महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 491–500
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितुः ॥ १२५ ॥
' तथा बड़े - बड़े महारथी वीरोंका संहार कर डालेगा । आधे दिनमें ही महाबाहु अभिमन्यु समस्त शत्रुओंके एक चौथाई भागको यमलोक पहुँचा देगा । तदनन्तर बहुत - से महारथी एक साथ ही उसपर टूट पड़ेंगे और वह महाबाहु उन सबका सामना करते हुए संध्या होते - होते पुनः मुझसे आ मिलेगा । वह एक ही वंशप्रवर्तक वीर पुत्रको जन्म देगा, जो नष्ट हुए भरतकुलको पुनः धारण करेगा। ' सोमका यह वचन सुनकर समस्त देवताओंने ‘ तथास्तु ’ कहकर उनकी बात मान ली और सबने चन्द्रमाका पूजन किया । राजा जनमेजय! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पिताके पिताका जन्म- रहस्य बताया है ॥ १२१ – १२५ ॥
अग्नेर्भागं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम् ।
शिखण्डिनमथो राजन् स्त्रीपूर्वं विद्धि राक्षसम् ॥ १२६ ॥
महाराज! महारथी धृष्टद्युम्नको तुम अग्निका भाग समझो । शिखण्डी राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुआ था । वह पहले कन्यारूपमें उत्पन्न होकर पुनः पुरुष हो गया था ॥ १२६ ॥
द्रौपदेयाश्च ये पञ्च बभूवुर्भरतर्षभ ।
विश्वान् देवगणान् विद्धि संजातान् भरतर्षभ ॥ १२७ ॥
भरतर्षभ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि द्रौपदीके जो पाँच पुत्र थे, उनके रूपमें पाँच विश्वेदेवगण ही प्रकट हुए थे ॥ १२७ ॥
प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः श्रुतकीर्तिस्तथापरः ।
नाकुलिस्तु शतानीकः श्रुतसेनश्च वीर्यवान् ॥ १२८ ॥
उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, नकुलनन्दन शतानीक तथा पराक्रमी श्रुतसेन ॥ १२८ ॥
शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् ।
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ १२ ९ ॥
वसुदेवजीके पिताका नाम था शूरसेन । वे यदुवंशके एक श्रेष्ठ पुरुष थे । उनके पृथा नामवाली एक कन्या हुई, जिसके समान रूपवती स्त्री इस पृथ्वीपर दूसरी नहीं थी ॥ १२९ ॥
पितुः स्वस्त्रीयपुत्राय सोऽनपत्याय वीर्यवान् ।
अग्रमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यस्य वै तदा ॥ १३० ॥
उग्रसेनके फुफेरे भाई कुन्तिभोज संतानहीन थे । पराक्रमी शूरसेनने पहले कभी उनके सामने यह प्रतिज्ञा की थी कि ' मैं अपनी पहली संतान आपको दे दूँगा ' ॥ १३० ॥
अग्रजातेति तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षया ।
अददात् कुन्तिभोजाय स तां दुहितरं तदा ॥ १३१ ॥
तदनन्तर सबसे पहले उनके यहाँ कन्या ही उत्पन्न हुई। शूरसेनने अनुग्रहकी इच्छासे राजा कुन्तिभोजको अपनी वह पुत्री पृथा प्रथम संतान होनेके कारण गोद दे दी ॥ १३१ ॥
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सा नियुक्ता पितुर्गेहे ब्राह्मणातिथिपूजने ।
उग्रं पर्यचरद् घोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १३२ ॥
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।
तमुग्रं शंसितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत् ॥ १३३ ॥
पिताके घरपर रहते समय पृथाको ब्राह्मणों और अतिथियोंके स्वागत- सत्कारका कार्य सौंपा गया था । एक दिन उसने कठोर व्रतका पालन करनेवाले भयंकर क्रोधी तथा उग्र प्रकृतिवाले एक ब्राह्मण महर्षिकी, जो धर्मके विषयमें अपने निश्चयको छिपाये रखते थे और लोग जिन्हें दुर्वासाके नामसे जानते हैं, सेवा की । वे ऊपरसे तो उग्र स्वभावके थे, परंतु उनका हृदय महान् होनेके कारण सबके द्वारा प्रशंसित था । पृथाने पूरा प्रयत्न करके अपनी सेवाओंद्वारा मुनिको संतुष्ट किया ॥ १३२-१३३ ॥
तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि ।
उवाच चैनां भगवान् प्रीतोऽस्मि सुभगे तव ॥ १३४ ॥
भगवान् दुर्वासाने संतुष्ट होकर पृथाको प्रयोग- विधिसहित एक मन्त्रका विधिपूर्वक उपदेश किया और कहा - ' सुभगे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १३४ ॥
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
तस्य तस्य प्रसादात् त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि ॥ १३५ ॥
'देवि! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी - उसीके कृपाप्रसादसे पुत्र उत्पन्न करोगी' ॥ १३५ ॥
एवमुक्ता च सा बाला तदा कौतूहलान्विता ।
कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ १३६ ॥
