महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 81–90
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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ग्रन्थ महत्त्व, गौरव अथवा गम्भीरतामें वेदोंसे भी अधिक सिद्ध हुआ है ॥ २६ ९ -—२७३ ॥
महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २७४ ॥
अतएव महत्ता, भार अथवा गम्भीरताकी विशेषतासे ही इसको महाभारत कहते हैं । जो इस ग्रन्थके निर्वचनको जान लेता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ॥ २७४ ॥
तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः
स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः ।
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क- स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥ २७५ ॥
तपस्या निर्मल है, शास्त्रोंका अध्ययन भी निर्मल है, वर्णाश्रमके अनुसार स्वाभाविक वेदोक्त विधि भी निर्मल है और कष्टपूर्वक उपार्जन किया हुआ धन भी निर्मल है, किंतु वे ही सब विपरीत भावसे किये जानेपर पापमय हैं अर्थात् दूसरेके अनिष्टके लिये किया हुआ तप, शास्त्राध्ययन और वेदोक्त स्वाभाविक कर्म तथा क्लेशपूर्वक उपार्जित धन भी पापयुक्त हो जाता है । ( तात्पर्य यह कि इस ग्रन्थरत्नमें भावशुद्धिपर विशेष जोर दिया गया है; इसलिये महाभारत-ग्रन्थका अध्ययन करते समय भी भाव शुद्ध रखना चाहिये ) ॥ २७५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अनुक्रमणिकापर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अनुक्रमणिकापर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल २८२ श्लोक हैं ] ॥ अनुक्रमणिकापर्व सम्पूर्ण ॥ १. जय शब्दका अर्थ महाभारत नामक इतिहास ही है । आगे चलकर कहा है — ' जयो नामेतिहासोऽयम्’ इत्यादि । अथवा अठारहों पुराण, वाल्मीकिरामायण आदि सभी आर्ष-ग्रन्थोंकी संज्ञा ‘जय’ है । २. मंगलाचरणका श्लोक देखनेपर ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ नारायण शब्दका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्ण और नरोत्तम नरका अर्थ है नररत्न अर्जुन । महाभारतमें प्रायः सर्वत्र इन्हीं दोनोंका नर- नारायणके अवतारके रूपमें उल्लेख हुआ है । इससे मंगलाचरणमें ग्रन्थके इन दोनों प्रधान पात्र तथा भगवान्के मूर्ति-युगलको प्रणाम करना मंगलाचरणको नमस्कारात्मक होनेके साथ ही वस्तुनिर्देशात्मक भी बना देता है । इसलिये अनुवादमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका ही उल्लेख किया गया है ।
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३. नैमिषारण्य नामकी व्याख्या वाराहपुराणमें इस प्रकार मिलती है—
एवं कृत्वा ततो देवो मुनिं गौरमुखं तदा । उवाच निमिषेणेदं निहतं दानवं बलम् ॥
अरण्येऽस्मिंस्ततस्त्वेतन्नैमिषारण्यसंज्ञितम् । ऐसा करके भगवान्ने उस समय गौरमुख मुनिसे कहा- ' मैंने निमिषमात्रमें इस अरण्य ( वन) -के भीतर इस दानव - सेनाका संहार किया है; अतः यह वन नैमिषारण्यके नामसे प्रसिद्ध होगा । ' ४. जो विद्वान् ब्राह्मण अकेला ही दस सहस्र जिज्ञासु व्यक्तियोंका अन्न -दानादिके द्वारा भरण- पोषण करता है, उसे कुलपति कहते हैं । ५. जो कार्य अनेक व्यक्तियोंके सहयोगसे किया गया हो और जिसमें बहुतोंको ज्ञान, सदाचार आदिकी शिक्षा तथा अन्न-वस्त्रादि वस्तुएँ दी जाती हों, जो बहुतोंके लिये तृप्तिकारक एवं उपयोगी हो, उसे ' सत्र ’ कहते हैं । 3. ‘ तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्' ( तैत्तिरीय उपनिषद्) । ब्रह्मने अण्ड एवं पिण्डकी रचना करके मानो
