महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 691–700

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700

पृष्ठ 691

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अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है । मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं ॥ २६ ॥

यो नः स्वर्गजितः सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत् ।

अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् ॥ २७ ॥

जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं राजा स महात्मा ह्यतीव स्वैर्दोहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः । त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे । शत्रुओंके लिये अजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे । उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपने सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमेंउत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २०३ श्लोक मिलाकर कुल ४८३ श्लोक हैं ) 20 * ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे ।

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः पूरुवंशका वर्णन जनमेजय उवाच

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पूरोर्वंशकरान् नृपान् ।

यद्वीर्यान् यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ॥ १ ॥

जनमेजय बोले- भगवन! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंका परिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितने थे? ॥ १ ॥

न ह्यस्मिन् शीलहीनो वा निर्वीर्यो वा नराधिपः ।

प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कथंचन ॥ २ ॥

मेरा विश्वास है कि इस वंशमें पहले कभी किसी प्रकार भी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ है, जो शीलरहित, बल - पराक्रमसे शून्य अथवा संतानहीन रहा हो ॥ २ ॥

तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् ।

चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ॥ ३ ॥

तपोधन! जो अपने सदाचारके लिये प्रसिद्ध और विवेकसम्पन्न थे, उन सभी पूरुवंशी राजाओंके चरित्रको मुझे विस्तारपूर्वक सुननेकी इच्छा है ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

पूरोर्वशधरान् वीराञ्छक्रप्रतिमतेजसः ।

भूरिद्रविणविक्रान्तान् सर्वलक्षणपूजितान् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा-जनमेजय! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा । पूरुके वंशमें उत्पन्न हुए वीर नरेश इन्द्रके समान तेजस्वी, अत्यन्त धनवान्, परम पराक्रमी तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे ( उन सबका परिचय देता हूँ) ॥ ४ ॥

प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः ।

पूरो: पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत् ततः ॥ ५ ॥

पूरुके पौष्टी नामक पत्नीके गर्भसे प्रवीर, ईश्वर तथा रौद्राश्व नामक तीन महारथी पुत्र हुए । इनमेंसे प्रवीर अपनी वंश -परम्पराको आगे बढ़ानेवाले हुए ॥ ५ ॥

मनस्युरभवत् तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः ।

पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ॥ ६ ॥

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प्रवीरके पुत्रका नाम मनस्यु था, जो शूरसेनीके पुत्र और शक्तिशाली थे । कमलके समान नेत्रवाले मनस्युने चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समस्त पृथ्वीका पालन किया ॥ ६ ॥

शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः ।

मनस्योरभवन् पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ॥ ७ ॥

मनस्युके सौवीरीके गर्भसे तीन पुत्र हुए-शक्त, संहनन और वाग्मी । वे सभी शूरवीर और महारथी थे ॥ ७ ||

अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः ।

रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः ॥ ८ ॥

यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः ।

सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः ॥ ९ ॥

पूरुके तीसरे पुत्र मनस्वी रौद्राश्वके मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे अन्वग्भानु आदि दस महाधनुर्धर पुत्र हुए, जो सभी यज्ञकर्ता, शूरवीर, संतानवान्, अनेक शास्त्रोंके विद्वान, सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा धर्मपरायण थे ॥ ८- ९ ॥

ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान् ।

स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः ॥ १० ॥

तेजेयुर्बलवान् धीमान् सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः ।

धर्मेयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः ॥ ११ ॥

( उन सबके नाम इस प्रकार हैं - ) ऋचेयु-, कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान् और बुद्धिमान् तेजेयु, इन्द्रके समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मेयु तथा दसवें देवतुल्य पराक्रमी संनतेयु ॥ १०-११ ॥

अनाधृष्टिरभूत् तेषां विद्वान् भुवि तथैकराट् ।

ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः ॥ १२ ॥

ऋचेयु जिनका एक नाम अनाधृष्टि भी है, अपने सब भाइयोंमें वैसे ही विद्वान् और

पराक्रमी हुए, जैसे देवताओंमें इन्द्र । वे भूमण्डलके चक्रवर्ती राजा थे ॥ १२ ॥

अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद् राजसूयाश्वमेधकृत् ।

मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः ॥ १३ ॥

अनाधृष्टिके पुत्रका नाम मतिनार था । राजा मतिनार राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करनेवाले एवं परम धर्मात्मा थे ॥ १३ ॥

मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः ।

तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः ॥ १४ ॥

राजन्! मतिनारके चार पुत्र हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी थे । उनके नाम ये हैं — तंसु, महान्, अतिरथ और अनुपम तेजस्वी द्रुह्यु ॥ १४ ॥

तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन् ।

पृष्ठ 694

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आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ॥ १५ ॥

इनमें महापराक्रमी तंसुने पौरव वंशका भार वहन करते हुए उज्ज्वल यशका उपार्जन किया और सारी पृथ्वीको जीत लिया ॥ १५ ॥

ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् ।

सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ॥ १६ ॥

पराक्रमी तंसुने ईलिन नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ था । उसने भी सारी पृथ्वी जीत ली थी ॥ १६ ॥

रथन्तर्यां सुतान् पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः ।

ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन् नृपान् ॥ १७ ॥

ईलिनने रथन्तरी नामवाली अपनी पत्नीके गर्भसे पंच महाभूतोंके समान दुष्यन्त आदि पाँच राजपुत्रोंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ १७ ॥

दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च ।

तेषां श्रेष्ठोऽभवद् राजा दुष्यन्तो जनमेजय ॥ १८ ॥

( उनके नाम ये हैं - ) दुष्यन्त, शूर, भीम, प्रवसु तथा वसु। जनमेजय! इनमें सबसे बड़े होनेके कारण दुष्यन्त राजा हुए ॥ १८ ॥

दुष्यन्ताद् भरतो जज्ञे विद्वाञ्छाकुन्तलो नृपः ।

तस्माद् भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः ॥ १ ९ ॥

दुष्यन्तसे विद्वान् राजा भरतका जन्म हुआ, जो शकुन्तलाके पुत्र थे । उन्हींसे भरतवंशका महान् यश फैला ॥ १ ९ ॥

भरतस्तिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् ।

नाभ्यनन्दत तान् राजा नानुरूपा ममेत्युत ॥ २० ॥

भरतने अपनी तीन रानियोंसे नौ पुत्र उत्पन्न किये । किंतु ' ये मेरे अनुरूप नहीं हैं ' ऐसा कहकर राजाने उन शिशुओंका अभिनन्दन नहीं किया ॥ २० ॥

ततस्तान् मातरः क्रुद्धाः पुत्रान् निन्युर्यमक्षयम् ।

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ॥ २१ ॥

तब उन शिशुओंकी माताओंने कुपित होकर उनको मार डाला । इससे महाराज भरतका वह पुत्रोत्पादन व्यर्थ हो गया ॥ २१ ॥

ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा ।

लेभे पुत्रं भरद्वाजाद् भुमन्युं नाम भारत ॥ २२ ॥

भारत! तब महाराज भरतने बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया और महर्षि भरद्वाजकी कृपासे एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम भुमन्यु था ॥ २२ ॥

ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः ।

भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २३ ॥

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भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर पौरवकुलका आनन्द बढ़ानेवाले भरतने अपनेको पुत्रवान् समझकर भुमन्युको युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ॥ २३ ॥

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत् सुतः ।

सुहोत्रश्च सुहोताच सुहविः सुयजुस्तथा ॥ २४ ॥

पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन् सुताः ।

तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ॥ २५ ॥

भुमन्युके दिविरथ नामक पुत्र हुआ । उसके सिवा सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु तथा ऋचीक भी भुमन्युके ही पुत्र थे । ये सब पुष्करिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । इन सब क्षत्रियोंमें

सुहोत्र ही ज्येष्ठ थे । अतः उन्हींको राज्य मिला ॥ २४-२५ ॥

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद् बहुभिः सवैः ।

सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ॥ २६ ॥

पूर्णां हस्तिगजाश्वैश्च बहुरत्नसमाकुलाम् ।

ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ॥ २७ ॥

हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् ।

सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ॥ २८ ॥

राजा सुहोत्रने राजसूय तथा अश्वमेध आदि अनेक यज्ञोंद्वारा यजन किया और समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका, जो हाथी -घोड़ोंसे परिपूर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न थी, उपभोग किया । जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजाका शासन कर रहे थे, उस समय सारी पृथ्वी हाथी, घोड़ों, रथ और मनुष्योंसे खचाखच भरी थी। उन पशु आदिके भारी भारसे पीड़ित होकर राजा सुहोत्रके शासनकालकी पृथ्वी मानो नीचे धँसी जाती थी ॥ २६— २८ ॥

चैत्ययूपाङ्किता चासीद् भूमिः शतसहस्रशः ।

प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत ॥ २९ ॥

उनके राज्यकी भूमि लाखों चैत्यों ( देव- मन्दिरों ) और यज्ञयूपोंसे चिह्नित दिखायी देती थी । सब लोग हृष्ट- पुष्ट होते थे । खेतीकी उपज अधिक हुआ करती थी । इस प्रकार उस राज्यकी पृथ्वी सदा ही अपने वैभवसे सुशोभित होती थी ॥ २ ९ ॥

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात् पृथिवीपतेः ।

अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ॥ ३० ॥

भारत! राजा सुहोत्रसे ऐक्ष्वाकीने अजमीढ, सुमीढ तथा पुरुमीढ नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३० ॥

अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन् वंशः प्रतिष्ठितः ।

षट् पुत्रान् सोऽप्यजनयत् तिसृषु स्त्रीषु भारत ॥ ३१ ॥

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उनमें अजमीढ ज्येष्ठ थे । उन्हींपर वंशकी मर्यादा टिकी हुई थी । जनमेजय! उन्होंने भी तीन स्त्रियोंके गर्भसे छः पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥

ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठिनौ ।

केशिन्यजनयज्जनुं सुतौ व्रजनरूपिणौ ॥ ३२ ॥

उनकी धूमिनी नामवाली स्त्रीने ऋक्षको, नीलीने दुष्यन्त और परमेष्ठीको तथा केशिनीने जह्नु, व्रजन तथा रूपिण इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३२ ॥

तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः ।

अन्वयाः कुशिका राजन् जह्नोरमिततेजसः ॥ ३३ ॥

इनमें दुष्यन्त और परमेष्ठीके सभी पुत्र पांचाल कहलाये । राजन्! अमिततेजस्वी जह्नुके वंशज कुशिक नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ३३ ॥

व्रजनरूपिणयोर्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम् ।

ऋक्षात् संवरणो जज्ञे राजन् वंशकरः सुतः ॥ ३४ ॥

व्रजन तथा रूपिणके ज्येष्ठ भाई ऋक्षको राजा कहा गया है । ऋक्षसे संवरणका जन्म हुआ । राजन्! वे वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्र थे ॥ ३४ ॥

आर्क्षे संवरणे राजन् प्रशासति वसुंधराम् ।

संक्षयः सुमहानासीत् प्रजानामिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥

जनमेजय! ऋक्षपुत्र संवरण जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय प्रजाका बहुत बड़ा संहार हुआ था, ऐसा हमने सुना है ॥ ३५ ॥

व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा ।

क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् ॥ ३६ ॥

इस तरह नाना प्रकारसे क्षय होनेके कारण वह सारा राज्य नष्ट- सा हो गया । सबको भूख, मृत्यु, अनावृष्टि और व्याधि आदिके कष्ट सताने लगे ॥ ३६ ॥

अभ्यघ्नन् भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च ।

चालयन् वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा ॥ ३७ ॥

अभ्ययात् तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तरसा महीम् ।

अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत् ॥ ३८ ॥

शत्रुओंकी सेनाएँ भरतवंशी योद्धाओंका नाश करने लगीं। पांचालनरेशने इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए चतुरंगिणी सेनाके साथ संवरणपर आक्रमण किया और उनकी सारी भूमि वेगपूर्वक जीतकर दस अक्षौहिणी सेनाओंद्वारा संवरणको भी युद्धमें परास्त कर दिया ॥ ३७-३८ ॥

ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः ।

राजा संवरणस्तस्मात् पलायत महाभयात् ॥ ३ ९ ॥

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तदनन्तर स्त्री, पुत्र, सुहृद् और मन्त्रियोंके साथ राजा संवरण महान् भयके कारण वहाँसे भाग चले ॥ ३ ९ ॥

सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसत् तदा ।

नदीविषयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः ॥ ४० ॥

उस समय उन्होंने सिंधु नामक महानदके तटवर्ती निकुंजमें, जो एक पर्वतके समीपसे लेकर नदीके तटतक फैला हुआ था, निवास किया ॥ ४० ॥

तत्रावसन् बहून् कालान् भारता दुर्गमाश्रिताः ।

तेषां निवसतां तत्र सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ४१ ॥

वहाँ उस दुर्गका आश्रय लेकर भरतवंशी क्षत्रिय बहुत वर्षोंतक टिके रहे । उन सबको वहाँ रहते हुए एक हजार वर्ष बीत गये ॥ ४१ ॥

अथाभ्यगच्छद् भरतान् वसिष्ठो भगवानृषिः ।

तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥ ४२ ॥

अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा ।

निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे ॥ ४३ ॥

तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा ।

पुरोहितो भवान् नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ॥ ४४ ॥

इसी समय उनके पास भगवान् महर्षि वसिष्ठ आये । उन्हें आया देख भरतवंशियोंने प्रयत्नपूर्वक उनकी अगवानी की और प्रणाम करके सबने उनके लिये अर्घ्य अर्पण किया । फिर उन तेजस्वी महर्षिको सत्कारपूर्वक अपना सर्वस्व समर्पण करके उत्तम आसनपर बिठाकर राजाने स्वयं उनका वरण करते हुए कहा– ' भगवन्! हम पुनः राज्यके लिये

प्रयत्न कर रहे हैं । आप हमारे पुरोहित हो जाइये ' ॥ ४२–४४ ॥

ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतान् प्रत्यपद्यत ।

अथाभ्यषिञ्चत् साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ॥ ४५ ॥

विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ।

भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत् पुरोत्तमम् ॥ ४६ ॥

तब ' बहुत अच्छा' कहकर वसिष्ठजीने भी भरतवंशियोंको अपनाया और समस्त भूमण्डलमें उत्कृष्ट पूरुवंशी संवरणको समस्त क्षत्रियोंके सम्राट्-पदपर अभिषिक्त कर दिया, ऐसा हमारे सुननेमें आया है । तत्पश्चात् महाराज संवरण, जहाँ प्राचीन भरतवंशी राजा रहते थे, उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करने लगे ॥ ४५-४६ ॥

पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः ।

ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः ॥ ४७ ॥

आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।

ततः संवरणात् सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 698

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फिर उन्होंने सब राजाओंको जीतकर उन्हें करद बना लिया । तदनन्तर वे महाबली नरेश अजमीढवंशी संवरण पुनः पृथ्वीका राज्य पाकर बहुत दक्षिणावाले बहुसंख्यक महायज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करने लगे । कुछ कालके पश्चात् सूर्यकन्या तपतीने संवरणके वीर्यसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४७-४८ ॥

राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे ।

तस्य नाम्नाभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलम् ॥ ४ ९ ॥

कुरुको धर्मज्ञ मानकर सम्पूर्ण प्रजावर्गके लोगोंने स्वयं उनका राजाके पदपर वरण किया । उन्हींके नामसे पृथ्वीपर कुरुजांगलदेश प्रसिद्ध हुआ ॥ ४ ९ ॥

कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः ।

अश्ववन्तमभिष्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम् ॥ ५० ॥

जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्यानुशुश्रुम ।

पञ्चैतान् वाहिनी पुत्रान् व्यजायत मनस्विनी ॥ ५१ ॥

उन महातपस्वी कुरुने अपनी तपस्याके बलसे कुरुक्षेत्रको पवित्र बना दिया । उनके पाँच पुत्र सुने गये हैं— अश्ववान्, अभिष्यन्त, चैत्ररथ, मुनि तथा सुप्रसिद्ध जनमेजय । इन पाँचों पुत्रोंको उनकी मनस्विनी पत्नी वाहिनीने जन्म दिया था ॥ ५०-५१ ॥

