महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 441–450
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा । वह अतिशय रूप- सौन्दर्यसे सुशोभित थी । सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी ॥ ६८–७० ॥
दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् ।
दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरुं मुनिपुङ्गवः ॥ ७१ ॥
उसकी हँसी बड़ी मोहक थी, उसकी जाँघें कदलीकी - सी शोभा धारण करती थीं । उस दिव्य वसुकुमारीको देखकर परम बुद्धिमान् मुनिवर पराशरने उसके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की ॥ ७१ ॥
संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत ।
साब्रवीत् पश्य भगवन् पारावारे स्थितानृषीन् ॥ ७२ ॥
और कहा — ‘ कल्याणी! मेरे साथ संगम करो । ' वह बोली — ‘ भगवन्! देखिये, नदीके आर- पार दोनों तटोंपर बहुत- से ऋषि खड़े हैं ॥ ७२ ॥
आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं तु स्यात् समागमः ।
एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसृजत् प्रभुः ॥ ७३ ॥
‘ और हम दोनोंको देख रहे हैं । ऐसी दशामें हमारा समागम कैसे हो सकता है? ' उसके ऐसा कहनेपर शक्तिशाली भगवान् पराशरने कुहरेकी सृष्टि की ॥ ७३ ॥
येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् ।
दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा ॥ ७४ ॥
विस्मिता साभवत् कन्या व्रीडिता च तपस्विनी । जिससे वहाँका सारा प्रदेश अन्धकारसे आच्छादित- सा हो गया । महर्षिद्वारा कुहरेकी सृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्या आश्चर्यचकित एवं लज्जित हो गयी ॥ ७४३ ॥
सत्यवत्युवाच विद्धि मां भगवन् कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ॥ ७५ ॥
सत्यवतीने कहा — भगवन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं सदा अपने पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ ॥ ७५ ॥
त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ ।
कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम ॥ ७६ ॥
गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन् न स्थातुमुत्सहे ।
एतत् संचिन्त्य भगवन् विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ७७ ॥
निष्पाप महर्षे! आपके संयोगसे मेरा कन्याभाव ( कुमारीपन) दूषित हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ! कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ । बुद्धिमान् मुनीश्वर! अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती । भगवन्! इस बातपर भलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ ७६-७७ ॥
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एवमुक्तवतीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तमः ।
उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ ७८ ॥
वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि ।
वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ॥ ७९ ॥
सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले-' भीरु! मेरा प्रिय कार्य
करके भी तुम कन्या ही रहोगी । भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो ।
शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है ' ॥ ७८-७९ ॥
एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् ।
स चास्यै भगवान् प्रादान्मनसः काङ्क्षितं भुवि ॥ ८० ॥
महर्षिके ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपने शरीरमें उत्तम सुमन होनेका वरदान माँगा ।
भगवान् पराशरने इस भूतलपर उसे वह मनोवांछित वर दे दिया ॥ ८० ॥
ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता ।
जगाम सह संसर्गमृषिणाद्भुतकर्मणा ॥ ८१ ॥
तेन गन्धवतीत्येवं नामास्याः प्रथितं भुवि ।
तस्यास्तु योजनाद् गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि ॥ ८२ ॥
तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण ( सद्यः ऋतुस्नान आदि) -से विभूषित हो गयी और उसने अद्भुतकर्मा महर्षि पराशरके साथ समागम किया । उसके शरीरसे उत्तम गन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया । इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धका अनुभव करते थे । इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया ॥ ८१-८२३ ॥ इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ॥ ८३ ॥
पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा ।
जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ॥ ८४ ॥
इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लास से भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरका संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया । यमुनाके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए ॥ ८३-८४ ॥
स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे ।
स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ॥ ८५ ॥
उन्होंने मातासे यह कहा - ' आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना । मैं अवश्य दर्शन दूँगा । ' इतना कहकर माताकी आज्ञा ले व्यासजीने तपस्यामें ही मन लगाया ॥ ८५ ॥
एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् ।
न्यस्तो द्वीपे स यद् बालस्तस्माद् द्वैपायनः स्मृतः ॥ ८६ ॥
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इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ । वे बाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये 'द्वैपायन ' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ८६ ॥
( ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम् ।
तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि ॥
दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन् प्रीतिमावहत् । ) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी । उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे । उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ । दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता । अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता ॥ ) दाशराजने पूछा — बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी - सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे ‘ मत्स्यगन्धा ’ कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन्ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है? सत्यवत्युवाच ( शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति स्मृतः ॥
नावं वाहयमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम् ।
अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ ॥
ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन् । ) सत्यवती बोली — पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, ( वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय ) मैं नाव खे रही थी । उन्होंने मेरी दुर्गन्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है । महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए ।
पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे ।
आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च ॥ ८७ ॥
ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया ।
विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृतः ॥ ८८ ॥
विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है । मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है । यह
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सब देख - सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास ( विस्तार ) किया । इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए ॥ ८७-८८ ॥
वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ ८ ९ ॥
प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च ।
संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ ९ ० ॥
सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया । फिर उन सबने पृथक् - पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित कीं ॥ ८ ९- ९ ० ॥
तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः ।
वसुवीर्यात् समभवन्महावीर्यो महायशाः ॥ ९ १ ॥
अमिततेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म आठवें वसुके अंशसे तथा गंगाजीके गर्भसे उत्पन्न हुए । वे महान् पराक्रमी और अत्यन्त यशस्वी थे ॥ ९ १ ॥
वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः ।
शूले प्रोतः पुराणर्षिरचौरश्चौरशङ्कया ॥ ९ २ ॥
अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः ।
स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् ॥ ९ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान् अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये । परलोकमें जानेपर उन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा- ॥ ९ २ - ९ ३ ॥
इषीकया मया बाल्याद् विद्धा ह्येका शकुन्तिका ।
तत् किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत् पापमहं स्मरे ॥ ९ ४ ॥
‘ धर्मराज! पहले कभी मैंने बाल्यावस्थाके कारण सींकसे एक चिड़ियेके बच्चेको छेद दिया था । वही एक पाप मुझे याद आ रहा है । अपने दूसरे किसी पापका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ९ ४ ॥
तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तपः ।
गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद् यतः ॥ ९ ५ ॥
' मैंने अगणित सहस्रगुना तप किया है । फिर उस तपने मेरे छोटे - से पापको क्यों नहीं नष्ट कर दिया । ब्राह्मणका वध समस्त प्राणियोंके वधसे बड़ा है ॥ ९ ५ ॥
तस्मात् त्वं किल्बिषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि ।
तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ॥ ९ ६ ॥
' ( तुमने मुझे शूलीपर चढ़वाकर वही पाप किया है ) इसलिये तुम पापी हो । अतः पृथ्वीपर शूद्रकी योनिमें तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा । ' अणीमाण्डव्यके उस शापसे धर्म भी
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शूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ९ ६ ॥
विद्वान् विदुररूपेण धार्मी तनुरकिल्बिषी ।
संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात् ॥ ९ ७ ॥
पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था । उसी समय गवल्गणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे ॥ ९७ ॥
सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबलः ।
सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ॥ ९ ८ ॥
राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भ से सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई । वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था ॥ ९ ८ ॥
अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः ।
वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥ ९९ ॥
उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ॥ ९९ ॥
अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः ।
अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥ १०० ॥
वे भगवान् आदि- अन्तसे रहित, द्युतिमान्, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींको अव्यक्त अक्षर ( अविनाशी ) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं ॥ १०० ॥
आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् ।
पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥ १०१ ॥
अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् ।
धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥ १०२ ॥
कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् ।
पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥ १०३ ॥
आत्मा, अव्यय, प्रकृति ( उपादान ), प्रभव (उत्पत्ति- कारण), प्रभु ( अधिष्ठाता ), पुरुष ( अन्तर्यामी ), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है । वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ १०१ – १०३ ॥
धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु ।
अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ॥ १०४ ॥
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उन्होंने ही धर्मकी वृद्धिके लिये अन्धक और वृष्णिकुलमें बलराम और श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया था । वे दोनों भाई सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता, महापराक्रमी और समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें परम प्रवीण थे ॥ १०४ ॥
सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ ।
सत्यकाद् हृदिकाच्चैव जज्ञातेऽस्त्रविशारदौ ॥ १०५ ॥
सत्यकसे सात्यकि और हृदिकसे कृतवर्माका जन्म हुआ था । वे दोनों अस्त्रविद्यामें अत्यन्त निपुण और भगवान् श्रीकृष्णके अनुगामी थे ॥ १०५ ॥
भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत ।
महर्षेरुग्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत ॥ १०६ ॥
एक समय उग्रतपस्वी महर्षि भरद्वाजका वीर्य किसी द्रोणी ( पर्वतकी गुफा ) -में स्खलित
होकर धीरे- धीरे पुष्ट होने लगा । उसीसे द्रोणका जन्म हुआ ॥ १०६ ॥
गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः ।
अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महाबलः ॥ १०७ ॥
किसी समय गौतमगोत्रीय शरद्वान्का वीर्य सरकंडेके समूहपर गिरा और दो भागोंमें बँट गया । उसीसे एक कन्या और एक पुत्रका जन्म हुआ । कन्याका नाम कृपी था, जो
अश्वत्थामाकी जननी हुई। पुत्र महाबली कृपके नामसे विख्यात हुआ ॥ १०७ ॥
अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबलः ।
तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः ॥ १०८ ॥
वैताने कर्मणि ततः पावकात् समजायत ।
वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १० ९ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यसे महाबली अश्वत्थामाका जन्म हुआ । इसी प्रकार यज्ञकर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् अग्निदेवके समान तेजस्वी था । पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुआ था ॥ १०८-१०९ ॥
तत्रैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा ।
विभ्राजमाना वपुषा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ ११० ॥
उसी यज्ञकी वेदीसे शुभस्वरूपा तेजस्विनी द्रौपदी उत्पन्न हुई, जो परम उत्तम रूप धारण करके अपने सुन्दर शरीरसे अत्यन्त शोभा पा रही थी ॥ ११० ॥
प्रह्रादशिष्यो नग्नजित् सुबलश्चाभवत् ततः ।
तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ॥ १११ ॥
गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौबलस्तथा ।
दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेऽर्थविशारदौ ॥ ११२ ॥
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प्रह्रादका शिष्य नग्नजित् राजा सुबलके रूपमें प्रकट हुआ । देवताओंके कोपसे उसकी संतति ( शकुनि ) धर्मका नाश करनेवाली हुई । गान्धारराज सुबलका पुत्र शकुनि एवं सौबल नामसे विख्यात हुआ तथा उनकी पुत्री गान्धारी दुर्योधनकी माता थी । ये दोनों भाई- बहिन अर्थशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे ॥ १११-११२ ॥
कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महाबलः ॥ ११३ ॥
धर्मार्थकुशलो धीमान् मेधावी धूतकल्मषः ।
विदुरः शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्वैपायनादपि ॥ ११४ ॥
पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् ।
द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद् युधिष्ठिरः ॥ ११५ ॥
राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायन व्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ । द्वैपायन व्याससे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था । वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान्, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्- पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब- के - सब देवताओंके समान थे । उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे । वे उत्तम गुणोंमें भी सबसे बढ़ - चढ़कर थे ॥ ११३—११५ ॥
धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः ।
इन्द्राद् धनंजयः श्रीमान् सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ११६ ॥
जज्ञाते रूपसम्पन्नावश्विभ्यां च यमावपि ।
नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ॥ ११७ ॥
