महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 481–490

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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नामसे प्रसिद्ध जो श्रेष्ठ असुर था, उसे पश्चिम अनूप देशका राजा समझो । गविष्ठ नामसे प्रसिद्ध जो महातेजस्वी असुर था, वही इस पृथ्वीपर द्रुमसेन नामक राजा हुआ । मयूर नामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् एवं महान् असुर था, वही विश्व नामसे विख्यात राजा हुआ । मयूरका छोटा भाई सुपर्ण ही भूमण्डलमें कालकीर्ति नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ । दैत्योंमें जो चन्द्रहन्ता नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ असुर कहा गया है, वही मनुष्योंका स्वामी राजर्षि शुनक हुआ । इसी प्रकार जो चन्द्रविनाशन नामक महान् असुर बताया गया है, वही जानकि नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ । कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! दीर्घजिह्व नामसे प्रसिद्ध दानवराज ही इस पृथ्वीपर काशिराजके नामसे विख्यात था । सिंहिकाने सूर्य और चन्द्रमाका मान मर्दन करनेवाले जिस राहु नामक ग्रहको जन्म दिया था, वही यहाँ क्राथ नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ॥ १०-४० ॥

दनायुषस्तु पुत्राणां चतुर्णां प्रवरोऽसुरः ।

विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रो नृपः स्मृतः ॥ ४१ ॥

दनायुके चार पुत्रोंमें जो सबसे बड़ा है, वह विक्षर नामक तेजस्वी असुर यहाँ राजा वसुमित्र बताया गया है ॥ ४१ ॥

द्वितीयो विक्षराद् यस्तु नराधिप महासुरः ।

पाण्ड्यराष्ट्राधिप इति विख्यातः सोऽभवन्नृपः ॥ ४२ ॥

नराधिप! विक्षरसे छोटा उसका दूसरा भाई बल, जो असुरोंका राजा था, पाण्ड्य देशका सुविख्यात राजा हुआ ॥ ४२ ॥

बली वीर इति ख्यातो यस्त्वासीदसुरोत्तमः ।

पौण्ड्रमात्स्यक इत्येवं बभूव स नराधिपः ॥ ४३ ॥

महाबली वीर नामसे विख्यात जो श्रेष्ठ असुर ( विक्षरका तीसरा भाई ) था, पौण्ड्रमात्स्यक नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ॥ ४३ ॥

वृत्र इत्यभिविख्यातो यस्तु राजन् महासुरः ।

मणिमान्नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः ॥ ४४ ॥

राजन्! जो वृत्र नामसे विख्यात (और विक्षरका चौथा भाई ) महान् असुर था, वही पृथ्वीपर राजर्षि मणिमान्के नामसे प्रसिद्ध भूपाल हुआ ॥ ४४ ॥

क्रोधहन्तेति यस्तस्य बभूवावरजोऽसुरः ।

दण्ड इत्यभिविख्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ ॥ ४५ ॥

क्रोधहन्ता नामक असुर जो उसका छोटा भाई ( कालाके पुत्रोंमें तीसरा ) था, वह इस पृथ्वीपर दण्ड नामसे विख्यात नरेश हुआ ॥ ४५ ॥

क्रोधवर्धन इत्येवं यस्त्वन्यः परिकीर्तितः ।

दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजर्षभः ॥ ४६ ॥

क्रोधवर्धन नामक जो दूसरा दैत्य कहा गया है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ दण्डधार नामसे विख्यात हुआ ॥ ४६ ॥

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कालेयानां तु ये पुत्रास्तेषामष्टौ नराधिपाः ।

जज्ञिरे राजशार्दूल शार्दूलसमविक्रमाः ॥ ४७ ॥

नृपश्रेष्ठ! कालेय नामक दैत्योंके जो पुत्र थे, उनमेंसे आठ इस पृथ्वीपर सिंहके समान पराक्रमी राजा हुए ॥ ४७ ॥

