महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 701–710

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन जनमेजय उवाच

श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान् ।

उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन् राजानो मे परिश्रुताः ॥ १ ॥

जनमेजय बोले — ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे पूर्ववर्ती राजाओंकी उत्पत्तिका महान् वृत्तान्त सुना । इस पूरुवंशमें उत्पन्न हुए उदार राजाओंके नाम भी मैंने भलीभाँति सुन लिये ॥ १ ॥

किंतु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति ।

प्रीणात्यतो भवान् भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ॥ २ ॥

एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः ।

तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ॥ ३ ॥

परंतु संक्षेपसे कहा हुआ यह प्रिय आख्यान सुनकर मुझे पूर्णतः तृप्ति नहीं हो रही है । अतः आप पुनः विस्तारपूर्वक मुझसे इसी दिव्य कथाका वर्णन कीजिये । दक्ष प्रजापति और मनुसे लेकर उन सब राजाओंका पवित्र जन्म- प्रसंग किसको प्रसन्न नहीं करेगा? ॥ २-३ ॥

सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् ।

विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेषां यशः स्फीतमवस्थितम् ॥ ४ ॥

उत्तम धर्म और गुणोंके माहात्म्यसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ इन राजाओंका श्रेष्ठ और उज्ज्वल यश तीनों लोकोंमें व्याप्त हो रहा है ॥ ४ ॥

गुणप्रभाववीर्यौजः सत्त्वोत्साहवतामहम् ।

न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसम्मिताम् ॥ ५ ॥

ये सभी नरेश उत्तम गुण, प्रभाव, बल- पराक्रम, ओज, सत्त्व ( धैर्य ) और उत्साहसे सम्पन्न थे । इनकी कथा अमृतके समान मधुर है, उसे सुनते- सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छुतम् ।

प्रोच्यमानमिदं कृत्स्नं स्ववंशजननं शुभम् ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! पूर्वकालमें मैंने महर्षि कृष्णद्वैपायनके मुखसे जिसका भलीभाँति श्रवण किया था, वह सम्पूर्ण प्रसंग तुम्हें सुनाता हूँ। अपने वंशकी

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उत्पत्तिका वह शुभ वृत्तान्त सुनो ॥ ६ ॥

दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुर्मनो- रिला इलायाः पुरूरवाः पुरूरवस आयुरायुषो नहुषो नहुषाद् ययातिः; ययातेर्द्वे भार्ये बभूवतुः ॥ ७ ॥

उशनसो दुहिता देवयानी; वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ॥ ८ ॥

दक्षसे अदिति, अदितिसे विवस्वान ( सूर्य ), विवस्वान् से मनु, मनुसे इला, इलासे पुरूरवा, पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष और नहुषसे ययातिका जन्म हुआ । ययातिकी दो पत्नियाँ थीं पहली शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा दूसरी वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा ॥ ८ ॥

अत्रानुवंशश्लोको भवति—

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।

द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९ ॥

यहाँ उनके वंशका परिचय देनेवाला यह श्लोक कहा जाता है- देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु — ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ ९ ॥

तत्र यदोर्यादवाः; पूरोः पौरवाः ॥ १० ॥

इनमें यदुसे यादव और पूरुसे पौरव हुए ॥ १० ॥

पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम I तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम; यस्त्रीनश्वमेधानाजहार, विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ॥ ११ ॥

पूरुकी पत्नीका नाम कौसल्या था ( उसीको पौष्टी भी कहते हैं ) । उसके गर्भसे पूरुके जनमेजय नामक पुत्र हुआ ( इसीका दूसरा नाम प्रवीर है ); जिसने तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और विश्वजित् यज्ञ करके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया था ॥ ११ ॥

जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीम् । तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्; यः प्राचीं दिशं जिगाय यावत् सूर्योदयात्, ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ॥ १२ ॥

जनमेजयने मधुवंशकी कन्या अनन्ताके साथ विवाह किया था । उसके गर्भसे उनके प्राचिन्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । उसने उदयाचलसे लेकर सारी प्राची दिशाको एक ही दिनमें जीत लिया था; इसीलिये उसका नाम प्राचिन्वान् हुआ ॥ १२ ॥

