महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 551–560
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
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तस्मात् त्वं जीव मे पुत्र सुसुखी शरदां शतम् ॥ ६४ ॥
' मेरा जीवन तथा अक्षय संतान- परम्परा भी तुम्हारे ही अधीन है, अतः पुत्र! तुम अत्यन्त सुखी होकर सौ वर्षोंतक जीवन धारण करो ॥ ६४ ॥
त्वदङ्गेभ्यः प्रसूतोऽयं पुरुषात् पुरुषोऽपरः ।
सरसीवामलेऽऽत्मानं द्वितीयं पश्य वै सुतम् ॥ ६५ ॥
‘ यह बालक आपके अंगोंसे उत्पन्न हुआ है; मानो एक पुरुषसे दूसरा पुरुष प्रकट हुआ है । निर्मल सरोवरमें दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति अपने द्वितीय आत्मारूप इस पुत्रको देखिये ॥ ६५ ॥
यथा ह्याहवनीयोऽग्निर्गार्हपत्यात् प्रणीयते ।
तथा त्वत्तः प्रसूतोऽयं त्वमेकः सन् द्विधा कृतः ॥ ६६ ॥
मृगावकृष्टेन पुरा मृगयां परिधावता ।
अहमासादिता राजन् कुमारी पितुराश्रमे ॥ ६७ ॥
‘ जैसे गार्हपत्य अग्निसे आहवनीय अग्निका प्रणयन ( प्राकट्य ) होता है, उसी प्रकार यह बालक आपसे उत्पन्न हुआ है, मानो आप एक होकर भी अब दो रूपोंमें प्रकट हो गये हैं । राजन्! आजसे कुछ वर्ष पहले आप शिकार खेलने वनमें गये थे । वहाँ एक हिंसक पशुके पीछे आकृष्ट हो आप दौड़ते हुए मेरे पिताजीके आश्रमपर पहुँच गये, जहाँ मुझ कुमारी कन्याको आपने गान्धर्व विवाहद्वारा पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ ६६-६७ ॥
उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहजन्या च मेनका ।
विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ॥ ६८ ॥
' उर्वशी, पूर्वचित्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और घृताची- ये छ: अप्सराएँ ही अन्य सब अप्सराओंसे श्रेष्ठ हैं ॥ ६८ ॥
तासां सा मेनका नाम ब्रह्मयोनिर्वराप्सराः ।
दिवः सम्प्राप्य जगतीं विश्वामित्रादजीजनत् ॥ ६ ९ ॥
' उन सबमें भी मेनका नामवाली अप्सरा श्रेष्ठ है, क्योंकि वह साक्षात् ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुई है । उसीने स्वर्गलोकसे भूतलपर आकर विश्वामित्रजीके सम्पर्कसे मुझे उत्पन्न किया था ॥ ६ ९ ॥
( श्रीमानृषिर्धर्मपरो वैश्वानर इवापरः ।
ब्रह्मयोनिः कुशो नाम विश्वामित्रपितामहः ॥
कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभश्च धार्मिकः ।
गाधिस्तस्य सुतो राजन् विश्वामित्रस्तु गाधिजः ॥
एवंविधः पिता राजन् मेनका जननी वरा ॥ ) ' महाराज! पूर्वकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण तेजस्वी महर्षि हो गये हैं, जो दूसरे अग्निदेवके समान प्रतापी थे । उनकी उत्पत्ति ब्रह्माजीसे हुई थी । वे महर्षि
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विश्वामित्रके प्रपितामह थे । कुशके बलवान् पुत्रका नाम कुशनाभ था । वे बड़े धर्मात्मा थे । राजन्! कुशनाभके पुत्र गाधि हुए और गाधिसे विश्वामित्रका जन्म हुआ । ऐसे कुलीन महर्षि मेरे पिता हैं और मेनका मेरी श्रेष्ठ माता है ।
सा मां हिमवतः प्रस्थे सुषुवे मेनकाप्सराः ।
