महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 61–70

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 61 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गीताप्रेस गोरखपुर - द्रौपदी स्वयंवर

पृष्ठ 62

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 62 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Umavel गीताप्रेस गोरखपुर प्रभासक्षेत्रमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका मिलन

पृष्ठ 63

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 63 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गीताप्रेस गोरखपुर कृपासिंधु भगवान् श्रीकृष्ण

पृष्ठ 64

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 64 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यदाश्रौषं वासुदेवे प्रयाते रथस्यैकामग्रतस्तिष्ठमानाम् । आर्तां पृथां सान्त्वितां केशवेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७७ ॥

जब मैंने सुना— यहाँसे श्रीकृष्णके लौटते समय अकेली कुन्ती उनके रथके सामने आकर खड़ी हो गयी और अपने हृदयकी आर्ति- वेदना प्रकट करने लगी, तब श्रीकृष्णने उसे भलीभाँति सान्त्वना दी । संजय! तभीसे मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १७७ ॥

यदाश्रौषं मन्त्रिणं वासुदेवं तथा भीष्मं शान्तनवं च तेषाम् । भारद्वाजं चाशिषोऽनुब्रुवाणं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७८ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि श्रीकृष्ण पाण्डवोंके मन्त्री हैं और शान्तनुनन्दन भीष्म तथा भारद्वाज द्रोणाचार्य उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं, तब मुझे विजय-प्राप्तिकी किंचित् भी आशा नहीं रही ॥ १७८ ॥

यदाश्रौषं कर्ण उवाच भीष्मं नाहं योत्स्ये युध्यमाने त्वयीति । हित्वा सेनामपचक्राम चापि तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७ ९ ॥ जब कर्णने भीष्मसे यह बात कह दी कि ' जबतक तुम युद्ध करते रहोगे तबतक मैं पाण्डवोंसे नहीं लडूंगा', इतना ही नहीं-वह सेनाको छोड़कर हट गया, संजय! तभीसे मेरे मनमें विजयके लिये कुछ भी आशा नहीं रह गयी ॥ १७ ९ ॥ यदाश्रौषं वासुदेवार्जुनौ तौ तथा धनुर्गाण्डीवमप्रमेयम् । त्रीण्युग्रवीर्याणि समागतानि तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८० ॥

संजय! जब मैंने सुना कि भगवान् श्रीकृष्ण, वीरवर अर्जुन और अतुलित शक्तिशाली गाण्डीव धनुष– ये तीनों भयंकर प्रभावशाली शक्तियाँ इकट्ठी हो गयी हैं, तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १८० ॥

यदाश्रौषं कश्मलेनाभिपन्ने रथोपस्थे सीदमानेऽर्जुने वै । कृष्णं लोकान् दर्शयानं शरीरे

पृष्ठ 65

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 65 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८१ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि रथके पिछले भागमें स्थित मोहग्रस्त अर्जुन अत्यन्त दुःखी हो रहे थे और श्रीकृष्णने अपने शरीरमें उन्हें सब लोकोंका दर्शन करा दिया, तभी मेरे मनसे विजयकी सारी आशा समाप्त हो गयी ॥ १८१ ॥

यदाश्रौषं भीष्मममित्रकर्शनं

निघ्नन्तमाजावयुतं रथानाम् ।

नैषां कश्चिद् वध्यते ख्यातरूप- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८२ ॥

जब मैंने सुना कि शत्रुघाती भीष्म रणांगणमें प्रतिदिन दस हजार रथियोंका संहार कर रहे हैं, परंतु पाण्डवोंका कोई प्रसिद्ध योद्धा नहीं मारा जा रहा है, संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १८२ ॥

यदाश्रौषं चापगेयेन संख्ये

स्वयं मृत्युं विहितं धार्मिकेण ।

तच्चाकार्षुः पाण्डवेयाः प्रहृष्टा- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८३ ॥

जब मैंने सुना कि परम धार्मिक गंगानन्दन भीष्मने युद्धभूमिमें पाण्डवोंको अपनी मृत्युका उपाय स्वयं बता दिया और पाण्डवोंने प्रसन्न होकर उनकी उस आज्ञाका पालन किया । संजय! तभी मुझे विजयकी आशा नहीं रही ॥ १८३ ॥

यदाश्रौषं भीष्ममत्यन्तशूरं हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् । शिखण्डिनं पुरतः स्थापयित्वा तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८४ ॥