मगधेषु जयत्सेनस्तेषामासीत् स पार्थिवः ।

अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेयानां महासुरः ॥ ४८ ॥

उन आठों कालेयोंमें श्रेष्ठ जो महान् असुर था, वही मगध देशमें जयत्सेन नामक राजा हुआ ॥ ४८ ॥

द्वितीयस्तु ततस्तेषां श्रीमान् हरिहयोपमः ।

अपराजित इत्येवं स बभूव नराधिपः ॥ ४ ९ ॥

उन कालेयोंमेंसे जो दूसरा इन्द्रके समान श्रीसम्पन्न था, वही अपराजित नामक राजा हुआ ॥ ४ ९ ॥

तृतीयस्तु महातेजा महामायो महासुरः ।

निषादाधिपतिर्जज्ञे भुवि भीमपराक्रमः ॥ ५० ॥

तीसरा जो महान् तेजस्वी और महामायावी महादैत्य था, वह इस पृथ्वीपर भयंकर पराक्रमी निषादनरेशके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ५० ॥

तेषामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः ।

श्रेणिमानिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ॥ ५१ ॥

कालेयोंमेंसे ही एक जो चौथा बताया गया है, वह इस भूमण्डलमें राजर्षिप्रवर श्रेणिमान्के नामसे विख्यात हुआ ॥ ५१ ॥

पञ्चमस्त्वभवत् तेषां प्रवरो यो महासुरः ।

महौजा इति विख्यातो बभूवेह परंतपः ॥ ५२ ॥

कालेयोंमें जो पाँचवाँ श्रेष्ठ महादैत्य था, वही इस लोकमें शत्रुतापन महौजाके नामसे विख्यात हुआ ॥ ५२ ॥

षष्ठस्तु मतिमान् यो वै तेषामासीन्महासुरः ।

अभीरुरिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ॥ ५३ ॥

उन कालेयोंमें जो छठा महान् असुर था, वह भूमण्डलमें राजर्षिशिरोमणि अभीरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ५३ ॥

समुद्रसेनस्तु नृपस्तेषामेवाभवद् गणात् ।

विश्रुतः सागरान्तायां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित् ॥ ५४ ॥

उन्हींमेंसे सातवाँ असुर राजा समुद्रसेन हुआ, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर सब ओर विख्यात और धर्म एवं अर्थतत्त्वका ज्ञाता था ॥ ५४ ॥

बृहन्नामाष्टमस्तेषां कालेयानां नराधिप ।

पृष्ठ 483

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बभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः ॥ ५५ ॥

राजन्! कालेयोंमें जो आठवाँ था, वह बृहत् नामसे प्रसिद्ध सर्वभूतहितकारी धर्मात्मा राजा हुआ ॥ ५५ ॥

कुक्षिस्तु राजन् विख्यातो दानवानां महाबलः ।

पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः ॥ ५६ ॥

महाराज! दानवोंमें कुक्षि नामसे प्रसिद्ध जो महाबली राजा था, वह पार्वतीय नामक राजा हुआ; जो मेरुगिरिके समान तेजस्वी एवं विशाल था ॥ ५६ ॥

क्रथनश्च महावीर्यः श्रीमान् राजा महासुरः ।

सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः ॥ ५७ ॥

महापराक्रमी क्रथन नामक जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वह भूमण्डलमें पृथ्वीपति राजा सूर्याक्ष नामसे उत्पन्न हुआ ॥ ५७ ॥

असुराणां तु यः सूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः ।

दरदो नाम बाह्लीको वरः सर्वमहीक्षिताम् ॥ ५८ ॥

असुरोंमें जो सूर्य नामक श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही पृथ्वीपर सब राजाओंमें श्रेष्ठ दरद नामक बाह्लीकराज हुआ ॥ ५८ ॥

गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन् प्रकीर्तितः ।

ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः ॥ ५ ९ ॥

राजन्! क्रोधवश नामक जिन असुरगणोंका तुम्हें परिचय दिया है, उन्हींमेंसे कुछ लोग इस पृथ्वीपर निम्नांकित वीर राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए ॥ ५ ९ ॥

मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थ: कीटकस्तथा ।

सुवीरश्च सुबाहुश्च महावीरोऽथ बाह्लिकः ॥ ६० ॥

क्रथो विचित्रः सुरथः श्रीमान् नीलश्च भूमिपः ।

चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः ॥ ६१ ॥

दन्तवक्त्रश्च नामासीद् दुर्जयश्चैव दानवः ।

रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः ॥ ६२ ॥

आषाढो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च ।

एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः ॥ ६३ ॥

कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च ।

श्रुतायुरुद्वहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च ॥ ६४ ॥

क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः ।

मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः ॥ ६५ ॥

मद्रक, कर्णवेष्ट, सिद्धार्थ, कीटक, सुवीर, सुबाहु, महावीर, बाह्लिक, क्रथ, विचित्र, सुरथ, श्रीमान् नील नरेश, चीरवासा, भूमिपाल, दन्तवक्त्र, दानव दुर्जय, नृपश्रेष्ठ रुक्मी,

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राजा जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, सुमित्र, वाटधान, गोमुख, करूषदेशके अनेक राजा, क्षेमधूर्ति, श्रुतायु, उद्वह, बृहत्सेन, क्षेम, उग्रतीर्थ, कलिंग- नरेश कुहर तथा परम बुद्धिमान् मनुष्योंका राजा ईश्वर ॥ ६०–६५ ॥

गणात् क्रोधवशादेष राजपूगोऽभवत् क्षितौ ।

जातः पुरा महाभागो महाकीर्तिर्महाबलः ॥ ६६ ॥

इतने राजाओंका समुदाय पहले इस पृथ्वीपर क्रोधवश नामक दैत्यगणसे उत्पन्न हुआ था । ये सब राजा परम सौभाग्यशाली, महान् यशस्वी और अत्यन्त बलशाली थे ॥ ६६ ॥

कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महाबलः ।

स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो बली ॥ ६७ ॥

दानवोंमें जो महाबली कालनेमि था, वही राजा उग्रसेनके पुत्र बलवान् कंसके नामसे विख्यात हुआ || ६७ ||

यस्त्वासीद् देवको नाम देवराजसमद्युतिः ।

स गन्धर्वपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः ॥ ६८ ॥

इन्द्रके समान कान्तिमान् राजा देवकके रूपमें इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ गन्धर्वराज ही उत्पन्न हुआ था ॥ ६८ ॥

बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत ।

अंशाद् द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम् ॥ ६ ९ ॥

भारत! महान् कीर्तिशाली देवर्षि बृहस्पतिके अंशसे अयोनिज भरद्वाजनन्दन द्रोण उत्पन्न हुए, यह जान लो ॥ ६ ९ ॥

धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः ।

महाकीर्तिर्महातेजाः स जज्ञे मनुजेश्वर ॥ ७० ॥

नृपश्रेष्ठ राजा जनमेजय! आचार्य द्रोण समस्त धनुर्धर वीरोंमें उत्तम और सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता थे । उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी । वे महान् तेजस्वी थे ॥ ७० ॥

धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः ।

वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ॥ ७१ ॥

वेदवेत्ता विद्वान् द्रोणको धनुर्वेद और वेद दोनोंमें सर्वश्रेष्ठ मानते थे । वे विचित्र कर्म करनेवाले तथा अपने कुलकी मर्यादाको बढ़ानेवाले थे ॥ ७१ ॥

महादेवान्तकाभ्यां च कामात् क्रोधाच्च भारत ।

एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परंतपः ॥ ७२ ॥

अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः ।

वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिप ॥ ७३ ॥

भारत! उनके यहाँ महादेव, यम, काम और क्रोधके सम्मिलित अंशसे शत्रुसंतापी शूरवीर अश्वत्थामाका जन्म हुआ, जो इस पृथ्वीपर महापराक्रमी और शत्रुपक्षका संहार