अवकीर्य च मां याता परात्मजमिवासती ॥ ७० ॥
‘ उस मेनका अप्सराने हिमालयके शिखरपर मुझे जन्म दिया; किंतु वह असद् व्यवहार करनेवाली अप्सरा मुझे परायी संतानकी तरह वहीं छोड़कर चली गयी ॥ ७० ॥
( पक्षिणः पुण्यवन्तस्ते सहिता धर्मतस्तदा ।
पक्षैस्तैरभिगुप्ता च तस्मादस्मि शकुन्तला ॥
ततोऽहमृषिणा दृष्टा काश्यपेन महात्मना ।
जलार्थमग्निहोत्रस्य गतं दृष्ट्वा तु पक्षिणः ॥
न्यासभूतामिव मुनेः प्रददुर्गां दयावतः ।
स मारणिमिवादाय स्वमाश्रममुपागमत् ॥
सा वै सम्भाविता राजन्ननुक्रोशान्महर्षिणा ।
तेनैव स्वसुतेवाहं राजन् वै परमर्षिणा ॥
विश्वामित्रसुता चाहं वर्धिता मुनिना नृप ।
यौवने वर्तमानां च दृष्टवानसि मां नृप ॥
आश्रमे पर्णशालायां कुमारीं विजने वने ।
धात्रा प्रचोदितां शून्ये पित्रा विरहितां मिथः ॥
वाग्भिस्त्वं सूनृताभिर्मामपत्यार्थमचूचुदः ।
अकार्षीस्त्वाश्रमे वासं धर्मकामार्थनिश्चितम् ॥
गान्धर्वेण विवाहेन विधिना पाणिमग्रहीः ।
साहं कुलं च शीलं च सत्यवादित्वमात्मनः ॥
स्वधर्मं च पुरस्कृत्य त्वामद्य शरणं गता ।
तस्मान्नार्हसि संश्रुत्य तथेति वितथं वचः ॥
स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा परित्यक्तुमुपस्थिताम् । त्वन्नाथां लोकनाथस्त्वं नार्हसि त्वमनागसम् ॥ ) ‘ वे पक्षी भी पुण्यवान् हैं, जिन्होंने एक साथ आकर उस समय धर्मपूर्वक अपने पंखोंसे मेरी रक्षा की । शकुन्तों ( पक्षियों) - ने मेरी रक्षा की, इसलिये मेरा नाम शकुन्तला हो गया । तदनन्तर महात्मा कश्यपनन्दन कण्वकी दृष्टि मुझपर पड़ी । वे अग्निहोत्रके लिये जल लानेके हेतु उधर गये हुए थे । उन्हें देखकर पक्षियोंने उन दयालु महर्षिको मुझे धरोहरकी भाँति सौंप दिया । वे मुझे अरणी ( शमी ) -की भाँति लेकर अपने आश्रमपर आये । राजन्! महर्षिने कृपापूर्वक अपनी पुत्रीके समान मेरा पालन- पोषण किया । नरेश्वर! इस प्रकार मैं
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विश्वामित्र मुनिकी पुत्री हूँ और महात्मा कण्वने मुझे पाल- पोसकर बड़ी किया है । आपने युवावस्थामें मुझे देखा था । निर्जन वनमें आश्रमकी पर्णकुटीके भीतर सूने स्थानमें, जबकि मेरे पिता उपस्थित नहीं थे, विधाताकी प्रेरणासे प्रभावित मुझ कुमारी कन्याको आपने अपने मीठे वचनोंद्वारा संतानोत्पादनके निमित्त सहवासके लिये प्रेरित किया । धर्म, अर्थ एवं कामकी ओर दृष्टि रखकर मेरे साथ आश्रममें निवास किया । गान्धर्व विवाहकी विधिसे आपने मेरा पाणिग्रहण किया है । वही मैं आज अपने कुल, शील, सत्यवादिता और धर्मको आगे रखकर आपकी शरणमें आयी हूँ । इसलिये पूर्वकालमें वैसी प्रतिज्ञा करके अब उसे असत्य न कीजिये । आप जगत्के रक्षक हैं, मेरे प्राणनाथ हैं । मैं सर्वथा निरपराध हूँ और स्वयं आपकी सेवामें उपस्थित हूँ, अतः अपने धर्मको पीछे करके मेरा परित्याग न कीजिये ।
किं नु कर्माशुभं पूर्वं कृतवत्यन्यजन्मनि ।
यदहं बान्धवैस्त्यक्ता बाल्ये सम्प्रति च त्वया ॥ ७१ ॥
‘ मैंने पूर्व जन्मान्तरोंमें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिससे बाल्यावस्थामें तो मेरे बान्धवोंने मुझे त्याग दिया और इस समय आप पतिदेवताके द्वारा भी मैं त्याग दी गयी ॥ ७१ ॥