जब मैंने सुना कि अर्जुनने सामने शिखण्डीको खड़ा करके उसकी ओटसे सर्वथा अजेय अत्यन्त शूर भीष्मपितामहको युद्धभूमिमें गिरा दिया । संजय! तभी मेरी विजयकी आशा समाप्त हो गयी ॥ १८४ ॥

यदाश्रौषं शरतल्पे शयानं

वृद्धं वीरं सादितं चित्रपुङ्खैः ।

भीष्मं कृत्वा सोमकानल्पशेषां- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८५ ॥

जब मैंने सुना कि हमारे वृद्ध वीर भीष्मपितामह अधिकांश सोमकवंशी योद्धाओंका वध करके अर्जुनके बाणोंसे क्षत - विक्षत शरीर हो शरशय्यापर शयन कर रहे हैं, संजय! तभी मैंने समझ लिया अब मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १८५ ॥

पृष्ठ 66

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 66 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यदाश्रौषं शान्तनवे शयाने पानीयार्थे चोदितेनार्जुनेन । भूमिं भित्त्वा तर्पितं तत्र भीष्मं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८६ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि शान्तनुनन्दन भीष्मपितामहने शरशय्यापर सोते समय अर्जुनको संकेत किया और उन्होंने बाणसे धरतीका भेदन करके उनकी प्यास बुझा दी, तब मैंने विजयकी आशा त्याग दी ॥ १८६ ॥

यदा वायुश्चन्द्रसूर्यौ च युक्तौ कौन्तेयानामनुलोमा जयाय । नित्यं चास्माञ्श्वापदा भीषयन्ति तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८७ ॥

जब वायु अनुकूल बहकर और चन्द्रमा- सूर्य लाभस्थानमें संयुक्त होकर पाण्डवोंकी विजयकी सूचना दे रहे हैं और कुत्ते आदि भयंकर प्राणी प्रतिदिन हमलोगोंको डरा रहे हैं । संजय! तब मैंने विजयके सम्बन्धमें अपनी आशा छोड़ दी ॥ १८७ ॥

यदा द्रोणो विविधानस्त्रमार्गान् निदर्शयन् समरे चित्रयोधी । न पाण्डवाञ्श्रेष्ठतरान् निहन्ति तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८८ ॥

संजय! हमारे आचार्य द्रोण बेजोड़ योद्धा थे और उन्होंने रणांगणमें अपने अस्त्र- शस्त्रके अनेकों विविध कौशल दिखलाये, परंतु जब मैंने सुना कि वे वीर-शिरोमणि पाण्डवोंमेंसे किसी एकका भी वध नहीं कर रहे हैं, तब मैंने विजयकी आशा त्याग दी ॥ १८८ ॥

यदाश्रौषं चास्मदीयान् महारथान् व्यवस्थितानर्जुनस्यान्तकाय । संशप्तकान् निहतानर्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८ ९ ॥ संजय! मेरी विजयकी आशा तो तभी नहीं रही जब मैंने सुना कि मेरे जो महारथी वीर संशप्तक योद्धा अर्जुनके वधके लिये मोर्चेपर डटे हुए थे, उन्हें अकेले ही अर्जुनने मौतके घाट उतार दिया ॥ १८९ ॥

यदाश्रौषं व्यूहमभेद्यमन्यै- र्भारद्वाजेनात्तशस्त्रेण गुप्तम् । भित्त्वा सौभद्रं वीरमेकं प्रविष्टं

पृष्ठ 67

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 67 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ० ॥ संजय! स्वयं भारद्वाज द्रोणाचार्य अपने हाथमें शस्त्र उठाकर उस चक्रव्यूहकी रक्षा कर रहे थे, जिसको कोई दूसरा तोड़ ही नहीं सकता था, परंतु सुभद्रानन्दन वीर अभिमन्यु अकेला ही छिन्न- भिन्न करके उसमें घुस गया, जब यह बात मेरे कानोंतक पहुँची, तभी मेरी विजयकी आशा लुप्त हो गयी ॥ १ ९ ० ॥ यदाभिमन्युं परिवार्य बालं

सर्वे हत्वा हृष्टरूपा बभूवुः ।

महारथाः पार्थमशक्नुवन्त- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ १ ॥