स्वयं ही उसमें प्रवेश किया है ।
२. ऋषयः सप्त पूर्वे ये मनवश्च चतुर्दश । एते प्रजानां पतय एभिः कल्पः समाप्यते ॥
( नीलकण्ठीमें ब्रह्माण्डपुराणका वचन ) * यह और इसके बादका श्लोक महाभारतके तात्पर्यके सूचक हैं। दुर्योधन क्रोध है । यहाँ क्रोध शब्दसे द्वेष- असूया आदि दुर्गुण भी समझ लेने चाहिये । कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि उससे एकताको प्राप्त हैं, उसीके स्वरूप हैं । इन सबका मूल है राजा धृतराष्ट्र। यह अज्ञानी अपने मनको वशमें करनेमें असमर्थ है । इसीने पुत्रोंकी आसक्तिसे अंधे होकर दुर्योधनको अवसर दिया, जिससे उसकी जड़ मजबूत हो गयी । यदि यह दुर्योधनको वशमें कर लेता अथवा बचपनमें ही विदुर आदिकी बात मानकर इसका त्याग कर देता तो विष- दान, लाक्षागृहदाह, द्रौपदी - केशाकर्षण आदि दुष्कर्मोंका अवसर ही नहीं आता और कुलक्षय न होता । इस प्रसंगसे यह भाव सूचित किया गया है कि यह जो मन्यु ( दुर्योधन ) -रूप वृक्ष है, इसका दृढ़ अज्ञान ही मूल है, क्रोध- लोभादि स्कन्ध हैं, हिंसा -चोरी आदि शाखाएँ हैं और बन्धन- नरकादि इसके फल- पुष्प हैं । पुरुषार्थकामी पुरुषको मूलाज्ञानका उच्छेद करके पहले ही इस (क्रोधरूप) वृक्षको नष्ट कर देना चाहिये । *- युधिष्ठिर धर्म हैं । इसका अभिप्राय यह है कि वे शम, दम, सत्य, अहिंसा आदि रूप धर्मकी मूर्ति हैं । अर्जुन- भीम आदिको धर्मकी शाखा बतलानेका अभिप्राय यह है कि वे सब युधिष्ठिरके ही स्वरूप हैं, उनसे अभिन्न हैं । शुद्धसत्त्वमय ज्ञानविग्रह श्रीकृष्णरूप परमात्मा ही उसके मूल हैं । उनके दृढ़ ज्ञानसे ही धर्मकी नींव मजबूत होती है । श्रुति भगवतीने कहा है कि ' हे गार्गी! इस अविनाशी परमात्माको जाने बिना इस लोकमें जो हजारों वर्षपर्यन्त यज्ञ करता है, दान देता है, तपस्या करता है, उन सबका फल नाशवान् ही होता है । ' ज्ञानका मूल है ब्रह्म अर्थात् वेद । वेदसे ही परमधर्म योग और अपरधर्म यज्ञ -यागादिका ज्ञान होता है । यह निश्चित सिद्धान्त है कि धर्मका मूल केवल शब्दप्रमाण ही है । वेदके भी मूल ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे ही वेद- सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं । इस प्रकार उपदेशकके रूपमें ब्राह्मण, प्रमाणके रूपमें वेद और अनुग्राहकके रूपमें परमात्मा धर्मका मूल है । इससे यह बात सिद्ध हुई है कि वेद और ब्राह्मणका भक्त अधिकारी पुरुष भगवदाराधनके बलसे योगादिरूप धर्ममय वृक्षका सम्पादन करे। उस वृक्षके अहिंसा- सत्य आदि तने हैं । धारण- ध्यान आदि शाखाएँ हैं और तत्त्व- साक्षात्कार ही उसका फल है । इस धर्ममय वृक्षके समाश्रयसे ही पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं । * शास्त्रोक्त आचारका परित्याग न करना, सदाचारी सत्पुरुषोंका संग करना और सदाचारमें दृढ़तासे स्थित रहना — इसको ' शौच' कहते हैं । अपनी इच्छाके अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें विकार न होना ही ' धृति' है । सबसे बढ़कर सामर्थ्यका होना ही ' विक्रम ' है । सद्वृत्तकी अनुवृत्ति ही ' शुश्रूषा ' है । ( सदाचारपरायण गुरुजनोंका अनुसरण गुरुशुश्रूषा है । ) किसीके द्वारा अपराध बन जानेपर भी उसके प्रति अपने चित्तमें क्रोध आदि विकारोंका न होना ही ' क्षमाशीलता ' है । जितेन्द्रियता अथवा अनुद्धत रहना ही ‘ विनय' है । बलवान् शत्रुको भी पराजित कर देनेका अध्यवसाय ' शौर्य' है । इनके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—
आचारापरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः । आचारे च व्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ॥
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इष्टानिष्टार्थसम्पत्तौ चित्तस्याविकृतिर्धृतिः । सर्वातिशयसामर्थ्यं विक्रमं परिचक्षते ॥ वृत्तानुवृत्तिः शुश्रूषा क्षान्तिरागस्यविक्रिया । जितेन्द्रियत्वं विनयोऽथवानुद्धतशीलता ॥ शौर्यमध्यवसायः स्याद् बलिनोऽपि पराभवे ॥ * आचार्य, ब्रह्मा, ऋत्विक्, सदस्य, यजमान, यजमानपत्नी, धन- सम्पत्ति, श्रद्धा - उत्साह, विधानका सम्यक् पालन एवं सद्बुद्धि आदि यज्ञकी उत्तम गुणसामग्रीके अन्तर्गत हैं ।
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( पर्वसंग्रहपर्व) द्वितीयोऽध्यायः समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल ऋषय ऊचुः
समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन ।
एतत् सर्वं यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ १ ॥
ऋषि बोले- सूतनन्दन! आपने अपने प्रवचनके प्रारम्भमें जो समन्तपंचक ( कुरुक्षेत्र) -की चर्चा की थी, अब हम उस देश ( तथा वहाँ हुए युद्ध ) - के सम्बन्धमें पूर्णरूपसे सब कुछ यथावत् सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
सौतिरुवाच
शृणुध्वं मम भो विप्रा ब्रुवतश्च कथाः शुभाः ।
समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा — साधुशिरोमणि विप्रगण! अब मैं कल्याणदायिनी शुभ कथाएँ कह रहा हूँ; उसे आपलोग सावधान चित्तसे सुनिये और इसी प्रसंगमें समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन भी सुन लीजिये ॥ २ ॥
त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।
असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥ ३ ॥
त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने क्षत्रियोंके प्रति क्रोधसे प्रेरित होकर अनेकों बार क्षत्रिय राजाओंका संहार किया ॥ ३ ॥
स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रौधिरान् ह्रदान् ॥ ४ ॥
अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीने अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण क्षत्रियवंशका संहार करके समन्तपंचकक्षेत्रमें रक्तके पाँच सरोवर बना दिये ॥ ४ ॥
स तेषु रुधिराम्भःसु ह्रदेषु क्रोधमूर्च्छितः ।
पितॄन् संतर्पयामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥
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क्रोधसे आविष्ट होकर परशुरामजीने उन रक्तरूप जलसे भरे हुए सरोवरोंमें रक्ताञ्जलिके द्वारा अपने पितरोंका तर्पण किया, यह बात हमने सुनी है ॥ ५ ॥
अथर्चीकादयोऽभ्येत्य पितरो राममब्रुवन् ।
राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ ६ ॥
अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण तव प्रभो ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यमिच्छसि महाद्युते ॥ ७ ॥
तदनन्तर, ऋचीक आदि पितृगण परशुरामजीके पास आकर बोले — ' महाभाग राम! सामर्थ्यशाली भृगुवंशभूषण परशुराम!! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम बहुत ही प्रसन्न हैं । महाप्रतापी परशुराम! तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो हमसे माँग लो' ॥ ६-७ ॥ राम उवाच