कामं त्वया परित्यक्ता गमिष्यामि स्वमाश्रमम् ।
इमं तु बालं संत्यक्तुं नार्हस्यात्मजमात्मनः ॥ ७२ ॥
'महाराज! आपके द्वारा स्वेच्छासे त्याग दी जानेपर मैं पुनः अपने आश्रमको लौट जाऊँगी, किंतु अपने इस नन्हे - से पुत्रका त्याग आपको नहीं करना चाहिये ' ॥ ७२ ॥
दुष्यन्तउवाच
न पुत्रमभिजानामि त्वयि जातं शकुन्तले ।
असत्यवचना नार्यः कस्ते श्रद्धास्यते वचः ॥ ७३ ॥
मेनका निरनुक्रोशा बन्धकी जननी तव ।
यया हिमवतः पृष्ठे निर्माल्यमिव चोज्झिता ॥ ७४ ॥
दुष्यन्त बोले — शकुन्तले! मैं तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न इस पुत्रको नहीं जानता । स्त्रियाँ प्रायः झूठ बोलनेवाली होती हैं । तुम्हारी बातपर कौन श्रद्धा करेगा? तुम्हारी माता वेश्या मेनका बड़ी क्रूरहृदया है, जिसने तुम्हें हिमालयके शिखरपर निर्माल्यकी तरह उतार फेंका है ॥ ७३-७४ ॥
स चापि निरनुक्रोशः क्षत्रयोनिः पिता तव ।
विश्वामित्रो ब्राह्मणत्वे लुब्धः कामवशं गतः ॥ ७५ ॥
और तुम्हारे क्षत्रियजातीय पिता विश्वामित्र भी, जो ब्राह्मण बननेके लिये लालायित थे और मेनकाको देखते ही कामके अधीन हो गये थे, बड़े निर्दयी जान पड़ते हैं ॥ ७५ ॥
मेनकाप्सरसां श्रेष्ठा महर्षीणां पिता च ते ।
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तयोरपत्यं कस्मात् त्वं पुंश्चलीव प्रभाषसे ॥ ७६ ॥
मेनका अप्सराओंमें श्रेष्ठ बतायी जाती है और तुम्हारे पिता विश्वामित्र भी महर्षियोंमें उत्तम समझे जाते हैं । तुम उन्हीं दोनोंकी संतान होकर व्यभिचारिणी स्त्रीके समान क्यों झूठी बातें बना रही हो ॥ ७६ ॥
अश्रद्धेयमिदं वाक्यं कथयन्ती न लज्जसे ।
विशेषतो मत्सकाशे दुष्टतापसि गम्यताम् ॥ ७७ ॥
तुम्हारी यह बात श्रद्धा करनेके योग्य नहीं है । इसे कहते समय तुम्हें लज्जा नहीं आती? विशेषतः मेरे समीप ऐसी बातें कहनेमें तुम्हें संकोच होना चाहिये । दुष्ट तपस्विनि! तुम चली जाओ यहाँसे ॥ ७७ ॥
क्व महर्षिः स चैवाग्रयः साप्सराः क्व च मेनका ।
क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी ॥ ७८ ॥
कहाँ वे मुनिशिरोमणि महर्षि विश्वामित्र, कहाँ अप्सराओंमें श्रेष्ठ मेनका और कहाँ तुम-जैसी तापसीका वेष धारण करनेवाली दीन- हीन नारी? ॥ ७८ ॥
अतिकायश्च ते पुत्रो बालोऽतिबलवानयम् ।
कथमल्पेन कालेन शालस्तम्भ इवोद्गतः ॥ ७९ ॥
तुम्हारे इस पुत्रका शरीर बहुत बड़ा है । बाल्यावस्थामें ही यह अत्यन्त बलवान् जान पड़ता है । इतने थोड़े समयमें यह साखूके खंभे - जैसा लम्बा कैसे हो गया? ॥ ७९ ॥
सुनिकृष्टा च ते योनिः पुंश्चलीव प्रभाषसे ।
यदृच्छया कामरागाज्जाता मेनकया ह्यसि ॥ ८० ॥
तुम्हारी जाति नीच है । तुम कुलटा - जैसी बातें करती हो । जान पड़ता है, मेनकाने अकस्मात् भोगासक्तिके वशीभूत होकर तुम्हें जन्म दिया है ॥ ८० ॥
सर्वमेतत् परोक्षं मे यत् त्वं वदसि तापसि ।
नाहं त्वामभिजानामि यथेष्टं गम्यतां त्वया ॥ ८१ ॥