संजय! मेरे बड़े - बड़े महारथी वीरवर अर्जुनके सामने तो टिक न सके और सबने मिलकर बालक अभिमन्युको घेर लिया और उसको मारकर हर्षित होने लगे, जब यह बात मुझतक पहुँची, तभीसे मैंने विजयकी आशा त्याग दी ॥ १ ९ १ ॥ यदाश्रौषमभिमन्युं निहत्य हर्षान्मूढान् क्रोशतो धार्तराष्ट्रान् । क्रोधादुक्तं सैन्धवे चार्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ २ ॥ जब मैंने सुना कि मेरे मूढ़ पुत्र अपने ही वंशके होनहार बालक अभिमन्युकी हत्या करके हर्षपूर्ण कोलाहल कर रहे हैं और अर्जुनने क्रोधवश जयद्रथको मारनेकी भीषण प्रतिज्ञा की है, संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १ ९ २ ॥ यदाश्रौषं सैन्धवार्थे प्रतिज्ञां प्रतिज्ञातां तद्बधायार्जुनेन । सत्यां तीर्णां शत्रुमध्ये च तेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ३ ॥ जब मैंने सुना कि अर्जुनने जयद्रथको मार डालनेकी जो दृढ़ प्रतिज्ञा की थी, उसने वह शत्रुओंसे भरी रणभूमिमें सत्य एवं पूर्ण करके दिखा दी । संजय! तभीसे मुझे विजयकी सम्भावना नहीं रह गयी ॥ १ ९ ३ ॥ यदाश्रौषं श्रान्तहये धनञ्जये मुक्त्वा हयान् पाययित्वोपवृत्तान् । पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रयातं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ४ ॥

पृष्ठ 68

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 68 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धभूमिमें धनञ्जय अर्जुनके घोड़े अत्यन्त श्रान्त और प्याससे व्याकुल हो रहे थे । स्वयं श्रीकृष्णने उन्हें रथसे खोलकर पानी पिलाया । फिरसे रथके निकट लाकर उन्हें जोत दिया और अर्जुनसहित वे सकुशल लौट गये । जब मैंने यह बात सुनी, संजय! तभी मेरी विजयकी आशा समाप्त हो गयी ॥ १ ९ ४ ॥ यदाश्रौषं वाहनेष्वक्षमेषु रथोपस्थे तिष्ठता पाण्डवेन । सर्वान् योधान् वारितानर्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ५ ॥ जब संग्रामभूमिमें रथके घोड़े अपना काम करनेमें असमर्थ हो गये, तब रथके समीप ही खड़े होकर पाण्डववीर अर्जुनने अकेले ही सब योद्धाओंका सामना किया और उन्हें रोक दिया । मैंने जिस समय यह बात सुनी, संजय! उसी समय मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १ ९ ५ ॥ यदाश्रौषं नागबलैः सुदुःसहं द्रोणानीकं युयुधानं प्रमथ्य । यातं वार्ष्णेयं यत्र तौ कृष्णपार्थौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ६ ॥ जब मैंने सुना कि वृष्णिवंशावतंस युयुधान -सात्यकिने अकेले ही द्रोणाचार्यकी उस सेनाको, जिसका सामना हाथियोंकी सेना भी नहीं कर सकती थी, तितर- बितर और तहस- नहस कर दिया तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास पहुँच गये । संजय! तभीसे मेरे लिये विजयकी आशा असम्भव हो गयी ॥ १ ९ ६ ॥ यदाश्रौषं कर्णमासाद्य मुक्तं वधाद् भीमं कुत्सयित्वा वचोभिः । धनुष्कोट्याऽऽतुद्य कर्णेन वीरं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ७ ॥ संजय! जब मैंने सुना कि वीर भीमसेन कर्णके पंजेमें फँस गये थे, परंतु कर्णने तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर और धनुषकी नोक चुभाकर ही छोड़ दिया तथा भीमसेन मृत्युके मुखसे बच निकले । संजय! तभी मेरी विजयकी आशापर पानी फिर गया ॥ १ ९७ ॥ यदा द्रोणः कृतवर्मा कृपश्च कर्णो द्रौणिर्मद्रराजश्च शूरः । अमर्षयन् सैन्धवं वध्यमानं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९ ८ ॥

पृष्ठ 69

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 69 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जब मैंने सुना कि द्रोणाचार्य, कृतवर्मा, कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा

तथा वीर शल्यने भी सिन्धुराज जयद्रथका वध सह लिया, प्रतीकार नहीं किया ।

संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १ ९ ८ ॥

यदाश्रौषं देवराजेन दत्तां दिव्यां शक्तिं व्यंसितां माधवेन । घटोत्कचे राक्षसे घोररूपे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १ ९९ ॥ संजय! देवराज इन्द्रने कर्णको कवचके बदले एक दिव्य शक्ति दे रखी थी और उसने उसे अर्जुनपर प्रयुक्त करनेके लिये रख छोड़ा था; परंतु मायापति श्रीकृष्णने भयंकर राक्षस घटोत्कचपर छुड़वाकर उससे भी वंचित करवा दिया । जिस समय यह बात मैंने सुनी, उसी समय मेरी विजयकी आशा टूट गयी ॥ १ ९९ ॥ यदाश्रौषं कर्णघटोत्कचाभ्यां युद्धे मुक्तां सूतपुत्रेण शक्तिम् । यया वध्यः समरे सव्यसाची तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०० ॥

जब मैंने सुना कि कर्ण और घटोत्कचके युद्धमें कर्णने वह शक्ति

घटोत्कचपर चला दी, जिससे रणांगणमें अर्जुनका वध किया जा सकता था ।

संजय! तब मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ २०० ॥

यदाश्रौषं द्रोणमाचार्यमेकं धृष्टद्युम्नेनाभ्यतिक्रम्य धर्मम् । रथोपस्थे प्रायगतं विशस्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०१ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि आचार्य द्रोण पुत्रकी मृत्युके शोकसे शस्त्रादि छोड़कर आमरण अनशन करनेके निश्चयसे अकेले रथके पास बैठे थे और धृष्टद्युम्नने धर्मयुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके उन्हें मार डाला, तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ २०१ ॥

यदाश्रौषं द्रौणिना द्वैरथस्थं माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये समं युद्धे मण्डलेभ्यश्चरन्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०२ ॥

जब मैंने सुना कि अश्वत्थामा- जैसे वीरके साथ बड़े - बड़े वीरोंके सामने ही माद्रीनन्दन नकुल अकेले ही अच्छी तरह युद्ध कर रहे हैं । संजय! तब मुझे

पृष्ठ 70

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जीतकी आशा न रही ॥ २०२ ॥

यदा द्रोणे निहते द्रोणपुत्रो नारायणं दिव्यमस्त्रं विकुर्वन् । नैषामन्तं गतवान् पाण्डवानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०३ ॥

जब द्रोणाचार्यकी हत्याके अनन्तर अश्वत्थामाने दिव्य नारायणास्त्रका प्रयोग किया; परंतु उससे वह पाण्डवोंका अन्त नहीं कर सका । संजय! तभी मेरी विजयकी आशा समाप्त हो गयी ॥ २०३ ॥

यदाश्रौषं भीमसेनेन पीतं रक्तं भ्रातुर्युधि दुःशासनस्य । निवारितं नान्यतमेन भीमं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०४ ॥

जब मैंने सुना कि रणभूमिमें भीमसेनने अपने भाई दुःशासनका रक्तपान

किया, परंतु वहाँ उपस्थित सत्पुरुषोंमेंसे किसी एकने भी निवारण नहीं किया ।

संजय! तभीसे मुझे विजयकी आशा बिलकुल नहीं रह गयी ॥ २०४ ॥

यदाश्रौषं कर्णमत्यन्तशूरं हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् । तस्मिन् भ्रातॄणां विग्रहे देवगुह्ये तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०५ ॥

संजय! वह भाईका भाईसे युद्ध देवताओंकी गुप्त प्रेरणासे हो रहा था । जब मैंने सुना कि भिन्न - भिन्न युद्धभूमियोंमें कभी पराजित न होनेवाले अत्यन्त शूरशिरोमणि कर्णको पृथापुत्र अर्जुनने मार डाला, तब मेरी विजयकी आशा नष्ट हो गयी ॥ २०५ ॥

यदाश्रौषं द्रोणपुत्रं च शूरं दुःशासनं कृतवर्माणमुग्रम् । युधिष्ठिरं धर्मराजं जयन्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०६ ॥

जब मैंने सुना कि धर्मराज युधिष्ठिर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, शूरवीर दुःशासन एवं उग्र योद्धा कृतवर्माको भी युद्धमें जीत रहे हैं, संजय! तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रह गयी ॥ २०६ ॥

यदाश्रौषं निहतं मद्रराजं रणे शूरं धर्मराजेन सूत । सदा संग्रामे स्पर्धते यस्तु कृष्णं