महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 471–480

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 471 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस प्रकार आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा प्रजापति और वषट्कार — ये तैंतीस मुख्य देवता हैं । अब मैं तुम्हें इनके पक्ष और कुल आदिके उल्लेखपूर्वक वंश और गण आदिका परिचय देता हूँ ॥ ३७ ॥

रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा ।

वसूनां भार्गवं विद्याद् विश्वेदेवांस्तथैव च ॥ ३८ ॥

रुद्रोंका एक अलग पक्ष या गण है, साध्य, मरुत् तथा वसुओंका भी पृथक्-पृथक् गण है । इसी प्रकार भार्गव तथा विश्वेदेवगणको भी जानना चाहिये ॥ ३८ ॥

वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा ।

बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ॥ ३ ९ ॥

विनतानन्दन गरुड, बलवान् अरुण तथा भगवान् बृहस्पतिकी गणना आदित्योंमें ही की जाती है ॥ ३ ९ ॥

अश्विनौ गुह्यकान् विद्धि सर्वौषध्यस्तथा पशून् ।

एते देवगणा राजन् कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ॥ ४० ॥

अश्विनीकुमार, सर्वौषधि तथा पशु–इन सबको गुह्यकसमुदायके भीतर समझो । राजन्! ये देवगण तुम्हें क्रमशः बताये गये हैं ॥ ४० ॥

यान् कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान् भृगुः ॥ ४१ ॥

मनुष्य इन सबका कीर्तन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । भगवान् भृगु ब्रह्माजीके हृदयका भेदन करके प्रकट हुए थे ॥ ४१ ॥

भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः ।

त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये ।

स्वयम्भुवा नियुक्तः सन् भुवनं परिधावति ॥ ४२ ॥

भृगुके विद्वान् पुत्र कवि हुए और कविके पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकर तीनों लोकोंके जीवनकी रक्षाके लिये वृष्टि, अनावृष्टि तथा भय और अभय उत्पन्न करते हैं । स्वयम्भू ब्रह्माजीकी प्रेरणासे वे समस्त लोकोंका चक्कर लगाते रहते हैं ॥ ४२ ॥

योगाचार्यो महाबुद्धिर्दैत्यानामभवद् गुरुः ।

सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ॥ ४३ ॥

महाबुद्धिमान् शुक्र ही योगके आचार्य और दैत्योंके गुरु हुए । वे ही योगबलसे मेधावी, ब्रह्मचारी एवं व्रतपरायण बृहस्पतिके रूपमें प्रकट हो देवताओंके भी गुरु होते हैं ॥ ४३ ॥

तस्मिन् नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे ।

पृष्ठ 472

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 472 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजीने जब भृगुपुत्र शुक्रको जगत्के योगक्षेमके कार्यमें नियुक्त कर दिया, तब महर्षि भृगुने एक दूसरे निर्दोष पुत्रको जन्म दिया ॥ ४४ ॥

च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् ।

यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ॥ ४५ ॥

जिसका नाम था च्यवन । महर्षि च्यवनकी तपस्या सदा उद्दीप्त रहती है । वे धर्मात्मा और यशस्वी हैं । भारत! वे अपनी माताको संकटसे बचानेके लिये रोषपूर्वक गर्भसे च्युत हो गये थे ( इसीलिये च्यवन कहलाये ) ॥ ४५ ॥

आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः ।

और्वस्तस्यां समभवदूरुं भित्त्वा महायशाः ॥ ४६ ॥

मनुकी पुत्री आरुषी मनीषी च्यवन मुनिकी पत्नी थी । उससे महायशस्वी और्व मुनिका जन्म हुआ । वे अपनी माताकी ऊरु (जाँघ) फाड़कर प्रकट हुए थे; इसलिये और्व कहलाये ॥ ४६ ॥

महातेजा महावीर्यो बाल एव गुणैर्युतः ।

ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ॥ ४७ ॥

वे महान् तेजस्वी और अत्यन्त शक्तिशाली थे । बचपनमें ही अनेक सद्गुण उनकी शोभा बढ़ाने लगे । और्वके पुत्र ऋचीक तथा ऋचीकके पुत्र जमदग्नि हुए ॥ ४७ ॥