तुम जो कुछ कहती हो, वह सब मेरी आँखोंके सामने नहीं हुआ है । तापसी! मैं तुम्हें नहीं पहचानता । तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, वहीं चली जाओ ॥ ८१ ॥
शकुन्तलोवाच
राजन् सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि ।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ॥ ८२ ॥
शकुन्तलाने कहा – राजन्! आप दूसरोंके सरसों बराबर दोषोंको तो देखते रहते हैं, किंतु अपने बेलके समान बड़े - बड़े दोषोंको देखकर भी नहीं देखते ॥ ८२ ॥
मेनका त्रिदशेष्वेव त्रिदशाश्चानु मेनकाम् ।
ममैवोद्रिच्यते जन्म दुष्यन्त तव जन्मनः ॥ ८३ ॥
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मेनका देवताओंमें रहती है और देवता मेनकाके पीछे चलते हैं - उसका आदर करते हैं ( उसी मेनकासे मेरा जन्म हुआ है ); अतः महाराज दुष्यन्त! आपके जन्म और कुलसे मेरा जन्म और कुल बढ़कर है ॥ ८३ ॥
क्षितावटसि राजेन्द्र अन्तरिक्षे चराम्यहम् ।
आवयोरन्तरं पश्य मेरुसर्षपयोरिव ॥ ८४ ॥
राजेन्द्र! आप केवल पृथ्वीपर घूमते हैं, किंतु मैं आकाशमें भी चल सकती हूँ । तनिक ध्यानसे देखिये, मुझमें और आपमें सुमेरु पर्वत और सरसोंका- सा अन्तर है ॥ ८४ ॥
महेन्द्रस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च ।
भवनान्यनुसंयामि प्रभावं पश्य मे नृप ॥ ८५ ॥
नरेश्वर! मेरे प्रभावको देख लो । मैं इन्द्र, कुबेर, यम और वरुण– सभीके लोकोंमें निरन्तर आने - जानेकी शक्ति रखती हूँ ॥ ८५ ॥
सत्यश्चापि प्रवादोऽयं यं प्रवक्ष्यामि तेऽनघ ।
निदर्शनार्थं न द्वेषाच्छ्रुत्वा तं क्षन्तुमर्हसि ॥ ८६ ॥
अनघ! लोकमें एक कहावत प्रसिद्ध है और वह सत्य भी है, जिसे मैं दृष्टान्तके तौरपर
आपसे कहूँगी; द्वेषके कारण नहीं । अतः उसे सुनकर क्षमा कीजियेगा ॥ ८६ ॥
विरूपो यावदादर्शे नात्मनः पश्यते मुखम् ।
मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम् ॥ ८७ ॥
कुरूप मनुष्य जबतक आइनेमें अपना मुँह नहीं देख लेता, तबतक वह अपनेको दूसरोंसे अधिक रूपवान् समझता है ॥ ८७ ॥
यदा स्वमुखमादर्शे विकृतं सोऽभिवीक्षते ।
तदान्तरं विजानीते आत्मानं चेतरं जनम् ॥ ८८ ॥
किंतु जब कभी आइनेमें वह अपने विकृत मुखका दर्शन कर लेता है, तब अपने और दूसरोंमें क्या अन्तर है, यह उसकी समझमें आ जाता है ॥ ८८ ॥
अतीवरूपसम्पन्नो न कंचिदवमन्यते ।
अतीव जल्पन् दुर्वाचो भवतीह विहेठकः ॥ ८९ ॥
जो अत्यन्त रूपवान् है, वह किसी दूसरेका अपमान नहीं करता; परंतु जो रूपवान् न होकर भी अपने रूपकी प्रशंसामें अधिक बातें बनाता है, वह मुखसे खोटे वचन कहता और दूसरोंको पीड़ित करता है ॥ ८ ९ ॥
मूर्खो हि जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः ।
अशुभं वाक्यमादत्ते पुरीषमिव सूकरः ॥ ९० ॥
मूर्ख मनुष्य परस्पर वार्तालाप करनेवाले दूसरे लोगोंकी भली -बुरी बातें सुनकर उनमेंसे बुरी बातोंको ही ग्रहण करता है; ठीक वैसे ही, जैसे सूअर अन्य वस्तुओंके रहते हुए भी विष्ठाको ही अपना भोजन बनाता है ॥ ९० ॥
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प्राज्ञस्तु जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः ।
गुणवद् वाक्यमादत्ते हंसः क्षीरमिवाम्भसः ॥ ९ १ ॥