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करनेवाला वीर था । राजन्! उसके नेत्र कमलदलके समान विशाल थे ॥ ७२-७३ ॥

जज्ञिरे वसवस्त्वष्टौ गङ्गायां शान्तनोः सुताः ।

वसिष्ठस्य च शापेन नियोगाद् वासवस्य च ॥ ७४ ॥

महर्षि वसिष्ठके शाप और इन्द्रके आदेशसे आठों वसु गंगाजीके गर्भसे राजा शान्तनुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ ७४ ॥

तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभयंकरः ।

मतिमान् वेदविद् वाग्मी शत्रुपक्षक्षयंकरः ॥ ७५ ॥

उनमें सबसे छोटे भीष्म थे, जिन्होंने कौरववंशको निर्भय बना दिया था । वे परम बुद्धिमान्, वेदवेत्ता, वक्ता तथा शत्रुपक्षका संहार करनेवाले थे ॥ ७५ ॥

जामदग्न्येन रामेण सर्वास्त्रविदुषां वरः ।

योऽयुध्यत महातेजा भार्गवेण महात्मना ॥ ७६ ॥

सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मने भृगुवंशी महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध किया था ॥ ७६ ॥

यस्तु राजन् कृपो नाम ब्रह्मर्षिरभवत् क्षितौ ।

रुद्राणां तु गणाद् विद्धि सम्भूतमतिपौरुषम् ॥ ७७ ॥

महाराज! जो कृप नामसे प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, उनका पुरुषार्थ असीम था । उन्हें रुद्रगणके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ॥ ७७ ॥

शकुनिर्नाम यस्त्वासीद् राजा लोके महारथः ।

द्वापरं विद्धि तं राजन् सम्भूतमरिमर्दनम् ॥ ७८ ॥

राजन्! जो इस जगत्में महारथी राजा शकुनिके नामसे विख्यात था, उसे तुम द्वापरके

अंशसे उत्पन्न हुआ मानो । वह शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाला था ॥ ७८ ॥

सात्यकिः सत्यसन्धश्च योऽसौ वृष्णिकुलोद्वहः ।

पक्षात् स जज्ञे मरुतां देवानामरिमर्दनः ॥ ७९ ॥

वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाले जो सत्यप्रतिज्ञ शत्रुमर्दन सात्यकि थे, वे मरुत्-देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ॥ ७ ९ ॥

द्रुपदश्चैव राजर्षिस्तत एवाभवद् गणात् ।

मानुषे नृप लोकेऽस्मिन् सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ८० ॥

राजा जनमेजय! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि द्रुपद भी इस मनुष्यलोकमें उस मरुद्गणसे ही उत्पन्न हुए थे ॥ ८० ॥

ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम् ।

तमप्रतिमकर्माणं क्षत्रियर्षभसत्तमम् ॥ ८१ ॥

महाराज! अनुपम कर्म करनेवाले, क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ राजा कृतवर्माको भी तुम मरुद्गणोंसे ही उत्पन्न मानो ॥ ८१ ॥

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मरुतां तु गणाद् विद्धि संजातमरिमर्दनम् ।

विराटं नाम राजानं परराष्ट्रप्रतापनम् ॥ ८२ ॥

शत्रुराष्ट्रको संताप देनेवाले शत्रुमर्दन राजा विराटको भी मरुद्गणोंसे ही उत्पन्न समझो ॥ ८२ ॥