दुर्वासाके ऐसा कहनेपर वह सती- साध्वी यशस्विनी बाला यद्यपि अभी कुमारी कन्या थी, तो भी कौतूहलवश उसने भगवान् सूर्यका आवाहन किया ॥ १३६ ॥
प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भं दधौ तदा ।
अजीजनत् सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १३७ ॥
तब सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश फैलानेवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीके उदरमें गर्भ स्थापित किया और उस गर्भसे एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया, जो समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ १३७ ॥
सकुण्डलं सकवचं देवगर्भश्रियान्वितम् ।
दिवाकरसमं दीप्त्या चारुसर्वाङ्गभूषितम् ॥ १३८ ॥
वह कुण्डल और कवचके साथ ही प्रकट हुआ था । देवताओंके बालकोंमें जो सहज
कान्ति होती है, उसीसे वह सुशोभित था । अपने तेजसे वह सूर्यके समान जान पड़ता था ।
उसके सभी अंग मनोहर थे, जो उसके सम्पूर्ण शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १३८ ॥
निगूहमाना जातं वै बन्धुपक्षभयात् तदा ।
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उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम् ॥ १३ ९ ॥ उस समय कुन्तीने पिता-माता आदि बान्धव - पक्षके भयसे उस यशस्वी कुमारको छिपाकर एक पेटीमें रखकर जलमें छोड़ दिया ॥ १३ ९ ॥
तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः ।
राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा ॥ १४० ॥
जलमें छोड़े हुए उस बालकको राधाके पति महायशस्वी अधिरथ सूतने लेकर राधाकी गोदमें दे दिया और उसे राधाका पुत्र बना लिया ॥ १४० ॥
चक्रतुर्नामधेयं च तस्य बालस्य तावुभौ ।
दम्पती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम् ॥ १४१ ॥
उन दोनों दम्पतिने उस बालकका नाम वसुषेण रखा । वह सम्पूर्ण दिशाओंमें भलीभाँति विख्यात था ॥ १४१ ॥
संवर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेषूत्तमोऽभवत् ।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जयतां वरः ॥ १४२ ॥
बड़ा होनेपर वह बलवान् बालक सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंको चलानेकी कलामें उत्तम हुआ । उस विजयी वीरने सम्पूर्ण वेदांगोंका अध्ययन कर लिया ॥ १४२ ॥
यस्मिन् काले जपन्नास्ते धीमान् सत्यपराक्रमः ।
नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् तस्मिन् काले महात्मनः ॥ १४३ ॥
वसुषेण ( कर्ण) बड़ा बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी था । जिस समय वह जपमें लगा होता, उस समय उस महात्माके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे डाले ॥ १४३ ॥
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः ।
ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाङ्गजम् ॥ १४४ ॥
भूतभावन इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनके हितके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके वीर कर्णसे दोनों कुण्डल तथा उसके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ कवच माँगा ॥ १४४ ॥
उत्कृत्य कर्णो ह्यददात् कवचं कुण्डले तथा ।
शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत् ॥ १४५ ॥
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
यस्मिन् क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष स एको न भविष्यति ॥ १४६ ॥
कर्णने अपने शरीरमें चिपके हुए कवच और कुण्डलोंको उधेड़कर दे दिया । इन्द्रने विस्मित होकर कर्णको एक शक्ति प्रदान की और कहा- ' दुर्धर्ष वीर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंमेंसे जिसपर भी इस शक्तिको चलाओगे, वह एक व्यक्ति निश्चय ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा ' ॥ १४५-१४६ ॥ पुरा नाम च तस्यासीद् वसुषेण इति क्षितौ ।
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ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥ १४७ ॥
पहले कर्णका नाम इस पृथ्वीपर वसुषेण था । फिर कवच और कुण्डल'काटनेके कारण वह वैकर्तन नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १४७ ॥
आमुक्तकवचो वीरो यस्तु जज्ञे महायशाः ।
स कर्ण इति विख्यातः पृथायाः प्रथमः सुतः ॥ १४८ ॥
जो महायशस्वी वीर कवच धारण किये हुए ही उत्पन्न हुआ, वह पृथाका प्रथम पुत्र कर्ण नामसे ही सर्वत्र विख्यात था ॥ १४८ ॥
स तु सूतकुले वीरो ववृधे राजसत्तम ।
कर्णं नरवरश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १४ ९ ॥
महाराज! वह वीर सूतकुलमें पाला -पोसा जाकर बड़ा हुआ था । नरश्रेष्ठ कर्ण सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ १४ ९ ॥
दुर्योधनस्य सचिवं मित्रं शत्रुविनाशनम् ।
दिवाकरस्य तं विद्धि राजन्नंशमनुत्तमम् ॥ १५० ॥
वह दुर्योधनका मन्त्री और मित्र होनेके साथ ही उसके शत्रुओंका नाश करनेवाला था ।
राजन्! तुम कर्णको साक्षात् सूर्यदेवका सर्वोत्तम अंश जानो ॥ १५० ॥
यस्तु नारायणो नाम देवदेवः सनातनः ।
तस्यांशो मानुषेष्वासीद् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १५१ ॥
देवताओंके भी देवता जो सनातन पुरुष भगवान् नारायण हैं, उन्हींके अंशस्वरूप प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए थे ॥ १५१ ॥
शेषस्यांशश्च नागस्य बलदेवो महाबलः ।
सनत्कुमारं प्रद्युम्नं विद्धि राजन् महौजसम् ॥ १५२ ॥
महाबली बलदेवजी शेषनागके अंश थे । राजन्! महातेजस्वी प्रद्युम्नको तुम सनत्कुमारका अंश जानो ॥ १५२ ॥
एवमन्ये मनुष्येन्द्रा बहवोंऽशा दिवौकसाम् ।
जज्ञिरे वसुदेवस्य कुले कुलविवर्धनाः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार वसुदेवजीके कुलमें बहुत - से दूसरे- दूसरे नरेन्द्र उत्पन्न हुए, जो देवताओंके अंश थे । वे सभी अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ १५३ ॥
गणस्त्वप्सरसां यो वै मया राजन् प्रकीर्तितः ।
तस्य भागः क्षितौ जज्ञे नियोगाद् वासवस्य ह ॥ १५४ ॥
महाराज! मैंने अप्सराओंके जिस समुदायका वर्णन किया है, उसका अंश भी इन्द्रके आदेशसे इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ था ॥ १५४ ॥
तानि षोडश देवीनां सहस्राणि नराधिप ।
बभूवुर्मानुषे लोके वासुदेवपरिग्रहः ॥ १५५ ॥
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नरेश्वर! वे अप्सराएँ मनुष्यलोकमें सोलह हजार देवियोंके रूपमें उत्पन्न हुई थीं, जो सब--की - सब भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हुईं ॥ १५५ ॥
श्रस्तु भागः संजज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले ।
भीष्मकस्य कुले साध्वी रुक्मिणी नाम नामतः ॥ १५६ ॥
नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करनेके लिये भूतलपर विदर्भराज भीष्मकके कुलमें सती- साध्वी रुक्मिणीदेवीके नामसे लक्ष्मीजीका ही अंश प्रकट हुआ था ॥ १५६ ॥
द्रौपदी त्वथ संजज्ञे शची भागादनिन्दिता ।
द्रुपदस्य कुले कन्या वेदिमध्यादनिन्दिता ॥ १५७ ॥
सती- साध्वी द्रौपदी शचीके अंशसे उत्पन्न हुई थी । वह राजा द्रुपदके कुलमें यज्ञकी वेदीके मध्यभागसे एक अनिन्द्य सुन्दरी कुमारी कन्याके रूपमें प्रकट हुई थी ॥ १५७ ॥
नातिहस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी ।
पद्मायताक्षी सुश्रोणी स्वसिताञ्चितमूर्धजा ॥ १५८ ॥
वह न तो बहुत छोटी थी और न बहुत बड़ी ही । उसके अंगोंसे नीलकमलकी सुगन्ध फैलती रहती थी । उसके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर और विशाल थे, नितम्बभाग बड़ा ही मनोहर था और उसके काले - काले घुँघराले बालोंका सौन्दर्य भी अद्भुत था ॥ १५८ ॥
सर्वलक्षणसम्पूर्णा वैदूर्यमणिसंनिभा ।
पञ्चानां पुरुषेन्द्राणां चित्तप्रमथनी रहः ॥ १५ ९ ॥
वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा वैदूर्य मणिके समान कान्तिमती थी । एकान्तमें रहकर वह पाँचों पुरुषप्रवर पाण्डवोंके मनको मुग्ध किये रहती थी ॥ १५ ९ ॥
सिद्धिर्धृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते ।
कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु सुबलात्मजा ॥ १६० ॥
सिद्धि और धृति नामवाली जो दो देवियाँ हैं, वे ही पाँचों पाण्डवोंकी दोनों माताओं— कुन्ती और माद्रीके रूपमें उत्पन्न हुई थीं । सुबल- नरेशकी पुत्री गान्धारीके रूपमें साक्षात् मतिदेवी ही प्रकट हुई थीं ॥ १६० ॥
इति देवासुराणां ते गन्धर्वाप्सरसां तथा ।
अंशावतरणं राजन् राक्षसानां च कीर्तितम् ॥ १६१ ॥
ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्ध दुर्मदाः ।
महात्मानो यदूनां च ये जाता विपुले कुले ॥ १६२ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मया ते परिकीर्तिताः ।
धन्यं यशस्यं पुत्रीयमायुष्यं विजयावहम् ।
इदमंशावतरणं श्रोतव्यमनसूयता ॥ १६३ ॥