परंतु विद्वान् पुरुष दूसरे वक्ताओंके शुभाशुभ वचनको सुनकर उनमेंसे गुणयुक्त बातोंको ही अपनाता है, ठीक उसी तरह, जैसे हंस पानीको छोड़कर केवल दूध ग्रहण कर लेता है ॥ ९ १ ॥
अन्यान् परिवदन् साधुर्यथा हि परितप्यते ।
तथा परिवदन्नन्यांस्तुष्टो भवति दुर्जनः ॥ ९ २ ॥
साधु पुरुष दूसरोंकी निन्दाका अवसर आनेपर जैसे अत्यन्त संतप्त हो उठता है, ठीक उसी प्रकार दुष्ट मनुष्य दूसरोंकी निन्दाका अवसर मिलनेपर बहुत संतुष्ट होता है ॥ ९ २ ॥
अभिवाद्य यथा वृद्धान् सन्तो गच्छन्ति निर्वृतिम् ।
एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्खो भवति निर्वृतः ॥ ९ ३ ॥
सुखं जीवन्त्यदोषज्ञा मूर्खा दोषानुदर्शिनः ।
यत्र वाच्याः परैः सन्तः परानाहुस्तथाविधान् ॥ ९ ४ ॥
जैसे साधु पुरुष बड़े - बूढ़ोंको प्रणाम करके बड़े प्रसन्न होते हैं, वैसे ही मूर्ख मानव साधु पुरुषोंकी निन्दा करके संतोषका अनुभव करते हैं। साधु पुरुष दूसरोंके दोष न देखते हुए सुखसे जीवन बिताते हैं, किंतु मूर्ख मनुष्य सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं । जिन दोषोंके कारण दुष्टात्मा मनुष्य साधु पुरुषोंद्वारा निन्दाके योग्य समझे जाते हैं, दुष्टलोग वैसे ही दोषोंका साधु पुरुषोंपर आरोप करके उनकी निन्दा करते हैं ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥
अतो हास्यतरं लोके किंचिदन्यन्न विद्यते ।
यत्र दुर्जनमित्याह दुर्जनः सज्जनं स्वयम् ॥ ९ ५ ॥
संसारमें इससे बढ़कर हँसीकी दूसरी कोई बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषोंको दुर्जन कहते हैं ॥ ९ ५ ॥
सत्यधर्मच्युतात् पुंसः क्रुद्धादाशीविषादिव ।
अनास्तिकोऽप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः ॥ ९ ६ ॥
जो सत्यरूपी धर्मसे भ्रष्ट है, वह पुरुष क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर है । उससे नास्तिक भी भय खाता है; फिर आस्तिक मनुष्यके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ९ ६ ॥
स्वयमुत्पाद्य वै पुत्रं सदृशं यो न मन्यते ।
तस्य देवाः श्रियं घ्नन्ति न च लोकानुपाश्नते ॥ ९ ७ ॥
जो स्वयं ही अपने तुल्य पुत्र उत्पन्न करके उसका सम्मान नहीं करता, उसकी सम्पत्तिको देवता नष्ट कर देते हैं और वह उत्तम लोकोंमें नहीं जाता ॥ ९ ७ ॥
कुलवंशप्रतिष्ठां हि पितरः पुत्रमब्रुवन् ।
उत्तमं सर्वधर्माणां तस्मात् पुत्रं न संत्यजेत् ॥ ९ ८ ॥
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पितरोंने पुत्रको कुल और वंशकी प्रतिष्ठा बताया है, अतः पुत्र सब धर्मोंमें उत्तम है । इसलिये पुत्रका त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ९ ८ ॥
स्वपत्नीप्रभवान् पञ्च लब्धान् क्रीतान् विवर्धितान् ।
कृतानन्यासु चोत्पन्नान् पुत्रान् वै मनुरब्रवीत् ॥ ९९ ॥
अपनी पत्नीसे उत्पन्न एक और अन्य स्त्रियोंसे उत्पन्न लब्ध, क्रीत, पोषित तथा उपनयनादिसे संस्कृत —ये चार मिलाकर कुल पाँच प्रकारके पुत्र मनुजीने बताये हैं ॥ ९९ ॥
धर्मकीर्त्यावहा नॄणां मनसः प्रीतिवर्धनाः ।