जमदग्नेस्तु चत्वार आसन् पुत्रा महात्मनः ।

रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः ।

सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी ॥ ४८ ॥

महात्मा जमदग्निके चार पुत्र थे, जिनमें परशुरामजी सबसे छोटे थे; किंतु उनके गुण छोटे नहीं थे । वे श्रेष्ठ सद्गुणोंसे विभूषित थे, सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामें कुशल, क्षत्रिय- कुलका संहार करनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ४८ ॥

और्वस्यासीत् पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् ।

तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ॥ ४ ९ ॥

और्व मुनिके जमदग्नि आदि सौ पुत्र थे। फिर उनके भी सहस्रों पुत्र हुए । इस प्रकार इस पृथ्वीपर भृगुवंशका विस्तार हुआ ॥ ४ ९ ॥

द्वौ पुत्रौ ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् ।

लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ॥ ५० ॥

ब्रह्माजीके दो पुत्र और थे, जिनका धारण- पोषण और सृष्टिरूप लक्षण लोकमें सदा ही उपलब्ध होता है । उनके नाम हैं धाता और विधाता । ये मनुके साथ रहते हैं ॥ ५० ॥

पृष्ठ 473

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 473 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा ।

तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ॥ ५१ ॥

वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद् देवी व्यजायत ।

तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ॥ ५२ ॥

कमलोंमें निवास करनेवाली शुभस्वरूपा लक्ष्मीदेवी उन दोनोंकी बहिन हैं । आकाशमें विचरनेवाले अश्व लक्ष्मीदेवीके मानस पुत्र हैं । राजन्! वरुणके बीजसे उनकी ज्येष्ठ पत्नी देवीने एक पुत्र और एक पुत्रीको जन्म दिया । उसके पुत्रको तो बल और देवनन्दिनी पुत्रीको सुरा समझो ॥ ५१-५२ ॥

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् ।

अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥ ५३ ॥

तदनन्तर एक समय ऐसा आया जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक- दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जो समस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ॥ ५३ ॥

तस्यापि निरृतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः ।

घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा ॥ ५४ ॥

अधर्मकी स्त्री निरृति हुई, जिससे नैर्ऋत नामवाले तीन भयंकर राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए, जो सदा पापकर्ममें ही लगे रहनेवाले हैं ॥ ५४ ॥

भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा ।

न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ॥ ५५ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं- भय, महाभय और मृत्यु | उनमें मृत्यु समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला है । उसके पत्नी या पुत्र कोई नहीं है, क्योंकि वह सबका अन्त करनेवाला है ॥ ५५ ॥

काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् ।

ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ॥ ५६ ॥

देवी ताम्राने काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री तथा शुकी- इन पाँच लोकविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ५६ ॥

उलूकान् सुषुवे काकी श्येनी श्येनान् व्यजायत ।

भासी भासानजनयद् गृध्रांश्चैव जनाधिप ॥ ५७ ॥

जनेश्वर! काकीने उल्लुओं और श्येनीने बाजोंको जन्म दिया; भासीने मुर्गों तथा गीधोंको उत्पन्न किया ॥ ५७ ॥

धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः ।

चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥ ५८ ॥

शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी ।

पृष्ठ 474

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 474 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कल्याणगुणसम्पन्ना सर्वलक्षणपूजिता ॥ ५ ९ ॥ कल्याणमयी धृतराष्ट्रीने सब प्रकारके हंसों, कल-हंसों तथा चक्रवाकोंको जन्म दिया । कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त यशस्विनी शुकीने शुकों (तोतों ) को ही उत्पन्न किया ॥ ५८-५९ ॥

नव क्रोधवशा नारी: प्रजज्ञे क्रोधसम्भवाः ।

मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि ॥ ६० ॥

मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वेता सुरभिरेव च ।

सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा चैव भामिनी ॥ ६१ ॥

क्रोधवशाने नौ प्रकारकी क्रोधजनित कन्याओंको जन्म दिया । उनके नाम ये हैं – मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमना, मातंगी, शार्दूली, श्वेता, सुरभि तथा सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुन्दरी सुरसा ॥ ६०-६१ ॥

अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम ।

ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्च परंतप ॥ ६२ ॥

ततस्त्वैसवतं नागं जज्ञे भद्रमनाः सुतम् ।

ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ॥ ६३ ॥

नरश्रेष्ठ! समस्त मृग मृगीकी संतानें हैं । परंतप! मृगमन्दासे रीछ तथा सृमर (छोटी जातिके मृग ) उत्पन्न हुए । भद्रमनाने ऐरावत हाथीको अपने पुत्ररूपमें उत्पन्न किया । देवताओंका हाथी महान् गजराज ऐरावत भद्रमनाका ही पुत्र है ॥ ६२-६३ ॥

हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तरस्विनः ।

गोलांगूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान् प्रचक्षते ॥ ६४ ॥

प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान् व्याघ्राननेकशः ।

द्वीपिनश्च महासत्त्वान् सर्वानेव न संशयः ॥ ६५ ॥

राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, वेगवान् घोड़े और वानर हरीके पुत्र हैं । गायके समान पूँछवाले लंगूरोंको भी हरीका ही पुत्र बताया जाता है । शार्दूलीने सिंहों, अनेक प्रकारके बाघों और महान् बलशाली सभी प्रकारके चीतोंको भी जन्म दिया, इसमें संशय नहीं है ॥ ६४-६५ ॥

मातङ्गयपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप ।

दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वेताजनयदाशुगम् ॥ ६६ ॥

तथा दुहितरौ राजन् सुरभिर्वै व्यजायत ।

रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी ॥ ६७ ॥

नरेश्वर! मातंगीने मतवाले हाथियोंको संतानके रूपमें उत्पन्न किया । श्वेताने शीघ्रगामी दिग्गज श्वेतको जन्म दिया । राजन्! तुम्हारा भला हो, सुरभिने दो

पृष्ठ 475

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 475 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कन्याओंको उत्पन्न किया । उनमेंसे एकका नाम रोहिणी था और दूसरीका गन्धर्वी । गन्धर्वी बड़ी यशस्विनी थी ॥ ६६-६७ ॥ विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत ।

रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धर्व्यां वाजिनः सुताः ।

सप्त पिण्डफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत ॥ ६८ ॥

भारत! तत्पश्चात् रोहिणीने विमला और अनला नामवाली दो कन्याएँ और उत्पन्न कीं । रोहिणीसे गाय- बैल और गन्धर्वीसे घोड़े ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए । अनलाने सात प्रकारके वृक्षोंको* उत्पन्न किया, जिनमें पिण्डाकार फल लगते हैं ॥ ६८ ॥

अनलायाः शुकी पुत्री कङ्कस्तु सुरसासुतः ।

अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महाबलौ ॥ ६ ९ ॥

सम्पातिं जनयामास वीर्यवन्तं जटायुषम् ।

सुरसाजनयन्नागान् कद्रूः पुत्रांस्तु पन्नगान् ॥ ७० ॥

द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ । अनलाके शुकी नामकी एक कन्या भी हुई । कंक पक्षी सुरसाका पुत्र है । अरुणकी पत्नी श्येनीने दो महाबली और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये । एकका नाम था सम्पाती और दूसरेका जटायु । जटायु बड़ा शक्तिशाली था । सुरसा और कद्रूने नाग एवं पन्नग जातिके पुत्रोंको उत्पन्न किया । विनताके दो ही पुत्र विख्यात हैं, गरुड और अरुण ॥ ६ ९-७० ॥

( सुरसाजनयत् सर्पाञ्छतमेकशिरोधरान् ।

सुरसाकन्यका जातास्तिस्रः कमललोचनाः ॥

वनस्पतीनां वृक्षाणां वीरुधां चैव मातरः ।

अनला रुहा च द्वे प्रोक्ते वीरुधां चैव ताः स्मृताः ॥

गृह्णन्ति ये विना पुष्पं फलानि तरवः पृथक् ।

अनलासुतास्ते विज्ञेयाः तानेवाहुर्वनस्पतीन् ॥

पुष्पैः फलग्रहान् वृक्षान् रुहायाः प्रसवान् विभो ।

लतागुल्मानि वल्यश्च त्वक्सारतृणजातयः ॥

वीरुधायाः प्रजास्ताः स्युरत्रवंशः समाप्यते । ) सुरसाने एक सौ एक सिरवाले सर्पोंको जन्म दिया था । सुरसासे तीन कमलनयनी कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो वनस्पतियों, वृक्षों और लता- गुल्मोंकी जननी हुईं । उनके नाम इस प्रकार हैं- अनला, रुहा और वीरुधा । जो वृक्ष बिना फूलके ही फल ग्रहण करते हैं उन सबको अनलाका पुत्र जानना चाहिये; वे ही

पृष्ठ 476

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 476 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वनस्पति कहलाते हैं । प्रभो! जो फूलसे फल ग्रहण करते हैं उन वृक्षोंको रुहाकी संतान समझो । लता, गुल्म, वल्ली, बाँस और तिनकोंकी जितनी जातियाँ हैं उन सबकी उत्पत्ति वीरुधासे हुई है । यहाँ वंशवर्णन समाप्त होता है ।

इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप ।

प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतां वर ॥ ७१ ॥

यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः ।

सर्वज्ञतां च लभते गतिमग्रयां च विन्दति ॥ ७२ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजय! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण महाभूतोंकी उत्पत्तिका भलीभाँति वर्णन किया है । जिसे अच्छी तरह सुनकर मनुष्य सब पापोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है और सर्वज्ञता तथा उत्तम गति प्राप्त कर लेता है ॥ ७१-७२ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ७६३ श्लोक हैं) * मनुस्मृतिमें प्रजापति दक्षको ही पुत्रिका -विधिका प्रवर्तक बताकर उसका लक्षण इस प्रकार दिया है— अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात् स्वधाकरम् ॥ ( ९ ।१२७ ) जिसके पुत्र न हों वह निम्नांकित विधिसे अपनी कन्याको पुत्रिका बना ले - यह संकल्प कर ले कि इस कन्याके गर्भसे जो बालक उत्पन्न हो, वह मेरा श्राद्धादि कर्म करनेवाला पुत्ररूप हो । * किसी- किसीके मतमें शाख, विशाख और नैगमेय – ये तीनों नाम कुमार कार्तिकेयके ही हैं । किन्हींके मतमें कुमार कार्तिकेयके पुत्रोंकी संज्ञा शाख, विशाख और नैगमेय है । कल्पभेदसे सभी ठीक हो सकते हैं । * खर्जूरं तालहिन्तालौ ताली खर्जूरिका तथा । गुणका नारिकेलश्च सप्त पिण्डफला द्रुमाः ॥ (खजूर, ताल, हिन्ताल, ताली, छोटे खजूर, सोपारी और नारियल- ये सात पिण्डाकार फलवाले वृक्ष हैं । )

पृष्ठ 477

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 477 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तषष्टितमोऽध्यायः देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन जनमेजय उवाच

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

सिंहव्याघ्रमृदगाणां च पन्नगानां पतत्त्रिणाम् ॥ १ ॥

सर्वेषां चैव भूतानां सम्भवं भगवन्नहम् ।

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन मानुषेषु महात्मनाम् ।

जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ॥ २ ॥

जनमेजयने कहा – भगवन्! मैं मनुष्य- योनिमें अंशतः उत्पन्न हुए देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, हरिण, सर्प, पक्षी एवं सम्पूर्ण भूतोंके जन्मका वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ । मनुष्योंमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनके तथा इन सभी प्राणियोंके जन्म- कर्मका क्रमशः वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

मानुषेषु मनुष्येन्द्र सम्भूता ये दिवौकसः ।

प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥ ३ ॥

विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद् दानवर्षभः ।

जरासन्ध इति ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः ॥ ४ ॥

दितेः पुत्रस्तु यो राजन् हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।

स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी बोले – नरेन्द्र! मनुष्योंमें जो देवता और दानव प्रकट हुए थे, उन सबके जन्मका ही पहले तुम्हें परिचय दे रहा हूँ। विप्रचित्ति नामसे विख्यात जो दानवोंका राजा था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ जरासन्ध नामसे विख्यात हुआ । राजन्! हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध जो दितिका पुत्र था, वही मनुष्यलोकमें नरश्रेष्ठ शिशुपालके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३-५ ॥

संह्राद इति विख्यातः प्रह्लादस्यानुजस्तु यः ।

स शल्य इति विख्यातो जज्ञे बाह्लीकपुङ्गवः ॥ ६ ॥

अनुह्रादस्तु तेजस्वी योऽभूत् ख्यातो जघन्यजः ।

धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः ॥ ७ ॥

प्रह्रादका छोटा भाई जो संह्रादके नामसे विख्यात था, वही बाह्लीक देशका सुप्रसिद्ध राजा शल्य हुआ । प्रह्लादका ही दूसरा छोटा भाई जिसका नाम अनुह्राद था, धृष्टकेतु नामक राजा हुआ ॥ ६-७ ॥

पृष्ठ 478

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 478 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यस्तु राजञ्छिबिर्नाम दैतेयः परिकीर्तितः ।

द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद् भुवि पार्थिवः ॥ ८ ॥

राजन्! जो शिबि नामका दैत्य कहा गया है, वही इस पृथ्वीपर द्रुम नामसे विख् राजा हुआ ॥ ८ ॥

बाष्कलो नाम यस्तेषामासीदसुरसत्तमः ।

भगदत्त इति ख्यातः स जज्ञे पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥

असुरोंमें श्रेष्ठ जो बाष्कल था, वही नरश्रेष्ठ भगदत्तके नामसे उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥

अयःशिरा अश्वशिरा अयःशङ्कुश्च वीर्यवान् ।

तथा गगनमूर्धा च वेगवांश्चात्र पञ्चमः ॥ १० ॥

पञ्चैते जज्ञिरे राजन् वीर्यवन्तो महासुराः ।

केकयेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः ।

केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यः प्रतापवान् ॥ ११ ॥

अमितौजा इति ख्यातः सोग्रकर्मा नराधिपः ।

स्वर्भानुरिति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ॥ १२ ॥

उग्रसेन इति ख्यात उग्रकर्मा नराधिपः ।

यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः ॥ १३ ॥

अशोको नाम राजाभून्महावीर्योऽपराजितः ।

तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥

दैतेयः सोऽभवद् राजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः ।

वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ॥ १५ ॥

दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

अजकस्त्ववरो राजन् य आसीद् वृषपर्वणः ॥ १६ ॥

स शाल्व इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः ।

अश्वग्रीव इति ख्यातः सत्त्ववान् यो महासुरः ॥ १७ ॥

रोचमान इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

सूक्ष्मस्तु मतिमान् राजन् कीर्तिमान् यः प्रकीर्तितः ॥ १८ ॥

बृहद्रथ इति ख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः ।

तुहुण्ड इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ॥ १ ९ ॥

सेनाबिन्दुरिति ख्यातः स बभूव नराधिपः ।

इषुपान्नाम यस्तेषामसुराणां बलाधिकः ॥ २० ॥

नग्नजिन्नाम राजासीद् भुवि विख्यातविक्रमः ।

एकचक्र इति ख्यात आसीद् यस्तु महासुरः ॥ २१ ॥

प्रतिविन्ध्य इति ख्यातो बभूव प्रथितः क्षितौ ।

पृष्ठ 479

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 479 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विरूपाक्षस्तु दैतेयश्चित्रयोधी महासुरः ॥ २२ ॥

चित्रधर्मेति विख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः हरस्त्वरिहरो वीर आसीद् यो दानवोत्तमः ॥ २३ ॥

सुबाहुरिति विख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः ।

अहरस्तु महातेजाः शत्रुपक्षक्षयंकरः ॥ २४ ॥

बाह्लीको नाम राजा स बभूव प्रथितः क्षितौ ।

निचन्द्रश्चन्द्रवक्त्रस्तु य आसीदसुरोत्तमः ॥ २५ ॥

मुञ्जकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः ।

निकुम्भस्त्वजितः संख्ये महामतिरजायत ॥ २६ ॥

भूमौ भूमिपतिः क्षेष्ठो देवाधिप इति स्मृतः ।

शरभो नाम यस्तेषां दैतेयानां महासुरः ॥ २७ ॥

पौरवो नाम राजर्षिः स बभूव नरोत्तमः ।

कुपटस्तु महावीर्यः श्रीमान् राजन् महासुरः ॥ २८ ॥

सुपार्श्व इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः ।

क्रथस्तु राजन् राजर्षिः क्षितौ जज्ञे महासुरः ॥ २ ९ ॥

पार्वतेय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः ।

द्वितीयः शलभस्तेषामसुराणां बभूव ह ॥ ३० ॥

प्रह्रादो नाम बाह्लीकः स बभूव नराधिपः ।

चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः ॥ ३१ ॥

चन्द्रवर्मेति विख्यातः काम्बोजानां नराधिपः ।

अर्क इत्यभिविख्यातो यस्तु दानवपुङ्गवः ॥ ३२ ॥

ऋषिको नाम राजर्षिर्बभूव नृपसत्तमः ।

मृतपा इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ॥ ३३ ॥

पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम ।

गविष्ठस्तु महातेजा यः प्रख्यातो महासुरः ॥ ३४ ॥

द्रुमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

मयूर इति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ॥ ३५ ॥

स विश्व इति विख्यातो बभूव पृथिवीपतिः ।

सुपर्ण इति विख्यातस्तस्मादवरजस्तु यः ॥ ३६ ॥

कालकीर्तिरिति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ।

चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः ॥ ३७ ॥

शुनको नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः ।

विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 480

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 480 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जानकिर्नाम विख्यातः सोऽभवन्मनुजाधिपः ।

दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः ॥ ३ ९ ॥

काशिराजः स विख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपते ।

ग्रहं तु सुषुवे यं तु सिंहिकार्केन्दुमर्दनम् ।

स क्राथ इति विख्यातो बभूव मनुजाधिपः ॥ ४० ॥

अयःशिरा, अश्वशिरा, वीर्यवान् अयःशंकु, गगनमूर्धा और वेगवान्— राजन्! ये पाँच पराक्रमी महादैत्य केकय देशके प्रधान-प्रधान महात्मा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए । उनसे भिन्न केतुमान् नामसे प्रसिद्ध प्रतापी महान् असुर अमितौजा नामसे विख्यात राजा हुआ, जो भयानक कर्म करनेवाला था । स्वर्भानु नामवाला जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही भयंकर कर्म करनेवाला राजा उग्रसेन कहलाया । अश्व नामसे विख्यात जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही किसीसे परास्त न होनेवाला महापराक्रमी राजा अशोक हुआ । राजन्! उसका छोटा भाई जो अश्वपति नामक दैत्य था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ हार्दिक्य नामवाला राजा हुआ। वृषपर्वा नामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर दीर्घप्रज्ञ नामक राजा हुआ। राजन्! वृषपर्वाका छोटा भाई जो अजक था, वही इस भूमण्डलमें शाल्व नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ । अश्वग्रीव नामवाला जो धैर्यवान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर रोचमान नामसे विख्यात राजा हुआ । राजन्! बुद्धिमान् और यशस्वी सूक्ष्म नामसे प्रसिद्ध जो दैत्य कहा गया है, वह इस पृथ्वीपर बृहद्रथ नामसे विख्यात राजा हुआ है । असुरोंमें श्रेष्ठ जो तुहुण्ड नामक दैत्य था, वही यहाँ सेनाबिन्दु नामसे विख्यात राजा हुआ । असुरोंके समाजमें जो सबसे अधिक बलवान् था, वह इषुपाद नामक दैत्य इस पृथ्वीपर विख्यात पराक्रमी नग्नजित् नामक राजा हुआ । एकचक्र नामसे प्रसिद्ध जो महान् असुर था, वही इस पृथ्वीपर प्रतिविन्ध्य नामसे विख्यात राजा हुआ । विचित्र युद्ध करनेवाला महादैत्य विरूपाक्ष इस पृथ्वीपर चित्रधर्मा नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ । शत्रुओंका संहार करनेवाला जो वीर दानवश्रेष्ठ हर था, वही सुबाहु नामक श्रीसम्पन्न राजा हुआ । शत्रुपक्षका विनाश करनेवाला महातेजस्वी अहर इस भूमण्डलमें बाह्लिक नामसे विख्यात राजा हुआ । चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाला जो असुरश्रेष्ठ निचन्द्र था, वही मुंजकेश नामसे विख्यात श्रीसम्पन्न राजा हुआ । परम बुद्धिमान् निकुम्भ जो युद्धमें अजेय था, वह इस भूमिपर भूपालोंमें श्रेष्ठ देवाधिप कहलाया । दैत्योंमें जो शरभ नामसे प्रसिद्ध महान् असुर था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजर्षि पौरव हुआ । राजन्! महापराक्रमी महान् असुर कुपट ही इस पृथ्वीपर राजा सुपार्श्वके रूपमें उत्पन्न हुआ । महाराज! महादैत्य क्रथ इस पृथ्वीपर राजर्षि पार्वतेयके नामसे उत्पन्न हुआ, उसका शरीर मेरु पर्वतके समान विशाल था । असुरोंमें शलभ नामसे प्रसिद्ध जो दूसरा दैत्य था, वह बाह्लीकवंशी राजा प्रह्लाद हुआ । दैत्यश्रेष्ठ चन्द्र इस लोकमें चन्द्रमाके समान सुन्दर और चन्द्रवर्मा नामसे विख्यात काम्बोज देशका राजा हुआ। अर्क नामसे विख्यात जो दानवोंका सरदार था, वही नरपतियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि ऋषिक हुआ । नृपशिरोमणे! मृतपा