाता ( धारण- पोषण करनेवाला ) है । राजा दस श्रोत्रियके समान है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३०-३१ ॥
तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना ।
अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ ३२ ॥
वे तपस्वी राजा यहाँ भूखे- प्यासे और थके - माँदे आये थे । उन्हें मेरे इस मौन -व्रतका पता नहीं था, इसलिये मेरे न बोलनेसे रुष्ट होकर उन्होंने ऐसा किया है ॥ ३२ ॥
कस्मादिदं त्वया बाल्यात् सहसा दुष्कृतं कृतम् ।
न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ॥ ३३ ॥
तुमने मूर्खतावश बिना विचारे क्यों यह दुष्कर्म कर डाला? बेटा! राजा हमलोगोंसे शाप पानेके योग्य नहीं हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-शापविषयक इकतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
पृष्ठ 323
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित्के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत शृङ्गयुवाच
यद्येतत् साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् ।
प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृषा भवेत् ॥ १ ॥
शृंगी बोला - तात! यदि यह साहस है अथवा यदि मेरे द्वारा दुष्कर्म हो गया है तो हो जाय। आपको यह प्रिय लगे या अप्रिय, किंतु मैंने जो बात कह दी है, वह झूठी नहीं हो सकती ॥ १ ॥
नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते ।
नाहं मृषा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ॥ २ ॥
पिताजी! मैं आपसे सच कहता हूँ, अब यह शाप टल नहीं सकता । मैं हँसी- मजाकमें भी झूठ नहीं बोलता, फिर शाप देते समय कैसे झूठी बात कह सकता हूँ ॥ २ ॥
शमीक उवाच
जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यगिरं तथा ।
नानृतं चोक्तपूर्वं ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ ३ ॥
शमीकने कहा- बेटा! मैं जानता हूँ तुम्हारा प्रभाव उग्र है, तुम बड़े सत्यवादी हो, तुमने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है; अतः यह शाप मिथ्या नहीं होगा ॥ ३ ॥
पित्रा पुत्रो वयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु ।
यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद् यशः ॥ ४ ॥
तथापि पिताको उचित है कि वह अपने पुत्रको बड़ी अवस्थाका हो जानेपर भी सदा सत्कर्मोंका उपदेश देता रहे; जिससे वह गुणवान् हो और महान् यश प्राप्त करे ॥ ४ ॥
किं पुनर्बाल एव त्वं तपसा भावितः सदा ।
वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ॥ ५ ॥
फिर तुम्हें उपदेश देनेकी तो बात ही क्या है, तुम तो अभी बालक ही हो । तुमने सदा तपस्याके द्वारा अपनेको दिव्य शक्तिसे सम्पन्न किया है । जो योगजनित ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं, ऐसे प्रभावशाली तेजस्वी पुरुषोंका भी क्रोध अधिक बढ़ जाता है; फिर तुम - जैसे बालकको क्रोध हो, इसमें कहना ही क्या है ॥ ५ ॥
सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर ।
पृष्ठ 324
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥ ६ ॥
( किंतु यह क्रोध धर्मका नाशक होता है ) इसलिये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुम्हारे बचपन और दुःसाहसपूर्ण कार्यको देखकर मैं तुम्हें कुछ कालतक उपदेश देनेकी आवश्यकता समझता हूँ ॥ ६ ॥
स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।
चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥ ७ ॥
तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ॥ ७ ॥
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।
ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥ ८ ॥
क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है । फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ॥ ८ ॥
शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः ।
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥ ९ ॥
शम ( मनोनिग्रह ) ही क्षमाशील साधकोंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाला है । जिनमें क्षमा है, उन्हींके लिये यह लोक और परलोक दोनों कल्याणकारक हैं ॥ ९ ॥