त्रायन्ते नरकाज्जाताः पुत्रा धर्मप्लवाः पितॄन् ॥ १०० ॥
ये सभी पुत्र मनुष्योंको धर्म और कीर्तिकी प्राप्ति करानेवाले तथा मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होते हैं । पुत्र धर्मरूपी नौकाका आश्रय ले अपने पितरोंका नरकसे उद्धार कर देते हैं ॥ १०० ॥
स त्वं नृपतिशार्दूल पुत्रं न त्यक्तुमर्हसि ।
आत्मानं सत्यधर्मौ च पालयन् पृथिवीपते ।
नरेन्द्रसिंह कपटं न वोढुं त्वमिहार्हसि ॥ १०१ ॥
अतः नृपश्रेष्ठ! आप अपने पुत्रका परित्याग न करें । पृथ्वीपते! नरेन्द्रप्रवर! आप अपने आत्मा, सत्य और धर्मका पालन करते हुए अपने सिरपर कपटका बोझ न उठावें ॥ १०१ ॥
वरं कूपशताद् वापी वरं वापीशतात् क्रतुः ।
वरं क्रतुशतात् पुत्रः सत्यं पुत्रशताद् वरम् ॥ १०२ ॥
सौ कुएँ खोदवानेकी अपेक्षा एक बावड़ी बनवाना उत्तम है । सौ बावड़ियोंकी अपेक्षा एक यज्ञ कर लेना उत्तम है । सौ यज्ञ करनेकी अपेक्षा एक पुत्रको जन्म देना उत्तम है और सौ पुत्रोंकी अपेक्षा भी सत्यका पालन श्रेष्ठ है ॥ १०२ ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ १०३ ॥
एक हजार अश्वमेध यज्ञ एक ओर तथा सत्यभाषणका पुण्य दूसरी ओर यदि तराजूपर रखा जाय, तो हजार अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका पलड़ा ही भारी होता है ॥ १०३ ॥
सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सत्यं च वचनं राजन् समं वा स्यान्न वा समम् ॥ १०४ ॥
राजन्! सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन और समस्त तीर्थोंका स्नान भी सत्य वचनकी समानता कर सकेगा या नहीं, इसमें संदेह ही है ( क्योंकि सत्य उनसे भी श्रेष्ठ है ) ॥ १०४ ॥
नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद् विद्यते परम् ।
न हि तीव्रतरं किंचिदनृतादिह विद्यते ॥ १०५ ॥
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सत्यके समान कोई धर्म नहीं है । सत्यसे उत्तम कुछ भी नहीं है और झूठसे बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत् में दूसरा कोई नहीं है ॥ १०५ ॥
राजन् सत्यं परं ब्रह्म सत्यं च समयः परः ।
मा त्याक्षीः समयं राजन् सत्यं संगतमस्तु ते ॥ १०६ ॥
राजन्! सत्य परब्रह्म परमात्माका स्वरूप है । सत्य सबसे बड़ा नियम है । अतः
महाराज! आप अपनी सत्य प्रतिज्ञाको न छोड़िये । सत्य आपका जीवनसंगी हो ॥ १०६ ॥
अनृते चेत् प्रसङ्गस्ते श्रद्दधासि न चेत् स्वयम् ।
आत्मना हन्त गच्छामि त्वादृशे नास्ति संगतम् ॥ १०७ ॥
यदि आपकी झूठमें ही आसक्ति है और मेरी बातपर श्रद्धा नहीं करते हैं तो मैं स्वयं ही चली जाती हूँ । आप -जैसेके साथ रहना मुझे उचित नहीं है ॥ १०७ ॥
( पुत्रत्वे शङ्कमानस्य बुद्धिर्ज्ञापकदीपना ।
गतिः स्वरः स्मृतिः सत्त्वं शीलविज्ञानविक्रमाः ॥
धृष्णुप्रकृतिभावौ च आवर्ता रोमराजयः ।
समा यस्य यतः स्युस्ते तस्य पुत्रो न संशयः ॥
