महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 601–610
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष शुक्र उवाच ( मम विद्या हि निर्द्वन्द्वा ऐश्वर्यं हि फलं मम । दैन्यं शाठ्यं च जैम्यं च नास्ति मे यदधर्मतः ॥ )
यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षते ।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥ १ ॥
यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा ।
स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ २ ॥
- शुक्राचार्यने कहा – बेटी! मेरी विद्या द्वन्द्वरहित है । मेरा ऐश्वर्य ही उसका फल है । मुझमें दीनता, शठता, कुटिलता और अधर्मपूर्ण बर्ताव नहीं है । देवयानी! जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन ( दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा ) - को सह लेता है, उसने इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली, ऐसा समझो । जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है । किंतु जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं ॥ १-२ ॥
यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन निरस्यति ।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥ ३ ॥
देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध ( क्षमाभाव ) के द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया ॥ ३ ॥
यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयेह निरस्यति ।
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते ॥ ४ ॥
जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको यहाँ क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है ॥ ४ ॥
यः संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षते ।
यश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम् ॥ ५ ॥
जो क्रोधको रोक लेता है, निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है ॥ ५ ॥
यो यजेदपरिश्रान्तो मासि मासि शतं समाः ।
न क्रुद्धेयद् यश्च सर्वस्य तयोरक्रोधनोऽधिकः ॥ ६ ॥
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जो मनुष्य सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें बिना किसी थकावटके निरन्तर यज्ञ करता रहता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥
(क्रुद्धस्य निष्फलान्येव दानयज्ञतपांसि च ।
तस्मादक्रोधने यज्ञस्तपो दानं महाफलम् ॥
न पूतो न तपस्वी च न यज्वा न च कर्मवित् ।
क्रोधस्य यो वशं गच्छेत् तस्य लोकद्वयं न च ॥
पुत्रभृत्यसुहृन्मित्रभार्या धर्मश्च सत्यता । तस्यैतान्यपयास्यन्ति क्रोधशीलस्य निश्चितम् ॥ )
यत् कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः ।
न तत् प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥ ७ ॥
क्रोधीके यज्ञ, दान और तप- सभी निष्फल होते हैं । अतः जो क्रोध नहीं करता, उसी पुरुषके यज्ञ, तप और दान महान् फल देनेवाले होते हैं । जो क्रोधके वशीभूत हो जाता है, वह कभी पवित्र नहीं होता तथा तपस्या भी नहीं कर सकता । उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान भी सम्भव नहीं है और वह कर्मके रहस्यको भी नहीं जानता । इतना ही नहीं, उसके लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । जो स्वभावसे ही क्रोधी है, उसके पुत्र, भृत्स, सुहृद्, मित्र, पत्नी, धर्म और सत्य - ये सभी निश्चय ही उसे छोड़कर दूर चले जायँगे । अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर- विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ ७ ॥
देवयान्युवाच
वेदाहं तात बालापि धर्माणां यदिहान्तरम् ।
अक्रोधे चातिवादे च वेद चापि बलाबलम् ॥ ८ ॥
देवयानीने कहा - पिताजी! यद्यपि मैं अभी बालिका हूँ फिर भी धर्म - अधर्मका अन्तर समझती हूँ । क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है ॥ ८ ॥
शिष्यस्याशिष्यवृत्तेस्तु न क्षन्तव्यं बुभूषता ।
तस्मात् संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९ ॥
परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार- विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ९ ॥
पुमांसो ये हि निन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च ।
न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥ १० ॥
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जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये ॥ १० ॥
ये त्वेनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन वा ।
तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११ ॥
जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषोंमें ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ११ ॥
( सुयन्त्रिता वरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्नराः ।
दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चाण्डाला धनिनोऽपि वा ॥
अकारणाद् ये द्विषन्ति परिवादं वदन्ति च ।
न तत्रास्य निवासोऽस्ति पाप्मभिः पापतां व्रजेत् ॥
सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः । ध्रुवं रतिर्भवेत् तत्र तस्माद् दोषं न रोचयेत् ॥ )
वाग् दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ।
मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥ १२ ॥
धनहीन मनुष्य भी यदि सदा अपने मनपर संयम रखें तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान् भी यदि दुराचारी तथा पापकर्मी हों, तो वे चाण्डालके समान हैं। जो अकारण किसीके साथ द्वेष करते हैं और दूसरोंकी निन्दा करते रहते हैं, उनके बीचमें सत्पुरुषका निवास नहीं होना चाहिये; क्योंकि पापियोंके संगसे मनुष्य पापात्मा हो जाता है । मनुष्य पाप अथवा पुण्य जिसमें भी आसक्त होता है, उसीमें उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पापकर्ममें प्रीति नहीं करनी चाहिये । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको मथ रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है ॥ १२ ॥
न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । ( निःसंशयो विशेषेण परुषं मर्मकृन्तनम् । सुहृन्मित्रजनास्तेषु सौहृदं न च कुर्वते ॥ )
यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ।
मरणं शोभनं तस्य इति विद्वज्जना विदुः ॥ १३ ॥
इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात मैं अपने लिये तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती हूँ। इसमें संदेह नहीं कि कटुवचन मर्मस्थलोंको विदीर्ण करनेवाला होता है । कटुवादी मनुष्योंसे उनके सगे - सम्बन्धी और मित्र भी प्रेम नहीं करते हैं । जो श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई लक्ष्मीकी उपासना करता है, उस मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है; ऐसा विद्वान् पुरुष अनुभव करते हैं ॥ १३ ॥
(अवमानमवाप्नोति शनैर्नीचेषु सङ्गतः ।
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वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । शनैर्दुःखं शस्त्रविषाग्निजातं तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥ ) नीच पुरुषोंके संगसे मनुष्य धीरे - धीरे अपमानित हो जाता है । मुखसे जो कटुवचनरूपी बाण छूटते हैं, उनसे आहत होकर मनुष्य रात - दिन शोकमें डूबा रहता है । शस्त्र, विष और अग्निसे प्राप्त होनेवाला दुःख शनैः - शनैः अनुभवमें आता है ( परंतु कटुवचन तत्काल ही अत्यन्त कष्ट देने लगता है ) । अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह दूसरोंपर वाग्बाण न छोड़े । बाणसे बिंधा हुआ वृक्ष और फरसेसे काटा हुआ जंगल फिर पनप जाता है, परंतु वाणीद्वारा जो भयानक कटु वचन निकलता है, उससे घायल हुए हृदयका घाव फिर नहीं भरता । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०३ श्लोक मिलाकर कुल २३३ श्लोक हैं )
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अशीतितमोऽध्यायः शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर के लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना वैशम्पायन उवाच
ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह ।
वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये । वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था । शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे - विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥ १ ॥
नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव ।
शनैरावर्त्यमानो हि कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ २ ॥
' राजन्! जो अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता । जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे - धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे - धीरे कर्ताकी जड़ काट देता है ॥ २ ॥
पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति ।
फलत्येव ध्रुवं पापं गुरु भुक्तमिवोदरे ॥ ३ ॥
‘ यदि वह ( पापसे उपार्जित द्रव्यका ) दुष्परिणाम अपने ऊपर नहीं दिखायी देता तो उस अन्यायोपार्जित द्रव्यका उपभोग करनेके कारण पुत्रों अथवा नाती- पोतोंपर अवश्य प्रकट होता है । जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है ' ॥ ३ ॥
( अधीयानं हितं राजन् क्षमावन्तं जितेन्द्रियम् । )
यदघातयिथा विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा ।
अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषं मद्गृहे रतम् ॥ ४ ॥
‘ राजन्! अंगिराके पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण हैं । वे स्वाध्याय- परायण, हितैषी, क्षमावान् और जितेन्द्रिय हैं, स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ हैं तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न थे, परंतु तुमने उनका बार- बार वध करवाया था ॥ ४ ॥
वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम ।
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वृषपर्वन् निबोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम् ।
स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्ष्यामि त्वया सह ॥ ५ ॥
‘ वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँ ढकेला गया है । इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई- बन्धुओंको त्याग दूँगा । राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा ॥ ५ ॥
अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् ।
यथेममात्मनो दोषं न नियच्छस्युपेक्षसे ॥ ६ ॥
‘ दैत्यराज! बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुमने मुझे मिथ्यावादी समझ लिया । तभी तो तुम अपने इस दोषको दूर नहीं करते और लापरवाही दिखाते हो' ॥ ६ ॥
वृषपर्वोवाच ( यदि ब्रह्मन् घातयामि यदि वाऽऽक्रोशयाम्यहम् । शर्मिष्ठया देवयानीं तेन गच्छाम्यसद्गतिम् ॥ ) वृषपर्वा बोले — ब्रह्मन्! यदि मैं शर्मिष्ठासे देवयानीको पिटवाता या तिरस्कृत करवाता होऊँ तो इस पापसे मुझे सद्गति न मिले ।
नाधर्मं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव ।
त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत् प्रसीदतु नो भवान् ॥ ७ ॥
यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव ।
समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामो नान्यदस्ति परायणम् ॥ ८ ॥
भृगुनन्दन! आपपर अधर्म अथवा मिथ्याभाषणका दोष मैंने कभी लगाया हो, यह मैं नहीं जानता । आपमें तो सदा धर्म और सत्य प्रतिष्ठित हैं । अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये । भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो हम सब लोग समुद्रमें समा जायँगे; हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ७-८ ॥ ( यद्येव देवान् गच्छेस्त्वं मां च त्यक्त्वा ग्रहाधिप । सर्वत्यागं ततः कृत्वा प्रविशामि हुताशनम् ॥ ) ग्रहेश्वर! यदि आप मुझे छोड़कर देवताओंके पक्षमें चले जायँगे तो मैं भी सर्वस्व त्याग कर जलती आगमें कूद पडूंगा । शुक्र उवाच
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः ।
दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे ॥ ९ ॥
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शुक्राचार्यने कहा — असुरो! तुमलोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ; मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ ९ ॥
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् ।
योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः ॥ १० ॥
तुम देवयानीको प्रसन्न करो, क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं । उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा ॥ १० ॥
वृषपर्वोवाच
यत् किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव ।
भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः ॥ ११ ॥
वृषपर्वा बोले – भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपरजो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी - घोड़े और गाय आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं ॥ ११ ॥
शुक्रउवाच
यत् किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर ।
तस्येश्वरोऽस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम् ॥ १२ ॥
शुक्राचार्यने कहा- महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन- वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविः ।
देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गवः ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर वृषपर्वाने ' तथास्तु ' कहकर उनकी आज्ञा मान ली । तदनन्तर दोनों देवयानीके पास गये और महाकवि शुक्राचार्यने वृषपर्वाकी कही हुई सारी बात कह सुनायी ॥ १३ ॥
देवयान्युवाच
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव ।
नाभिजानामि तत् तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ॥ १४ ॥
तब देवयानीने कहा - तात! यदि आप राजाके धनके स्वामी हैं तो आपके कहनेसे मैं
इस बातको नहीं मानूँगी । राजा स्वयं कहें, तो मुझे विश्वास होगा ॥ १४ ॥
वृषपर्वोवाच यं काममभिकामासि देवयानि शुचिस्मिते ।
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तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ॥ १५ ॥
वृषपर्वा बोले — पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि दुर्लभ हो तो भी तुम्हें अवश्य दूँगा ॥ १५ ॥
देवयान्युवाच
दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये ।
अनु मां तत्र गच्छेत् सा यत्र दद्याच्च मे पिता ॥ १६ ॥
देवयानीने कहा- मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी होकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय ॥ १६ ॥
वृषपर्वोवाच
उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय ।
यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ॥ १७ ॥
यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा - धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ॥ १७ ॥
( त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ ) कुलके हितके लिये एक मनुष्यको त्याग दे । गाँवके भलेके लिये एक कुलको छोड़ दे । जनपदके लिये एक गाँवकी उपेक्षा कर दे और आत्मकल्याणके लिये सारी पृथ्वीको त्याग दे । वैशम्पायन उवाच
ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् ।
उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा — ‘ भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति- भाइयोंको सुख पहुँचाओ ॥ १८ ॥
त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः ।
सायं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयानघे ॥ १ ९ ॥
‘ पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों— यजमानोंको त्याग रहे हैं । अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये ' ॥ १ ९ ॥ शर्मिष्ठोवाच यं सा कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम् । यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम् ।
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मद्दोषान्मा गमच्छुक्रो देवयानी च मत्कृते ॥ २० ॥
शर्मिष्ठा बोली -यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती है, वह सब आजसे मैं करूँगी । मेरे अपराधसे शुक्राचार्यजी न जायँ और देवयानी भी मेरे कारण अन्यत्र जानेका विचार न करे ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा ।
पितुर्नियोगात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिबिकापर आरूढ़ हो तुरंत राजधानीसे बाहर निकली । उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी ॥ २१ ॥
शर्मिष्ठोवाच
अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका ।
अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥ २२ ॥
शर्मिष्ठा बोली — देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २२ ॥
देवयान्युवाच
स्तुवतो दुहिताहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः ।
स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥ २३ ॥
देवयानीने कहा — अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ॥ २३ ॥
शर्मिष्ठोवाच
येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत् ।
अतस्त्वामनुयास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥ २४ ॥
शर्मिष्ठा बोली - जिस किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये । अतः तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः ।
देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं – नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा ॥ २५ ॥
देवयान्युवाच
प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम ।
अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते ॥ २६ ॥
देवयानी बोली – पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी । द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है ॥ २६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो दुहित्रास द्विजश्रेष्ठो महायशाः ।
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ३२३ श्लोक हैं ) OFF FULL