अविक्षितः परिक्षित् तु शबलाश्वस्तु वीर्यवान् ।

आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः ॥ ५२ ॥

उच्चैःश्रवा भङ्गकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः ।

एतेषामन्ववाये तु ख्यातास्ते कर्मजैर्गुणैः ।

जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः ॥ ५३ ॥

अश्ववान्का दूसरा नाम अविक्षित् था । उसके आठ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं —परिक्षित्, पराक्रमी शबलाश्व, आदिराज, विराज, महाबली शाल्मलि, उच्चैःश्रवा, भंगकार तथा आठवाँ जितारि । इनके वंशमें जनमेजय आदि अन्य सात महारथी भी हुए, जो अपने कर्मजनित गुणोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५२-५३ ॥

परिक्षितोऽभऽभवन् पुत्राः सर्वे धर्मार्थकोविदाः ।

कक्षसेनोग्रसेनौ तु चित्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ ५४ ॥

इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः ।

जनमेजयस्य तनया भुवि ख्याता महाबलाः ॥ ५५ ॥

धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्बाह्लीक एव च ।

निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली ॥ ५६ ॥

कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः ।

सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहिते रताः ॥ ५७ ॥

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परिक्षित्के सभी पुत्र धर्म और अर्थके ज्ञाता थे; जिनके नाम इस प्रकार हैं— कक्षसेन, उग्रसेन, पराक्रमी, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण और भीमसेन । जनमेजयके महाबली पुत्र भूमण्डलमें विख्यात थे । उनमें प्रथम पुत्रका नाम धृतराष्ट्र था । उनसे छोटे क्रमशः पाण्डु, बाह्लीक, महातेजस्वी निषध, बलवान् जाम्बूनद, कुण्डोदर, पदाति तथा वसाति थे । इनमें वसाति आठवाँ था । ये सभी धर्म और अर्थमें कुशल तथा समस्त प्राणियोंके हितमें संलग्न रहनेवाले थे ॥ ५४–५७ ॥

धृतराष्ट्रोऽथ राजाऽऽसीत् तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः ।

हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः ॥ ५८ ॥

हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ।

धृतराष्ट्रसुतानां तु त्रीनेतान् प्रथितान् भुवि ॥ ५ ९ ॥

प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत ।

प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ॥ ६० ॥

इनमें धृतराष्ट्र राजा हुए । उनके पुत्र कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ, कुण्डिन, हविःश्रवा, इन्द्राभ, भुमन्यु और अपराजित थे । भारत! इनके सिवा प्रतीप, धर्मनेत्र और सुनेत्र – ये तीन पुत्र और थे । धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें ये ही तीन इस भूतलपर अधिक विख्यात थे । इनमें भी

प्रतीपकी प्रसिद्धि अधिक थी । भूमण्डलमें उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था ॥ ५८

-६० ॥

प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ ।

देवापिः शान्तनुश्चैव बाह्लीकश्च महारथः ॥ ६१ ॥

देवापिश्च प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया ।

शान्तनुश्च महीं लेभे बाह्लीकश्च महारथः ॥ ६२ ॥

भरतश्रेष्ठ! प्रतीपके तीन पुत्र हुए - देवापि, शान्तनु और महारथी बाह्लीक । इनमेंसे देवापि धर्माचरणद्वारा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छासे वनको चले गये, इसलिये शान्तनु एवं महारथी बाह्लीकने इस पृथ्वीका राज्य प्राप्त किया ॥ ६१-६२ ॥

भरतस्यान्वये जाताः सत्त्ववन्तो नराधिपाः ।

देवर्षिकल्पा नृपते बहवो राजसत्तमाः ॥ ६३ ॥

राजन्! भरतके वंशमें सभी नरेश धैर्यवान् एवं शक्तिशाली थे । उस वंशमें बहुत - से श्रेष्ठ नृपतिगण देवर्षियोंके समान थे ॥ ६३ ॥

एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा महारथाः ।

जाता मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ॥ ६४ ॥

ऐसे ही और भी कितने ही देवतुल्य महारथी मनुवंशमें उत्पन्न हुए थे, जो महाराज पुरूरवाके वंशकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 700

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशवर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९ ४ ॥ * ऋचेयु, अन्वग्भानु और अनाधृष्टि एक ही व्यक्तिके नाम हैं ।