महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 451–460

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ॥ ६ ॥

नररत्न! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकालमें ही उनके साथ मिलते थे; न तो कामवश और न बिना ऋतुकालके ही ॥ ६ ॥

तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः ।

ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ ७ ॥

कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये ।

एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥ ८ ॥

जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम् ।

चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्मणोत्तराः ॥ ९ ॥

राजन्! उन सहस्रों क्षत्राणियोंने ब्राह्मणोंसे गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रियकुलकी वृद्धिके लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों तथा कुमारियोंको जन्म दिया । इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्राणियोंके गर्भसे धर्मपूर्वक क्षत्रिय - संतानकी उत्पत्ति और वृद्धि हुई । वे सब संतानें दीर्घायु होती थीं । तदनन्तर जगत्में पुनः ब्राह्मणप्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठित हुए ॥ ७ – ९ ॥

अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा ।

तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ १० ॥

ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत् तथा भरतर्षभ ।

ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥ ११ ॥

उस समय सब लोग ऋतुकालमें ही पत्नीसमागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकालके बिना नहीं करते थे । इसी प्रकार पशु -पक्षी आदिकी योनिमें पड़े हुए जीव भी ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रियोंसे संयोग करते थे । भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मका आश्रय लेनेसे सब लोग सहस्र एवं शत वर्षोंतक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे ॥ १०-११ ॥

ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः ।

आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥ १२ ॥

भूपाल! उस समयकी प्रजा धर्म एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त रहते थे ॥ १२ ॥

अथेमां सागरापाङ्गीं गां गजेन्द्रगताखिलाम् ।

अध्यतिष्ठत् पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ॥ १३ ॥

गजराजके समान गमन करनेवाले राजा जनमेजय! तदनन्तर धीरे - धीरे समुद्रसे घिरी हुई पर्वत, वन और नगरोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर पुनः क्षत्रियजातिका ही अधिकार हो गया ॥ १३ ॥

प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् ।

पृष्ठ 452

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ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ॥ १४ ॥

जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि वर्णोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ १४ ॥

कामक्रोधोद्भवान् दोषान् निरस्य च नराधिपाः ।

धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ॥ १५ ॥

उन दिनों राजालोग काम और क्रोधजनित दोषोंको दूर करके दण्डनीय अपराधियोंको धर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वीका पालन करते थे ॥ १५ ॥

तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः ।

स्वादु देशे च काले च वर्षेणापालयत् प्रजाः ॥ १६ ॥

इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियोंके शासनमें सारा देश- काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होने लगा । उस समय सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र समयपर वर्षा करके प्रजाओंका पालन करते थे ॥ १६ ॥

न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप ।

न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनः ॥ १७ ॥

राजन्! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्थामें नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्था प्राप्त हुए बिना स्त्री - सुखका अनुभव नहीं करता था ॥ १७ ॥

एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ ।

इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ॥ १८ ॥

भरतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था हो जानेसे समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकालतक जीवित रहनेवाली प्रजाओंसे भर गयी ॥ १८ ॥

ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः ।

साङ्गोपनिषदान् वेदान् विप्राश्चाधीयते तदा ॥ १ ९ ॥

क्षत्रियलोग बहुत - सी दक्षिणावाले बड़े - बड़े यज्ञोंद्वारा यजन करते थे । ब्राह्मण अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करते थे ॥ १ ९ ॥

नच विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप ।

न च शूद्रसमभ्याशे वेदानुच्चारयन्त्युत ॥ २० ॥

राजन्! उस समय ब्राह्मण न तो वेदका विक्रय करते और न शूद्रोंके निकट वेदमन्त्रोंका उच्चारण ही करते थे ॥ २० ॥

कारयन्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह ।

युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाङ्गांश्चाप्यजीवयन् ॥ २१ ॥

वैश्यगण बैलोंद्वारा इस पृथ्वीपर दूसरोंसे खेती कराते हुए भी स्वयं उनके कंधेपर जुआ नहीं रखते थे — उन्हें बोझ ढोनेमें नहीं लगाते थे और दुर्बल अंगोंवाले निकम्मे पशुओंको भी दाना - घास देकर उनके जीवनकी रक्षा करते थे ॥ २१ ॥

पृष्ठ 453

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फेनपांश्च तथा वत्सान् न दुहन्ति स्म मानवाः ।

