महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 811–820

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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कर्णने कहा —ब्रह्मन्! इन्द्र यदि ब्राह्मणका रूप धारण करके सचमुच मुझसे याचना करेंगे, तो मैं आपकी चेतावनीके अनुसार कैसे उन्हें वह वस्तु नहीं दूँगा । ब्राह्मण तो सदा अपना प्रिय चाहनेवाले देवताओंके लिये भी पूजनीय हैं । देवाधिदेव इन्द्र ही ब्राह्मणरूपमें आये हैं, यह जान लेनेपर भी मैं उनकी अवहेलना नहीं कर सकूँगा । सूर्य उवाच

यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति ।

शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशस्त्रविबाधिनीम् ॥

सूर्य बोले- वीर! यदि ऐसी बात है तो सुनो, बदलेमें इन्द्र भी तुम्हें वर देंगे । उस समय तुम उनसे सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंका निराकरण करनेवाली बरछी माँग लेना । वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ते तत्रैवान्तरधीयत । कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत् तदा ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं -स्वप्नमें यों कहकर ब्राह्मण वेषधारी सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये । तब कर्ण जाग गया और स्वप्नकी बातोंका चिन्तन करने लगा ।

तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थी समुपागमत् ।

कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः ॥ २७ ॥

तत्पश्चात् एक दिन महातेजस्वी देवराज इन्द्र ब्राह्मण बनकर भिक्षाके लिये कर्णके पास आये और उससे उन्होंने कवच और कुण्डलोंको माँगा ॥ २७ ॥

स्वशरीरात् समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम् ।

कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत् कृताञ्जलिः ॥ २८ ॥

तब कर्णने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रको अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवचको शरीरसे उधेड़कर एवं दोनों कुण्डलोंको भी काटकर दे दिया ॥ २८ ॥

प्रतिग्रह तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा ।

( अहो साहसमित्येवं मनसा वासवो हसन् ।

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ॥

न तं पश्यामि को ह्येतत् कर्म कर्ता भविष्यति ।

प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं वृणु यमिच्छसि ॥

कवच और कुण्डलोंको लेकर उसके इस कर्मसे संतुष्ट हो इन्द्रने मन- ही - मन हँसते हुए कहा — ' अहो! यह तो बड़े साहसका काम है । देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस —इनमेंसे किसीको भी मैं ऐसा साहसी नहीं देखता । भला, कौन ऐसा कार्य कर सकता है । ' यों कहकर वे स्पष्ट वाणीमें बोले – ' वीर! मैं तुम्हारे इस कर्मसे प्रसन्न हूँ, इसलिये तुम जो चाहो, वही वर मुझसे माँग लो । '

पृष्ठ 812

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कर्णउवाच इच्छामि भगवहत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम् । ) कर्णने कहा— भगवन्! मैं आपकी दी हुई वह अमोघ बरछी चाहता हूँ, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है । वैशम्पायन उवाच ददौ शक्तिं सुरपतिर्वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं - तब देवराज इन्द्रने बदलेमें उसे अपनी ओरसे एक बरछी प्रदान की और कहा— ॥ २ ९ ॥

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

यमेकं जेतुमिच्छेथाः सोऽनया न भविष्यति ॥ ३० ॥

‘ वीरवर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसोंमेंसे जिस एकको जीतना चाहोगे, वही इस शक्तिके प्रहारसे नष्ट हो जायगा' ॥ ३० ॥

प्राङ् नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ ।

कर्णो वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥ ३१ ॥

पहले इस पृथ्वीपर उसका नाम वसुषेण कहा जाता था । तत्पश्चात् अपने शरीरसे कवचको कतर डालनेके कारण वह कर्ण और वैकर्तन नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णसम्भवे दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमेंकर्णकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३३ श्लोक मिलाकर कुल ४४३ श्लोक हैं ) OFF FULL

पृष्ठ 813

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः कुन्तीद्वारा स्वयंवरमें पाण्डुका वरण और उनके साथ विवाह वैशम्पायन उवाच

सत्त्वरूपगुणोपेता धर्मारामा महाव्रता ।

दुहिता कुन्तिभोजस्य पृथा पृथुललोचना ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा कुन्तिभोजकी पुत्री विशाल नेत्रोंवाली पृथा धर्म, सुन्दर रूप तथा उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी । वह एकमात्र धर्ममें ही रत रहनेवाली और महान् व्रतोंका पालन करनेवाली थी ॥ १ ॥

