महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 51–60

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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जब मैंने सुना कि धूर्त एवं मन्दबुद्धि दुःशासनने द्रौपदीका वस्त्र खींचा और वहाँ वस्त्रोंका इतना ढेर लग गया कि वह उसका पार न पा सका; संजय! तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रही ॥ १५८ ॥

यदाश्रौषं हृतराज्यं युधिष्ठिरं

पराजितं सौबलेनाक्षवत्याम् ।

अन्वागतं भ्रातृभिरप्रमेयै- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५ ९ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि धर्मराज युधिष्ठिरको जूएमें शकुनिने हरा दिया और उनका राज्य छीन लिया, फिर भी उनके अतुल बलशाली धीर गम्भीर भाइयोंने युधिष्ठिरका अनुगमन ही किया, तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १५ ९ ॥ यदाश्रौषं विविधास्तत्र चेष्टा धर्मात्मनां प्रस्थितानां वनाय । ज्येष्ठप्रीत्या क्लिश्यतां पाण्डवानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६० ॥

जब मैंने सुना कि वनमें जाते समय धर्मात्मा पाण्डव धर्मराज युधिष्ठिरके प्रेमवश दुःख पा रहे थे और अपने हृदयका भाव प्रकाशित करनेके लिये विविध प्रकारकी चेष्टाएँ कर रहे थे; संजय! तभी मेरी विजयकी आशा नष्ट हो गयी ॥ १६० ॥

यदाश्रौषं स्नातकानां सहस्रै- रन्वागतं धर्मराजं वनस्थम् । भिक्षाभुजां ब्राह्मणानां महात्मनां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६१ ॥

जब मैंने सुना कि हजारों स्नातक वनवासी युधिष्ठिरके साथ रह रहे हैं और वे तथा दूसरे महात्मा एवं ब्राह्मण उनसे भिक्षा प्राप्त करते हैं । संजय! तभी मैं विजयके सम्बन्धमें निराश हो गया ॥ १६१ ॥

यदाश्रौषमर्जुनं देवदेवं किरातरूपं त्र्यम्बकं तोष्य युद्धे । अवाप्तवन्तं पाशुपतं महास्त्रं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६२ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि किरातवेषधारी देवदेव त्रिलोचन महादेवको युद्धमें संतुष्ट करके अर्जुनने पाशुपत नामक महान् अस्त्र प्राप्त कर लिया है, तभी मेरी आशा निराशामें परिणत हो गयी ॥ १६२ ॥

( यदाश्रौषं वनवासे तु पार्थान् समागतान् महर्षिभिः पुराणैः ।

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उपास्यमानान् सगणैर्जातसख्यान् तदा नाशंसे विजयाय संजय II ) यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनञ्जयं शक्रात् साक्षाद् दिव्यमस्त्रं यथावत् । अधीयानं शंसितं सत्यसन्धं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६३ ॥

जब मैंने सुना कि वनवासमें भी कुन्तीपुत्रोंके पास पुरातन महर्षिगण पधारते और उनसे मिलते हैं । उनके साथ उठते - बैठते और निवास करते हैं तथा सेवक - सम्बन्धियोंसहित पाण्डवोंके प्रति उनका मैत्रीभाव हो गया है । संजय! तभी मुझे अपने पक्षकी विजयका विश्वास नहीं रह गया था । जब मैंने सुना कि सत्यसंध धनंजय अर्जुन स्वर्गमें गये हुए हैं और वहाँ साक्षात् इन्द्रसे दिव्य अस्त्र - शस्त्रकी विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और वहाँ उनके पौरुष एवं ब्रह्मचर्य आदिकी प्रशंसा हो रही है, संजय! तभी से मेरी युद्धमें विजयकी आशा जाती रही ॥ १६३ ॥

यदाश्रौषं कालकेयास्ततस्ते पौलोमानो वरदानाच्च दृप्ताः । देवैरजेया निर्जिताश्चार्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६४ ॥

जबसे मैंने सुना कि वरदानके प्रभावसे घमंडके नशेमें चूर कालकेय तथा पौलोम नामके असुरोंको, जिन्हें बड़े - बड़े देवता भी नहीं जीत सकते थे, अर्जुनने बात - की - बातमें पराजित कर दिया, तभीसे संजय! मैंने विजयकी आशा कभी नहीं की ॥ १६४ ॥