यदि मे पितरः प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि ।
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ॥ ८ ॥
अतश्च पापान्मुच्येऽहमेष मे प्रार्थितो वरः ।
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः ॥ ९ ॥
परशुरामजीने कहा — यदि आप सब हमारे पितर मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे अपने अनुग्रहका पात्र समझते हैं तो मैंने जो क्रोधवश क्षत्रियवंशका विध्वंस किया है, इस कुकर्मके पापसे मैं मुक्त हो जाऊँ और ये मेरे बनाये हुए सरोवर पृथ्वीमें प्रसिद्ध तीर्थ हो जायँ । यही वर मैं आपलोगोंसे चाहता हूँ ॥ ८-९ ॥
एवं भविष्यतीत्येवं पितरस्तमथाब्रुवन् ।
तं क्षमस्वेति निषिषिधुस्ततः स विरराम ह ॥ १० ॥
तदनन्तर ' ऐसा ही होगा' यह कहकर पितरोंने वरदान दिया। साथ ही ' अब बचे - खुचे -क्षत्रियवंशको क्षमा कर दो' – ऐसा कहकर उन्हें क्षत्रियोंके संहारसे भी रोक दिया । इसके पश्चात् परशुरामजी शान्त हो गये ॥ १० ॥
तेषां समीपे यो देशो ह्रदानां रुधिराम्भसाम् ।
समन्तपञ्चकमिति पुण्यं तत् परिकीर्तितम् ॥ ११ ॥
उन रक्तसे भरे सरोवरोंके पास जो प्रदेश है उसे ही समन्तपंचक कहते हैं । यह क्षेत्र बहुत ही पुण्यप्रद है ॥ ११ ॥
न लिङ्गेन यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते ।
तेनैव नाम्ना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ॥ १२ ॥
जिस चिह्नसे जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानोंका कहना है कि उस देशका वही नाम रखना चाहिये ॥ १२ ॥
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अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् ।
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ १३ ॥
जब कलियुग और द्वापरकी सन्धिका समय आया, तब उसी समन्तपंचकक्षेत्रमें कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका परस्पर भीषण युद्ध हुआ ॥ १३ ॥
तस्मिन् परमधर्मिष्ठे देशे भूदोषवर्जिते ।
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ॥ १४ ॥
भूमिसम्बन्धी दोषोंसे रहित उस परम धार्मिक प्रदेशमें युद्ध करनेकी इच्छासे अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ इकट्ठी हुई थीं ॥ १४ ॥
समेत्य तं द्विजास्ताश्च तत्रैव निधनं गताः ।
एतन्नामाभिनिर्वृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः ॥ १५ ॥
ब्राह्मणो! वे सब सेनाएँ वहाँ इकट्ठी हुईं और वहीं नष्ट हो गयीं । द्विजवरो! इसीसे उस देशका नाम समन्तपंचक पड़ गया ॥ १५ ॥
पुण्यश्च रमणीयश्च स देशो वः प्रकीर्तितः ।
तदेतत् कथितं सर्वं मया ब्राह्मणसत्तमाः ।
यथा देशः स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु सुव्रताः ॥ १६ ॥
वह देश अत्यन्त पुण्यमय एवं रमणीय कहा गया है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तीनों लोकोंमें जिस प्रकार उस देशकी प्रसिद्धि हुई थी, वह सब मैंने आपलोगोंसे कह दिया ॥ १६ ॥
ऋषय ऊचुः
अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वया सूतनन्दन ।
एतदिच्छामहे श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ॥ १७ ॥
ऋषियोंने पूछा – सूतनन्दन! अभी- अभी आपने जो अक्षौहिणी शब्दका उच्चारण किया है, इसके सम्बन्धमें हमलोग सारी बातें यथार्थरूपसे सुनना चाहते हैं ॥ १७ ॥
अक्षौहिण्याः परीमाणं नराश्वरथदन्तिनाम् ।
यथावच्चैव नो ब्रूहि सर्वं हि विदितं तव ॥ १८ ॥
अक्षौहिणी सेनामें कितने पैदल, घोड़े, रथ और हाथी होते हैं? इसका हमें यथार्थ वर्णन सुनाइये; क्योंकि आपको सब कुछ ज्ञात है ॥ १८ ॥
सौतिरुवाच
एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातयः ।
त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीयते ॥ १ ९ ॥
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उग्रश्रवाजीने कहा –एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े — बस, इन्हींको सेनाके मर्मज्ञ विद्वानोंने ' पत्ति' कहा है ॥ १ ९ ॥
पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः ।
त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ २० ॥
इसी पत्तिकी तिगुनी संख्याको विद्वान् पुरुष ' सेनामुख ' कहते हैं। तीन ' सेनामुखों' को एक ' गुल्म ' कहा जाता है ॥ २० ॥
यो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रयः ।
स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ॥ २१ ॥
तीन गुल्मका एक 'गण' होता है, तीन गणकी एक 'वाहिनी' होती है और तीन वाहिनियोंको सेनाका रहस्य जाननेवाले विद्वानोंने ' पृतना ' कहा है ॥ २१ ॥
चमूस्तु पृतनास्तिस्रस्तिस्रश्चम्बस्त्वनीकिनी ।
अनीकिनीं दशगुणां प्राहुरक्षौहिणीं बुधाः ॥ २२ ॥
तीन पृतनाकी एक ‘ चमू', तीन चमूकी एक ' अनीकिनी' और दस अनीकिनीकी एक
‘ अक्षौहिणी’ होती है । यह विद्वानोंका कथन है ॥ २२ ॥
अक्षौहिण्याः प्रसंख्याता रथानां द्विजसत्तमाः ।
संख्या गणिततत्त्वज्ञैः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ २३ ॥
शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूयश्च सप्ततिः ।
गजानां च परीमाणमेतदेव विनिर्दिशेत् ॥ २४ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! गणितके तत्त्वज्ञ विद्वानोंने एक अक्षौहिणी सेनामें रथोंकी संख्या इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर ( २१,८७० ) बतलायी है । हाथियोंकी संख्या भी इतनी ही कहनी चाहिये ॥ २३-२४ ॥
ज्ञेयं शतसहस्रं तु सहस्राणि नवैव तु ।
नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघाः ॥ २५ ॥
निष्पाप ब्राह्मणो! एक अक्षौहिणीमें पैदल मनुष्योंकी संख्या एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास ( १,० ९, ३५० ) जाननी चाहिये ॥ २५ ॥
पञ्चषष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च ।
दशोत्तराणि षट् प्राहुर्यथावदिह संख्यया ॥ २६ ॥
एक अक्षौहिणी सेनामें, घोड़ोंकी ठीक -ठीक संख्या पैंसठ हजार छः सौ दस ( ६५,६१० ) कही गयी है ॥ २६ ॥
एतामक्षौहिणीं प्राहुः संख्यातत्त्वविदो जनाः ।
यां वः कथितवानस्मि विस्तरेण तपोधनाः ॥ २७ ॥
तपोधनो! संख्याका तत्त्व जाननेवाले विद्वानोंने इसीको अक्षौहिणी कहा है, जिसे मैंने आपलोगोंको विस्तारपूर्वक बताया है ॥ २७ ॥
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एतया संख्यया ह्यासन् कुरुपाण्डवसेनयोः ।
अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डिताष्टादशैव तु ॥ २८ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी गणनाके अनुसार कौरव - पाण्डव दोनों सेनाओंकी संख्या अठारह अक्षौहिणी थी ॥ २८ ॥
समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः ।
कौरवान् कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ॥ २ ९ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले कालकी प्रेरणासे समन्तपंचक क्षेत्रमें कौरवोंको निमित्त बनाकर इतनी सेनाएँ इकट्ठी हुईं और वहीं नाशको प्राप्त हो गयीं ॥ २ ९ ॥