तां तु तेजस्विनीं कन्यां रूपयौवनशालिनीम् ।

व्यवृण्वन् पार्थिवाः केचिदतीव स्त्रीगुणैर्युताम् ॥ २ ॥

स्त्रीजनोचित सर्वोत्तम गुण अधिक मात्रामें प्रकट होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । मनोहर रूप तथा युवावस्थासे सुशोभित उस तेजस्विनी राजकन्याके लिये कई राजाओंने महाराज कुन्तिभोजसे याचना की ॥ २ ॥

ततः सा कुन्तिभोजेन राज्ञाऽऽहूय नराधिपान् ।

पित्रा स्वयंवरे दत्ता दुहिता राजसत्तम ॥ ३ ॥

राजेन्द्र! तब कन्याके पिता राजा कुन्तिभोजने उन सब राजाओंको बुलाकर अपनी पुत्री पृथाको स्वयंवरमें उपस्थित किया ॥ ३ ॥

ततः सा रङ्गमध्यस्थं तेषां राज्ञां मनस्विनी ।

ददर्श राजशार्दूलं पाण्डु भरतसत्तमम् ॥ ४ ॥

मनस्विनी कुन्तीने सब राजाओंके बीच रंगमंचपर बैठे हुए भरतवंशशिरोमणि नृपश्रेष्ठ पाएको देखा ॥ ४ ॥

सिंहदर्पं महोरस्कं वृषभाक्षं महाबलम् ।

आदित्यमिव सर्वेषां राज्ञां प्रच्छाद्य वै प्रभाः ॥ ५ ॥

उनमें सिंहके समान अभिमान जाग रहा था । उनकी छाती बहुत चौड़ी थी । उनके नेत्र बैलकी आँखोंके समान बड़े -बड़े थे । उनका बल महान् था । वे सब राजाओंकी प्रभाको अपने तेजसे आच्छादित करके भगवान् सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५ ॥

तिष्ठन्तं राजसमितौ पुरन्दरमिवापरम् ।

तं दृष्टवा सानवद्याङ्गी कुन्तिभोजसुता शुभा ॥ ६ ॥

पाण्डुं नरवरं रङ्गे हृदयेनाकुलाभवत् ।

पृष्ठ 814

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ततः कामपरीताङ्गी सकृत् प्रचलमानसा ॥ ७ ॥

उस राजसमाजमें वे द्वितीय इन्द्रके समान विराजमान थे । निर्दोष अंगोंवाली कुन्तिभोजकुमारी शुभलक्षणा कुन्ती स्वयंवरकी रंगभूमिमें नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर मन-ही - मन उन्हें पानेके लिये व्याकुल हो उठी । उसके सब अंग कामसे व्याप्त हो गये और चित्त एकबारगी चंचल हो उठा ॥ ६-७ ॥

व्रीडमाना स्रजं कुन्ती राज्ञः स्कन्धे समासजत् ।

तं निशम्य वृतं पाण्डुं कुन्त्या सर्वे नराधिपाः ॥ ८ ॥

यथागतं समाजग्मुर्गजैरश्वै रथैस्तथा ।

ततस्तस्याः पिता राजन् विवाहमकरोत् प्रभुः ॥ ९ ॥

कुन्तीने लजाते - लजाते राजा पाण्डुके गलेमें जयमाला डाल दी । सब राजाओंने जब सुना कि कुन्तीने महाराज पाण्डुका वरण कर लिया, तब वे हाथी, घोड़े एवं रथों आदि वाहनोंद्वारा जैसे आये थे, वैसे ही अपने अपने स्थानको लौट गये । राजन! तब उसके पिताने ( पाण्डुके साथ शास्त्रविधिके अनुसार) कुन्तीका विवाह कर दिया ॥ ८ - ९ ॥

स तया कुन्तिभोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः ।

युयुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव ॥ १० ॥

पृष्ठ 815

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अनन्त सौभाग्यशाली कुरुनन्दन पाए कुन्तिभोज- कुमारी कुन्तीसे संयुक्त हो शचीके साथ इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ॥ १० ॥

कुन्त्याः पाण्डोश्च राजेन्द्र कुन्तिभोजो महीपतिः ।

कृत्वोद्वाहं तदा तं तु नानावसुभिरर्चितम् ।

स्वपुरं प्रेषयामास स राजा कुरुसत्तम ॥ ११ ॥

ततो बलेन महता नानाध्वजपताकिना ।

स्तूयमानः स चाशीर्भिर्ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ॥ १२ ॥

सम्प्राप्य नगर राजा पाण्डुः कौरवनन्दनः ।

न्यवेशयत तां भार्यां कुन्तीं स्वभवने प्रभुः ॥ १३ ॥

राजेन्द्र! महाराज कुन्तिभोजने कुन्ती और पाण्डुका विवाहसंस्कार सम्पन्न करके उस समय उन्हें नाना प्रकारके धन और रत्नोंद्वारा सम्मानित किया । तत्पश्चात् पाण्डुको उनकी राजधानीमें भेज दिया । कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! तब कौरवनन्दन राजा पाण्डु नाना प्रकारकी ध्वजापताकाओंसे सुशोभित विशाल सेनाके साथ चले । उस समय बहुत- से ब्राह्मण एवं महर्षि आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करवाते थे । हस्तिनापुरमें आकर उन शक्तिशाली नरेशने अपनी प्यारी पत्नी कुन्तीको राजमहलमें पहुँचा दिया ॥ ११-१३ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीविवाहे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कुन्तीविवाहविषयक एक सौ ग्यारहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १११ ॥

OL

पृष्ठ 816

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द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः माद्रीके साथ पाण्डुका विवाह तथा राजा पाण्डुकी दिग्विजय वैशम्पायन उवाच

ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः ।

विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान् मतिम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर शान्तनुनन्दन परम बुद्धिमान् भीष्मजीने यशस्वी राजा पाण्डुके द्वितीय विवाहके लिये विचार किया ॥ १ ॥

सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्धं ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।

बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम ॥ २ ॥

वे बूढ़े मन्त्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों तथा चतुरंगिणी सेनाके साथ मद्रराजकी राजधानीमें गये ॥ २ ॥

तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं बाह्लीकपुङ्गवः ।

प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ॥ ३ ॥

बाह्लीकशिरोमणि राजा शल्य भीष्मजीका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये नगरसे बाहर आये और यथोचित स्वागत- सत्कार करके उन्हें राजधानीके भीतर ले गये ॥ ३ ॥

दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्यं तथैव च ।

मधुपर्कं च महेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ ४ ॥

वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पण करके मद्रराजने भीष्मजीसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछा ॥ ४ ॥

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः ।

आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ॥ ५ ॥

तब कुरुकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजीने मद्रराजसे इस प्रकार कहा —' शत्रुदमन! तुम मुझे कन्याके लिये आया हुआ समझो ॥ ५ ॥

श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी ।

तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ॥ ६ ॥

' सुना है, तुम्हारी एक यशस्विनी बहिन है, जो बड़े साधु स्वभावकी है; उसका नाम माद्री है । मैं उस यशस्विनी माद्रीका अपने पाण्डुके लिये वरण करता हूँ ॥ ६ ॥

युक्तरूपो हि सम्बन्धे त्वं नो राजन् वयं तव ।

पृष्ठ 817

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एतत् संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान् यथाविधि ॥ ७ ॥

‘ राजन्! तुम हमारे यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा योग्य हो और हम भी तुम्हारे योग्य हैं । मद्रेश्वर! यों विचारकर तुम हमें विधिपूर्वक अपनाओ' ॥ ७ ॥

तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः ।

न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ॥। ८ ॥

भीष्मजीके यों कहनेपर मद्रराजने उत्तर दिया- ' मेरा विश्वास है कि आपलोगोंसे श्रेष्ठ वर मुझे ढूँढ़नेसे भी नहीं मिलेगा ' ॥ ८ ॥

पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित् कुलेऽस्मिन् नृपसत्तमैः ।

साधु वा यदि वासाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ॥ ९ ॥

‘ परंतु इस कुलमें पहलेके श्रेष्ठ राजाओंने कुछ शुल्क लेनेका नियम चला दिया है । वह अच्छा हो या बुरा, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ९ ॥