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राजन्! इस प्रकार तुम्हें देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा राक्षसोंके अंशोंका अवतरण बताया गया । युद्धमें उन्मत्त रहनेवाले जो-जो राजा इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए थे और जो -जो महात्मा क्षत्रिय यादवोंके विशाल कुलमें प्रकट हुए थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य जो भी रहे हैं, उन सबके स्वरूपका परिचय मैंने तुम्हें दे दिया है । मनुष्यको चाहिये कि वह दोष - दृष्टिका त्याग करके इस अंशावतरणके प्रसंगको सुने । यह धन, यश, पुत्र, आयु तथा विजयकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १६१–१६३ ॥
अंशावतरणं श्रुत्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ।
प्रभवाप्ययवित् प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति ॥ १६४ ॥
देवता, गन्धर्व तथा राक्षसोंके इस अंशावतरणको सुनकर विश्वकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान परमात्माके स्वरूपको जाननेवाला प्राज्ञ पुरुष बड़ी- बड़ी विपत्तियोंमें भी दुःखी नहीं होता ॥ १६४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अंशावतरणसमाप्तौ सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणसमाप्तिविषयक सड़सठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
‘ अत्रि' शब्दसे यहाँ सूर्यको ग्रहण किया गया है । नीलकण्ठने भी यही अर्थ लिया है ।
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अष्टषष्टितमोऽध्यायः राजा दुष्यन्तकी अद्भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन जनमेजय उवाच
त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन् देवदानवरक्षसाम् ।
अंशावतरणं सम्यग् गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ १ ॥
जनमेजय बोले — ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे देवता, दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा अप्सराओंके अंशावतरणका वर्णन अच्छी तरह सुन लिया ॥ १ ॥
इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः ।
कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसंनिधौ ॥ २ ॥
विप्रवर! अब इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आपके द्वारा वर्णित कुरुवंशका वृत्तान्त पुनः आदिसे ही सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान् ।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! पूरुवंशका विस्तार करनेवाले एक राजा हो गये हैं, जिनका नाम था दुष्यन्त। वे महान् पराक्रमी तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके पालक थे ॥ ३ ॥
चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः ।
समुद्रावरणांश्चापि देशान् स समितिंजयः ॥ ४ ॥
आम्लेच्छावधिकान् सर्वान् स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः ।
रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान् ॥ ५ ॥
राजा दुष्यन्त पृथ्वीके चारों भागोंका तथा समुद्रसे आवृत सम्पूर्ण देशोंका भी पूर्णरूपसे पालन करते थे । उन्होंने अनेक युद्धोंमें विजय पायी थी । रत्नाकर समुद्रतक फैले हुए, चारों वर्णके लोगोंसे भरे- पूरे तथा म्लेच्छ देशकी सीमासे मिले - जुले सम्पूर्ण भूभागोंका वे शत्रुमर्दन नरेश अकेले ही शासन तथा संरक्षण करते थे ॥ ४-५ ॥
न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः ।
न पापकृत् कश्चिदासीत् तस्मिन् राजनि शासति ॥ ६ ॥
उस राजाके शासनकालमें कोई मनुष्य वर्णसंकर संतान उत्पन्न नहीं करता था; पृथ्वी बिना जोते - बोये ही अनाज पैदा करती थी और सारी भूमि ही रत्नोंकी खान बनी हुई थी,
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इसलिये कोई भी खेती करने या रत्नोंकी खानका पता लगानेकी चेष्टा नहीं करता था । पाप करनेवाला तो उस राज्यमें कोई था ही नहीं ॥ ६ ॥
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे ।
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ७ ॥
नासीच्चौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि ।
नासीद् व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ८ ॥
नरश्रेष्ठ! सभी लोग धर्ममें अनुराग रखते और उसीका सेवन करते थे । अतः धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते थे । तात! राजा दुष्यन्त जब इस देशके शासक थे, उस समय कहीं चोरोंका भय नहीं था । भूखका भय तो नाममात्रको भी नहीं था । इस देशपर दुष्यन्तके शासनकालमें रोग- व्याधिका डर तो बिलकुल ही नहीं रह गया था ॥ ७-८ ॥
