श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 711–720

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720

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रखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह कर सकता है । भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वग था ॥ ७६-७७ ॥ अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीं भार्यामुदावहत् । स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली । तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीव गुणसम्पन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ॥ ७८ ॥

अर्जुनने द्वारकामें जाकर मंगलमय वचन बोलनेवाली वासुदेवकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसे लेकर कुशलपूर्वक अपनी राजधानीमें चले आये वहाँ उसके गर्भसे अत्यन्त गुणसम्पन्न अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया; जो वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय था ॥ ७८ ॥

नकुलस्तु चैद्यां करेणुमतीं नाम भार्यामुदावहत् । तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनयत् ॥ ७९ ॥

नकुलने चेदिनरेशकी पुत्री करेणुमतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे निरमित्र नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ७ ९ ॥ सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयेमे मद्रराजस्य द्युतिमतो दुहितरम् । तस्यां पुत्रमजनयत् सुहोत्रं नाम ॥ ८० ॥

सहदेवने भी मद्रदेशकी राजकुमारी विजयाको स्वयंवरमें प्राप्त किया । वह मद्रराज द्युतिमान्की पुत्री थी । उसके गर्भसे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ८० ॥

भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ८१ ॥

भीमसेनने पहले ही हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कच नामक राक्षसजातीय पुत्रको उत्पन्न किया ॥ ८१ ॥

इत्येत एकादश पाण्डवानां पुत्राः । तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार ये पाण्डवोंके ग्यारह पुत्र हुए । इनमेंसे अभिमन्युका ही वंश चला ॥ ८२ ॥

स विराटस्य दुहितरमुपयेमे उत्तरां नाम । तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत् । तमुत्सङ्गेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात् पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य षाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवयिष्यामीति ॥ ८३ ॥

अभिमन्युने विराटकी पुत्री उत्तराके साथ विवाह किया था । उसके गर्भसे अभिमन्युके एक पुत्र हुआ; जो मरा हुआ था । पुरुषोतम भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे कुन्तीने उसे अपनी गोदमें ले लिया । उन्होंने यह आश्वासन दिया कि छः महीनेके इस मरे हुए बालकको मैं जीवित कर दूँगा ॥ ८३ ॥

स भगवता वासुदेवेनासंजातबलवीर्य - पराक्रमोऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितः 1। जीवयित्वा चैनमुवाच - परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परिक्षिन्नामेति ॥ ८४ ॥

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परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे त्वन्मातरम् । तस्यां भवान् जनमेजयः ॥ ८५

|| अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे झुलसकर वह असमयमें ( समयसे पहले ) ही पैदा हो गया था । उसमें बल, वीर्य और पराक्रम नहीं था । परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपने तेजसे जीवित कर दिया । इसको जीवित करके वे इस प्रकार बोले- ' इस कुलके परिक्षीण ( नष्ट ) होनेपर इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परिक्षित् नामसे विख्यात हो ' । परिक्षित्ने तुम्हारी माता माद्रवतीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे तुम जनमेजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ८४-८५ ॥ भवतो वपुष्टमायां द्वौ पुत्रौ जज्ञाते; शतानीकः शङ्कुकर्णश्च । शतानीकस्य वैदेह्यां पुत्र उत्पन्नोऽश्वमेधदत्त इति ॥ ८६ ॥

तुम्हारी पत्नी वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए हैं - शतानीक और शंकुकर्ण । शतानीककी पत्नी विदेहराजकुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रका नाम है अश्वमेधदत्त ॥ ८६ ॥

एष पूरोर्वंशः पाण्डवानां च कीर्तितः; धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्यो ब्राह्मणैर्नियम - वद्भिरनन्तरं क्षत्रियैः स्वधर्मनिरतैः प्रजापालन - तत्परैर्वैश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्रैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति ॥ ८७ ॥

यह पूरु तथा पाण्डवोंके वंशका वर्णन किया गया; जो धन और पुण्यकी प्राप्ति करानेवाला एवं परम पवित्र है, नियमपरायण ब्राह्मणों, अपने धर्ममें स्थित प्रजापालक क्षत्रियों, वैश्यों तथा तीनों वर्णोंकी सेवा करनेवाले श्रद्धालु शूद्रोंको भी सदा इसका श्रवण एवं स्वाध्याय करना चाहिये ॥ ८७ ॥

इतिहासमिमं पुण्यमशेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराः श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेद- परास्तेऽपि स्वर्गजितः पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः सम्पूज्याश्च ॥ ८८ ॥

जो पुण्यात्मा मनुष्य मनको वशमें करके ईर्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभावको रखते हुए वेदपरायण हो इस सम्पूर्ण पुण्यमय इतिहासको सुनावेंगे अथवा सुनेंगे वे स्वर्गलोकके अधिकारी होंगे और देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्योंके लिये सदैव आदरणीय तथा पूजनीय होंगे ॥ ८८ ॥

परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधाना अमत्सरा मैत्रा वेदसम्पन्नाः श्रोष्यन्ति, तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृते भवन्ति ॥ ८ ९ ॥ जो ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग मात्सर्यरहित, मैत्रीभावसे संयुक्त और वेदाध्ययनसे सम्पन्न हो श्रद्धापूर्वक भगवान् व्यासके द्वारा कहे हुए इस परम पावन महाभारत ग्रन्थको

पृष्ठ 713

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सुनेंगे, वे भी स्वर्गके अधिकारी और पुण्यात्मा होंगे तथा उनके लिये इस बातका शोक नहीं रह जायगा कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ॥ ८ ९ ॥

भवति चात्र श्लोकः- इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।

धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ॥ ९ ० ॥

इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है- ‘यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र, उत्तम तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। मनको वशमें रखनेवाले साधु पुरुषोंको सदैव इसका श्रवण करना चाहिये ' ॥ ९ ० ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशानुवर्णनविषयक पंचानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥

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षण्णवतितमोऽध्यायः महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत वैशम्पायन उवाच

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।

महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ॥ १ ॥

सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।

तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इश्वाकु वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे । उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ॥ १-२ ॥

ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।

तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥ ३ ॥

तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे । वहाँ बहुत-त- से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ॥ ३ ॥

अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात् पितामहम् ।

तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन शशिप्रभम् ॥ ४ ॥

इसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा ब्रह्माजीके समीप आयी । उस समय वायुके झोंकेसे उसके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपरकी ओर उठ गया ॥ ४ ॥

ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।

महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ॥ ५ ॥

यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षि महाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ॥ ५ ॥

सोऽपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः ।

उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ॥ ६ ॥

ययाऽऽहृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते ।

सा' ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ॥ ७ ॥

तब भगवान् ब्रह्माने महाभिषको शाप देते हुए कहा- 'दुर्मते! तुम मनुष्योंमें जन्म लेकर फिर पुण्यलोकोंमें आओगे । जिस गंगाने तुम्हारे चित्तको चुरा लिया है, वही

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मनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ॥ ६-७ ॥ यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे । ‘ जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे । ’ वैशम्पायन उवाच स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ॥ ८ ॥

प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् ।

महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ॥ ९ ॥

तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा ।

सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ॥ १० ॥

ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः ।

तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत -से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना —उन्हींको पसंद किया । महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही--मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी । मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा । उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था । वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे । उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा- ॥ ८–११ ॥

किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् ।

तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि । १२ ॥

अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना ।

विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ॥ १३ ॥

संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिसृताः पुरा ।

तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ॥ १४ ॥

तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंने गंगासे कहा— ‘ महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़े से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप दे दिया है । पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़ में संध्योपासना कर रहे थे, हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये ( और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया ) । इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि ' तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो ' ॥ १२– १४ ॥

न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।

त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान् - वसून् भुवि ॥ १५ ॥

पृष्ठ 716

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‘ उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न करो ॥ १५ ॥

न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे ।

इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ॥ १६ ॥

' शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोध किया है । ' वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी ' तथास्तु' कहकर यों बोलीं ॥ १६ ॥

गङ्गोवाच मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति । गंगाजीने कहा - वसुओ! मर्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगोंके पिता होंगे । वसव ऊचुः

प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः ।

भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ॥ १७ ॥

वसुगण बोले- प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे ।

मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ॥ १७ ॥

गङ्गोवाच

ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।

प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ॥ १८ ॥

गंगाजीने कहा - निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है । मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ॥ १८ ॥

वसव ऊचुः

जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि ।

यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ॥ १ ९ ॥

वसुगण बोले- तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसे जन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारा मर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ॥ १ ९ ॥ गङ्गोवाच एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् ।

पृष्ठ 717

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नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥

गंगाजीने कहा- ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २० ॥

वसव ऊचुः

तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् ।

तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥

वसुगण बोले- हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे । उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ॥ २१ ॥

न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु संततिः ।

तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥

किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी । अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेके साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ॥ २२ ॥

एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह ।

जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥

इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमेंमहाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ६ ॥

पृष्ठ 718

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सप्तनवतितमोऽध्यायः राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना वैशम्पायन उवाच

ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा ।

निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे । वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे । एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार ( हरिद्वार ) -में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ॥ १ ॥

तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी ।

उत्तीर्य सलिलात् तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ॥ २ ॥

अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी ।

दक्षिणं शालसंकाशमूरुं भेजे शुभानना ॥ ३ ॥

उस समय मनस्विनी गंगा सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त युवती स्त्रीका रूप धारण करके जलसे निकलीं और स्वाध्यायमें लगे हुए राजर्षि प्रतीपके शाल- जैसे विशाल दाहिने ऊरु ( जाँघ ) -पर जा बैठीं । उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवांगनाओंके समान था और मुख अत्यन्त मनोहर था ॥ २-३ ॥

प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् ।

करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ॥ ४ ॥

अपनी जाँघपर बैठी हुई उस यशस्विनी नारीसे राजा प्रतीपने पूछा — ' कल्याणि! मैं तुम्हारा कौन - सा प्रिय कार्य करूँ? तुम्हारी क्या इच्छा है? ' ॥ ४ ॥

स्त्र्युवाच

त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् ।

त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ॥ ५ ॥

स्त्री बोली- राजन्! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आप मुझे स्वीकार करें; क्योंकि कामके अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियोंका परित्याग साधु पुरुषोंने निन्दित माना है ॥ ५ ॥

प्रतीप उवाच

नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि ।

न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 719

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प्रतीपने कहा – सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं कर सकता । जो अपने वर्णकी न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता । कल्याणि! यह मेरा धर्मानुकूल व्रत है ॥ ६ ॥

स्त्र्युवाच

नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित् ।

भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ॥ ७ ॥

स्त्री बोली - राजन्! मैं अशुभ या अमंगल करनेवाली नहीं हूँ, समागमके अयोग्य भी नहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलंक लगावे । मैं आपके प्रति अनुरक्त

होकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ । अतः आप मुझे स्वीकार करें ॥ ७ ॥

प्रतीप उवाच

त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।

अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ॥ ८ ॥

प्रतीपने कहा – सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया । यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ॥ ८ ॥

प्राप्य दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने ।

अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम् ॥ ९ ॥

वरांगने! तुम मेरी दाहिनी जाँघपर आकर बैठी हो । भीरु! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि यह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधूका आसन है ॥ ९ ॥

सव्योरुः कामिनी भोग्यस्त्वया स च विवर्जितः ।

तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ॥ १० ॥

पुरुषकी बायीं जाँघ ही कामिनीके उपभोगके योग्य है; किंतु तुमने उसका त्याग कर दिया है । अतः वरांगने! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा ॥ १० ॥

स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् ।

स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ॥ ११ ॥

सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ । मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ; क्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकी है ॥ ११ ॥

स्त्र्युवाच

एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते ।

त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 720

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स्त्री बोली - धर्मज्ञ नरेश! आप जैसा कहते हैं, वैसा भी हो सकता है । मैं आपके पुत्रके साथ संयुक्त होऊँगी । आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, उसके कारण मैं विख्यात भरतवंशका सेवन करूँगी ॥ १२ ॥

पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् ।

गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ १३ ॥

पृथ्वीपर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं । सौ वर्षोंमें भी आपलोगोंके गुणोंका वर्णन मैं नहीं कर सकती ॥ १३ ॥

कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् ।

समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो ॥ १४ ॥

तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् ।

एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ॥ १५ ॥

पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः । आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ! मैं एक शर्तके साथ आपके पुत्रसे विवाह करूँगी । प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्रको स्वीकार होना चाहिये । वे उसके विषयमें कभी कुछ विचार न करें । इस शर्तपर रहती हुई मैं आपके पुत्रके प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी । मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रिय पुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्रको स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ॥ १४-१५३ ॥ वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्ता तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा प्रतीपने ' तथास्तु ' कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली । तत्पश्चात् वह वहीं अन्तर्धान हो गयी ॥ १६ ॥

पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत् ।

एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ॥ १७ ॥

तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन । इसके बाद पुत्रके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीपने उसकी बात याद रखी । कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नीको साथ लेकर पुत्रके लिये तपस्या करने लगे ॥ १७३ ॥

(प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत ।

श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी ॥

ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम् । कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा ॥ ) तयोः समभवत् पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषः ॥ १८ ॥