महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 661–670

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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न सज्जते चात्र भृशं मनुष्यः ॥ ) जो दुःखमें खिन्न नहीं होता, सुखसे मतवाला नहीं हो उठता और सबके साथ समान भावसे बर्ताव करता है, वह धीर कहा गया है । विज्ञ मनुष्य बुद्धिसे प्रारब्धको अत्यन्त बलवान् समझकर यहाँ किसी भी विषयमें अधिक आसक्त नहीं होता । वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति- मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् । मातामहं सर्वगुणोपपन्नं तत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत् ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे । वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, मानो स्वर्गलोकमें हों । जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं, तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया ॥ १३ ॥

अष्टक उवाच ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधाना- स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथावत् । तान् मे राजन् ब्रूहि सर्वान् यथावत् क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मान् ॥ १४ ॥

अष्टक बोले – महाराज! आपने जिन -जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक

वहाँके सुखोंका भलीभाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये ।

राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं ॥ १४ ॥

ययातिरुवाच राजाहमासमिह सार्वभौम- स्ततो लोकान् महतश्चाजयं वै । तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १५ ॥

ययातिने कहा — अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े - बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोंतक निवास किया । इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा ॥ १५ ॥

ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनायताम् । अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं

पृष्ठ 662

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ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १६ ॥

वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई । उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया ॥ १६ ॥

ततो दिव्यमजंर प्राप्य लोकं प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् । तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १७ ॥

तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्य लोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है । वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया ॥ १७ ॥

स देवदेवस्य निवेशने च

विहृत्य लोकानवसं यथेष्टम् ।

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै- स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ॥ १८ ॥

वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था । वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न -भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा । उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था ॥ १८ ॥

तथावसं नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् । सहाप्सरोभिर्विहरन् पुण्यगन्धान् पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान् ॥ १ ९ ॥ इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा । वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे ॥ १ ९ ॥ तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् । दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ॥ २० ॥

वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया । तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला — ‘ गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ ' ॥ २० ॥

एतावन्मे विदितं राजसिंह

पृष्ठ 663

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ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः । वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणां सानुक्रोशाः शोचतां मां नरेन्द्र ॥ २१ ॥

राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है । तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा । नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी — ॥ २१ ॥

अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः । तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु ॥ २२ ॥

' अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं । ' तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा — ' देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है! ' ॥ २२ ॥

तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः

समीक्ष्य चेमां त्वरितमुपागतोऽस्मि ।

हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे- र्धूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः ॥ २३ ॥

तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ । यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूमप्रान्तका अवलोकन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं )

पृष्ठ 664

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नवतितमोऽध्यायः अष्टक और ययातिका संवाद अष्टक उवाच यदावसो नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् । किं कारणं कार्तयुगप्रधान हित्वा च त्वं वसुधामन्वपद्यः ॥ १ ॥

अष्टकने पूछा – सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये? ॥ १ ॥

ययातिरुवाच ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो वा यथेह क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि । तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं त्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवसङ्घाः ॥ २ ॥

ययाति बोले — जैसे इस लोकमें जाति - भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं; उसी प्रकार परलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो गया है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं ॥ २ ॥

अष्टक उवाच तस्मिन् कथं क्षीणपुण्या भवन्ति सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम् । किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे ॥ ३ ॥

अष्टकने पूछा-- देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है । प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट ( अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले ) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे क्षेत्रज्ञ ( आत्मज्ञानी ) जान पड़ते हैं ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच

पृष्ठ 665

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इमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे । ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थे* क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति ॥ ४ ॥

ययाति बोले– नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्य कर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं । यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये बड़ा भारी परिश्रम करके क्षीण होते और पुत्र - पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥

तस्मादेतद् वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म । आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि ॥ ५ ॥

इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो उसको सर्वथा त्याग देना चाहिये । भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया, बोलो, अब और तुम्हें क्या बताऊँ? ॥ ५ ॥

अष्टक उवाच यदा तु तान् वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि ॥ ६ ॥

अष्टकने पूछा- जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, नीलकण्ठ और पतंग ये नोच - नोचकर खा लेते हैं, तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? मैंने अबतक भौम नामक किसी दूसरे नरकका नाम नहीं सुना था ॥ ६ ॥

ययातिरुवाच ऊर्ध्वं देहात् कर्मणा जृम्भमाणाद् व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति । इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ॥ ७ ॥

ययाति बोले — कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर ( विषयोंमें) विचरते हैं । उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है । इसीमें वे पड़ते हैं । इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते ॥ ७ ॥

पृष्ठ 666

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षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि तथा अशीतिं परिवत्सराणि । तान् वै तुदन्ति पततः प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः ॥ ८ ॥

कितने ही प्राणी आकाश (स्वर्गादि) में साठ हजार वर्ष रहते हैं । कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं । इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं । यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस ( दुष्ट प्राणी ) अत्यन्त पीड़ा देते हैं ॥ ८ ॥

अष्टक उवाच यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ९ ॥

अष्टकने पूछा — तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके वे भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और कैसे गर्भमें आते हैं? ॥ ९ ॥

ययातिरुवाच अस्रं रेतः पुष्पफलानुपृक्त- मन्वेति तद् वै पुरुषेण सृष्टम् । स वै तस्या रज आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र ॥ १० ॥

ययाति बोले — अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी अस्र ( जल) होता है । फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है । वह वीर्य फूल और फलरूपी शेष कर्मोंसे संयुक्त होकर तदनुरूप योनिका अनुसरण करता है । गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वह वीर्यमें आविष्ट हुआ जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है । तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है ॥ १० ॥

वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति

अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम् ।

चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्व- मेवम्भूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ११ ॥

जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं । जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं । इस प्रकार भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

पृष्ठ 667

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अष्टक उवाच

अन्यद् वपुर्विदधातीह गर्भ- मुताहोस्वित् स्वेन कायेन याति ।

आपद्यमानो नरयोनिमेता- माचक्ष्व मे संशयात् प्रब्रवीमि ॥ १२ ॥

अष्टकने पूछा — राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है । आप यह रहस्य मुझे बताइये । मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ ॥ १२ ॥

शरीरभेदाभिसमुच्छ्रयं च चक्षुःश्रोत्रे लभते केन संज्ञाम् । एतत् तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे ॥ १३ । । गर्भमें आनेपर वह भिन्न -भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये । तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ ( आत्मज्ञानी ) मानते हैं ॥ १३ ॥

ययातिरुवाच वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि- मृतौ रेतः पुष्परसानुपृक्तम् । स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम् ॥ १४ ॥

ययाति बोले –ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लाता है। वहाँ गर्भाशयमें सूक्ष्मभूत उसपर अधिकार कर लेते हैं और वह क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है ॥ १४ ॥

स जायमानो विगृहीतमात्रः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः । स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्द स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च ॥ १५ ॥

वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है, तब चेतनताका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है । वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है ॥ १५ ॥

घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च त्वचा स्पर्शं मनसा वेद भावम् ।

पृष्ठ 668

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इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनां प्राणभृतां शरीरे ॥ १६ ॥

नासिकासे सुगन्ध लेता है । जिह्वासे रसका आस्वादन करता है । त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है । अष्टक! इस प्रकार महात्मा प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है ॥ १६ ॥

अष्टक उवाच यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा निखन्यते वापि निकृष्यते वा । अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मना चेतयते परस्तात् ॥ १७ ॥

अष्टकने पूछा— जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है । इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है । फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है? ॥ १७ ॥

ययातिरुवाच हित्वा सोऽसून् सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह ॥ १८ ॥

ययाति बोले- राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर वायुके समान वेगसे चलता हुआ अन्य योनिको प्राप्त होता है ॥ १८ ॥

पुण्यां योनिं पुण्यकृतो व्रजन्ति पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति । कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा न मे विवक्षास्ति महानुभाव ॥ १ ९ ॥ चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति । आख्यातमेतन्निखिलेन सर्वं भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ॥ २० ॥

पृष्ठ 669

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पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य -योनियोंमें जाते हैं और पाप करनेवाले मनुष्य पाप - योनिमें जाते हैं । इस प्रकार पापी जीव कीट- पतंग आदि होते हैं । महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती । नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैर, छः पैर और दो पैरवाले प्राणियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं । यह सब मैंने पूरा- पूरा बता दिया । अब और क्या पूछना चाहते हो? ॥ १ ९-२० ॥ अष्टक उवाच किंस्वित् कृत्वा लभते तात लोकान्

मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा ।

तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव- च्छुभाँल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण ॥ २१ ॥

अष्टकने पूछा- तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम लोक प्राप्त करता है? वे लोक तपसे प्राप्त होते हैं या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ । जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थरूपसे बताइये ॥ २१ ॥

ययातिरुवाच तपश्च दानं च शमो दमश्च हीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा । स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम् । नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः ॥ २२ ॥

ययाति बोले — राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं । उनके नाम ये हैं - तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया । वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है ॥ २२ ॥

अधीयानः पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् । तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद् ब्रह्म फलं ददाति ॥ २३ ॥

जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् ( विनाशशील ) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता ॥ २३ ॥

चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि

पृष्ठ 670

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भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुतमानयज्ञः ॥ २४ ॥

अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ – ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, अभिमानपूर्वक उनका अनुष्ठान किया जाय तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं ॥ २४ ॥

न मानमान्यो मुदमाददीत न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात् । सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते ॥ २५ ॥

विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो और अपमानित होनेपर संतप्त न हो । इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं । दुष्ट पुरुषोंको ' यह सत्पुरुष है ’ ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती ॥ २५ ॥

इति दद्यामिति यज इत्यधीय इति व्रतम् ।

इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वर्ज्यानि सर्वशः ॥ २६ ॥

मैं यह दे सकता हूँ, इस प्रकार यजन करता हूँ, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहता हूँ और यह मेरा व्रत है; इस प्रकार जो अहंकारपूर्वक वचन हैं, उन्हें भयरूप कहा गया है । ऐसे वचनोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥ २६ ॥

ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम् । तद्वः श्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह ॥ २७ ॥

जो सबका आश्रय है, पुराण ( कूटस्थ ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है वह ( परब्रह्म परमात्मा ) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो । जो विद्वान् उसे जानते हैं, वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ० || इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९० ॥