व्यक्तं तद् भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः ।

न च युक्तं तथा वक्तुं भवान् देहीति सत्तम ॥ १० ॥

‘ यह बात सबपर प्रकट है, निःसंदेह आप भी इसे जानते होंगे । साधुशिरोमणे! इस दशामें आपके लिये यह कहना उचित नहीं है कि मुझे कन्या दे दो ' ॥ १० ॥

कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् ।

तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ॥ ११ ॥

‘ वीर! वह हमारा कुलधर्म है और हमारे लिये वही परम प्रमाण है । शत्रुदमन! इसीलिये मैं आपसे निश्चितरूपसे यह नहीं कह पाता कि कन्या दे दूँगा' ॥ ११ ॥

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः ।

धर्म एष परो राजन् स्वयमुक्तः स्वयम्भुवा ॥ १२ ॥

यह सुनकर जनेश्वर भीष्मजीने मद्रराजको इस प्रकार उत्तर दिया – ' राजन्! यह उत्तम धर्म है । स्वयं स्वयम्भू ब्रह्माजीने इसे धर्म कहा है ' ॥ १२ ॥

नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैधिरयं कृतः ।

विदितेय च ते शल्य मर्यादा साधुसम्मता ॥ १३ ॥

‘ यदि तुम्हारे पूर्वजोंने इस विधिको स्वीकार कर लिया है तो इसमें कोई दोष नहीं है । शल्य! साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम्हारी यह कुलमर्यादा हम सबको विदित है ' ॥ १३ ॥

इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् ।

रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात् सहस्रशः ॥ १४ ॥

गजानश्वान् रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च ।

मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृजच्छ्रभम् ॥ १५ ॥

यह कहकर महातेजस्वी भीष्मजीने राजा शल्यको सोना और उसके बने हुए आभूषण तथा सहस्रों विचित्र प्रकारके रत्न भेंट किये । बहुत- से हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, अलंकार तथा

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मणि - मोती और मूँगे भी दिये ॥ १४-१५ ॥

तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः ।

ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ॥ १६ ॥

वह सारा धन लेकर शल्यका चित्त प्रसन्न हो गया । उन्होंने अपनी बहिनको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीको सौंप दिया ॥ १६ ॥

सतां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः ।

आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ॥ १७ ॥

परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्रीको लेकर हस्तिनापुरमें आये ॥ १७ ॥

तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते ।

जग्राह विधिवत् पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ॥ १८ ॥

तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आनेपर राजा पाण्डुने माद्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ १८ ॥

ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः ।

स्थापयामास तां भार्यां शुभे वेश्मनि भाविनीम् ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार विवाह- कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनी कल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ॥ १ ९ ॥

स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः ।

कुन्त्या माद्रया च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ॥ २० ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथ आनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ॥ २० ॥

ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः ।

जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत् पुरात् प्रभो ॥ २१ ॥

जनमेजय! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ॥ २१ ॥

स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च ।

धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् ।

आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ॥ २२ ॥

मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः ।

गजवाजिरथीघेन बलेन महतागमत् ॥ २३ ॥

उन्होंने भीष्म आदि बड़े -बूढ़ोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया । कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथा अन्य श्रेष्ठ कुशवंशियोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ली और उनका अनुमोदन

पृष्ठ 819

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मिलनेपर मंगलाचारयुत्ह आशीर्वादोंसे अभिनन्दित हो हाथी, घोड़ों तथा रथसमुदायसे युक्त विशाल सेनाके साथ प्रस्थान किया ॥ २२-२३ ॥

स राजा देवगर्भाभो विजिगीषुर्वसुंधराम् ।

हृष्टपुष्टबलैः प्रायात् पाण्डुः शत्रूननेकशः ॥ २४ ॥

राजा पाण्डु देवकुमारके समान तेजस्वी थे । उन्होंने इस पृथ्वीपर विजय पानेकी इच्छासे हृष्ट - पुष्ट सैनिकोंके साथ अनेक शत्रुओंपर धावा किया ॥ २४ ॥

पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशार्णाः समरे जिताः ।

पाण्डुना नरसिंहेन कौरवाणां यशोभृता ॥ २५ ॥

कौरवकुलके सुयशको बढ़ानेवाले, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा पाण्डुने सबसे पहले पूर्वके अपराधी दशार्णोपर- धावा करके उन्हें युद्धमें परास्त किया ॥ २५ ॥

ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् ।

प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम् ॥ २६ ॥

आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः ।

गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घो राजगृहे हतः ॥ २७ ॥

तत्पश्चात् वे नाना प्रकारकी ध्वजा पताकाओंसे युक्त और बहुसंख्यक हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदलोंसे भरी हुई भारी सेना लेकर मगधदेशमें गये । वहाँ राजगृहमें अनेक राजाओंका अपराधी बलाभिमानी मगधराज दीर्घ उनके हाथसे मारा गया ॥ २६-२७ ॥

ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः ।

पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः ॥ २८ ॥

उसके बाद भारी खजाना और वाहन आदि लेकर पाण्डुने मिथिलापर चढ़ाई की और विदेहवंशी क्षत्रियोंको युद्धमें परास्त किया ॥ २८ ॥

तथा काशिषु सुह्मेषु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ ।

स्वबाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद् यशः ॥ २ ९ ॥

नरश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वे पाण्डु काशी, सहा तथा पुण्ड्र देशोंपर विजय पाते हुए अपने बाहुबल और पराक्रमसे कुरुकुलके यशका विस्तार करने लगे ॥ २ ९ ॥

तं शरौघमहाच्वालं शस्त्रार्चिषमरिन्दमम् ।

पाण्डुपावकमासाद्य व्यदह्यन्त नराधिपाः ॥ ३० ॥

उस समय शत्रुदमन राजा पाण्डु प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित थे । बाणोंका समुदाय उनकी बढ़ती हुई ज्वालाके समान जान पड़ता था । खड्ग आदि शस्त्र लपटोंके

समान प्रतीत होते थे । उनके पास आकर बहुतसे राजा भस्म हो गये ॥ ३० ॥

ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला तपाः ।

पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः ॥ ३१ ॥

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सेनासहित राजा पाण्डुने सामने आये हुए सैन्यसहित नरपतियोंकी सारी सेनाएँ नष्ट कर दीं और उन्हें अपने अधीन करके कौरवोंके आज्ञापालनमें नियुक्त कर दिया ॥ ३१ ॥

ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।

तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरंदरम् ॥ ३२ ॥

पाण्डुके द्वारा परास्त हुए समस्त भूपालगण देवताओंमें इन्द्रकी भाँति इस पृथ्वीपर सब मनुष्योंमें एकमात्र उन्हींको शूरवीर मानने लगे ॥ ३२ ॥

तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः ।

उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ॥ ३३ ॥

भूतलके समस्त राजाओंने उनके सामने हाथ जोड़कर मस्तक टेक दिये और नाना प्रकारके रत्न एवं धन लेकर उनके पास आये ॥ ३३ ॥

मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं बहु ।

गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ॥ ३४ ॥

खरोष्ट्रमहिषीश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् ।

कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च ।

तत् सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ॥ ३५ ॥

राजाओंके दिये हुए ढेर- के - ढेर मणि, मोती, मूँगे, सुवर्ण, चाँदी, गोरत्न, अश्वरत्न, रथरत्न, हाथी, गदहे, ऊँट, भैंसें, बकरे, भेंड़ें, कम्बल, मृगचर्म, रत्न, रंकु मृगके चर्मसे बने हुए बिछौने आदि जो कुछ भी सामान प्राप्त हुए, उन सबको हस्तिनापुराधीश राजा पाण्डुने ग्रहण कर लिया ॥ ३४-३५ ॥

तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः ।

हर्षयिष्यन् स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ॥ ३६ ॥

वह सब लेकर महाराज पाण्डु अपने राष्ट्रके लोगोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः हस्तिनापुर चले आये । उस समय उनकी सवारीके अश्व आदि भी बहुत प्रसन्न थे ॥ ३६ ॥

शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः ।

प्रणष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः ॥ ३७ ॥

राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी शन्तनु तथा परम बुद्धिमान् भरतकी कीर्ति- कथा जो नष्ट - सी हो गयी थी, उसे महाराज पाण्डुने पुनरुज्जीवित कर दिया ॥ ३७ ॥

ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जहुः कुरुधनानि च ।

नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ॥ ३८ ॥

जिन राजाओंने पहले कुरुदेशके धन तथा कुरुराष्ट्रका अपहरण किया था, उनको हस्तिनापुरके सिंह पाण्डुने करद बना दिया ॥ ३८ ॥

इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च संगताः ।

प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ॥ ३ ९ ॥