महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 561–570

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! इस प्रकार देवदूतके वचनसे उस बालककी शुद्धता प्रमाणित करके राजा दुष्यन्तने हर्ष और आनन्दमें मग्न हो उस समय अपने उस पुत्रको ग्रहण किया ॥ ११८ ॥

ततस्तस्य तदा राजा पितृकर्माणि सर्वशः ।

कारयामास मुदितः प्रीतिमानात्मजस्य ह ॥ ११ ९ ॥

तदनन्तर महाराज दुष्यन्तने पिताको जो - जो कार्य करने चाहिये, वे सब उपनयन आदि संस्कार बड़े आनन्द और प्रेमके साथ अपने उस पुत्रके लिये ( शास्त्र और कुलकी मर्यादाके अनुसार) कराये ॥ ११ ९ ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय सस्नेहं परिषस्वजे ।

सभाज्यमानो विप्रैश्च स्तूयमानश्च वन्दिभिः ।

समुदं परमां लेभे पुत्रसंस्पर्शजां नृपः ॥ १२० ॥

और उसका मस्तक सूँघकर अत्यन्त स्नेहपूर्वक उसे हृदयसे लगा लिया । उस समय ब्राह्मणोंने उन्हें आशीर्वाद दिया और वन्दीजनोंने उनके गुण गाये । महाराजने पुत्र-स्पर्शजनित परम आनन्दका अनुभव किया ॥ १२० ॥

तां चैव भार्यां दुष्यन्तः पूजयामास धर्मतः ।

अब्रवीच्चैव तां राजा सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ १२१ ॥

दुष्यन्तने अपनी पत्नी शकुन्तलाका भी धर्मपूर्वक आदर-सत्कार किया और उसे समझाते हुए कहा– ॥ १२१ ॥

कृतो लोकपरोक्षोऽयं सम्बन्धो वै त्वया सह ।

तस्मादेतन्मया देवि त्वच्छुद्धयर्थं विचारितम् ॥ १२२ ॥

‘ देवि! मैंने तुम्हारे साथ जो विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे साधारण जनता नहीं जानती थी । अतः तुम्हारी शुद्धिके लिये ही मैंने यह उपाय सोचा था ॥ १२२ ॥

(ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव पृथग्विधाः । त्वां देवि पूजयिष्यन्ति निर्विशङ्कं पतिव्रताम् ॥ ) ‘ देवि! तुम निःसंदेह पतिव्रता हो । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – ये सभी पृथक्-पृथक् तुम्हारा पूजन ( समादर) करेंगे ।

मन्यते चैव लोकस्ते स्त्रीभावान्मयि संगतम् ।

पुत्रश्चायं वृतो राज्ये मया तस्माद् विचारितम् ॥ १२३ ॥

‘ यदि इस प्रकार तुम्हारी शुद्धि न होती तो लोग यही समझते कि तुमने स्त्री - स्वभावके कारण कामवश मुझसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मैंने भी कामके अधीन होकर ही तुम्हारे पुत्रको राज्यपर बिठानेकी प्रतिज्ञा कर ली । हम दोनोंके धार्मिक सम्बन्धपर किसीका विश्वास नहीं होता; इसीलिये यह उपाय सोचा गया था ॥ १२३ ॥

यच्च कोपितयात्यर्थं त्वयोक्तोऽस्म्यप्रियं प्रिये ।

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प्रणयिन्या विशालाक्षि तत् क्षान्तं ते मया शुभे ॥ १२४ ॥

‘ प्रिये! विशाललोचने! तुमने भी कुपित होकर जो मेरे लिये अत्यन्त अप्रिय वचन कहे हैं, वे सब मेरे प्रति तुम्हारा अत्यन्त प्रेम होनेके कारण ही कहे गये हैं । अतः शुभे! मैंने वह सब अपराध क्षमा कर दिया है ॥ १२४ ॥

( अनृतं वाप्यनिष्टं वा दुरुक्तं वापि दुष्कृतम् ।

त्वयाप्येवं विशालाक्षि क्षन्तव्यं मम दुर्वचः ॥

क्षान्त्या पतिकृते नार्यः पातिव्रत्यं व्रजन्ति ताः । ) ‘ विशाल नेत्रोंवाली देवि! इसी प्रकार तुम्हें भी मेरे कहे हुए असत्य, अप्रिय, कटु एवं पापपूर्ण दुर्वचनोंके लिये मुझे क्षमा कर देना चाहिये । पतिके लिये क्षमाभाव धारण करनेसे स्त्रियाँ पातिव्रत्य - धर्मको प्राप्त होती हैं ' ।

तामेवमुक्त्वा राजर्षिर्दुष्यन्तो महिषीं प्रियाम् ।

वासोभिरन्नपानैश्च पूजयामास भारत ॥ १२५ ॥

जनमेजय! अपनी प्यारी रानीसे ऐसी बात कहकर राजर्षि दुष्यन्तने अन्न, पान और वस्त्र आदिके द्वारा उसका आदर- सत्कार किया ॥ १२५ ॥

( स मातरमुपस्थाय रथन्तर्यामभाषत ।

मम पुत्रो वने जातस्तव शोकप्रणाशनः ॥

ऋणादद्य विमुक्तोऽहमस्मि पौत्रेण ते शुभे ।

विश्वामित्रसुता चेयं कण्वेन च विवर्धिता ॥

स्नुषा तव महाभागे प्रसीदस्व शकुन्तलाम् ।

पुत्रस्य वचनं श्रुत्वा पौत्रं सा परिषस्वजे ॥

पादयोः पतितां तत्र रथन्तर्या शकुन्तलाम् ।

परिष्वज्य च बाहुभ्यां हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ॥

उवाच वचनं सत्यं लक्षयँल्लक्षणानि च ।

तव पुत्रो विशालाक्षि चक्रवर्ती भविष्यति ॥

तव भर्ता विशालाक्षि त्रैलोक्यविजयी भवेत् । दिव्यान् भोगाननुप्राप्ता भव त्वं वरवर्णिनि ।

एवमुक्ता रथन्तर्या परं हर्षमवाप सा ।

शकुन्तलां तदा राजा शास्त्रोक्तेनैव कर्मणा ॥

ततोऽग्रमहिषीं कृत्वा सर्वाभरणभूषिताम् । ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सैनिकानां च भूपतिः ॥ ) तदनन्तर वे अपनी माता रथन्तर्याके पास जाकर बोले- ' माँ! यह मेरा पुत्र है, जो वनमें उत्पन्न हुआ है । यह तुम्हारे शोकका नाश करनेवाला होगा । शुभे! तुम्हारे इस पौत्रको पाकर आज मैं पितृ-ऋणसे मुक्त हो गया । महाभागे! यह तुम्हारी पुत्र-वधू है । महर्षि

पृष्ठ 563

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विश्वामित्रने इसे जन्म दिया और महात्मा कण्वने पाला है । तुम शकुन्तलापर कृपादृष्टि रखो । ' पुत्रकी यह बात सुनकर राजमाता रथन्तर्याने पौत्रको हृदयसे लगा लिया और अपने चरणोंमें पड़ी हुई शकुन्तलाको दोनों भुजाओंमें भरकर वे हर्षके आँसू बहाने लगीं । साथ ही पौत्रके शुभ लक्षणोंकी ओर संकेत करती हुई बोलीं- ' विशालाक्षि! तेरा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा । तेरे पतिको तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त हो । सुन्दरि! तुम्हें सदा दिव्य भोग प्राप्त होते रहें। ' यह कहकर राजमाता रथन्तर्या अत्यन्त हर्षसे विभोर हो उठीं । उस समय राजाने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार समस्त आभूषणोंसे विभूषित शकुन्तलाको पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके ब्राह्मणों तथा सैनिकोंको बहुत धन अर्पित किया ।

दुष्यन्तस्तु तदा राजा पुत्रं शाकुन्तलं तदा ।

भरतं नामतः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ १२६ ॥

तदनन्तर महाराज दुष्यन्तने शकुन्तलाकुमारका नाम भरत रखकर उसे युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १२६ ॥

( भरते भारमावेश्य कृतकृत्योऽभवन्नृपः ।

ततो वर्षशतं पूर्णं राज्यं कृत्वा नराधिपः ॥

कृत्वा दानानि दुष्यन्तः स्वर्गलोकमुपेयिवान् । ) फिर भरतको राज्यका भार सौंपकर महाराज दुष्यन्त कृतकृत्य हो गये । वे पूरे सौ वर्षोंतक राज्य भोगकर विविध प्रकारके दान दे अन्तमें स्वर्गलोक सिधारे ।

तस्य तत् प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः ।

भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् ॥ १२७ ॥

महात्मा राजा भरतका विख्यात चक्र- सब ओर घूमने लगा । वह अत्यन्त प्रकाशमान, दिव्य और अजेय था । वह महान् चक्र अपनी भारी आवाजसे सम्पूर्ण जगत्को प्रतिध्वनित करता चलता था ॥ १२७ ॥

स विजित्य महीपालांश्चकार वशवर्तिनः ।

चचार च सतां धर्मं प्राप चानुत्तमं यशः ॥ १२८ ॥

उन्होंने सब राजाओंको जीतकर अपने अधीन कर लिया तथा सत्पुरुषोंके धर्मका पालन और उत्तम यशका उपार्जन किया ॥ १२८ ॥

स राजा चक्रवर्त्यासीत् सार्वभौमः प्रतापवान् ।

ईजे च बहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः ॥ १२ ९ ॥

महाराज भरत समस्त भूमण्डलमें विख्यात, प्रतापी एवं चक्रवर्ती सम्राट् थे । उन्होंने देवराज इन्द्रकी भाँति बहुत - से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ १२ ९ ॥ याजयामास तं कण्वो विधिवद् भूरिदक्षिणम् ।

श्रीमान् गोविततं नाम वाजिमेधमवाप सः ।

यस्मिन् सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥ १३० ॥

पृष्ठ 564

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महर्षि कण्वने आचार्य होकर भरतसे प्रचुर दक्षिणाओंसे युक्त 'गोवितत ' नामक अश्वमेध यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाया । श्रीमान् भरतने उस यज्ञका पूरा फल प्राप्त किया । उसमें महाराज भरतने आचार्य कण्वको एक सहस्र पद्म स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणारूपमें दीं ॥ १३० ॥

भरताद् भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम् ।

अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः ॥ १३१ ॥

भरतसे ही इस भूखण्डका नाम भारत ( अथवा भूमिका नाम भारती) हुआ । उन्हींसे यह कौरववंश भरतवंशके नामसे प्रसिद्ध हुआ । उनके बाद उस कुलमें पहले तथा आज भी जो राजा हो गये हैं, वे भारत ( भरतवंशी ) कहे जाते हैं ॥ १३१ ॥

भरतस्यान्ववाये हि देवकल्पा महौजसः ।

बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः ॥ १३२ ॥

येषामपरिमेयानि नामधेयानि सर्वशः ।

तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तयिष्यामि भारत ।

महाभागान् देवकल्पान् सत्यार्जवपरायणान् ॥ १३३ ॥

भरतके कुलमें देवताओंके समान महापराक्रमी तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी बहुत-से राजर्षि हो गये हैं; जिनके सम्पूर्ण नामोंकी गणना असम्भव है। जनमेजय! इनमें जो मुख्य हैं, उन्हींके नामोंका तुमसे वर्णन करूँगा । वे सभी महाभाग नरेश देवताओंके समान तेजस्वी तथा सत्य, सरलता आदि धर्मोंमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ १३२-१३३ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल २२२३ श्लोक हैं ) 0 * चक्रके विशेषणोंसे यहाँ यही अनुमान होता है कि भरतके पास सुदर्शन चक्रके समान ही कोई चक्र था ।

पृष्ठ 565

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन वैशम्पायन उवाच

प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ।

भरतस्य कुरो: पूरोराजमीढस्य चानघ ॥ १ ॥

यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः ।

तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥ २ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ । वैशम्पायनजी कहते हैं - निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा । उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १-२ ॥ तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः ॥ ३ ॥

दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।

मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महीरुहाः ॥ ४ ॥

प्रचेताके दस पुत्र थे, जो अपने तेजके द्वारा सदा प्रकाशित होते थे । वे सब - के - सब महर्षियोंके समान तेजस्वी, सत्पुरुष और पुण्यकर्मा माने गये हैं । उन्होंने पूर्वकालमें अपने मुखसे प्रकट की हुई अग्निद्वारा उन बड़े - बड़े वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया था ( जो प्राणियोंको पीड़ा दे रहे थे ) ॥ ३-४ ॥

तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः ।

सम्भूताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ॥ ५ ॥

उक्त दस प्रचेताओंद्वारा ( मारिषाके गर्भसे ) प्राचेतस दक्षका जन्म हुआ तथा दक्षसे ये

समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं । नरश्रेष्ठ! वे सम्पूर्ण जगत्के पितामह हैं ॥ ५ ॥