स्वधर्मे रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः ।
तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः ॥ ९ ॥
सब वर्णोंके लोग अपने- अपने धर्मके पालनमें रत रहते थे । देवाराधन आदि कर्मोंको निष्कामभावसे ही करते थे । राजा दुष्यन्तका आश्रय लेकर समस्त प्रजा निर्भय हो गयी थी ॥ ९ ॥
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च ।
सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा ॥ १० ॥
मेघ समयपर पानी बरसाता और अनाज रसयुक्त होते थे । पृथ्वी सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न तथा पशु- धनसे परिपूर्ण थी ॥ १० ॥
स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते ।
स चाद्भुतमहावीर्यो वज्रसंहननो युवा ॥ ११ ॥
ब्राह्मण अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें तत्पर थे । उनमें झूठ एवं छल- कपट आदिका अभाव था । राजा दुष्यन्त स्वयं भी नवयुवक थे । उनका शरीर वज्रके सदृश दृढ था । वे अद्भुत एवं महान् पराक्रमसे सम्पन्न थे ॥ ११ ॥
उद्यम्य मन्दरं दोर्भ्यां वहेत् सवनकाननम् ।
चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च ॥ १२ ॥
नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठितः ।
बले विष्णुसमश्चासीत् तेजसा भास्करोपमः ॥ १३ ॥
वे अपने दोनों हाथोंद्वारा उपवनों और काननोंसहित मन्दराचलको उठाकर ले जानेकी शक्ति रखते थे । गदायुद्धके प्रक्षेप, विक्षेप, परिक्षेप, और अभिक्षेप —– इन चारों प्रकारोंमें कुशल तथा सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंकी विद्यामें अत्यन्त निपुण थे । घोड़े और हाथीकी पीठपर बैठनेकी कलामें वे अत्यन्त प्रवीण थे । बलमें भगवान् विष्णुके समान और तेजमें भगवान् सूर्यके सदृश थे ॥ १२-१३ ॥
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अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः ।
सम्मतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् ॥ १४ ॥
भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत् ॥ १५ ॥
वे समुद्रके समान अक्षोभ्य और पृथ्वीके समान सहनशील थे । महाराज दुष्यन्तका सर्वत्र सम्मान था । उनके नगर तथा राष्ट्रके लोग सदा प्रसन्न रहते थे । वे अत्यन्त धर्मयुक्त भावनासे सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन करते थे ॥ १४-१५ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
Fara 3. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना ' प्रक्षेप' कहलाता है । २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना ' विक्षेप ' कहा गया है । ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना ' परिक्षेप' है । ४. गदाके अग्रभागसे मारना ‘ अभिक्षेप ' कहलाता है ।
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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन - जन्तुओंका वध करना जनमेजय उवाच
सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः ।
शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले- ब्रह्मन्! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला ।
तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन् विस्तरं त्वहम् ॥ २ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर । भगवन्! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं । अतः ये सब बातें बताइये ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः ॥ ३ ॥
वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः ।
बलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा-एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत - से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी - घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले ॥ ३-४ ॥
खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः ।
प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतैर्वृतः ॥ ॥
जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे ॥ ५ ॥
सिंहनादैश्च योधानां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरबृंहितैः ॥ ६ ॥
नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा ।
ह्रेषितस्वनमिश्रैश्च क्ष्वेडितास्फोटितस्वनैः ॥ ७ ॥
आसीत् किलकिलाशब्दस्तस्मिन् गच्छति पार्थिवे ।