यदाश्रौषमसुराणां वधार्थे किरीटिनं यान्तममित्रकर्शनम् । कृतार्थं चाप्यागतं शक्रलोकात् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६५ ॥

मैंने जब सुना कि शत्रुओंका संहार करनेवाले किरीटी अर्जुन असुरोंका वध करनेके लिये गये थे और इन्द्रलोकसे अपना काम पूरा करके लौट आये हैं, संजय! तभी मैंने समझ लिया - अब मेरी जीतकी कोई आशा नहीं ॥ १६५ ॥

( यदाश्रौषं तीर्थयात्राप्रवृत्तं पाण्डोः सुतं सहितं लोमशेन । तस्मादश्रौषीदर्जुनस्यार्थलाभं तदा नाशंसे विजयाय संजय II ) यदाश्रौषं वैश्रवणेन सार्धं समागतं भीममन्यांश्च पार्थान् ।

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तस्मिन् देशे मानुषाणामगम्ये तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६६ ॥

जबमैंने सुना कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर महर्षि लोमशजीके साथ तीर्थयात्रा कर रहे हैं और लोमशजीके मुखसे ही उन्होंने यह भी सुना है कि स्वर्गमें अर्जुनको अभीष्ट वस्तु ( दिव्यास्त्र ) -की प्राप्ति हो गयी है, संजय! तभीसे मैंने विजयकी आशा ही छोड़ दी । जब मैंने सुना कि भीमसेन तथा दूसरे भाई उस देशमें जाकर, जहाँ मनुष्योंकी गति नहीं है, कुबेरके साथ मेल - मिलाप कर आये, संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ १६६ ॥

यदाश्रौषं घोषयात्रागतानां बन्धं गन्धर्वैर्मोक्षणं चार्जुनेन । स्वेषां सुतानां कर्णबुद्धौ रतानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६७ ॥

जब मैंने सुना कि कर्णकी बुद्धिपर विश्वास करके चलनेवाले मेरे पुत्र घोषयात्राके निमित्त गये और गन्धर्वोंके हाथ बन्दी बन गये और अर्जुनने उन्हें उनके हाथसे छुड़ाया । संजय! तभीसे मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १६७ ॥

यदाश्रौषं यक्षरूपेण धर्मं समागतं धर्मराजेन सूत । प्रश्नान् कांश्चिद् विब्रुवाणं च सम्यक् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६८ ॥

सूत संजय! जब मैंने सुना कि धर्मराज यक्षका रूप धारण करके युधिष्ठिरसे मिले और युधिष्ठिरने उनके द्वारा किये गये गूढ़ प्रश्नोंका ठीक- ठीक समाधान कर दिया, तभी विजयके सम्बन्धमें मेरी आशा टूट गयी ॥ १६८ ॥

यदाश्रौषं न विदुर्मामकास्तान् प्रच्छन्नरूपान् वसतः पाण्डवेयान् । विराटराष्ट्रे सह कृष्णया च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६ ९ ॥ संजय! विराटकी राजधानीमें गुप्तरूपसे द्रौपदीके साथ पाँचों पाण्डव निवास कर रहे थे, परंतु मेरे पुत्र और उनके सहायक इस बातका पता नहीं लगा सके; जब मैंने यह बात सुनी, मुझे यह निश्चय हो गया कि मेरी विजय सम्भव नहीं है ॥ १६ ९ ॥ (यदाश्रौषं कीचकानां वरिष्ठं निषूदितं भ्रातृशतेन सार्धम् । द्रौपद्यर्थं भीमसेनेन संख्ये तदा नाशंसे विजयाय संजय II ) यदाश्रौषं मामकानां वरिष्ठान्

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धनञ्जयेनैकरथेन भग्नान् । विराटराष्ट्रे वसता महात्मना तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७० ॥

