महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 611–620
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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एकाशीतितमोऽध्यायः सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन - विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह वैशम्पायन उवाच
अथ दीर्घस्य कालस्य देवयानी नृपोत्तम ।
वनं तदेव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं –नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी ॥ १ ॥
तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा ।
तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा ॥ २ ॥
ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम् ।
क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधुमाधवीम् ॥ ३ ॥
खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् विदशन्त्यः फलानि च ।
पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया ॥ ४ ॥
तमेव देशं सम्प्राप्तो जलार्थी श्रमकर्शितः ।
ददृशे देवयानीं स शर्मिष्ठां ताश्च योषितः ॥ ५ ॥
उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी । वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी । वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति- भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं । वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं । इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये । वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे । उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियों को भी देखा ॥ २–५ ॥ पिबन्तीर्ललमानाश्च दिव्याभरणभूषिताः । ( आसने प्रवरे दिव्ये सर्वाभरणभूषिते । ) उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम् ॥ ६ ॥
वे सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो पीनेयोग्य रसका पान और भाँति- भाँतिकी क्रीड़ाएँ कर रही थीं । राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ समस्त आभूषणोंसे
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विभूषित परम सुन्दर दिव्य आसनपर बैठी हुई देखा ॥ ६ ॥
रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।
शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ ॥
उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी । वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठाद्वारा उसकी चरणसेवा की जा रही थी ॥ ७ ॥
ययातिरुवाच
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते ।
गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यहं शुभे ॥ ८ ॥
ययातिने पूछा- दो हजार* कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके
गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ । शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें ॥ ८ ॥
देवयान्युवाच
आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप ।
शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ॥ ९ ॥
देवयानी बोली — महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें । असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये ॥ ९ ॥
इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी ।
दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ॥ १० ॥
यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है । मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी जायगी ॥ १० ॥
ययातिरुवाच
कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी ।
असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ ॥
ययाति बोले— सुन्दरी! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये । इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ११ ॥
देवयान्युवाच
सर्व एव नरश्रेष्ठ विधानमनुवर्तते ।
विधानविहितं मत्वा मा विचित्राः कथाः कृथाः ॥ १२ ॥
देवयानी बोली – नरश्रेष्ठ! सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं । इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये । इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये ॥ १२ ॥
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राजवद् रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च ।
को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ॥ १३ ॥
आपके रूप और वेष राजाके समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी ( विशुद्ध संस्कृत भाषा ) बोल रहे हैं । मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ॥ १३ ॥
ययातिरुवाच
ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः ।
राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ॥ १४ ॥
ययातिने कहा- मैंने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है । मैं राजा
नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ । मेरा नाम ययाति है ॥ १४ ॥
देवयान्युवाच
केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागतः ।
जिघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५ ॥
देवयानीने पूछा — महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं? ॥ १५ ॥
ययातिरुवाच
मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागतः ।
बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ ॥
ययातिने कहा— भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ । अतः अब मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥
देवयान्युवाच
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह ।
त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव ॥ १७ ॥
देवयानीने कहा — राजन्! आपका कल्याण हो । मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ । आप मेरे सखा और पति हो जायँ ॥ १७ ॥
ययातिरुवाच
विद्धयौशनसि भद्रं ते न त्वामर्होऽस्मि भाविनि ।
अविवाह्या हि राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८ ॥
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ययाति बोले — शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो । भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ । क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं ॥ १८ ॥
देवयान्युवाच
संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम् ।
ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाङ्ग वहस्व माम् ॥ १ ९ ॥
देवयानीने कहा —नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं । अतः मुझसे विवाह कीजिये ॥ १ ९ ॥ ययातिरुवाच
एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वराङ्गने ।
पृथग्धर्माः पृथक्छौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः ॥ २० ॥
ययाति बोले — वरांगने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है; परंतु
सबके धर्म और शौचाचार अलग - अलग हैं । ब्राह्मण उन सब वर्णोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ २० ॥
देवयान्युवाच पाणिधर्मो नाहुषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा तं मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१ ॥
देवयानीने कहा- नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है । पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था । सबसे पहले आपहीने मेरा हाथ पकड़ा था । इसलिये आपहीका मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ ॥ २१ ॥
कथं नु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत् ।
गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यृषिणा त्वया ॥ २२ ॥
मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ । आप जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है ॥ २२ ॥
ययातिरुवाच
क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् ।
दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता ॥ २३ ॥
ययाति बोले — देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ॥ २३ ॥
देवयान्युवाच कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् ।
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दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
देवयानीने कहा - पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥
ययातिरुवाच
एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते ।
हन्ति विप्रः राष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५ ॥
दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम ।
अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६ ॥
ययाति बोले — भद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है । भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ । अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा ॥ २५-२६ ॥ देवयान्युवाच
दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन् वृतो मया ।
अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७ ॥
( तिष्ठ राजन् मुहूर्तं तु प्रेषयिष्याम्यहं पितुः । देवयानीने कहा— राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें । आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे । अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है । राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये । मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ ॥ २७ ॥
गच्छ त्वं धात्रिके शीघ्रं ब्रह्मकल्पमिहानय ॥ स्वयंवरे वृतं शीघ्रं निवेदय च नाहुषम् ॥ ) धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ । उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुषनन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है । वैशम्पायन उवाच
त्वरितं देवयान्याथ संदिष्टं पितुरात्मनः ।
सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार देवयानीने तुरंत धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया । धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक - ठीक बता दीं ॥ २८ ॥
श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः ।
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दृष्ट्वैव चागतं शुक्रं ययातिः पृथिवीपतिः ।
ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ २ ९ ॥
सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया । विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये ॥ २ ९ ॥ देवयान्युवाच
राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् ।
नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥ ३० ॥
देवयानी बोली- तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं । इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था । आपको नमस्कार है । आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें । मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ॥ ३० ॥
शुक्र उवाच
वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया ।
गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ॥ ३१ ॥
शुक्राचार्यने कहा - वीर नहुषनन्दन! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है; अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ३१ ॥
ययातिरुवाच
अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव ।
वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३२ ॥
ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन्! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ॥ ३२ ॥
शुक्रउवाच
अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम् ।
अस्मिन् विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते ॥ ३३ ॥
शुक्राचार्यने कहा —राजन्! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँग लो । इस विवाहको लेकर तुम्हारे मनमें ग्लानि नहीं होनी चाहिये । मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ ॥ ३३ ॥
वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं सुमध्यमाम् ।
अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ ३४ ॥
तुम सुन्दरी देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो ॥ ३४ ॥
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इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
सम्पूज्या सततं राजन् मा चैनां शयने ह्वयेः ॥ ३५ ॥
महाराज! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है । इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न बुलाना ॥ ३५ ॥
( रहस्येनां समाहूय न वदेर्न च संस्पृशेः । वहस्व भार्यां भद्रं ते यथाकाममवाप्स्यसि ॥ ) तुम्हारा कल्याण हो । इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना । अब तुम विवाह करके इसे अपनी पत्नी बनाओ । इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी । वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम् ।
शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम् ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं –जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधिसे मंगलमय विवाह कार्य सम्पन्न किया ॥ ३६ ॥