सादृश्येनोद्धृतं बिम्बं तव देहाद् विशाम्पते । तातेति भाषमाणं वै मा स्म राजन् वृथा कृथाः ॥ ) यह मेरा पुत्र है या नहीं, ऐसा संदेह होनेपर बुद्धि ही इसका निर्णय करनेवाली अथवा इस रहस्यपर प्रकाश डालनेवाली है । चाल-ढाल, स्वर, स्मरणशक्ति, उत्साह, शील- स्वभाव, -विज्ञान, पराक्रम, साहस, प्रकृतिभाव, आवर्त ( भँवर ) तथा रोमावली – जिसकी ये सब वस्तुएँ जिससे सर्वथा मिलती-जुलती हों, वह उसीका पुत्र है, इसमें संशय नहीं है । राजन्! आपके शरीरसे पूर्ण समानता लेकर यह बिम्बकी भाँति प्रकट हुआ है और आपको ‘ तात ’ कहकर पुकार रहा है । आप इसकी आशा न तोड़ें ।
त्वामृतेऽपि हि दुष्यन्त शैलराजावतंसकाम् ।
चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालयिष्यति ॥ १०८ ॥
महाराज दुष्यन्त! मैं एक बात कहे देती हूँ, आपके सहयोगके बिना भी मेरा यह पुत्र चारों समुद्रोंसे घिरी हुई गिरिराज हिमालयरूपी मुकुटसे सुशोभित समूची पृथ्वीका शासन करेगा ॥ १०८ ॥
( शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति ।
एवमुक्तो महेन्द्रेण भविष्यति न चान्यथा ॥
साक्षित्वे बहवोऽप्युक्ता देवदूतादयो मताः ।
न ब्रुवन्ति यथा सत्यमुताहोऽप्यनृतं किल ॥
असाक्षिणी मन्दभाग्या गमिष्यामि यथाऽऽगतम् । )
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देवराज इन्द्रका वचन है—' शकुन्तले! तुम्हारा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा । ' यह कभी मिथ्या नहीं हो सकता । यद्यपि देवदूत आदि बहुत - से साक्षी बताये गये हैं, तथापि इस समय वे क्या सत्य है और क्या असत्य- इसके विषयमें कुछ नहीं कह रहे हैं । अतः साक्षीके अभावमें यह भाग्यहीन शकुन्तला जैसे आयी है, वैसे ही लौट जायगी । वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा राजानं प्रातिष्ठत शकुन्तला ।
अथान्तरिक्षाद् दुष्यन्तं वागुवाचाशरीरिणी ॥ १० ९ ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मन्त्रिभिश्च वृतं तदा । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा दुष्यन्तसे इतनी बातें कहकर शकुन्तला वहाँसे चलनेको उद्यत हुई। इतनेमें ही ऋत्विज्, पुरोहित, आचार्य और मन्त्रियोंसे घिरे हुए दुष्यन्तको सम्बोधित करते हुए आकाशवाणी हुई ॥ १० ९ ३ ॥ भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ॥ ११० ॥
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ।
( सर्वेभ्यो ह्यङ्गमङ्गेभ्यः साक्षादुत्पद्यते सुतः ।
आत्मा चैष सुतो नाम तथैव तव पौरव ॥
आहितं ह्यात्मनाऽऽत्मानं परिरक्ष इमं सुतम् ।
अनन्यां स्वां प्रतीक्षस्व मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥
स्त्रियः पवित्रमतुलमेतद् दुष्यन्त धर्मतः । मासि मासि रजो ह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति ॥ ) रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ॥ १११ ॥
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।
जाया जनयते पुत्रमात्मनोऽङ्गं द्विधा कृतम् ॥ ११२ ॥