प्राचिन्वान् खल्वश्मकीमुपयेमे यादवीम् । तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ॥ १३ ॥

प्राचिन्वान्ने यदुकुलकी कन्या अश्मकीको अपनी पत्नी बनाया । उसके गर्भसे उन्हें संयाति नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १३ ॥

संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे अहंयातिः ॥

१४ ॥

संयातिने दृषद्वान्की पुत्री वरांगीसे विवाह किया । उसके गर्भसे उन्हें अहंयाति नामक पुत्र हुआ ॥ १४ ॥

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अहंयातिः खलु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमतीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः || १५ ॥ अहंयातिने कृतवीर्यकुमारी भानुमतीको अपनी पत्नी बनाया । उसके गर्भसे अहंयातिके सार्वभौम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १५ ॥

सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दां नाम । तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे जयत्सेनो नाम ॥ १६ ॥

सार्वभौमने युद्धमें जीतकर केकयकुमारी सुनन्दाका अपहरण किया और उसीको अपनी पत्नी बनाया । उससे उनको जयत्सेन नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥

जयत्सेनो खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अवाचीनः ॥ १७ ॥

जयत्सेनने विदर्भराजकुमारी सुश्रवासे विवाह किया । उसके गर्भसे उनके अवाचीन नामक पुत्र हुआ ॥ १७ ॥

अवाचीनोऽपि वैदर्भीमपरामेवोपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहः ॥

१८ ॥

अवाचीनने भी विदर्भराजकुमारी मर्यादाके साथ विवाह किया, जो आगे बतायी जानेवाली देवातिथिकी पत्नीसे भिन्न थी । उसके गर्भसे उन्हें 'अरिह ' नामक पुत्र हुआ ॥ १८ ॥

अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः ॥ १ ९ ॥

अरिहने अंगदेशकी राजकुमारीसे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें महाभौम नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १ ९ ॥ महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञा नाम । तस्यामस्य जज्ञे अयुतनायी; यः पुरुषमेधानामयुतमानयत्, तेनास्यायुतनायित्वम् ॥ २० ॥

महाभौमने प्रसेनजित्की पुत्री सुयज्ञासे विवाह किया । उसके गर्भसे उन्हें अयुतनायी नामक पुत्र प्राप्त हुआ; जिसने दस हजार पुरुषमेध ' यज्ञ' किये । अयुत यज्ञोंका आनयन ( अनुष्ठान) करनेके कारण ही उनका नाम अयुतनायी हुआ ॥ २० ॥

अयुतनायी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अक्रोधनः ॥ २१ ॥

अयुतनायीने पृथुश्रवाकी पुत्री कामासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अक्रोधनका जन्म हुआ ॥ २१ ॥

स खलु कालिङ्गीं करम्भां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ॥ २२ ॥

अक्रोधनने कलिंगदेशकी राजकुमारी करम्भासे विवाह किया । जिसके गर्भसे उनके देवातिथि नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २२ ॥

देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहो नाम ॥ २३

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देवातिथिने विदेहराजकुमारी मर्यादासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अरिह नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २३ ॥

अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यां पुत्रमजीजनदृक्षम् ॥ २४ ॥

अरिहने अंगराजकुमारी सुदेवाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २४ ॥

ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम । तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादयामास ॥ २५ ॥

ऋक्षने तक्षककी पुत्री ज्वालाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे मतिनार नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २५ ॥

मतिनारः खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत् । समाप्ते च सत्रे सरस्वत्य - भिगम्य तं भर्तारं वरयामास । तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम ॥ २६ ॥

मतिनारने सरस्वतीके तटपर उत्तम गुणोंसे युक्त द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान किया । उसके समाप्त होनेपर सरस्वतीने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया । मतिनारने उसके गर्भसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ २६ ॥

अत्रानुवंशश्लोको भवति- तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् ।

ईलिनं जनयामास कालिंग्यां तंसुरात्मजम् ॥ २७ ॥

— यहाँ वंशपरम्पराका सूचक श्लोक इस प्रकार है- सरस्वतीने मतिनारसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया और तंसुने कलिंगराजकुमारीके गर्भसे ईलिन नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २७ ॥