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः ।
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥ १० ॥
इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो । क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ॥ १० ॥
मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै ।
तत् करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै ॥ ११ ॥
मम पुत्रेण शप्तोऽसि बालेन कृशबुद्धिना ।
ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा ॥ १२ ॥
तात! मैं तो शान्ति धारण करके अब जो कुछ किया जा सकता है, वह करूँगा । राजाके पास यह संदेश भेज दूँगा कि ' राजन्! तुम्हारे द्वारा मुझे जो तिरस्कार प्राप्त हुआ है उसे देखकर अमर्षमें भरे हुए मेरे अल्पबुद्धि एवं मूढ़ पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है ' ॥ ११-१२ ॥ सौतिरुवाच
एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः ।
परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥ १३ ॥
पृष्ठ 325
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च ।
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥ १४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं -उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दयालु एवं महातपस्वी शमीक मुनिने अपने गौरमुख नामवाले एकाग्रचित्त एवं शीलवान् शिष्यको इस प्रकार आदेश दे कुशल- प्रश्न, कार्य एवं वृतान्तका संदेश देकर राजा परीक्षित्के पास भेजा ॥ १३-१४ ॥
सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् ।
विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः ॥ १५ ॥
गौरमुख वहाँसे शीघ्र कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज परीक्षित्के पास चला गया । राजधानीमें पहुँचनेपर द्वारपालने पहले महाराजको उसके आनेकी सूचना दी और उनकी आज्ञा मिलनेपर गौरमुखने राजभवनमें प्रवेश किया ॥ १५ ॥
पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा ।
आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥
शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । महाराज परीक्षित्ने उस समय गौरमुख ब्राह्मणका बड़ा सत्कार किया । जब उसने विश्राम कर लिया, तब शमीकके कहे हुए घोर वचनको मन्त्रियोंके समीप राजाके सामने पूर्णरूपसे कह सुनाया ॥ १६३ ॥
गौरमुख उवाच शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ॥ १७ ॥
ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः ।
तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥ १८ ॥
अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च ।
क्षान्तवांस्तव तत् कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ॥ १ ९ ॥
गौरमुख बोला- महाराज! आपके राज्यमें शमीक नामवाले एक परम धर्मात्मा महर्षि रहते हैं । वे जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले और महान् तपस्वी हैं । नरव्याघ्र! आपने मौन व्रत धारण करनेवाले उन महात्माके कंधेपर धनुषकी नोकसे उठाकर एक मरा हुआ साँप रख दिया था । महर्षिने तो उसके लिये आपको क्षमा कर दिया था, किंतु उनके पुत्रको वह सहन नहीं हुआ ॥ १७–१९ ॥
तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै ।
तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ॥ २० ॥
राजेन्द्र! उस ऋषिकुमारने आज अपने पिताके अनजानमें ही आपके लिये यह शाप दिया है कि ‘ आजसे सात रातके बाद ही तक्षक नाग आपकी मृत्युका कारण हो जायगा' ॥ २० ॥
पृष्ठ 326
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत् ।
तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ॥ २१ ॥
इस दशामें आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था करें । यह मुनिने बार- बार कहा है । उस शापको कोई भी टाल नहीं सकता ॥ २१ ॥
न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् ।
ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन् हितार्थिना ॥ २२ ॥