न कूटमानैर्वणिजः पाण्यं विक्रीणते तदा ॥ २२ ॥

जबतक बछड़े केवल दूधपर रहते, घास नहीं चरते, तबतक मनुष्य गौओंका दूध नहीं दुहते थे । व्यापारीलोग बेचने योग्य वस्तुओंका झूठे माप- तौलद्वारा विक्रय नहीं करते थे ॥ २२ ॥

कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः ।

धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥ २३ ॥

नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्ममें ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंका ही अनुष्ठान करते थे ॥ २३ ॥

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप ।

एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न हसते क्वचित् ॥ २४ ॥

राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने - अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे । नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ॥ २४ ॥

काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ ।

भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥ २५ ॥

भरतश्रेष्ठ! गौएँ तथा स्त्रियाँ भी ठीक समयपर ही संतान उत्पन्न करती थीं । ऋतु आनेपर ही वृक्षोंमें फूल और फल लगते थे ॥ २५ ॥

एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदा नृप ।

आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ॥ २६ ॥

नरेश्वर! इस तरह उस समय सब ओर सत्ययुग छा रहा था । सारी पृथ्वी नाना प्रकारके प्राणियोंसे खूब भरी- पूरी रहती थी ॥ २६ ॥

एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ ।

असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥ २७ ॥

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण मानव जगत् बहुत प्रसन्न था । मनुजेश्वर! इसी समय असुरलोग राजपत्नियोंके गर्भसे जन्म लेने लगे ॥ २७ ॥

आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि ।

ऐश्वर्याद् भ्रंशिताः स्वर्गात् सम्बभूवुः क्षिताविह ॥ २८ ॥

उन दिनों अदितिके पुत्रों ( देवताओं) - द्वारा दैत्यगण अनेक बार युद्धमें पराजित हो चुके थे । स्वर्गके ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होनेपर वे इस पृथ्वीपर ही जन्म लेने लगे ॥ २८ ॥

इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः ।

जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥ २ ९ ॥

प्रभो! यहीं रहकर देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे वे मनस्वी असुर भूतलपर मनुष्यों तथा भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें जन्म लेने लगे ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 454

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गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च ।

क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥ ३० ॥

जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही ।

न शशाकात्मनाऽऽत्मानमियं धारयितुं धरा ॥ ३१ ॥

राजेन्द्र! गौओं, घोड़ों, गदहों, ऊँटों, भैसों, कच्चे मांस खानेवाले पशुओं, हाथियों और मृगोंकी योनिमें भी यहाँ असुरोंने जन्म लिया और अभीतक वे जन्म धारण करते जा रहे थे । उन सबसे यह पृथ्वी इस प्रकार भर गयी कि अपने- आपको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ३०-३१ ॥

अथ जाता महीपालाः केचिद् बहुमदान्विताः ।

दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इह च्युताः ॥ ३२ ॥

वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् ।

इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥ ३३ ॥

स्वर्गसे इस लोकमें गिरे हुए तथा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए कितने ही दैत्य और दानव अत्यन्त मदसे उन्मत्त रहते थे । वे पराक्रमी होनेके साथ ही अहंकारी भी थे । अनेक प्रकारके रूप धारण कर अपने शत्रुओंका मान- मर्दन करते हुए समुद्रपर्यज सारी पृथ्वीपर विचरते रहते थे ॥ ३२-३३ ॥

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् ।

अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥ ३४ ॥

वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंको भी सताया करते थे । अन्यान्य जीवोंको भी अपने बल और पराक्रमसे पीड़ा देते थे ॥ ३४ ॥

त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते ।

विचेरुः सर्वशो राजन् महीं शतसहस्रशः ॥ ३५ ॥

राजन्! वे असुर लाखोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे और समस्त प्राणियोंको डराते-धमकाते तथा उनकी हिंसा करते हुए भूमण्डलमें सब ओर घूमते रहते थे ॥ ३५ ॥

आश्रमस्थान् महर्षीश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः ।

अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ॥ ३६ ॥

वे वेद और ब्राह्मणके विरोधी, पराक्रमके नशेमें चूर तथा अहंकार और बलसे मतवाले होकर इधर- उधर आश्रमवासी महर्षियोंका भी तिरस्कार करने लगे ॥ ३६ ॥