अरिष्टायास्तु यः पुत्रो हंस इत्यभिविश्रुतः ।

स गन्धर्वपतिर्जज्ञे कुरुवंशविवर्धनः ॥ ८३ ॥

धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपायनात्मजः ।

दीर्घबाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ॥ ८४ ॥

मातुर्दोषादृषेः कोपादन्ध एव व्यजायत । अरिष्टाका पुत्र जो हंस नामसे विख्यात गन्धर्वराज था, वही कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले व्यासनन्दन धृतराष्ट्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ । धृतराष्ट्रकी बाँहें बहुत बड़ी थीं । वे महातेजस्वी नरेश प्रज्ञाचक्षु ( अन्धे ) थे । वे माताके दोष और महर्षिके क्रोधसे अन्धे ही उत्पन्न हुए ॥ ८३-८४ ॥ तस्यैवावरजो भ्राता महासत्त्वो महाबलः ॥ ८५ ॥

स पाण्डुरिति विख्यातः सत्यधर्मरतः शुचिः ।

अत्रेस्तु* सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम् ।

विदुरं विद्धि तं लोके जातं बुद्धिमतां वरम् ॥ ८६ ॥

उन्हींके छोटे भाई महान् शक्तिशाली महाबली पाण्डुके नामसे विख्यात हुए। वे सत्य- धर्ममें तत्पर और पवित्र थे । पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ और बुद्धिमानोंमें उत्तम परम सौभाग्यशाली विदुरको तुम इस लोकमें सूर्यपुत्र धर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ॥ ८५-८६ ॥

कलेरंशस्तु संजज्ञे भुवि दुर्योधनो नृपः ।

दुर्बुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामयशस्करः ॥ ८७ ॥

खोटी बुद्धि और दूषित विचारवाले कुरुकुलकलंक राजा दुर्योधनके रूपमें इस पृथ्वीपर कलिका अंश ही उत्पन्न हुआ था ॥ ८७ ॥

जगतो यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः ।

यः सर्वां घातयामास पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ८८ ॥

राजन्! वह कलिस्वरूप पुरुष सबका द्वेषपात्र था । उसने सारी पृथ्वीके वीरोंको लड़ाकर मरवा दिया था ॥ ८८ ॥

उद्दीपितं येन वैरं भूतान्तकरणं महत् ।

पौलस्त्या भ्रातरश्चास्य जज्ञिरे मनुजेष्विह ॥ ८ ९ ॥

उसके द्वारा प्रज्वलित की हुई वैरकी भारी आग असंख्य प्राणियोंके विनाशका कारण बन गयी । पुलस्त्य- कुलके राक्षस भी मनुष्योंमें दुर्योधनके भाइयोंके रूपमें उत्पन्न हुए

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थे ॥ ८९ ॥

शतं दुःशासनादीनां सर्वेषां क्रूरकर्मणाम् ।

दुर्मुखो दुःसहश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ९० ॥

दुर्योधनसहायास्ते पौलस्त्या भरतर्षभ ।

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ॥ ९ १ ॥

उसके दुःशासन आदि सौ भाई थे । वे सभी क्रूरतापूर्ण कर्म किया करते थे । दुर्मुख, दुःसह तथा अन्य कौरव जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, दुर्योधनके सहायक थे । भरतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रके वे सब पुत्र पूर्वजन्मके राक्षस थे । धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु वैश्य - जातीय

स्त्रीसे उत्पन्न हुआ था । वह दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके अतिरिक्त था ॥ ९० - ९ १ ॥

जनमेजय उवाच

ज्येष्ठानुज्येष्ठतामेषां नामधेयानि वा विभो ।

धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्येण कीर्तय ॥ ९ २ ॥

जनमेजयने कहा – प्रभो! धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र थे, उनके नाम मुझे बड़े -छोटेके क्रमसे एक - एक करके बताइये ॥ ९ २ ॥ वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा ।