अहानि युयुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रवित् ।
अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ॥ ३० ॥
अस्त्र- शस्त्रोंके सर्वोपरि मर्मज्ञ भीष्मपितामहने दस दिनोंतक युद्ध किया, आचार्य द्रोणने पाँच दिनोंतक कौरव सेनाकी रक्षा की ॥ ३० ॥
अहनी युयुधे द्वे तु कर्णः परबलार्दनः ।
शल्योऽर्धदिवसं चैव गदायुद्धमतः परम् ॥ ३१ ॥
शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले वीरवर कर्णने दो दिन युद्ध किया और शल्यने आधे दिनतक । इसके पश्चात् ( दुर्योधन और भीमसेनका परस्पर) गदायुद्ध आधे दिनतक होता रहा ॥ ३१ ॥
तस्यैव दिवसस्यान्ते द्रौणिहार्दिक्यगौतमाः ।
प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥ ३२ ॥
अठारहवाँ दिन बीत जानेपर रात्रिके समय अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यने निःशंक सोते हुए युधिष्ठिरके सैनिकोंको मार डाला ॥ ३२ ॥
यत्तु शौनक सत्रे ते भारताख्यानमुत्तमम् ।
जनमेजयस्य तत् सत्रे व्यासशिष्येण धीमता ॥ ३३ ॥
कथितं विस्तरार्थं च यशो वीर्यं महीक्षिताम् ।
पौष्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादितः स्मृतम् ॥ ३४ ॥
शौनकजी! आपके इस सत्संग - सत्रमें मैं यह जो उत्तम इतिहास महाभारत सुना रहा हूँ, यही जनमेजयके सर्पयज्ञमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीके द्वारा भी वर्णन किया गया था । उन्होंने बड़े- बड़े नरपतियोंके यश और पराक्रमका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये प्रारम्भमें पौष्य, पौलोम और आस्तीक– इन तीन पर्वोंका स्मरण किया ॥ ३३-३४ ॥
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमयान्वितम् ।
प्रतिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ॥ ३५ ॥
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जैसे मोक्ष चाहनेवाले पुरुष पर वैराग्यकी शरण ग्रहण करते हैं, वैसे ही प्रज्ञावान् मनुष्य अलौकिक अर्थ, विचित्र पद, अद्भुत आख्यान और भाँति- भाँतिकी परस्पर विलक्षण मर्यादाओंसे युक्त इस महाभारतका आश्रय ग्रहण करते हैं ॥ ३५ ॥
आत्मेव वेदितव्येषु प्रियेष्विव हि जीवितम् ।
इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमेष्वयम् ॥ ३६ ॥
जैसे जाननेयोग्य पदार्थोंमें आत्मा, प्रिय पदार्थोंमें अपना जीवन सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप प्रयोजनको पूर्ण करनेवाला यह इतिहास श्रेष्ठ है ॥ ३६ ॥
अनाश्रित्येदमाख्यानं कथा भुवि न विद्यते ।
आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥ ३७ ॥
जैसे भोजन किये बिना शरीर- निर्वाह सम्भव नहीं है, वैसे ही इस इतिहासका आश्रय लिये बिना पृथ्वीपर कोई कथा नहीं है ॥ ३७ ॥
तदेतद् भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते ।
उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥ ३८ ॥
जैसे अपनी उन्नति चाहनेवाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने कुलीन और सद्भावसम्पन्न स्वामीकी सेवा करते हैं, इसी प्रकार संसारके श्रेष्ठ कवि इस महाभारतकी सेवा करके ही अपने काव्यकी रचना करते हैं ॥ ३८ ॥
इतिहासोत्तमे यस्मिन्नर्पिता बुद्धिरुत्तमा ।
स्वरव्यञ्जनयोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रयेव वाक् ॥ ३ ९ ॥