'दुष्यन्त! माता तो केवल भाथी ( धौंकनी ) - के समान है । पुत्र पिताका ही होता है; क्योंकि जो जिसके द्वारा उत्पन्न होता है, वह उसीका स्वरूप है – इस न्यायसे पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है, अतः दुष्यन्त! तुम पुत्रका पालन करो । शकुन्तलाका अनादर मत करो । पौरव! पुत्र साक्षात् अपना ही शरीर है । वह पिताके सम्पूर्ण अंगोंसे उत्पन्न होता है । वास्तवमें वह पुत्र नामसे प्रसिद्ध अपना आत्मा ही है । ऐसा ही यह तुम्हारा पुत्र भी है । अपने द्वारा ही गर्भमें स्थापित किये हुए आत्मस्वरूप इस पुत्रकी तुम रक्षा करो । शकुन्तला तुम्हारे प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली धर्म पत्नी है । इसे इसी दृष्टिसे देखो! उसका अनादर मत करो । दुष्यन्त! स्त्रियाँ अनुपम पवित्र वस्तु हैं, यह धर्मतः स्वीकार किया गया है । प्रत्येक मासमें इनके जो रजःस्राव होता है, वह इनके सारे दोषोंको दूर कर देता है । नरदेव! वीर्यका आधान करनेवाला पिता ही पुत्र बनता है और वह यमलोकसे अपने पितृगणका उद्धार
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करता है । तुमने ही इस गर्भका आधान किया था । शकुन्तला सत्य कहती है । जाया ( पत्नी ) दो भागोंमें विभक्त हुए पतिके अपने ही शरीरको पुत्ररूपमें उत्पन्न करती है ॥ ११०– ११२ ॥
तस्माद् भरस्व दुष्यन्त पुत्रं शाकुन्तलं नृप ।
अभूतिरेषा यत् त्यक्त्वा जीवेज्जीवन्तमात्मजम् ॥ ११३ ॥
‘ इसलिये राजा दुष्यन्त! तुम शकुन्तलासे उत्पन्न हुए अपने पुत्रका पालन - पोषण करो । अपने जीवित पुत्रको त्यागकर जीवन धारण करना बड़े दुर्भाग्यकी बात है ॥ ११३ ॥
शाकुन्तलं महात्मानं दौष्यन्तिं भर पौरव ।
भर्तव्योऽयं त्वया यस्मादस्माकं वचनादपि ॥ ११४ ॥
तस्माद् भवत्वयं नाम्ना भरतो नाम ते सुतः । ‘ पौरव! यह महामना बालक शकुन्तला और दुष्यन्त दोनोंका पुत्र है । हम देवताओंके कहनेसे तुम इसका भरण- पोषण करोगे, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र भरतके नामसे विख्यात होगा' ॥ ११४३ ॥
(एवमुक्त्वा ततो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । पतिव्रतेति संहृष्टाः पुष्पवृष्टिं ववर्षिरे ॥ ) तच्छ्रुत्वा पौरवो राजा व्याहृतं त्रिदिवौकसाम् ॥ ११५ ॥
पुरोहितममात्यांश्च सम्प्रहृष्टोऽब्रवीदिदम् ।
शृण्वन्त्वेतद् भवन्तोऽस्य देवदूतस्य भाषितम् ॥ ११६ ॥
(वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ) ऐसा कहकर देवता तथा तपस्वी ऋषि शकुन्तलाको पतिव्रता बतलाते हुए उसपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । पूरुवंशी राजा दुष्यन्त देवताओंकी यह बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और पुरोहित तथा मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले ——आपलोग इस देवदूतका कथन भलीभाँति सुन लें ॥ ११५-११६ ॥
अहं चाप्येवमेवैनं जानामि स्वयमात्मजम् ।
यद्यहं वचनादस्या गृह्णीयामि ममात्मजम् ॥ ११७ ॥
भवेद्धि शङ्क्यो लोकस्य नैव शुद्धो भवेदयम् । ' मैं भी अपने इस पुत्रको इसी रूपमें जानता हूँ । यदि केवल शकुन्तलाके कहनेसे मैं इसे ग्रहण कर लेता, तो सब लोग इसपर संदेह करते और यह बालक विशुद्ध नहीं माना जाता ' ॥ ११७३ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं विशोध्य तदा राजा देवदूतेन भारत ।
हृष्टः प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम् ॥ ११८ ॥