वीरिण्या सह संगम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः ।

आत्मतुल्यानजनयत् सहस्रं संशितव्रतान् ॥ ६ ॥

प्राचेतस मुनि दक्षने वीरिणीसे समागम करके अपने ही समान गुण- शीलवाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किये । वे सब - के - सब अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ६ ॥

सहस्रसंख्यान् सम्भूतान् दक्षपुत्रांश्च नारदः ।

मोक्षमध्यापयामास सांख्यज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 566

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एक सहस्रकी संख्यामें प्रकट हुए उन दक्ष पुत्रोंको देवर्षि नारदजीने मोक्ष - शास्त्रका अध्ययन कराया । परम उत्तम सांख्य -ज्ञानका उपदेश किया ॥ ७ ॥

ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसंदधे ।

प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय ॥ ८ ॥

जनमेजय! जब वे सभी विरक्त होकर घरसे निकल गये, तब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रजापति दक्षने पुत्रिकाके द्वारा पुत्र ( दौहित्र ) होनेपर उस पुत्रिकाको ही पुत्र मानकर पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥ ८ ॥

ददौ दश स धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।

कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे ॥ ९ ॥

उन्होंने दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको और कालका संचालन करनेमें नियुक्त नक्षत्रस्वरूपा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं ॥ ९ ॥

त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा ।

मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥ १० ॥

इन्द्रादीन् वीर्यसम्पन्नान् विवस्वन्तमथापि च ।

विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः ॥ ११ ॥

मरीचिनन्दन कश्यपने अपनी तेरह पत्नियोंमेंसे जो सबसे बड़ी दक्ष- कन्या अदिति थीं, उनके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया, जो बड़े पराक्रमी थे । तदनन्तर उन्होंने अदितिसे ही विवस्वान्‌को उत्पन्न किया । विवस्वान्के पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं । वे समस्त प्राणियोंके नियन्ता हैं ॥ १०-११ ॥

मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजायत सुतः प्रभुः ।

यमश्चापि सुतो जज्ञे ख्यातस्तस्यानुजः प्रभुः ॥ १२ ॥

विवस्वान्के ही पुत्र परम बुद्धिमान् मनु हुए, जो बड़े प्रभावशाली हैं । मनुके बाद उनसे यम नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई, जो सर्वत्र विख्यात हैं । यमराज मनुके छोटे भाई तथा प्राणियोंका नियमन करनेमें समर्थ हैं ॥ १२ ॥

धर्मात्मा स मनुर्धीमान् यत्र वंशः प्रतिष्ठितः ।

मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥ १३ ॥

बुद्धिमान् मनु बड़े धर्मात्मा थे, जिनपर सूर्यवंशकी प्रतिष्ठा हुई । मानवोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह मनुवंश उन्हींसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥

ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ।

ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥ १४ ॥

उन्हीं मनुसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए हैं। महाराज! तभीसे ब्राह्मणकुल क्षत्रियसे सम्बद्ध हुआ ॥ १४ ॥

ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमधारयन् ।

पृष्ठ 567

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वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ॥ १५ ॥

कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम् ।

पृषध्रं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ॥ १६ ॥

नाभागारिष्टदशमान् मनोः पुत्रान् प्रचक्षते ।

पञ्चाशत् तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन् क्षितौ ॥ १७ ॥

उनमेंसे ब्राह्मणजातीय मानवोंने छहों अंगोंसहित वेदोंको धारण किया । वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इला, नवें क्षत्रिय - धर्मपरायण पृषध्र तथा दसवें नाभागारिष्ट – इन दसोंको मनुपुत्र कहा जाता है । मनुके इस पृथ्वीपर पचास पुत्र और हुए ॥ १५-१७ ॥

अन्योन्यभेदात् ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् ।

पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ॥ १८ ॥

परंतु आपसकी फूटके कारण वे सब- के - सब नष्ट हो गये, ऐसा हमने सुना है । तदनन्तर इलाके गर्भसे विद्वान् पुरूरवाका जन्म हुआ ॥ १८ ॥

सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् ।

त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन् पुरूरवाः ॥ १ ९ ॥

सुना जाता है, इला पुरूरवाकी माता भी थी और पिता भी । राजा पुरूरवा समुद्रके तेरह द्वीपोंका शासन और उपभोग करते थे ॥ १ ९ ॥

अमानुषैर्वृतः सत्त्वैर्मानुषः सन् महायशाः ।

विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ॥ २० ॥

जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि । महायशस्वी पुरूरवा मनुष्य होकर भी मानवेतर प्राणियोंसे घिरे रहते थे । वे अपने बल-पराक्रमसे उन्मत्त हो ब्राह्मणोंके साथ विवाद करने लगे । बेचारे ब्राह्मण चीखते - चिल्लाते रहते थे तो भी वे उनका सारा धन - रत्न छीन लेते थे ॥ २० ॥

सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपेत्य ह ॥ २१ ॥

अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ।

ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ॥ २२ ॥

जनमेजय! ब्रह्मलोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके । तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये ॥ २१-२२ ॥

लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः ।

स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् ॥ २३ ॥

आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन् यथावत् विहितांस्त्रिधा ।

पृष्ठ 568

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षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः ॥ २४ ॥

दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ।

नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् ॥ २५ ॥

स्वर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान् प्रचक्षते ।

आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान् सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥

राजा पुरूरवा लोभसे अभिभूत थे और बलके घमंडमें आकर अपनी विवेक- शक्ति खो बैठे थे । वे शोभाशाली नरेश ही गन्धर्वलोकमें स्थित और विधिपूर्वक स्थापित त्रिविध अग्नियोंको उर्वशीके साथ इस धरातलपर लाये थे । इलानन्दन पुरूरवाके छः पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं – आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु और शतायु । ये सभी उर्वशीके पुत्र हैंहैं ॥ उनमेंसे आयुके स्वर्भानुकुमारीके गर्भसे उत्पन्न पाँच पुत्र बताये जाते हैं - नहुष, वृद्धशर्मा, रजि गय तथा अनेना । आयुर्नन्दन नहुष बड़े बुद्धिमान् और सत्य- पराक्रमी थे ॥ २३-२६ ॥

राज्यं शशास सुमहद् धर्मेण पृथिवीपते ।

पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् गन्धर्वोरगराक्षसान् ॥ २७ ॥

नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः ।

स हत्वा दस्युसंघातानृषीन् करमदापयत् ॥ २८ ॥

पृथ्वीपते! उन्होंने अपने विशाल राज्यका धर्मपूर्वक शासन किया । पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका भी पालन किया । राजा नहुषने झुंड के झुंड डाकुओं और लुटेरोंका वध करके ऋषियोंको भी कर देनेके लिये विवश किया ॥ २७-२८ ॥

पशुवच्चैव तान् पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान् ।

कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः ॥ २ ९ ॥

तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा ।

यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम् ॥ ३० ॥

नहुषो जनयामास षट् सुतान् प्रियवादिनः ।

यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३१ ॥

अपने इन्द्रत्वकालमें पराक्रमी नहुषने महर्षियोंको पशुकी तरह वाहन बनाकर उनकी पीठपर सवारी की थी । उन्होंने तेज, तप, ओज और पराक्रमद्वारा समस्त देवताओंको तिरस्कृत करके इन्द्रपदका उपभोग किया था । राजा नहुषने छः प्रियवादी पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम इस प्रकार हैं- यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव । इनमें यति योगका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये थे ॥ २ ९ –३१ ॥

ययातिर्नाहुषः सम्राडासीत् सत्यपराक्रमः ।

स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 569

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तब नहुषके दूसरे पुत्र सत्यपराक्रमी ययाति सम्राट् हुए । उन्होंने इस पृथ्वीका पालन तथा बहुत - से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ३२ ॥

अतिभक्त्या पितॄनर्चन् देवांश्च प्रयतः सदा ।

अन्वगृह्णात् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः ॥ ३३ ॥

तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः ।

देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३४ ॥

महाराज ययाति किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे । वे सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़े भक्ति- भावसे देवताओं तथा पितरोंका पूजन करते और समस्त प्रजापर अनुग्रह रखते थे । महाराज जनमेजय! राजा ययातिके देवयानी और शर्मिष्ठाके गर्भसे महान् धनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए । वे सभी समस्त सद्गुणोंके भण्डार थे ॥ ३३-३४ ॥

देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव च ।

द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३५ ॥

यदु और तुर्वसु — ये दो देवयानीके पुत्र थे और द्रुह्यु, अनु तथा पूरु — ये तीन शर्मिष्ठाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥

स शाश्वतीः समा राजन् प्रजा धर्मेण पालयन् ।

जरामार्च्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम् ॥ ३६ ॥

राजन्! वे सर्वदा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते थे । एक समय नहुषपुत्र ययातिको अत्यन्त भयानक वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो रूप और सौन्दर्यका नाश करनेवाली है ॥ ३६ ॥

जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत् ।

यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्यं चानुं च भारत ॥ ३७ ॥

जनमेजय! वृद्धावस्थासे आक्रान्त होनेपर राजा ययातिने अपने समस्त पुत्रों यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुसे कहा— ॥ ३७ ॥

यौवनेन चरन् कामान् युवा युवतिभिः सह ।

विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रकाः ॥ ३८ ॥

‘ पुत्रो! मैं युवावस्थासे सम्पन्न हो जवानीके द्वारा कामोपभोग करते हुए युवतियोंके

साथ विहार करना चाहता हूँ । तुम मेरी सहायता करो ' ॥ ३८ ॥

तं पुत्रो दैवयानेयः पूर्वजो वाक्यमब्रवीत् ।

किं कार्यं भवतः कार्यमस्माकं यौवनेन ते ॥ ३ ९ ॥

यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने पूछा- ' भगवन्! हमारी जवानी लेकर उसके द्वारा आपको कौन - सा कार्य करना है ' ॥ ३ ९ ॥

ययातिरब्रवीत् तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम् ।

यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम् ॥ ४० ॥

पृष्ठ 570

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तब ययातिने उससे कहा- तुम मेरा बुढ़ापा ले लो और मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोपभोग करूँगा ॥ ४० ॥

यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः ।

कामार्थः परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रकाः ॥ ४१ ॥

' पुत्रो! अबतक तो मैं दीर्घकालीन यज्ञोंके अनुष्ठानमें लगा रहा और अब मुनिवर शुक्राचार्यके शापसे बुढ़ापेने मुझे धर दबाया है, जिससे मेरा कामरूप पुरुषार्थ छिन गया । इसीसे मैं संतप्त हो रहा हूँ ॥ ४१ ॥

मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः ।

अहं तन्वाभिनवया युवा काममवाप्नुयाम् ॥ ४२ ॥

‘ तुममेंसे कोई एक व्यक्ति मेरा वृद्ध शरीर लेकर उसके द्वारा राज्यशासन करे । मैं नूतन शरीर पाकर युवावस्थासे सम्पन्न हो विषयोंका उपभोग करूँगा' ॥ ४२ ॥

ते न तस्य प्रत्यगृह्णन् यदुप्रभृतयो जराम् ।

तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः ॥ ४३ ॥

राजंश्चराभिनवया तन्वा यौवनगोचरः ।

अहं जरां समादाय राज्ये स्थास्यामि तेऽऽज्ञया ॥ ४४ ॥

राजाके ऐसा कहनेपर भी वे यदु आदि चार पुत्र उनकी वृद्धावस्था न ले सके । तब सबसे छोटे पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने कहा- ' राजन्! आप मेरे नूतन शरीरसे नौजवान होकर विषयोंका उपभोग कीजिये । मैं आपकी आज्ञासे बुढ़ापा लेकर राज्यसिंहासनपर बैठूंगा' ॥ ४३-४४ ॥

एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात् ।

संचारयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ॥ ४५ ॥

पुरुके ऐसा कहनेपर राजर्षि ययातिने तप और वीर्यके आश्रयसे अपनी वृद्धावस्थाका अपने महात्मा पुत्र पूरुमें संचार कर दिया ॥ ४५ ॥

पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः ।

यायातेनापि वयसा राज्यं पूरुरकारयत् ॥ ४६ ॥

ययाति स्वयं पूरुकी नयी अवस्था लेकर नौजवान बन गये । इधर पूरु भी राजा ययातिकी अवस्था लेकर उसके द्वारा राज्यका पालन करने लगे ॥ ४६ ॥

ततो वर्षसहस्राणि ययातिरपराजितः ।

स्थितः स नृपशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमः ॥ ४७ ॥

तदनन्तर किसीसे परास्त न होनेवाले और सिंहके समान पराक्रमी नृपश्रेष्ठ ययाति एक सहस्र वर्षतक युवावस्थामें स्थित रहे ॥ ४७ ॥

ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च ।

विश्वाच्या सहितो रेमे पुनश्चैत्ररथे वने ॥ ४८ ॥