एवं वीर्यबलोत्सिक्तैर्भूरियत्नैर्महासुरैः ।

पीड्यमाना मही राजन् ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥ ३७ ॥

राजन्! जब इस प्रकार बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त महादैत्य विशेष यत्नपूर्वक इस पृथ्वीको पीड़ा देने लगे, तब यह ब्रह्माजीकी शरणमें जानेको उद्यत हुई ॥ ३७ ॥

न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् ।

पृष्ठ 455

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तदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैर्बलात् ॥ ३८ ॥

ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता ।

जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥ ३ ९ ॥

सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः ।

ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥ ४० ॥

दानवोंने बलपूर्वक जिसपर अधिकार कर लिया था, पर्वतों और वृक्षोंसहित उस पृथ्वीको उस समय कच्छप और दिग्गज आदिकी संगठित शक्तियाँ तथा शेषनाग भी धारण करनेमें समर्थ न हो सके । महीपाल! तब असुरोंके भारसे आतुर तथा भयसे पीड़ित हुई पृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें उपस्थित हुई । ब्रह्मलोकमें जाकर पृथ्वीने उन लोकस्रष्टा अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माजीका दर्शन किया, जिन्हें महाभाग देवता, द्विज और महर्षि घेरे हुए थे ॥ ३८–४० ॥

गन्धर्वैरप्सतेभिश्च दैवकर्मसु निष्ठितैः ।

वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ॥ ४१ ॥

देवकर्ममें संलग्न रहनेवाले अप्सराएँ और गन्धर्व उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करते थे । पृथ्वीने उनके निकट जाकर प्रणाम किया ॥ ४१ ॥

अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी ।

संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ॥ ४२ ॥

तत् प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयम्भुवः ।

पूर्वमेवाभवद् राजन् विदितं परमेष्ठिनः ॥ ४३ ॥

भारत! तदनन्तर शरण चाहनेवाली भूमिने समस्त लोकपालोंके समीप अपना सारा दुःख ब्रह्माजीसे निवेदन किया । राजन्! स्वयम्भू ब्रह्मा सबके कारणरूप हैं, अतः पृथ्वीका जो आवश्यक कार्य था वह उन्हें पहलेसे ही ज्ञात हो गया था ॥ ४२-४३ ॥

स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्बुध्येत भारत ।

ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ॥ ४४ ॥

भारत! भला जो जगत्के स्रष्टा हैं, वे देवताओं और असुरोंसहित समस्त जगत्का सम्पूर्ण मनोगत भाव क्यों न समझ लें ॥ ४४ ॥

तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः ।

प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ॥ ४५ ॥

महाराज! जो इस भूमिके पालक और प्रभु हैं, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा समस्त प्राणियोंके अधीश्वर हैं, वे कल्याणमय प्रजापति ब्रह्माजी उस समय भूमिसे इस प्रकार बोले ॥ ४५ ॥

ब्रह्मोवाच

पृष्ठ 456

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यदर्थमभिसम्प्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे ।

तदर्थं संनियोक्ष्यामि सर्वानेव दिवौकसः ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजीने कहा — वसुन्धरे! तुम जिस उद्देश्यसे मेरे पास आयी हो, उसकी सिद्धिके लिये मैं सम्पूर्ण देवताओंको नियुक्त कर रहा हूँ ॥ ४६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजन् विसृज्य च ।

आदिदेश तदा सर्वान् विबुधान् भूतकृत् स्वयम् ॥ ४७ ॥

अस्या भूमेर्निरसितुं भारं भागैः पृथक् पृथक् ।

अस्यामेव प्रसूयध्वं विरोधायेति चाब्रवीत् ॥ ४८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने ऐसा कहकर उस समय पृथ्वीको तो विदा कर दिया और समस्त देवताओंको यह आदेश दिया – ' देवताओ! तुम इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने - अपने अंशसे पृथ्वीके विभिन्न भागोंमें पृथक् - पृथक् जन्म ग्रहण करो । वहाँ असुरोंसे विरोध करके अभीष्ट उद्देश्यकी सिद्धि करनी होगी' ॥ ४७-४८ ॥

तथैव स समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् ।

उवाच भगवान् सर्वानिदं वचनमर्थवत् ॥ ४ ९ ॥

इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने सम्पूर्ण गन्धर्वों और अप्सराओंको भी बुलाकर यह अर्थसाधक वचन कहा ॥ ४ ९ ॥ ब्रह्मोवाच स्वैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च ।

अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः ।

तव्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ॥ ५० ॥

ब्रह्माजी बोले- तुम सब लोग अपने - अपने अंशसे मनुष्योंमें इच्छानुसार जन्म ग्रहण करो । तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने देवगुरु ब्रह्माजीकी सत्य, अर्थसाधक और हितकर बात सुनकर उस समय उसे शिरोधार्य कर लिया ॥ ५० ॥

अथ ते सर्वशोंऽशैः स्वैर्गन्तुं भूमिं कृतक्षणाः ।

नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ॥ ५१ ॥

अब वे अपने - अपने अंशोंसे भूलोकमें सब ओर जानेका निश्चय करके शत्रुओंका नाश करनेवाले भगवान् नारायणके समीप वैकुण्ठधाममें जानेको उद्यत हुए ॥ ५१ ॥

यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः ।

पद्मनाभः सुरारिघ्नः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 457

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जो अपने हाथोंमें चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं, जिनके अंगोंकी कान्ति श्याम रंगकी है, जिनकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव हुआ है, जो देव- शत्रुओंके नाशक तथा विशाल और मनोहर नेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५२ ॥

प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः ।

श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ५३ ॥

जो प्रजापतियोंके भी पति, दिव्यस्वरूप, देवताओंके रक्षक, महाबली, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, इन्द्रियोंके अधिष्ठाता तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हैं ॥ ५३ ॥

तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् ।

अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ॥ ५४ ॥

उन भगवान् पुरुषोत्तमके पास जाकर इन्द्रने उनसे कहा – ' प्रभो! आप पृथ्वीका शोधन ( भार- हरण) करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ग्रहण करें । ' तब श्रीहरिने ' तथास्तु ' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें चौंसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

* ' वैश्यायां क्षत्रियाज्जातः करणः परिकीर्तितः । ' ( वैश्य माता और क्षत्रिय पितासे उत्पन्न पुत्र ' करण' कहलाता है ) इस धर्मशास्त्रीय वचनके अनुसार युयुत्सुकी ' करण' संज्ञा बतायी गयी है ।

पृष्ठ 458

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(सम्भवपर्व) पञ्चषष्टितमोऽध्यायः मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण वैशम्पायन उवाच

अथ नारायणेनेन्द्रश्चकार सह संविदम् ।

अवतर्तुं महीं स्वर्गादंशतः सहितः सुरैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! देवताओंसहित इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ स्वर्ग एवं वैकुण्ठसे पृथ्वीपर अंशतः अवतार ग्रहण करनेके सम्बन्धमें कुछ सलाह की ॥ १ ॥

आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानेव दिवौकसः ।

निर्जगाम पुनस्तस्मात् क्षयान्नारायणस्य ह ॥ २ ॥

तत्पश्चात् सभी देवताओंको तदनुसार कार्य करनेके लिये आदेश देकर वे भगवान् नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठधामसे पुनः चले आये ॥ २ ॥

तेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च ।

अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद् दिवौकसः ॥ ३ ॥

तब देवतालोग सम्पूर्ण लोकोंके हित तथा राक्षसोंके विनाशके लिये स्वर्गसे पृथ्वीपर आकर क्रमशः अवतीर्ण होने लगे ॥ ३ ॥

ततो ब्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च ।

जज्ञिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः ॥ ४ ॥

नृपश्रेष्ठ! वे देवगण अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मर्षियों अथवा राजर्षियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥

दानवान् राक्षसांश्चैव गन्धर्वान् पन्नगांस्तथा ।

पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्त्वान्यनेकशः ॥ ५ ॥

दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा ।

न तान् बलस्थान् बाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम ॥ ६ ॥

वे दानव, राक्षस, दुष्ट गन्धर्व, सर्प तथा अन्यान्य मनुष्यभक्षी जीवोंका बारम्बार संहार करने लगे । भरतश्रेष्ठ! वे बचपनमें भी इतने बलवान् थे कि दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा सर्प उनका बाल बाँका तक नहीं कर पाते थे ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 459

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जनमेजय उवाच

देवदानवसङ्घानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ।

मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ॥ ७ ॥

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सम्भवं कृत्स्नमादितः ।

प्राणिनां चैव सर्वेषां सम्भवं वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥

जनमेजय बोले — भगवन्! मैं देवता, दानवसमुदाय, गन्धर्व, अप्सरा, मनुष्य, यक्ष, राक्षस तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ । आप कृपा करके आरम्भसे ही इन सबकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ ७-८ ॥ वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।

सुरादीनामहं सम्यग् लोकानां प्रभवाप्ययम् ॥ ९ ॥

वैशम्पायनजीने कहा — अच्छा, मैं स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा एवं नारायणको नमस्कार करके तुमसे देवता आदि सम्पूर्ण लोगोंकी उत्पत्ति और नाशका यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ९ ॥

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥ १० ॥

ब्रह्माजीके मानस पुत्र छ: महर्षि विख्यात हैं - मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ १० ॥

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात् तु इमाः प्रजाः ।

प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश ॥ ११ ॥

मरीचिके पुत्र कश्यप थे और कश्यपसे ही ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं । ( ब्रह्माजीके एक पुत्र दक्ष भी हैं ) प्रजापति दक्षके परम सौभाग्यशालिनी तेरह कन्याएँ थीं ॥ ११ ॥

अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा ।

क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः ॥ १२ ॥

कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत ।

एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ १३ ॥

नरश्रेष्ठ! उनके नाम इस प्रकार हैं- अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा (क्रूरा ), प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कद्रू। भारत! ये सभी दक्षकी कन्याएँ हैं । इनके बल- पराक्रमसम्पन्न पुत्र - पौत्रोंकी संख्या अनन्त है ॥ १२-१३ ॥

अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता भुवनेश्वराः ।

ये राजन् नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत ॥ १४ ॥

पृष्ठ 460

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अदितिके पुत्र बारह आदित्य हुए, जो लोकेश्वर हैं । भरतवंशी नरेश! उन सबके नाम तुम्हें बता रहा हूँ — ॥ १४ ॥

धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च ।

भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥ १५ ॥

एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते ।

जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ १६ ॥

धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं । इन सब आदित्योंमें विष्णु छोटे हैं; किंतु गुणोंमें वे सबसे बढ़कर हैं ॥ १५-१६ ॥

एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।

नाम्ना ख्यातास्तु तस्येमे पञ्च पुत्रा महात्मनः ॥ १७ ॥

दितिका एक ही पुत्र हिरण्यकशिपु अपने नामसे विख्यात हुआ । उस महामना दैत्यके पाँच पुत्रथे॥ १७ ॥

प्रह्लादः पूर्वजस्तेषां संह्रादस्तदनन्तरम् ।

अनुह्रादस्तृतीयोऽभूत् तस्माच्च शिबिबाष्कलौ ॥ १८ ॥

उन पाँचोंमें प्रथमका नाम प्रह्लाद है । उससे छोटेको संह्राद कहते हैं । तीसरेका नाम अनुह्राद है । उसके बाद चौथे शिबि और पाँचवें बाष्कल हैं ॥ १८ ॥

प्रह्रादस्य त्रयः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ।

विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत ॥ १९ ॥

भारत! प्रह्लादके तीन पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं । उनके नाम ये हैं - विरोचन, कुम्भ और निकुम्भ ॥ १ ९ ॥

विरोचनस्य पुत्रोऽभूद् बलिरेकः प्रतापवान् ।

बलेश्च प्रथितः पुत्रो बाणो नाम महासुरः ॥ २० ॥

विरोचनके एक ही पुत्र हुआ, जो महाप्रतापी बलिके नामसे प्रसिद्ध है । बलिका विश्वविख्यात पुत्र बाण नामक महान् असुर है ॥ २० ॥

रुद्रस्यानुचरः श्रीमान् महाकालेति यं विदुः ।

चतुस्त्रिंशद् दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ॥ २१ ॥

जिसे सब लोग भगवान् शंकरके पार्षद श्रीमान् महाकालके नामसे जानते हैं । भारत! दनुके चौंतीस पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं ॥ २१ ॥

तेषां प्रथमजो राजा विप्रचित्तिर्महायशाः ।

शम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः ॥ २२ ॥

असिलोमा च केशी च दुर्जयश्चैव दानवः ।

अयःशिरा अश्वशिरा अश्वशंकुश्च वीर्यवान् ॥ २३ ॥