स्वयं महर्षि भी क्रोधमें भरे हुए अपने पुत्रको शान्त नहीं कर पा रहे हैं । अतः राजन्! आपके हितकी इच्छासे उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है ॥ २२ ॥
सौतिरुवाच
इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः ।
पर्यतप्यत तत् पापं कृत्वा राजा महातपाः ॥ २३ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - यह घोर वचन सुनकर कुरुनन्दन राजा परीक्षित् मुनिका अपराध करनेके कारण मन - ही - मन संतप्त हो उठे ॥ २३ ॥
तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा ।
भूय एवाभवद् राजा शोकसंतप्तमानसः ॥ २४ ॥
वे श्रेष्ठ महर्षि उस समय वनमें मौन--व्रतका पालन कर रहे थे, यह सुनकर राजा परीक्षित्का मन और भी शोक एवं संतापमें डूब गया ॥ २४ ॥
अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च ।
पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत् किल्बिषं मुनेः ॥ २५ ॥
शमीक मुनिकी दयालुता और अपने द्वारा उनके प्रति किये हुए उस अपराधका विचार करके वे अधिकाधिक संतप्त होने लगे ॥ २५ ॥
न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत ।
अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ॥ २६ ॥
देवतुल्य राजा परीक्षित्को अपनी मृत्युका शाप सुनकर वैसा संताप नहीं हुआ जैसा कि मुनिके प्रति किये हुए अपने उस बर्तावको याद करके वे शोकमग्न हो रहे थे ॥ २६ ॥
ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा ।
भूयः प्रसादं भगवान् करोत्विह ममेति वै ॥ २७ ॥
तदनन्तर राजाने यह संदेश देकर उस समय गौरमुखको विदा किया कि ‘ भगवान् शमीक मुनि यहाँ पधारकर पुनः मुझपर कृपा करें ' ॥ २७ ॥
तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा ।
मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः ॥ २८ ॥
पृष्ठ 327
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गौरमुखके चले जानेपर राजाने उद्विग्नचित्त हो मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा की ॥ २८ ॥
सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित् ।
प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ॥ २ ९ ॥
मन्त्र-तत्त्वके ज्ञाता महाराजने मन्त्रियोंसे सलाह करके एक ऊँचा महल बनवाया;
जिसमें एक ही खंभा लगा था । वह भवन सब ओरसे सुरक्षित था ॥ २ ९ ॥
रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च ।
ब्राह्मणान् मन्त्रसिद्धांश्च सर्वतो वै न्ययोजयत् ॥ ३० ॥
राजाने वहाँ रक्षाके लिये आवश्यक प्रबन्ध किया, उन्होंने सब प्रकारकी ओषधियाँ जुटा लीं और वैद्यों तथा मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणोंको सब ओर नियुक्त कर दिया ॥ ३० ॥
राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः ।
मन्त्रिभिः सह धर्मज्ञः समन्तात् परिरक्षितः ॥ ३१ ॥
वहीं रहकर वे धर्मज्ञ नरेश सब ओरसे सुरक्षित हो मन्त्रियोंके साथ सम्पूर्ण राज-कार्यकी व्यवस्था करने लगे ॥ ३१ ॥
न चैनं कश्चिदारूढं लभते राजसत्तमम् ।
वातोऽपि निश्चरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते ॥ ३२ ॥
उस समय महलमें बैठे हुए महाराजसे कोई भी मिलने नहीं पाता था । वायुको भी वहाँसे निकल जानेपर पुनः प्रवेशके समय रोका जाता था ॥ ३२ ॥
प्राप्ते च दिवसे तस्मिन् सप्तमे द्विजसत्तमः ।
काश्यपोऽभ्यागमद् विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम् ॥ ३३ ॥
सातवाँ दिन आनेपर मन्त्रशास्त्रके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ काश्यप राजाकी चिकित्सा करनेके लिये आ रहे थे ॥ ३३ ॥
श्रुतं हि तेन तदभूद् यथा तं राजसत्तमम् ।
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम् ॥ ३४ ॥
उन्होंने सुन रखा था कि ‘ भूपशिरोमणि परीक्षित्को आज नागोंमें श्रेष्ठ तक्षक यमलोक पहुँचा देगा ' ॥ ३४ ॥
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् ।
तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन् ॥ ३५ ॥
अतः उन्होंने सोचा कि नागराजके हँसे हुए महाराजका विष उतारकर मैं उन्हें जीवित कर दूँगा । ऐसा करनेसे वहाँ मुझे धन तो मिलेगा ही, लोकोपकारी राजाको जिलानेसे धर्म भी होगा ॥ ३५ ॥
तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि ।
गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः ॥ ३६ ॥
पृष्ठ 328
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् ।
क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ॥ ३७ ॥
मार्गमें नागराज तक्षकने काश्यपको देखा । वे एकचित्त होकर हस्तिनापुरकी ओर बढ़े जा रहे थे । तब नागराजने बूढ़े ब्राह्मणका वेश बनाकर मुनिवर काश्यपसे पूछा — ' आप कहाँ बड़ी उतावलीके साथ जा रहे हैं और कौन- सा कार्य करना चाहते हैं? ' ॥ ३६-३७ ॥ काश्यप उवाच
नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिन्दमम् ।
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ॥ ३८ ॥
काश्यपने कहा — कुरुकुलमें उत्पन्न शत्रुदमन महाराज परीक्षित्को आज नागराज तक्षक अपनी विषाग्निसे दग्ध कर देगा ॥ ३८ ॥
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा ।
पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् ।
गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ॥ ३ ९ ॥
वे राजा पाण्डवोंकी वंशपरम्पराको सुरक्षित रखने वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी हैं । अतः सौम्य! अग्निके समान तेजस्वी नागराजके डँस लेनेपर उन्हें तत्काल विषरहित करके जीवित कर देनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जा रहा हूँ ॥ ३ ९ ॥ तक्षक उवाच
अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् ।
निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥ ४० ॥
तक्षक बोला — ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षक हूँ। आज राजाको भस्म कर डालूँगा । आप लौट जाइये । मैं जिसे डँस लूँ, उसकी चिकित्सा आप नहीं कर सकते ॥ ४० ॥
काश्यप उवाच
अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम् ।
करिष्यामीति मे बुद्धिर्विद्याबलसमन्विता ॥ ४१ ॥
काश्यपने कहा — मैं तुम्हारे डँसे हुए राजाको वहाँ जाकर विषसे रहित कर दूँगा । यह विद्याबलसे सम्पन्न मेरी बुद्धिका निश्चय है ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमेंकाश्यपागमनविषयक बयालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
पृष्ठ 329
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 330
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित्के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना तक्षक उवाच
यदि दष्टं मयेह त्वं शक्तः किंचिच्चिकित्सितुम् ।
ततो वृक्षं मया दष्टमिमं जीवय काश्यप ॥ १ ॥
तक्षक बोला – काश्यप! यदि इस जगत् में मेरे डँसे हुए रोगीक कुछ भी चिकित्सा करनेमें तुम समर्थ हो तो मेरे डँसे हुए इस वृक्षको जीवित कर दो ॥ १ ॥
परं मन्त्रबलं यत् ते तद् दर्शय यतस्व च ।
न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे पास जो उत्तम मन्त्रका बल है, उसे दिखाओ और यत्न करो । लो, तुम्हारे देखते - देखते इस वटवृक्षको मैं भस्म कर देता हूँ ॥ २ ॥
काश्यप उवाच
दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे ।
अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजङ्गम ॥ ३ ॥
काश्यपने कहा— नागराज! यदि तुम्हें इतना अभिमान है तो इस वृक्षको डँसो ।
भुजंगम! तुम्हारे डँसे हुए इस वृक्षको मैं अभी जीवित कर दूँगा ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना ।
अदशद् वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं -महात्मा काश्यपके ऐसा कहनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ नागराज तक्षकने निकट जाकर बरगदके वृक्षको डँस लिया ॥ ४ ॥
स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना ।
आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ॥ ५ ॥
उस महाकाय विषधर सर्पके हँसते ही उसके विषसे व्याप्त हो वह वृक्ष सब ओरसे जल उठा ॥ ५ ॥
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरब्रवीत् ।
कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैनं वनस्पतिम् ॥ ६ ॥
इस प्रकार उस वृक्षको जलाकर नागराज पुनः काश्यपसे बोला- 'द्विजश्रेष्ठ! अब तुम यत्न करो और इस वृक्षको जिला दो ' ॥ ६ ॥