ईलिनस्तु रथन्तर्या दुष्यन्ताद्यान् पञ्च पुत्रानजीजनत् ॥ २८ ॥

ईलिनने रथन्तरीके गर्भसे दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥ २८ ॥

दुष्यन्तः खलु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे भरतः ॥

२ ९ ॥

दुष्यन्तने विश्वामित्रकी पुत्री शकुन्तलाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे उनके पुत्र भरतका जन्म हुआ ॥ २ ९ ॥

अत्रानुवंशश्लोकौ भवतः-- भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।

भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥ ३० ॥

यहाँ वंशपरम्पराके सूचक दो श्लोक हैं— ‘ माता तो भाथी ( धौंकनी ) - के समान है । वास्तवमें पुत्र पिताका ही होता है; जिससे उसका जन्म होता है, वही उस बालकके रूपमें प्रकट होता है । दुष्यन्त! तुम अपने पुत्रका भरण- पोषण करो; शकुन्तलाका अपमान न करो ॥ ३० ॥

पृष्ठ 705

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रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ।

त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ ३१ ॥

‘ गर्भाधान करनेवाला पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है । नरदेव! पुत्र यमलोकसे पिताका उद्धार कर देता है। तुम्हीं इस गर्भके आधान करनेवाले हो । शकुन्तलाका कथन सत्य है ' ॥ ३१ ॥

ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतः खलु काशेयीमुपयेमे सार्वसेनीं सुनन्दां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ॥ ३२ ॥

आकाशवाणीने भरण- पोषणके लिये कहा था, इसलिये उस बालकका नाम भरत

हुआ। भरतने राजा सर्वसेनकी पुत्री सुनन्दासे विवाह किया । वह काशीकी राजकुमारी थी ।

उसके गर्भसे भरतके भुमन्यु नामक पुत्र हुआ ॥ ३२ ॥

भुमन्युः खलु दाशार्हीमुपयेमे विजयां नाम । तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ॥ ३३ ॥

भुमन्युने दशार्हकन्या विजयासे विवाह किया; जिसके गर्भसे सुहोत्रका जन्म हुआ ॥ ३३ ॥

सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णां नाम । तस्यामस्य जज्ञे हस्ती; य इदं

हास्तिनपुरं स्थापयामास । एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ॥ ३४ ॥

सुहोत्रने इक्ष्वाकुकुलकी कन्या सुवर्णासे विवाह किया । उसके गर्भसे उन्हें हस्ती नामक पुत्र हुआ; जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था । हस्तीके बसानेसे ही यह नगर ‘ हास्तिनपुर’ कहलाया ॥ ३४ ॥

हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयेमे यशोधरां नाम । तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ॥ ३५

|| हस्तीने त्रिगर्तराजकी पुत्री यशोधराके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे विकुण्ठन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३५ ॥

विकुण्ठनः खलु दाशार्हीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अजमीढो नाम ॥

३६ ॥

विकुण्ठनने दशार्हकुलकी कन्या सुदेवासे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें अजमीढ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ३६ ॥

अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यां गान्धार्यां विशालायामृक्षायां चेति ।

पृथक् पृथक् वंशधरा नृपतयः । तत्र वंशकरः संवरणः ॥ ३७ ॥

अजमीढके कैकेयी, गान्धारी, विशाला तथा ऋक्षासे एक सौ चौबीस पुत्र हुए । वे सब पृथक् - पृथक् वंशप्रवर्तक राजा हुए । इनमें राजा संवरण कुरुवंशके प्रवर्तक हुए ॥ ३७ ॥

संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ॥ ३८ ॥

संवरणने सूर्यकन्या तपतीसे विवाह किया; जिसके गर्भसे कुरुका जन्म हुआ ॥ ३८ ॥

कुरुः खलु दाशार्हीमुपयेमे शुभाङ्गीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे विदूरः ॥ ३ ९ ॥

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कुरुने दशार्हकुलकी कन्या शुभांगीसे विवाह किया । उसके गर्भसे विदूर नामक पुत्र हुआ ॥ ३ ९ ॥

विदूरस्तु माधवीमुपयेमे सम्प्रियां नाम । तस्या- मस्य जज्ञे अनश्वा नाम ॥ ४० ॥

विदूरने मधुवंशकी कन्या सम्प्रियासे विवाह किया; जिसके गर्भसे अनश्वा नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ४० ॥