लब्ध्वा शुक्रान्महद् वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् ।
द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह ॥ ३७ ॥
सम्पूजितश्च शुक्रेण दैत्यैश्च नृपसत्तमः ।
जगाम स्वपुरं हृष्टोऽनुज्ञातोऽथ महात्मना ॥ ३८ ॥
शुक्राचार्यसे देवयानी - जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये ॥ ३७-३८ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत ययात्युपाख्यानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ८१ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ श्लोक हैं ) * किन्हीं श्लोकोंमें दो हजार और किन्हीं में एक हजार सखियोंका वर्णन आता है । यथावसर दोनों ठीक हैं ।
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द्वयशीतितमोऽध्यायः ययातिसे देवयानीको पुत्र प्राप्ति; ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म वैशम्पायन उवाच
ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम् ।
प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत् ॥ १ ॥
देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः ।
अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत् ॥ २ ॥
वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठां वार्षपर्वणीम् ।
वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसत्कृताम् ॥३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी ( अमरावती ) - के समान थी । उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको तो अन्तःपुरमें स्थान दिया और उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग - अलग व्यवस्था करके शर्मिष्ठाका समुचित सत्कार किया ॥ १–३ ॥
(अशोकवनिकामध्ये देवयानी समागता ।
शर्मिष्ठया सा क्रीडित्वा रमणीये मनोरमे ॥
तत्रैव तां तु निर्दिश्य राज्ञा सह ययौ गृहम् । एवमेव सह प्रीत्या मुमुदे बहुकालतः ॥ ) देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन- विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी । इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही ।
देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः ।
विजहार बहूनब्दान् देववन्मुदितः सुखी ॥ ४ ॥
नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया । वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे ॥ ४ ॥
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना ।
लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारं च व्यजायत ॥ ५ ॥
ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया ॥ ५ ॥
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गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा चान्वचिन्तयत् ॥ ६ ॥
इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो गयी ॥ ६ ॥
(शुद्धा स्नाता तु शर्मिष्ठा सर्वालंकारभूषिता ।
अशोकशाखामालम्ब्य सुफुल्लैः स्तबकैर्वृताम् ॥
आदर्श मुखमुद्वीक्ष्य भर्तृदर्शनलालसा ।
शोकमोहसमाविष्टा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतसाम् ।
त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियसंदर्शनाद्धि माम् ॥
एवमुक्तवती सा तु शर्मिष्ठा पुनरब्रवीत् ॥ ) स्नान करके शुद्ध हो समस्त आभूषणोंसे विभूषित हुई शर्मिष्ठा सुन्दर पुष्पोंके गुच्छोंसे भरी अशोक- शाखाका आश्रय लिये खड़ी थी । दर्पणमें अपना मुँह देखकर उसके मनमें पतिके दर्शनकी लालसा जाग उठी और वह शोक एवं मोहसे युक्त हो इस प्रकार बोली- ' हे अशोक वृक्ष! जिनका हृदय शोकमें डूबा हुआ है, उन सबके शोकको तुम दूर करनेवाले हो । इस समय मुझे प्रियतमका दर्शन कराकर अपने ही जैसे नामवाली बना दो ' ऐसा कहकर शर्मिष्ठा फिर बोली – ।
ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न च मेऽस्ति पतिर्वृतः ।
किं प्राप्तं किं नु कर्तव्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत् ॥ ७ ॥
'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया; किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया है । यह कैसी परिस्थिति आ गयी । अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुकृत ( पुण्य) होगा ॥ ७ ॥
देवयानी प्रजातासौ वृथाहं प्राप्तयौवना ।
यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम् ॥ ८ ॥
'देवयानी तो पुत्रवती हो गयी; किंतु मुझे जो जवानी मिली है, वह व्यर्थ जा रही है । जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ ॥ ८ ॥
राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः ।
अपीदानीं स धर्मात्मा इयान्मे दर्शनं रहः ॥ ९ ॥
‘ मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे? ' ॥ ९ ॥
अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया ।
अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्रेक्ष्य विष्ठितः ॥ १० ॥
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शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर ठहर गये ॥ १० ॥
तमेकं रहिते दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी ।
प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥
मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही ॥ ११ ॥
शर्मिष्ठोवाच
सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य च ।
तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥ १२ ॥
रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा ।
सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप ॥ १३ ॥
शर्मिष्ठाने कहा - नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण अथवा आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? ( अतएव यहाँ मैं सर्वथा सुरक्षित हूँ) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं । मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये – मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये ॥ १२-१३ ॥ ययातिरुवाच
वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम् ।
रूपं च ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम् ॥ १४ ॥
ययातिने कहा —शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ । तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो ॥ १४ ॥
अब्रवीदुशना काव्यो देवयानीं यदावहम् ।
नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी ॥ १५ ॥
परंतु क्या करूँ; जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय कविपुत्र शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि ' वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना' ॥ १५ ॥
शर्मिष्ठोवाच न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे