महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 651–660

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्न च याचेत् कदाचन ॥ १३ ॥

इसलिये कभी कठोर वचन न बोले । सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले । पूजनीय पुरुषोंका पूजन ( आदर- सत्कार) करे । दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं ) Fard

पृष्ठ 652

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना इन्द्र उवाच सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन् गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि । तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र केनासि तुल्यस्तपसा ययाते ॥ १ ॥

इन्द्रने कहा— राजन्! तुम सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे । अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम तपस्यामें किसके समान हो ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु ।

आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव ॥ २ ॥

ययातिने कहा — इन्द्र! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों और महर्षियोंमेंसे किसीको भी तपस्यामें अपनी बराबरी करनेवाला नहीं देखता हूँ ॥ २ ॥

इन्द्र उवाच यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च अल्पीयसश्चाविदितप्रभावः । तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमे क्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन् ॥ ३ ॥

इन्द्र बोले— राजन्! तुमने अपने समान, अपने से बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारे इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि ( दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब तुम यहाँसे नीचे गिरोगे ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात् क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः । इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः सतां मध्ये पतितुं देवराज ॥ ४ ॥

पृष्ठ 653

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ययातिने कहा- देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ४ ॥

इन्द्र उवाच सतां सकाशे पतितासि राजं- च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः । एतद् विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं मावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च ॥ ५ ॥

इन्द्र बोले — राजा ययाति! तुम यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके समीप गिरोगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लोगे । यह सब जानकर तुम फिर कभी अपने बराबर तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान न करना ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच ततः प्रहायामरराजजुष्टान्

पुण्याल्लोकान् पतमानं ययातिम् ।

सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त- मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग करके राजा ययाति नीचे गिरने लगे । उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ अष्टकने उन्हें गिरते देखा । वे उत्तम धर्म- विधिके पालक थे । उन्होंने ययातिसे कहा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 654

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ययातिका पतन

पृष्ठ 655

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अष्टक उवाच कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः । पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात् खात् खेचराणां प्रवरो यथार्कः ॥ ७ ॥

अष्टकने पूछा – इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो । मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान तुम कैसे गिर रहे हो? ॥ ७ ॥

दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम् । किं नु स्विदेतत् पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ॥ ८ ॥

तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है । तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हें सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क - वितर्कमें पड़े हैं कि ' यह क्या गिर रहा है? ' ॥ ८ ॥

पृष्ठ 656

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दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् । अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः ॥ ९ ॥

तुम इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हो । तुम्हें आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये तुम्हारे निकट आये हैं कि तुम्हारे पतनका यथार्थ कारण क्या है? ॥ ९ ॥

न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे न च त्वमस्मान् पृच्छसि ये वयं स्मः । तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ॥ १० ॥

हम पहले तुमसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और तुम भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते हो; कि हम कौन हैं? इसलिये मैं ही तुमसे पूछता हूँ । मनोरम रूपवाले महापुरुष! तुम किसके पुत्र हो? और किसलिये यहाँ आये हो? ॥ १० ॥

भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव । त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्रः ॥ ११ ॥

इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये । अब तुम्हें विषाद और मोहको भी तुरंत त्याग देना चाहिये । इस समय तुम संतोंके समीप विद्यमान हो । बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब तुम्हारा तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं ॥ ११ ॥

सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प । ते संगताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ॥ १२ ॥

देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वंचित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं । वे स्थावर और जंगम सब प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं । तुम अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हो ॥ १२ ॥

प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः ।

प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः ॥ १३ ॥

जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, इसी प्रकार संतोंपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिमें है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 657

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 658

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एकोननवतितमोऽध्यायः ययाति और अष्टकका संवाद ययातिरुवाच अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः पूरो: पिता सर्वभूतावमानात् । प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोकात् परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ॥ १ ॥

ययातिने कहा— महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और रुका पिता ययाति हूँ । समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं देवताओं, सिद्धों तथा महर्षियोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ ॥ १ ॥

अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भ्य- स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे । यो विद्यया तपसा जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ २ ॥

मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ । द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है, वह पूजनीय माना जाता है ॥ २ ॥

अष्टक उवाच अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धः स'वैवै राजन् नाभ्यधिकः कथ्यते च । यो विद्यया तपसा सम्प्रवृद्धः स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ ३ ॥

अष्टक बोले — राजन्! आपने कहा है कि जो अवस्थामें बड़ा हो, वही अधिक सम्माननीय कहा जाता है । परंतु द्विजोंमें तो जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा हो, वही पूज्य होता है ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु- स्तद् वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् । सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैतद् यथा चैषामनुकूलास्तथाऽऽसन् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 659

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ययातिने कहा — पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है, वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है । दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका श्रेष्ठ पुरुष अनुसरण नहीं करते हैं। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे ॥ ४ ॥

अभूद् धनं मे विपुलं गतं तद् विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि । एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्तते स विजानाति धीरः ॥ ५ ॥

मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था; किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया । अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता । मेरी इस दुरवस्थाको समझ- बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और वही धीर है ॥ ५ ॥

महाधनो यो यजते सुयज्ञै- र्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः । वेदानधीत्य तपसाऽऽयोज्य देहं दिवं समायात् पुरुषो वीतमोहः ॥ ६ ॥

जो मनुष्य बहुत धनी होकर उत्तम यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करता है, सम्पूर्ण विद्याओंको पाकर जिसकी बुद्धि विनययुक्त है तथा जो वेदोंको पढ़कर अपने शरीरको तपस्यामें लगा देता है, वह पुरुष मोहरहित होकर स्वर्गमें जाता है ॥ ६ ॥

न जातु हृष्येन्महता धनेन वेदानधीयीतानहंकृतः स्यात् । नानाभावा बहवो जीवलोके दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः । तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मबुद्ध्या ॥ ७ ॥

महान् धन पाकर कभी हर्षसे उल्लसित न हो, वेदोंका अध्ययन करे, किंतु अहंकारी न बने । इस जीव - जगत्में भिन्न -भिन्न स्वभाववाले बहुत से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं । इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे ' प्रारब्ध ही बलवान् है ' यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको प्राप्त न हो ॥ ७ ॥

सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या । तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ॥ ८ ॥

पृष्ठ 660

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जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह प्रारब्धसे ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं । अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे ॥ ८ ॥

दुःखैर्न तप्येन्न सुखैः प्रहृष्येत् समेन वर्तेत सदैव धीरः । दिष्टं बलीय इति मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ॥ ९ ॥

दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो । धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो ॥ ९ ॥

भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित् संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित् । धाता यथा मां विदधीत लोके ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा ॥ १० ॥

अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा, वैसे ही रहूँगा ॥ १० ॥

संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः । तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वे दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति ॥ ११ ॥

स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ —ये सभी प्रारब्ध - भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥

अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम् । किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः ॥ १२ ॥

अष्टक! मैं सुख तथा दुःख दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतप्त न होऊँ, इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ । अतः सावधान रहकर शोक- संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ ॥ १२ ॥

(दुःखे न खिद्येन्न सुखेन माद्येत् समेन वर्तेत स धीरधर्मा । दिष्टं बलीयः समवेक्ष्य बुद्ध्या