संजय! जब मैंने सुना कि भीमसेनने द्रौपदीके प्रति किये हुए अपराधका बदला लेनेके लिये कीचकोंके सर्वश्रेष्ठ वीरको उसके सौ भाइयोंसहित युद्धमें मार डाला था, तभीसे मुझे विजयकी बिलकुल आशा नहीं रह गयी थी । संजय! जब मैंने सुना कि विराटकी राजधानीमें रहते समय महात्मा धनंजयने एकमात्र रथकी सहायतासे हमारे सभी श्रेष्ठ महारथियोंको ( जो गो - हरणके लिये पूर्ण तैयारीके साथ वहाँ गये थे ) मार भगाया, तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रही ॥ १७० ॥

यदाश्रौषं सत्कृतां मत्स्यराज्ञा सुतां दत्तामुत्तरामर्जुनाय । तां चार्जुनः प्रत्यगृह्णात् सुतार्थे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७१ ॥

जिस दिन मैंने यह बात सुनी कि मत्स्यराज विराटने अपनी प्रिय एवं सम्मानित पुत्री उत्तराको अर्जुनके हाथ अर्पित कर दिया, परंतु अर्जुनने अपने लिये नहीं, अपने पुत्रके लिये उसे स्वीकार किया, संजय! उसी दिनसे मैं विजयकी आशा नहीं करता था ॥ १७१ ॥

यदाश्रौषं निर्जितस्याधनस्य प्रव्राजितस्य स्वजनात् प्रच्युतस्य । अक्षौहिणीः सप्त युधिष्ठिरस्य तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७२ ॥

संजय! युधिष्ठिर जूएमें पराजित हैं, निर्धन हैं, घरसे निकाले हुए हैं और अपने सगे-सम्बन्धियोंसे बिछुड़े हुए हैं । फिर भी जब मैंने सुना कि उनके पास सात अक्षौहिणी सेना एकत्र हो चुकी है, तभी विजयके लिये मेरे मनमें जो आशा थी, उसपर पानी फिर गया ॥ १७२ ॥

यदाश्रौषं माधवं वासुदेवं

सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टम् ।

यस्येमां गां विक्रममेकमाहु- स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७३ ॥

( वामनावतारके समय) यह सम्पूर्ण पृथ्वी जिनके एक डगमें ही आ गयी बतायी जाती है, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण पूरे हृदयसे पाण्डवोंकी कार्यसिद्धिके लिये तत्पर हैं, जब यह बात मैंने सुनी, संजय! तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रही ॥ १७३ ॥

यदाश्रौषं नरनारायणौ तौ कृष्णार्जुनौ वदतो नारदस्य ।

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अहं द्रष्टा ब्रह्मलोके च सम्यक् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७४ ॥

जब देवर्षि नारदके मुखसे मैंने यह बात सुनी कि श्रीकृष्ण और अर्जुन साक्षात् नर और नारायण हैं और इन्हें मैंने ब्रह्मलोकमें भलीभाँति देखा है, तभीसे मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १७४ ॥

यदाश्रौषं लोकहिताय कृष्णं शमार्थिनमुपयातं कुरूणाम् । शमं कुर्वाणमकृतार्थं च यातं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७५ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण लोककल्याणके लिये शान्तिकी इच्छासे आये हुए हैं और कौरव- पाण्डवोंमें शान्ति- सन्धि करवाना चाहते हैं, परंतु वे अपने प्रयासमें असफल होकर लौट गये, तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रही ॥ १७५ ॥

यदाश्रौषं कर्णदुर्योधनाभ्यां बुद्धिं कृतां निग्रहे केशवस्य । तं चात्मानं बहुधा दर्शयानं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७६ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि कर्ण और दुर्योधन दोनोंने यह सलाह की है कि श्रीकृष्णको कैद कर लिया जाय और श्रीकृष्णने अपने - आपको अनेक रूपोंमें विराट् या अखिल विश्वके रूपमें दिखा दिया, तभीसे मैंने विजयाशा त्याग दी थी ॥ १७६ ॥

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नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् 38 UPNIL देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् गीताप्रेस गोरखपुर नमस्कार

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गीताप्रेस, गोरखपुर अवतारके लिये प्रार्थना

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गीताप्रेस गोरखपुर सिंह - बाघोंमें बालक भरत

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bry गीताप्रेस, गोरखपुर कुमार भीमसेनका साँपोंपर कोप

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गीताप्रेस गोरखपुर एकलव्यकी गुरु - दक्षिणा