जैसे लौकिक और वैदिक सब प्रकारके ज्ञानको प्रकाशित करनेवाली सम्पूर्ण वाणी स्वरों एवं व्यंजनोंमें समायी रहती है, वैसे ही ( लोक, परलोक एवं परमार्थसम्बन्धी ) सम्पूर्ण उत्तम विद्या- बुद्धि इस श्रेष्ठ इतिहासमें भरी हुई है ॥ ३ ९ ॥
तस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः ।
सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थेर्भूषितस्य च ॥ ४० ॥
भारतस्येतिहासस्य श्रूयतां पर्वसंग्रहः ।
पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीयः पर्वसंग्रहः ॥ ४१ ॥
यह महाभारत इतिहास ज्ञानका भण्डार है । इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ और उनका अनुभव करानेवाली युक्तियाँ भरी हुई हैं । इसका एक-एक पद और पर्व आश्चर्यजनक है तथा यह वेदोंके धर्ममय अर्थसे अलंकृत है । अब इसके पर्वोंकी संग्रह- सूची सुनिये । पहले अध्यायमें पर्वानुक्रमणी है और दूसरेमें पर्वसंग्रह ॥ ४०-४१ ॥
पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ।
ततः सम्भवपर्वोक्तमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ४२ ॥
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इसके पश्चात् पौष्य, पौलोम, आस्तीक और आदिअंशावतरण पर्व हैं । तदनन्तर सम्भवपर्वका वर्णन है, जो अत्यन्त अद्भुत और रोमांचकारी है ॥ ४२ ॥
दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्बं पर्व चोच्यते ।
ततो बकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः ॥ ४३ ॥
इसके पश्चात् जतुगृह (लाक्षाभवन) दाहपर्व है। तदनन्तर हिडिम्बवधपर्व है, फिर बकवध और उसके बाद चैत्ररथपर्व है ॥ ४३ ॥
ततः स्वयंवरो देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते ।
क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ४४ ॥
उसके बाद पांचालराजकुमारी देवी द्रौपदीके स्वयंवरपर्वका तथा क्षत्रियधर्मसे सब राजाओंपर विजय - प्राप्तिपूर्वक वैवाहिकपर्वका वर्णन है ॥ ४४ ॥
विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च ।
अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः ॥ ४५ ॥
विदुरागमन, राज्यलम्भपर्व, तत्पश्चात् अर्जुन -वनवासपर्व और फिर सुभद्राहरणपर्व है ॥ ४५ ॥
सुभद्राहरणादूर्ध्वं ज्ञेया हरणहारिका ।
ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मयदर्शनम् ॥ ४६ ॥
सुभद्राहरणके बाद हरणाहरणपर्व है, पुनः खाण्डवदाह पर्व है, उसीमें मयदानवके दर्शनकी कथा है ॥ ४६ ॥
सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् ।
जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजयं तथा ॥ ४७ ॥
इसके बाद क्रमशः सभापर्व, मन्त्रपर्व, जरासन्ध- वधपर्व और दिग्विजयपर्वका प्रवचन है ॥ ४७ ॥
पर्व दिग्विजयादूर्ध्वं राजसूयिकमुच्यते ।
ततश्चार्घाभिहरणं शिशुपालवधस्ततः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर राजसूय, अर्घाभिहरण और शिशुपाल वधपर्व कहे गये हैं ॥ ४८ ॥
द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् ।
तत आरण्यकं पर्व किर्मीरवध एव च ॥ ४ ९ ॥
इसके बाद क्रमशः द्यूत एवं अनुद्यूतपर्व हैं । तत्पश्चात् वनयात्रापर्व तथा किर्मीरवधपर्व है ॥ ४ ९ ॥
अर्जुनस्याभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् ।
ईश्वरार्जुनयोर्युद्धं पर्व कैरातसंज्ञितम् ॥ ५० ॥
इसके बाद अर्जुनाभिगमनपर्व जानना चाहिये और फिर कैरातपर्व आता है, जिसमें सर्वेश्वर भगवान् शिव तथा अर्जुनके युद्धका वर्णन है ॥ ५० ॥