दुःसहो दुःशलश्चैव दुर्मुखश्च तथापरः ॥ ९ ३ ॥

विविंशतिर्विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः ।

विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ॥ ९ ४ ॥

दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ।

चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुश्चित्राङ्गदश्च ह ॥ ९ ५ ॥

दुर्मदो दुष्प्रधर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः ।

ऊर्णनाभः पद्मनाभस्तथा नन्दोपनन्दकौ ॥ ९ ६ ॥

सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ।

चित्रबाहुश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ॥ ९ ७ ॥

अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्रचापसुकुण्डलौ ।

भीमवेगो भीमबलो बलाकी भीमविक्रमौ ॥ ९ ८ ॥

उग्रायुधो भीमशरः कनकायुर्दृढायुधः ।

दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ॥ ९९ ॥

जरासन्धो दृढसन्धः सत्यसन्धः सहस्रवाक् ।

उग्रश्रवा उग्रसेनः क्षेममूर्तिस्तथैव च ॥ १०० ॥

अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधनः ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 488

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दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ।

आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तानुयायिनौ ॥ १०२ ॥

कवची निषङ्गी दण्डी दण्डधारो धनुर्ग्रहः ।

उग्रो भीमरथो वीरो वीरबाहुरलोलुपः ॥ १०३ ॥

अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथश्च यः ।

अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी दीर्घलोचनः ॥ १०४ ॥

दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोरुः कनकाङ्गदः ।

कुण्डजश्चित्रकश्चैव दुःशला च शताधिका ॥ १०५ ॥

वैशम्पायनजी बोले – राजन्! सुनो- १ दुर्योधन, २ युयुत्सु, ३ दुःशासन, ४ दुःसह, ५ दुःशल, ६ दुर्मुख, ७ विविंशति, ८ विकर्ण, ९ जलसन्ध, १० सुलोचन, ११ विन्द, १२ अनुविन्द, १३ दुर्धर्ष, १४ सुबाहु, १५ दुष्प्रधर्षण, १६ दुर्मर्षण, १७ दुर्मुख, १८ दुष्कर्ण, १ ९ कर्ण, २० चित्र, २१ उपचित्र, २२ चित्राक्ष, २३ चारु, २४ चित्रांगद, २५ दुर्मद, २६ दुष्प्रधर्ष, २७ विवित्सु, २८ विकट, २ ९ सम, ३० ऊर्णनाभ, ३१ पद्मनाभ, ३२ नन्द, ३३ उपनन्द, ३४ सेनापति, ३५ सुषेण, ३६ कुण्डोदर, ३७ महोदर, ३८ चित्रबाहु, ३ ९ चित्रवर्मा, ४० सुवर्मा, ४१ दुर्विरोचन, ४२ अयोबाहु, ४३ महाबाहु, ४४ चित्रचाप, ४५ सुकुण्डल, ४६ भीमवेग, ४७ भीमबल, ४८ बलाकी, ४ ९ भीम, ५० विक्रम, ५१ उग्रायुध, ५२ भीमशर, ५३ कनकायु, ५४ दृढायुध, ५५ दृढवर्मा, ५६ दृढक्षत्र, ५७ सोमकीर्ति, ५८ अनूदर, ५ ९ जरासन्ध, ६० दृढसन्ध, ६१ सत्यसन्ध, ६२ सहस्रवाक्, ६३ उग्रश्रवा, ६४ उग्रसेन, ६५ क्षेममूर्ति, ६६ अपराजित, ६७ पण्डितक, ६८ विशालाक्ष, ६ ९ दुराधन, ७० दृढहस्त, ७१ सुहस्त, ७२ वातवेग, ७३ सुवर्चा, ७४ आदित्यकेतु, ७५ बह्वाशी, ७६ नागदत्त, ७७ अनुयायी, ७८ कवची, ७ ९ निषंगी, ८० दण्डी, ८१ दण्डधार, ८२ धनुर्ग्रह, ८३ उग्र, ८४ भीमरथ, ८५ वीर, ८६ वीरबाहु, ८७ अलोलुप, ८८ अभय, ८ ९ रौद्रकर्मा, ९ ० दृढरथ, ९ १ अनाधृष्य, ९२ कुण्डभेदी, ९ ३ विरावी, ९ ४ दीर्घलोचन, ९ ५ दीर्घबाहु, ९ ६ महाबाहु, ९ ७ व्यूढोरु, ९८ कनकांगद, ९९ कुण्डज और १०० चित्रक — ये धृतराष्ट्रके सौ पुत्र थे । इनके सिवा दुःशला नामकी एक कन्या थी ॥ ९ ३ —१०५ ॥

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ।

एतदेकशतं राजन् कन्या चैका प्रकीर्तिता ॥ १०६ ॥

धृतराष्ट्रका वह पुत्र जिसका नाम युयुत्सु था, वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुआ था । वह दुर्योधन आदि सौ पुत्रोंसे अतिरिक्त था । राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्रके एक सौ एक पुत्र तथा एक कन्या बतायी गयी है ॥ १०६ ॥

नामधेयानुपूर्व्या च ज्येष्ठानुज्जेष्ठतां विदुः ।

सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १०७ ॥

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इनके नामोंका जो क्रम दिया गया है, उसीके अनुसार विद्वान् पुरुष इन्हें जेठा और छोटा समझते हैं । धृतराष्ट्रके सभी पुत्र उत्कृष्ट रथी, शूरवीर और युद्धकी कलामें कुशल थे ॥ १०७ ॥

सर्वे वेदविदश्चैव राजच्छास्त्रे च पारगाः ।

सर्वे संग्रामविद्यासु विद्याभिजनशोभिनः ॥ १०८ ॥

राजन्! वे सब- के - सब वेदवेत्ता, शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, संग्राम-विद्यामें प्रवीण तथा उत्तम विद्या और उत्तम कुलसे सुशोभित थे ॥ १०८ ॥

सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते ।

दुःशलां समये राजन् सिन्धुराजाय कौरवः ॥ १० ९ ॥

जयद्रथाय प्रददौ सौबलानुमते तदा ।

धर्मस्यांशं तु राजानं विद्धि राजन् युधिष्ठिरम् ॥ ११० ॥

भूपाल! उन सबका सुयोग्य स्त्रियोंके साथ विवाह हुआ था । महाराज! कुरुराज दुर्योधनने समय आनेपर शकुनिकी सलाहसे अपनी बहिन दुःशलाका विवाह सिन्धुदेशके राजा जयद्रथके साथ कर दिया । जनमेजय! राजा युधिष्ठिरको तो तुम धर्मका अंश जानो ॥ १० ९ -११० ॥

भीमसेनं तु वातस्य देवराजस्य चार्जुनम् ।

अश्विनोस्तु तथैवांशौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि ॥ १११ ॥

नकुलः सहदेवश्च सर्वभूतमनोहरौ ।

यस्तु वर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान् ॥ ११२ ॥

सोऽभिमन्युर्बृहत्कीर्तिरर्जुनस्य सुतोऽभवत् ।

यस्यावतरणे राजन् सुरान् सोमोऽब्रवीदिदम् ॥ ११३ ॥

भीमसेनको वायुका और अर्जुनको देवराज इन्द्रका अंश जानो । रूप - सौन्दर्यकी दृष्टिसे इस पृथ्वीपर जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था, वे समस्त प्राणियोंका मन मोह लेनेवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे । वर्चा नामसे विख्यात जो चन्द्रमाका प्रतापी पुत्र था, वही महायशस्वी अर्जुनकुमार अभिमन्यु हुआ । जनमेजय! उसके अवतार- कालमें चन्द्रमाने देवताओंसे इस प्रकार कहा- ॥ १११–११३ ॥

नाहं दद्यां प्रियं पुत्रं मम प्राणैर्गरीयसम् ।

समयः क्रियतामेष न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ ११४ ॥

' मेरा पुत्र मुझे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, अतः मैं इसे अधिक दिनोंके लिये नहीं दे सकता । इसलिये मृत्युलोकमें इसके रहनेकी कोई अवधि निश्चित कर दी जाय । फिर उस अवधिका उल्लंघन नहीं किया जा सकता ॥ ११४ ॥