अनश्वा खलु मागधीमुपयेमे अमृतां नाम । तस्यामस्य जज्ञे परिक्षित् ॥ ४१ ॥

अनश्वाने मगधराजकुमारी अमृताको अपनी पत्नी बनाया । उसके गर्भसे परिक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ४१ ॥

परिक्षित् खलु बाहुदामुपयेमे सुयशां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ॥ ४२ ॥

परिक्षित्ने बाहुदराजकी पुत्री सुयशाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे भीमसेन नामक पुत्र हुआ ॥ ४२ ॥

भीमसेनः खलु कैकेयीमुपयेमे कुमारीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे प्रतिश्रवा नाम ॥

४३ ॥

भीमसेनने केकयदेशकी राजकुमारी कुमारीको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे प्रतिश्रवाका जन्म हुआ ॥ ४३ ॥

प्रतिश्रवसः प्रतीपः खलु । शैब्यामुपयेमे सुनन्दां नाम । तस्यां पुत्रानुत्पादयामास देवापिं शान्तनुं बाह्लीकं चेति ॥ ४४ ॥

प्रतिश्रवासे प्रतीप उत्पन्न हुआ । उसने शिबि- देशकी राजकन्या सुनन्दासे विवाह किया और उसके गर्भसे देवापि, शान्तनु तथा बाह्लीक – इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ४४ ॥

देवापिः खलु बाल एवारण्यं विवेश । शान्तनुस्तु महीपालो बभूव ॥ ४५ ॥

देवापि बाल्यावस्थामें ही वनको चले गये, अतः शान्तनु राजा हुए ॥ ४५ ॥

अत्रानुवंशश्लोको भवति- यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते । पुनर्युवा च भवति तस्मात् तं शान्तनुं विदुः ॥ इति तदस्य शान्तनुत्वम् ॥ ४६ ॥

शान्तनुके विषयमें यह अनुवंशश्लोक उपलब्ध होता है- वे जिस - जिस बूढ़ेको अपने दोनों हाथोंसे छू देते थे, वह बड़े सुख और शान्तिका अनुभव करता था तथा पुनः नौजवान हो जाता था । इसीलिये लोग उन्हें शान्तनुके रूपमें जानने लगे । यही उनके शान्तनु नाम पड़नेका कारण हुआ ॥ ४६ ॥

शान्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवव्रतो नामः यमाहुर्भीष्ममिति ॥ ४७ ॥

शान्तनुने भागीरथी गंगाको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे उन्हें देवव्रत नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसे लोग ' भीष्म ' कहते हैं ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 707

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प्रियचिकीर्षया सत्यवतीं मातरमुदवाहयत्; भीष्मः खलु पितुः यामाहुर्गन्धकालीति ॥ ४८ ॥

भीष्मने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके साथ माता सत्यवतीका विवाह कराया; जिसे गन्धकाली भी कहते हैं ॥ ४८ ॥

तस्यां पूर्वं कानीनो गर्भः पराशराद् द्वैपायनोऽभवत् । तस्यामेव शान्तनोरन्यौ द्वौ पुत्रौ बभूवतुः ॥ ४ ९ ॥ सत्यवतीके गर्भसे पहले कन्यावस्थामें महर्षि पराशरसे द्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे । फिर उसी सत्यवतीके राजा शान्तनुद्वारा दो पुत्र और हुए ॥ ४ ९ ॥ विचित्रवीर्यश्चित्राङ्गदश्च । तयोरप्राप्तयौवन एव चित्राङ्गदो गन्धर्वेण हतः; विचित्रवीर्यस्तु राजाऽऽसीत् ॥ ५० ॥

जिनका नाम था, विचित्रवीर्य और चित्रांगद | उनमेंसे चित्रांगद युवावस्थामें पदार्पण करनेसे पहले ही एक गन्धर्वके द्वारा मारे गये; परंतु विचित्रवीर्य राजा हुए ॥ ५० ॥

विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजे अम्बिकाम्बालिके काशिराजदुहितरावुपयेमे ॥ ५१ ॥ विचित्रवीर्यने अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया । वे दोनों काशिराजकी पुत्रियाँ थीं और उनकी माताका नाम कौसल्या था ॥ ५१ ॥

विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः । ततः सत्यवत्यचिन्तयन्मा दौष्यन्तो वंश उच्छेदं व्रजेदिति ॥ ५२ ॥

विचित्रवीर्यके अभी कोई संतान नहीं हुई थी, तभी उनका देहावसान हो गया । तब सत्यवतीको यह चिन्ता हुई कि ' राजा दुष्यन्तका यह वंश नष्ट न हो जाय ' ॥ ५२ ॥

सा द्वैपायनमृषिं मनसा चिन्तयामास । स तस्याः पुरतः स्थितः, किं करवाणीति ॥ ५३ ॥

उसने मन- ही- मन द्वैपायन महर्षि व्यासका चिन्तन किया । फिर तो व्यासजी उसके आगे प्रकट हो गये और बोले - ' क्या आज्ञा है? ' ॥ ५३ ॥

सा तमुवाच - भ्राता तवानपत्य एव स्वर्यातो विचित्रवीर्यः । साध्वपत्यं तस्योत्पादयेति ॥ ५४ ॥

सत्यवतीने उनसे कहा – ' बेटा! तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य संतानहीन अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गये । अतः उनके वंशकी रक्षाके लिये उत्तम संतान उत्पन्न करो ' ॥ ५४ ॥

स तथेत्युक्त्वा त्रीन् पुत्रानुत्पादयामास; धृतराष्ट्रं पाण्डुं विदुरं चेति ॥ ५५ ॥

- उन्होंने ‘ तथास्तु ' कहकर धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर–इन तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥

तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं बभूव गान्धार्यां वरदानाद् द्वैपायनस्य ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 708

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 708 का मूल पृष्ठ
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उनमेंसे राजा धृतराष्ट्रके गान्धारीके गर्भसे व्यासजीके दिये हुए वरदानके प्रभावसे सौ पुत्र हुए ॥ ५६ ॥

तेषां धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां चत्वारः प्रधाना बभूवुः; दुर्योधनो दुःशासनो विकर्णश्चित्रसेनश्चेति ॥ ५७ ॥

धृतराष्ट्रके उन सौ पुत्रोंमें चार प्रधान थे –दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण और चित्रसेन ॥ ५७ ॥

पाण्डोस्तु द्वे भार्ये बभूवतुः कुन्ती पृथा नाम माद्री च इत्युभे स्त्रीरत्ने ॥ ५८ ॥

पाण्डुकी दो पत्नियाँ थीं; कुन्तिभोजकी कन्या पृथा और माद्री । ये दोनों ही स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा थीं ॥ ५८ ॥

I अथ पाण्डुर्मृगयां चरन् मैथुनगतमृषिमपश्यन्मृग्यां वर्तमानम् तथैवाद्भुतमनासादितकामरसमतृप्तं च बाणेनाजघान ॥ ५ ९ ॥ एक दिन राजा पाण्डुने शिकार खेलते समय एक मृगरूपधारी ऋषिको मृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीके साथ मैथुन करते देखा । वह अद्भुत मृग अभी काम- रसका आस्वादन नहीं कर सका था । उसे अतृप्त अवस्थामें ही राजाने बाणसे मार दिया ॥ ५ ९ ॥ पाण्डुम्—चरता स बाणविद्ध उवाच धर्ममिमं येन त्वयाभिज्ञेन कामरसस्याहमनवाप्तकामरसो निहतस्तस्मात् त्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति । स विवर्णरूपस्तथा पाण्डुः शापं परिहरमाणो नोपासर्पत भार्ये । वाक्यं चोवाच - ॥ ६० ॥

बाणसे घायल होकर उस मुनिने पाण्डुसे कहा - ' राजन्! तुम भी इस मैथुन धर्मका आचरण करनेवाले तथा काम - रसके ज्ञाता हो, तो भी तुमने मुझे उस दशामें मारा है, जब कि मैं काम- रससे तृप्त नहीं हुआ था । इस कारण इसी अवस्थामें पहुँचकर काम - रसका आस्वादन करनेसे पहले ही शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाओगे । ' यह सुनकर राजा पाण्डु उदास हो गये और शापका परिहार करते हुए पत्नियोंके सहवाससे दूर रहने लगे । उन्होंने कहा— ॥ ६० || स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहं शृणोमि च नानपत्यस्य लोकाः सन्तीति । सा त्वं मदर्थे पुत्रानुत्पादयेति कुन्तीमुवाच । सा तथोक्ता पुत्रानुत्पादयामास । धर्माद् युधिष्ठिरं मारुताद् भीमसेनं शक्रादर्जुनमिति ॥ ६१ ॥

‘ देवियो! अपनी चपलताके कारण मुझे यह शाप मिला है । सुनता हूँ, संतानहीनको पुण्यलोक नहीं प्राप्त होते हैं । अतः तुम मेरे लिये पुत्र उत्पन्न करो। ' यह बात उन्होंने कुन्तीसे कही । उनके ऐसा कहनेपर कुन्तीने तीन पुत्र उत्पन्न किये - धर्मराजसे युधिष्ठिरको, वायुदेवसे भीमसेनको और इन्द्रसे अर्जुनको जन्म दिया ॥ ६१ ॥

तां संहृष्टः पाण्डुरुवाच—

पृष्ठ 709

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इयं ते सपत्न्यनपत्या; साध्वस्या अपत्यमुत्पाद्यतामिति । एवमस्त्विति कुन्ती तां विद्यां माद्रयाः प्रायच्छत् ॥ ६२ ॥

इससे पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने कुन्तीसे कहा – ' यह तुम्हारी सौत माद्री तो संतानहीन ही रह गयी, इसके गर्भसे भी सुन्दर संतान उत्पन्न होनेकी व्यवस्था करो । ' ‘ ऐसा ही हो' कहकर कुन्तीने अपनी वह विद्या (जिससे देवता आकृष्ट होकर चले आते थे ) माद्रीको भी दे दी ॥ ६२ ॥

माद्रयामश्विभ्यां नकुलसहदेवावुत्पादितौ ॥ ६३ ॥

माद्रीके गर्भसे अश्विनीकुमारोंने नकुल और सहदेवको उत्पन्न किया ॥ ६३ ॥

माद्रीं खल्वलंकृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे च तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वं प्राप्तः ॥ ६४ ॥

तत्रैनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारुरोह उवाच कुन्तीम्; यमयोरप्रमत्तया त्वया भवितव्यमिति ॥ ६५ ॥

एक दिन माद्रीको शृंगार किये देख पाण्डु उसके प्रति आसक्त हो गये और उसका स्पर्श होते ही उनका शरीर छूट गया । तदनन्तर वहाँ चिताकी आगमें स्थित पतिके शवके साथ माद्री चितापर आरूढ़ हो गयी और कुन्तीसे बोली- ' बहिन! मेरे जुड़वें बच्चोंके भी लालन-पालनमें तुम सदा सावधान रहना' ॥ ६४-६५ ॥ ततस्ते पाण्डवाः कुन्त्या सहिता हास्तिनपुर- मानीय तापसैर्भीष्मस्य च विदुरस्य च निवेदिताः । सर्ववर्णानां च निवेद्यान्तर्हितास्तापसा बभूवुः प्रेक्ष्य - माणानां तेषाम् ॥ ६६ ॥

इसके बाद तपस्वी मुनियोंने कुन्तीसहित पाण्डवोंको वनसे हस्तिनापुरमें लाकर भीष्म तथा विदुरजीको सौंप दिया । साथ ही समस्त प्रजावर्गके लोगोंको भी सारे समाचार बताकर वे तपस्वी उन सबके देखते - देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६६ ॥

तच्च वाक्यमुपश्रुत्य भगवतामन्तरिक्षात् पुष्पवृष्टिः पपात; देवदुन्दुभयश्च प्रणेदुः ॥ ६७ ॥

उन ऐश्वर्यशाली मुनियोंकी बात सुनकर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं ॥ ६७ ॥

प्रतिगृहीताश्च पाण्डवाः पितुर्निधनमावेदयन् तस्यौर्ध्वदेहिकं न्यायतश्च कृतवन्तः ।

तांस्तत्र निवसतः पाण्डवान् बाल्यात् प्रभृति दुर्योधनो नामर्षयत् ॥ ६८ ॥

भीष्म और धृतराष्ट्रके द्वारा अपना लिये जानेपर पाण्डवोंने उनसे अपने पिताकी मृत्युका समाचार बताया, तत्पश्चात् पिताकी और्ध्वदैहिक क्रियाको विधिपूर्वक सम्पन्न करके पाण्डव वहीं रहने लगे । दुर्योधनको बाल्यावस्थासे ही पाण्डवोंका साथ रहना सहन नहीं हुआ ॥ ६८ ॥

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च व्यवसितः; पापाचारो राक्षसीं बुद्धिमाश्रितोऽनेकैरुपायैरुद्धर्तुं भावित्वाच्चार्थस्य न शकितास्ते समुद्धर्तुम् ॥ ६ ९ ॥ पापाचारी दुर्योधन राक्षसी बुद्धिका आश्रय ले अनेक उपायोंसे पाण्डवोंकी जड़ उखाड़नेका प्रयत्न करता रहता था । परंतु जो होनेवाली बात है, वह होकर ही रहती है; इसलिये दुर्योधन आदि पाण्डवोंको नष्ट करनेमें सफल न हो सके ॥ ६ ९ ॥ ततश्च धृतराष्ट्रेण व्याजेन वारणावतमनुप्रेषिता गमनमरोचयन् ॥ ७० ॥

इसके बाद धृतराष्ट्रने किसी बहानेसे पाण्डवोंको जब वारणावत नगरमें जानेके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने वहाँसे जाना स्वीकार कर लिया ॥ ७० ॥

तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारब्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेनेति ॥ ७१ ॥

वहाँ भी उन्हें लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया गया; किंतु पाण्डवोंके विदुरजीकी सलाहके अनुसार काम करनेके कारण विरोधीलोग उनको दग्ध करनेमें समर्थ न हो सके ॥ ७१ ॥

तस्माच्च हिडिम्बमन्तरा हत्वा एकचक्रां गताः ॥ ७२ ॥

पाण्डव वारणावतसे अपनेको छिपाते हुए चल पड़े और मार्गमें हिडिम्ब राक्षसका वध करके वे एकचक्रा नगरीमें जा पहुँचे ॥ ७२ ॥

तस्यामप्येकचक्रायां बकं नाम राक्षसं हत्वा पाञ्चालनगरमधिगताः ॥ ७३ ॥

एकचक्रामें भी बक नामवाले राक्षसका संहार करके वे पांचाल नगरमें चले गये ॥ ७३ ॥

तत्र द्रौपदीं भार्यामविन्दन्, स्वविषयं चाभिजग्मुः ॥ ७४ ॥

वहाँ पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और फिर अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें लौट आये ॥ ७४ ॥

कुशलिनः पुत्रांश्चोत्पादयामासुः । प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः, सुतसोमं वृकोदरः, श्रुतकीर्तिमर्जुनः, शतानीकं नकुलः, श्रुतकर्माणं सहदेव इति ॥ ७५ ॥

वहाँ कुशलपूर्वक रहते हुए उन्होंने द्रौपदीसे पाँच पुत्र उत्पन्न किये । युधिष्ठिरने प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनने सुतसोमको, अर्जुनने श्रुतकीर्तिको, नकुलने शतानीकको और सहदेवने श्रुतकर्माको जन्म दिया ॥ ७५ ॥

युधिष्ठिरस्तु गोवासनस्य शैब्यस्य देविकां नाम कन्यां स्वयंवरे लेभे । तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ॥ ७६ ॥

भीमसेनोऽपि काश्यां बलन्धरां नामोपयेमे वीर्य- शुल्काम् । तस्यां पुत्रं सर्वगं नामोत्पादयामास ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिरने शिबिदेशके राजा गोवासनकी पुत्री देविकाको स्वयंवरमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे एक पुत्रको जन्म दिया; जिसका नाम यौधेय था । भीमसेनने भी काशिराजकी कन्या बलन्धराके साथ विवाह किया; उसे प्राप्त करनेके लिये बल एवं पराक्रमका शुल्क