युधिष्ठिर धर्मसे, भीमसेन वायुदेवतासे, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुन इन्द्रदेवसे तथा सुन्दर रूपवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न हुए थे । वे जुड़वें पैदा हुए थे । नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते थे ॥ ११६-११७ ॥
तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ।
दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा ॥ ११८ ॥
परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए । इनके अतिरिक्त युयुत्सु भी उन्हींका पुत्र था । वह वैश्यजातीय मातासे उत्पन्न होनेके कारण ' करण ' कहलाता था ॥ ११८ ॥
ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत ।
दुर्मर्षणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ॥ ११ ९ ॥
जयः सत्यव्रतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत ।
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः ॥ १२० ॥
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भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें दुर्योधन, दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र तथा वैश्यापुत्र युयुत्सु — ये ग्यारह महारथी थे ॥ ११ ९ -१२० । |
अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत ।
स्वस्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२१ ॥
अर्जुनद्वारा सुभद्राके गर्भसे अभिमन्युका जन्म हुआ । वह महात्मा पाण्डुका पौत्र और भगवान् श्रीकृष्णका भानजा था ॥ १२१ ॥
पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जज्ञिरे ।
कुमारा रूपसम्पन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ १२२ ॥
पाण्डवोंद्वारा द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो बड़े ही सुन्दर और सब शास्त्रोंमें निपुण थे ॥ १२२ ॥
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् ।
अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ १२३ ॥
तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान् ।
हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ॥ १२४ ॥
युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक तथा सहदेवसे प्रतापी श्रुतसेनका जन्म हुआ था । भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासे वनमें घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १२३-१२४ ॥
शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वमागता ।
यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूणः प्रियचिकीर्षया ॥ १२५ ॥
राजा द्रुपदसे शिखण्डी नामकी एक कन्या हुई, जो आगे चलकर पुत्ररूपमें परिणत हो गयी । स्थूणाकर्ण नामक यक्षने उसका प्रिय करनेकी इच्छासे उसे पुरुष बना दिया था ॥ १२५ ॥
कुरूणां विग्रहे तस्मिन् समागच्छन् बहून् यथा ।
राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे ॥ १२६ ॥
तेषामपरिमेयानां नामधेयानि सर्वशः ।
न शक्यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि ।
एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम् ॥ १२७ ॥
कौरवोंके उस महासमरमें युद्ध करनेके लिये राजाओंके कई लाख योद्धा आये थे । दस हजार वर्षोंतक गिनती की जाय तो भी उन असंख्य योद्धाओंके नाम पूर्णतः नहीं बताये जा सकते । यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य राजाओंके नाम बताये गये हैं, जिनके चरित्रोंसे इस महाभारत - कथाका विस्तार हुआ है ॥ १२६-१२७ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि व्यासाद्युत्पत्तौ त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें व्यास आदिकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल १३१३ श्लोक हैं )
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चतुःषष्टितमोऽध्यायः ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश जनमेजय उवाच
य एते कीर्तिता ब्रह्मन् ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।
सम्यक् ताञ्छ्रोतुमिच्छामि राज्ञश्चान्यान् सहस्रशः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले — ब्रह्मन्! आपने यहाँ जिन राजाओंके नाम बताये हैं और जिन दूसरे नरेशोंके नाम यहाँ नहीं लिये हैं, उन सब सहस्रों राजाओंका मैं भलीभाँति परिचय सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
यदर्थमिह सम्भूता देवकल्पा महारथाः ।
भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
महाभाग! वे देवतुल्य महारथी इस पृथ्वीपर जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुए थे, उसका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
वैशम्पायनउवाच
रहस्यं खल्विदं राजन् देवानामिति नः श्रुतम् ।
तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा — राजन्! यह देवताओंका रहस्य है, ऐसा मैंने सुन रखा है ।
स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके आज उसी रहस्यका तुमसे वर्णन करूँगा ॥ ३ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा ।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥ ४ ॥
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन् सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियरहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्रपर तपस्या की थी । उस समय जब भृगुनन्दनने इस लोकको क्षत्रियशून्य कर दिया था, क्षत्रिय - नारियोंने पुत्रकी अभिलाषासे ब्राह्मणोंकी शरण ग्रहण की थी ॥ ४-५ ॥ ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।