सुरकार्यं हि नः कार्यमसुराणां क्षितौ वधः ।

तत्र यास्यत्ययं वर्चा न च स्थास्यति वै चिरम् ॥ ११५ ॥

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'पृथ्वीपर असुरोंका वध करना देवताओंका कार्य है और वह हम सबके लिये करनेयोग्य है । अतः उस कार्यकी सिद्धिके लिये यह वर्चा भी वहाँ अवश्य जायगा । परंतु दीर्घकालतक वहाँ नहीं रह सकेगा ॥ ११५ ॥

ऐन्द्रिर्नरस्तु भविता यस्य नारायणः सखा ।

सोऽर्जुनेत्यभिविख्यातः पाण्डोः पुत्रः प्रतापवान् ॥ ११६ ॥

‘ भगवान् नर, जिनके सखा भगवान् नारायण हैं, इन्द्रके अंशसे भूतलमें अवतीर्ण होंगे ।

वहाँ उनका नाम अर्जुन होगा और वे पाण्डुके प्रतापी पुत्र माने जायँगे ॥ ११६ ॥

तस्यायं भविता पुत्रो बालो भुवि महारथः ।

ततः षोडश वर्षाणि स्थास्यत्यमरसत्तमाः ॥ ११७ ॥

‘ श्रेष्ठ देवगण! पृथ्वीपर यह वर्चा उन्हीं अर्जुनका पुत्र होगा, जो बाल्यावस्थामें ही महारथी माना जायगा। जन्म लेनेके बाद सोलह वर्षकी अवस्थातक यह वहाँ रहेगा ॥ ११७ ॥

अस्य षोडशवर्षस्य स संग्रामो भविष्यति ।

यत्रांशा वः करिष्यन्ति कर्म वीरनिषूदनम् ॥ ११८ ॥

‘ इसके सोलहवें वर्षमें वह महाभारत युद्ध होगा, जिसमें आपलोगोंके अंशसे उत्पन्न हुए वीर-र- पुरुष शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अद्भुत पराक्रम कर दिखायेंगे ॥ ११८ ॥

नरनारायणाभ्यां तु स संग्रामो विना कृतः ।

चक्रव्यूहं समास्थाय योधयिष्यन्ति वः सुराः ॥ ११ ९ ॥

विमुखाञ्छात्रवान् सर्वान् कारयिष्यति मे सुतः ।

बालः प्रविश्य च व्यूहमभेद्यं विचरिष्यति ॥ १२० ॥

‘ देवताओ! एक दिन जब कि उस युद्धमें नर और नारायण ( अर्जुन और श्रीकृष्ण) उपस्थित न रहेंगे, उस समय शत्रुपक्षके लोग चक्रव्यूहकी रचना करके आप - लोगोंके साथ युद्ध करेंगे । उस युद्धमें मेरा यह पुत्र समस्त शत्रु - सैनिकोंको युद्धसे मार भगायेगा और बालक होनेपर भी उस अभेद्य व्यूहमें घुसकर निर्भय विचरण करेगा ॥ ११ ९-१२० ॥

महारथानां वीराणां कदनं च करिष्यति ।

सर्वेषामेव शत्रूणां चतुर्थांशं नयिष्यति ॥ १२१ ॥

दिनार्धेन महाबाहुः प्रेतराजपुरं प्रति ।

ततो महारथैर्वीरैः समेत्य बहुशो रणे ॥ १२२ ॥

दिनक्षये महाबाहुर्मया भूयः समेष्यति ।

एकं वंशकरं पुत्रं वीरं वै जनयिष्यति ॥ १२३ ॥

प्रणष्टं भारतं वंशं स भूयो धारयिष्यति ।

एतत् सोमवचः श्रुत्वा तथास्त्विति दिवौकसः ॥ १२४ ॥

प्रत्यूचुः सहिताः सर्वे ताराधिपमपूजयन् ।