महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 721–730
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730
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प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद् -ऋतुके शुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा । तदनन्तर दसवाँ मास प्राप्त होनेपर प्रतीपकी महारानीने एक देवोपम पुत्रको जन्म दिया, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था । उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ पूर्वोक्त राजा महाभिष ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनुः । शान्त पिताकी संतान होनेसे वे शान्तनु कहलाये ।
( तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत् प्रभुः ।
जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
शक्तिशाली राजा प्रतीपने उस बालकके आवश्यक कृत्य ( संस्कार ) करवाये । ब्राह्मण पुरोहितने वेदोक्त क्रियाओंद्वारा उसके जात - कर्म आदि सम्पन्न किये ।
नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ।
शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
जनमेजय! तदनन्तर बहुत - से ब्राह्मणोंने मिलकर वेदोक्त विधियोंके अनुसार शान्तनुका नामकरण - संस्कार भी किया ।
ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकपालकः ।
स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मविदां वरः ॥
धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः । यौवनं चापि सम्प्राप्तः कुमारो वदतां वरः ॥ ) तत्पश्चात् बड़े होनेपर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षाका कार्य करने लगे । वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे । उन्होंने धनुर्वेदमें उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनमें भी ऊँची स्थिति प्राप्त की ।
वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ वे राजकुमार धीरे- धीरे युवावस्थामें पहुँच गये ।
संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान् विजातान् स्वेन कर्मणा ॥ १ ९ ॥
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।
प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥ २० ॥
अपने सत्कर्मोंद्वारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकोंका स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानमें ही लगे रहते थे। युवावस्थामें पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनुको राजा प्रतीपने आदेश दिया— ॥ १ ९ -२० ॥
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव ।
त्वामाव्रजेद् यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ॥
कामयानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया ।
सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ॥ २२ ॥
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‘ शान्तनो! पूर्वकालमें मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी । उसका आगमन तुम्हारे कल्याणके लिये ही हुआ था । बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्तमें तुम्हारे पास आवे, तुम्हारे प्रति कामभावसे युक्त हो और तुमसे पुत्र पानेकी इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तम रूपसे सुशोभित उस दिव्य नारीसे ' अंगने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इत्यादि प्रश्न न करना ॥ २१-२२ ॥
यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ ।
मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ॥ २३ ॥
‘ अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये । यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना । ' ये बातें राजा प्रतीपने अपने पुत्रसे कहीं ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा ।
स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसी समय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ॥ २४ ॥
स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजसमद्युतिः ।
बभूव मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः ॥ २५ ॥
बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे । वे हिंसक पशुओंको मारनेके उद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे ॥ २५ ॥
स मृगान् महिषांश्चैव विनिघ्नन् राजसत्तमः ।
गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ॥ २६ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसोंको मारते हुए सिद्ध एवं चारणोंसे सेवित गंगाजीके तटपर अकेले ही विचरण करते थे ॥ २६ ॥
स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् ।
जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ॥ २७ ॥
महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो ॥ २७ ॥
सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् ।
सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ॥ २८ ॥
उसके सारे अंग परम सुन्दर और निर्दोष थे । दाँत तो और भी सुन्दर थे । वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी । उसके शरीरपर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमलके
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भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी, वह अकेली थी ॥ २८ ॥
तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद् विस्मितो रूपसम्पदा ।
पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ॥ २९ ॥
उसे देखते ही राजा शान्तनुके शरीरमें रोमांच हो आया, वे उसकी रूप - सम्पत्तिसे आश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रोंद्वारा उसकी सौन्दर्य-सुधाका पान करते हुए - से तृप्त नहीं होते थे ॥ २ ९ ॥
सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् ।
स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ॥ ३० ॥
वह भी वहाँ विचरते हुए महातेजस्वी राजा शान्तनुको देखते ही मुग्ध हो गयी । स्नेहवश उसके हृदयमें सौहार्दका उदय हो आया । वह विलासिनी राजाको देखते- देखते तृप्त नहीं होती थी ॥ ३० ॥
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्शलक्ष्णया गिरा ।
देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सराः ॥ ३१ ॥
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे ।
याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥ ३२ ॥
तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें बोले – ' सुमध्यमे! तुम देवी, दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ; देवकन्याके समान सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी हो जाओ' ॥ ३१-३२ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शान्तनूपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं )
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अष्टनवतितमोऽध्यायः शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च । ( यशस्विनी च साऽऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा । सा च दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम् ॥ ) वसूनां समयं स्मृत्वाथाभ्यगच्छदनिन्दिता ॥ १ ॥
(प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम् ।
प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृप ॥
कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता । )
उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा ।
भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा शान्तनुका मधुर मुसकानयुक्त मनोहर वचन सुनकर यशस्विनी गंगा उनकी ऐश्वर्य- वृद्धिके लिये उनके पास आयीं । तटपर विचरते हुए उन नृपश्रेष्ठको देखकर सती साध्वी गंगाको वसुओंको दिये हुए वचनका स्मरण हो आया । साथ ही राजा प्रतीपकी बात भी याद आ गयी । तब यही उपयुक्त समय है, ऐसा मानकर वसुओंको मिले हुए शापसे प्रेरित हो वे स्वयं संतानोत्पादनकी इच्छासे पृथ्वीपति महाराज शान्तनुके समीप चली आयीं और अपनी मधुर वाणीसे महाराजके मनको आनन्द प्रदान करती हुई बोलीं- ' भूपाल! मैं आपकी महारानी बनूँगी एवं आपके अधीन रहूँगी ॥ १-२ ॥
यत् तु कुर्यामहं राजञ्छुभं वा यदि वाशुभम् ।
न तद् वारयितव्यास्मि न वक्तव्या तथाप्रियम् ॥ ३ ॥
' ( परंतु एक शर्त है— ) राजन्! मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूँ, उसके लिये आपको मुझे नहीं रोकना चाहिये और मुझसे कभी अप्रिय वचन भी नहीं कहना चाहिये ॥ ३ ॥
एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव ।
वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ॥ ४ ॥
' पृथ्वीपते! ऐसा बर्ताव करनेपर ही मैं आपके समीप रहूँगी । यदि आपने कभी मुझे किसी कार्यसे रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपका साथ छोड़ दूँगी ' ॥ ४ ॥
तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम ।
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प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय बहुत अच्छा कहकर राजाने जब उसकी शर्त मान ली, तब उन नृपश्रेष्ठको पतिरूपमें प्राप्त करके उस देवीको अनुपम आनन्द मिला ॥ ५ ॥
(रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह । सा च शान्तनुमभ्यागात् साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा ॥ ) तब राजा शान्तनु देवी गंगाको रथपर बिठाकर उनके साथ अपनी राजधानीको चले गये । साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुशोभित होनेवाली गंगादेवी शान्तनुके साथ गयीं ।
आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी ।
न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान् ॥ ६ ॥
इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले राजा शान्तनु उस देवीको पाकर उसका इच्छानुसार उपभोग करने लगे । पिताका यह आदेश था कि उससे कुछ पूछना मत; अतः उनकी आज्ञा मानकर राजाने उससे कोई बात नहीं पूछी ॥ ६ ॥
स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च ।
उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः ॥ ७ ॥
उसके उत्तम शील- स्वभाव, सदाचार, रूप, उदारता, सद्गुण तथा एकान्त सेवासे महाराज शान्तनु बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ ७ ॥
दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी ।
मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ॥ ८ ॥
भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताभवत् ।
शान्तनोर्नपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ॥ ९ ॥
त्रिपथगामिनी दिव्यरूपिणी देवी गंगा ही अत्यन्त सुन्दर मनुष्य देह धारण करके देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी नृपशिरोमणि महाराज शान्तनुको, जिन्हें भाग्यसे इच्छानुसार सुख अपने - आप मिल रहा था, सुन्दरी पत्नीके रूपमें प्राप्त हुई थीं ॥ ८ - ९ ॥
सम्भोगस्नेहचातुर्यैर्हावभावसमन्वितैः ।
राजानं रमयामास यथा रेमे तथैव सः ॥ १० ॥
गंगादेवी हाव - भावसे युक्त सम्भोग-चातुरी और प्रणय- चातुरीसे राजाको जैसे - जैसे रमातीं, उसी उसी प्रकार वे उनके साथ रमण करते थे ॥ १० ॥
स राजा रतिसक्तत्वादुत्तमस्त्रीगुणैर्हृतः ।
संवत्सरानृतून् मासान् बुबुधे न बहून् गतान् ॥ ११ ॥
उस दिव्य नारीके उत्तम गुणोंने उनके चित्तको चुरा लिया था; अतः वे राजा उसके साथ रति - भोगमें आसक्त हो गये। | कितने ही वर्ष, ऋतु और मास व्यतीत हो गये, किंतु उसमें आसक्त होनेके कारण राजाको कुछ पता न चला ॥ ११ ॥
रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वरः ।
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अष्टावजनयत् पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् ॥ १२ ॥
उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शान्तनुने उसके गर्भसे देवताओंके समान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १२ ॥
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत ।
प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमज्जयत् ॥ १३ ॥
भारत! जो - जो पुत्र उत्पन्न होता, उसे वह गंगाजीके जलमें फेंक देती और कहती —— ( वत्स! इस प्रकार शापसे मुक्त करके ) मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूँ। ' ऐसा कहकर गंगा प्रत्येक बालकको धारामें डुबो देती थी ॥ १३ ॥
तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत् तदा ।
न च तां किंचनोवाच त्यागाद् भीतो महीपतिः ॥ १४ ॥
पत्नीका यह व्यवहार राजा शान्तनुको अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समय उससे कुछ नहीं कहते थे । राजाको यह डर बना हुआ था कि कहीं यह मुझे छोड़कर चली न जाय ॥ १४ ॥
अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव ।
उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन् पुत्रमात्मनः ॥ १५ ॥
तदनन्तर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हँसती हुई- सी अपनी स्त्रीसे राजाने अपने पुत्रका प्राण बचानेकी इच्छासे दुःखातुर होकर कहा— ॥ १५ ॥
मा वधीः कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति ।
पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुगर्हितम् ॥ १६ ॥
‘ अरी! इस बालकका वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटोंको मारे डालती है। पुत्रघातिनि! तुझे पुत्रहत्याका यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगा है ' ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच
पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर ।
जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ॥ १७ ॥
स्त्री बोली – पुत्रकी इच्छा रखनेवाले नरेश! तुम पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हो । मैं तुम्हारे इस पुत्रको नहीं मारूँगी; परंतु यहाँ मेरे रहनेका समय अब समाप्त हो गया; जैसी कि पहले ही शर्त हो चुकी है ॥ १७ ॥
अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता ।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमुषिताहं त्वया सह ॥ १८ ॥
मैं जह्नकी पुत्री और महर्षियोंद्वारा सेवित गंगा हूँ। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम्हारे साथ रह रही थी ॥ १८ ॥
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इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः ।
वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ॥ १ ९ ॥
ये तुम्हारे आठ पुत्र महातेजस्वी महाभाग वसु देवता हैं । वसिष्ठजीके शाप - दोषसे ये मनुष्य- योनिमें आये थे ॥ १ ९ ॥
तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते ।
मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ॥ २० ॥
तुम्हारे सिवा दूसरा कोई राजा इस पृथ्वीपर ऐसा नहीं था, जो उन वसुओंका जनक हो सके । इसी प्रकार इस जगत् में मेरी जैसी दूसरी कोई मानवी नहीं है, जो उन्हें गर्भमें धारण कर सके ॥ २० ॥
तस्मात् तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता ।
जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाक्षयाः ॥ २१ ॥
अतः इन वसुओंकी जननी होनेके लिये मैं मानवशरीर धारण करके आयी थी । राजन्! तुमने आठ वसुओंको जन्म देकर अक्षय लोक जीत लिये हैं ॥ २१ ॥
देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया ।
जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ॥ २२ ॥
वसु देवताओंकी यह शर्त थी और मैंने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो- जो वसु जन्म लेगा, उसे मैं जन्मते ही मनुष्य- योनिसे छुटकारा दिला दूँगी ॥ २२ ॥
तत् ते शापाद् विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ॥ २३ ॥
इसलिये अब वे वसु महात्मा आपव ( वसिष्ठ ) - केशापसे मुक्त हो चुके हैं । तुम्हारा
कल्याण हो, अब मैं जाऊँगी । तुम इस महान् व्रतधारी पुत्रका पालन करो ॥ २३ ॥
( अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः । सम्भूतोऽति जनानन्यान् भविष्यति न संशयः ॥ ) यह तुम्हारा पुत्र सब वसुओंके पराक्रमसे सम्पन्न होकर अपने कुलका आनन्द बढ़ानेके लिये प्रकट हुआ है । इसमें संदेह नहीं कि यह बालक बल और पराक्रममें दूसरे सब लोगोंसे बढ़कर होगा ।
एष पर्यायवासो मे वसूनां संनिधौ कृतः ।
मत्प्रसूतिं विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ॥ २४ ॥
यह बालक वसुओंमेंसे प्रत्येकके एक- एक अंशका आश्रय है- सम्पूर्ण वसुओंके अंशसे इसकी उत्पत्ति हुई है । मैंने तुम्हारे लिये वसुओंके समीप प्रार्थना की थी कि ‘ राजाका एक पुत्र जीवित रहे ' । इसे मेरा बालक समझना और इसका नाम ' गंगादत्त' रखना ॥ २४ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मोत्पत्तावष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्मोत्पत्तिविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल २८३ श्लोक हैं )
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नवनवतितमोऽध्यायः महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा शान्तनुरुवाच
आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् ।
यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ॥ १ ॥
शान्तनुने पूछा — देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपवके शापसे उन सबको मनुष्य योनिमें आना पड़ा ॥ १ ॥
अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् ।
यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ॥ २ ॥
और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोकमें निवास करेगा ॥ २ ॥
ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् ।
मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ॥ ३ ॥
जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए? यह सब बात मुझे बताओ ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् ।
भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - नरश्रेष्ठ जनमेजय! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकार पूछनेपर जह्नुपुत्री गंगादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
गङ्गोवाच
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम ।
वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ॥ ५ ॥
गंगा बोलीं- भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही ' आपव ' नामसे विख्यात हैं ॥ ५ ॥
तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् ।
मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥ ६ ॥
गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है । सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ६ ॥
स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम ।
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वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ॥ ७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ॥ ७ ॥
दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता ।
गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ॥ ८ ॥
महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ॥ ८ ॥
अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा ।
तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥ ९ ॥
वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी । वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ॥ ९ ॥
सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते ।
चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥ १० ॥
वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ॥ १० ॥
अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ ।
पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ॥ ११ ॥
ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः ।
रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १२ ॥
वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ॥ १२ ॥
तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम ।
संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ॥ १३ ॥
इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ॥ १३ ॥
नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् ।
सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ॥ १४ ॥
राजेन्द्र! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवालोंमें उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्तिसे वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ॥ १४ ॥
द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण ।