महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 801–810
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
पृष्ठ 801
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भीष्मेण विहितं राष्ट्रे धर्मचक्रमवर्तत ॥ १४ ॥
वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था ।
राष्ट्रमें सब ओर भीष्मजीके द्वारा चलाया हुआ धर्मका शासन चल रहा था ॥ १४ ॥
क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् ।
पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः सततोत्सवाः ॥ १५ ॥
उन महात्मा कुमारोंके यज्ञोपवीतादि संस्कार किये जानेके समय नगर और देशके सभी लोग निरन्तर उत्सव मनाते थे ॥ १५ ॥
गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप ।
दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ १६ ॥
जनमेजय! कुरुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य नगरनिवासियोंके घरोंमें सदा सब ओर यही बात सुनायी देती थी कि 'दान दो और अतिथियोंको भोजन कराओ ' ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः ।
जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत् परिपालिताः ॥ १७ ॥
धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा परम बुद्धिमान् विदुर– इन तीनों भाइयोंका भीष्मजीने जन्मसे ही पुत्रकी भाँति पालन किया ॥ १७ ॥
संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः ।
श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ॥ १८ ॥
उन्होंने ही उनके सब संस्कार कराये । फिर वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालन और वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर हो गये । परिश्रम और व्यायाममें भी उन्होंने बड़ी कुशलता प्राप्त की । फिर धीरे - धीरे वे युवावस्थाको प्राप्त हुए ॥ १८ ॥
धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि ।
तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ॥ १ ९ ॥
धनुर्वेद, घोड़ेकी सवारी, गदायुद्ध, ढाल- तलवारके प्रयोग, गजशिक्षा तथा नीतिशास्त्रमें वे तीनों भाई पारंगत हो गये ॥ १ ९ ॥
इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ॥ २० ॥
उन्हें इतिहास, पुराण तथा नाना प्रकारके शिष्टाचारोंका भी ज्ञान कराया गया । वे वेद- वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वत्र एक निश्चित सिद्धान्तके माननेवाले थे ॥ २० ॥
पाण्डुर्धनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् ।
अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ २१ ॥
पाण्डु धनुर्विद्यामें उस समयके मनुष्योंमें सबसे बढ़ - चढ़कर पराक्रमी थे । इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र दूसरे लोगोंकी अपेक्षा शारीरिक बलमें बहुत बढ़कर थे ॥ २१ ॥
पृष्ठ 802
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिषु लोकेषु न त्वासीत् कश्चिद् विदुरसम्मितः ।
धर्मनित्यस्तथा राजन् धर्मे च परमं गतः ॥ २२ ॥
राजन्! तीनों लोकोंमें विदुरजीके समान दूसरा कोई भी मनुष्य धर्मपरायण तथा धर्ममें ऊँची अवस्थाको प्राप्त ( आत्मद्रष्टा )* नहीं था ॥ २२ ॥
प्रणष्टं शन्तनोर्वंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् ।
ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ॥ २३ ॥
नष्ट हुए शान्तनुके वंशका पुनः उद्धार हुआ देखकर समस्त राष्ट्रके लोग परस्पर कहने लगे— ॥ २३ ॥
वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् ।
सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद् राज्यं न प्रत्यपद्यत ।
पारसवत्वाद् विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह ॥ २५ ॥
' वीर पुत्रोंको जन्म देनेवाली स्त्रियोंमें काशिराजकी दोनों पुत्रियाँ सबसे श्रेष्ठ हैं, देशोंमें कुरुजांगल देश सबसे उत्तम है, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें भीष्मजीका स्थान सबसे ऊँचा है तथा नगरोंमें हस्तिनापुर सर्वोत्तम है। ' धृतराष्ट्र अंधे होनेके कारण और विदुरजी पारशव ( शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न ) होनेसे राज्य न पा सके; अतः सबसे छोटे पाण्डु ही राजा हुए ॥ २४-२५ ॥
कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः ।
विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ॥ २६ ॥
एक समयकी बात है, सम्पूर्ण नीतिज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विदुरजीसे इस प्रकार न्यायोचित वचन बोले ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुराज्याभिषेकेऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुराज्याभिषेकविषयक एक सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २६३ श्लोक हैं ) 20 * ‘ अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम्' याज्ञवल्क्यस्मृतिके इस कथनके अनुसार आत्मदर्शन ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है ।
पृष्ठ 803
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवाधिकशततमोऽध्यायः राजा धृतराष्ट्रका विवाह भीष्म उवाच
गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् ।
अत्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक् ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा विदुर! हमारा यह कुल अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न होकर इस जगत्में विख्यात हो रहा है । यह अन्य भूपालोंको जीतकर इस भूमण्डलके साम्राज्यका अधिकारी हुआ है ॥ १ ॥
रक्षितं राजभिः पूर्वं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ।
नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ॥ २ ॥
पहलेके धर्मज्ञ एवं महात्मा राजाओंने इसकी रक्षा की थी; अतः हमारा यह कुल इस भूतलपर कभी उच्छिन्न नहीं हुआ ॥ २ ॥
मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना ।
समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु ॥ ३ ॥
( बीचमें संकटकाल उपस्थित हुआ था किंतु) मैंने, माता सत्यवतीने तथा महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने मिलकर पुन: इस कुलको स्थापित किया है । तुम तीनों भाई इस कुलके तंतु हो और तुम्हींपर अब इसकी प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥
तच्चैतद् वर्धते भूयः कुलं सागरवद् यथा ।
तथा मया विधातव्यं त्वया चैव न संशयः ॥ ४ ॥
वत्स! यह हमारा वही कुल आगे भी जिस प्रकार समुद्रकी भाँति बढ़ता रहे, निःसंदेह वही उपाय मुझे और तुम्हें भी करना चाहिये ॥ ४ ॥
श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः ।
सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ॥ ५ ॥
सुना जाता है, यदुवंशी शूरसेनकी कन्या पृथा ( जो अब राजा कुन्तिभोजकी गोद ली हुई पुत्री है ) भलीभाँति हमारे कुलके अनुरूप है । इसी प्रकार गान्धारराज सुबल और मद्रनरेशके यहाँ भी एक- एक कन्या सुनी जाती है ॥ ५ ॥
कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः ।
उचिताश्चैव सम्बन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः ॥ ६ ॥
बेटा! वे सब कन्याएँ बड़ी सुन्दरी तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं । वे श्रेष्ठ क्षत्रियगण हमारे साथ विवाह - सम्बन्धकरनेके सर्वथा योग्य हैं ॥ ६ ॥
मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर ।
पृष्ठ 804
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संतानार्थं कुलस्यास्य यद् वा विदुर मन्यसे ॥ ७ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुर! मेरी राय है कि इस कुलकी संतानपरम्पराको बढ़ानेके लिये उक्त कन्याओंका वरण करना चाहिये अथवा जैसी तुम्हारी सम्मति हो, वैसा किया जाय ॥ ७ ॥
विदुर उवाच
भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।
तस्मात् स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ॥ ८ ॥
विदुर बोले- प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही माता हैं और आप ही परम गुरु हैं; अतः स्वयं विचार करके जिस बातमें इस कुलका हित हो, वह कीजिये ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् ।
आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् ॥ ९ ॥
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा ।
इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥ १० ॥
ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत ।
अचक्षुरिति तत्रासीत् सुबलस्य विचारणा ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इसके बाद भीष्मजीने ब्राह्मणोंसे गान्धारराज सुबलकी पुत्री शुभलक्षणा गान्धारीके विषयमें सुना कि वह भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले वरदायक भगवान् शंकरकी आराधना करके अपने लिये सौ पुत्र होनेका वरदान प्राप्त कर चुकी है । भारत! जब इस बातका ठीक- ठीक पता लग गया, तब कुरुपितामह भीष्मने गान्धारराजके पास अपना दूत भेजा । धृतराष्ट्र अंधे हैं, इस बातको लेकर सुबलके मनमें बड़ा विचार हुआ ॥ ९ –११ ॥
कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्धया तु प्रसमीक्ष्य सः ।
ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम् ॥ १२ ॥
परंतु उनके कुल, प्रसिद्धि और आचार आदिके विषयमें बुद्धिपूर्वक विचार करके उसने धर्मपरायणा गान्धारीका धृतराष्ट्रके लिये वाग्दान कर दिया ॥ १२ ॥
गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् ।
आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ॥ १३ ॥
ततः सा पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा ।
बबन्ध नेत्रे स्वे राजन् पतिव्रतपरायणा ॥ १४ ॥
नाभ्यसूयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया ।
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् ॥ १५ ॥
पृष्ठ 805
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ।
तां तदा धृतराष्ट्राय ददौ परमसत्कृताम् ।
भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ॥ १६ ॥
जनमेजय! गान्धारीने जब सुना कि धृतराष्ट्र अंधे हैं और पिता- माता मेरा विवाह उन्हींके साथ करना चाहते हैं, तब उन्होंने रेशमी वस्त्र लेकर उसके कई तह करके उसीसे अपनी आँखें बाँध लीं । राजन्! गान्धारी बड़ी पतिव्रता थीं । उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं ( सदा पतिके अनुकूल रहूँगी, ) उनके दोष नहीं देखूँगी । तदनन्तर एक दिन गान्धारराजकुमार शकुनि युवावस्था तथा लक्ष्मीके समान मनोहर शोभासे युक्त अपनी बहिन गान्धारीको साथ लेकर कौरवोंके यहाँ गये और उन्होंने बड़े आदर- सत्कारके साथ धृतराष्ट्रको अपनी बहिन सौंप दी । शकुनिने भीष्मजीकी सम्मतिके अनुसार विवाह - कार्य सम्पन्न किया ॥ १३–१६ ॥
दत्त्वा स भगिनीं वीरो यथार्हं च परिच्छदम् ।
पुनरायात् स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ॥ १७ ॥
वीरवर शकुनिने अपनी बहिनका विवाह करके यथायोग्य दहेज दिया । बदलेमें भीष्मजीने भी उनका बड़ा सम्मान किया । तत्पश्चात् वे अपनी राजधानीको लौट आये ॥ १७ ॥
गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः ।
तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ॥ १८ ॥
भारत! सुन्दर शरीरवाली गान्धारीने अपने उत्तम स्वभाव, सदाचार तथा सद्व्यवहारोंसे समस्त कौरवोंको प्रसन्न कर लिया ॥ १८ ॥
वृत्तेनाराध्य तान् सर्वान् गुरून् पतिपरायणा ।
वाचापि पुरुषानन्यान् सुव्रता नान्यकीर्तयत् ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार सुन्दर बर्तावसे समस्त गुरुजनोंकी प्रसन्नता प्राप्त करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिपरायणा गान्धारीने कभी दूसरे पुरुषोंका नामतक नहीं लिया ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रविवाहे नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रविवाहविषयक एक सौ नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १० ९ ॥
पृष्ठ 806
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दशाधिकशततमोऽध्यायः कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान वैशम्पायन उवाच
शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् ।
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ शूरसेन हो गये हैं, जो वसुदेवजीके पिता थे । उन्हें एक कन्या हुई, जिसका नाम पृथा रखा गया । इस भूमण्डलमें उसके रूपकी तुलनामें दूसरी कोई स्त्री नहीं थी ॥ १ ॥
पितृष्वस्रीयाय स तामनपत्याय भारत ।
अग्रयमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक् ॥ २ ॥
भारत! सत्यवादी शूरसेनने अपने फुफेरे भाई संतानहीन कुन्तिभोजसे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं तुम्हें अपनी पहली संतान भेंट कर दूँगा ॥ २ ॥
अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे ।
प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने ॥ ३ ॥
उन्हें पहले कन्या ही उत्पन्न हुई । अतः कृपाकांक्षी महात्मा सखा राजा कुन्तिभोजको उनके मित्र शूरसेनने वह कन्या दे दी ॥ ३ ॥
सा नियुक्ता पितुर्गेहे देवताऽतिथिपूजने ।
उग्रं पर्यचरत् तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ ४ ॥
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।
तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत् ॥ ५ ॥
पिता कुन्तिभोजके घरपर पृथाको देवताओंके पूजन और अतिथियोंके सत्कारका कार्य सौंपा गया था । एक समय वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्मके विषयमें अपने निश्चयको सदा गुप्त रखनेवाले एक ब्राह्मण महर्षि आये, जिन्हें लोग दुर्वासाके नामसे जानते हैं। पृथा उनकी सेवा करने लगी । वे बड़े उग्र स्वभावके थे । उनका हृदय बड़ा कठोर था; फिर भी राजकुमारी पृथाने सब प्रकारके यत्नोंसे उन्हें पूर्ण संतुष्ट कर लिया ॥ ४-५ ॥
तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया ।
अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः ॥ ६ ॥
पृष्ठ 807
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दुर्वासाजीने पृथापर आनेवाले भावी संकटका विचार करके उनके धर्मकी रक्षाके लिये उसे एक वशीकरणमन्त्र दिया और उसके प्रयोगकी विधि भी बता दी । तत्पश्चात् वे मुनि उससे बोले – ॥ ६ ॥
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
तस्य तस्य प्रसादेन पुत्रस्तव भविष्यति ॥ ७ ॥
' शुभे! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस -जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी - उसीके अनुग्रहसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा ' ॥ ७ ॥
तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता ।
कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ ८ ॥
ब्रह्मर्षि दुर्वासाके यों कहनेपर कुन्तीके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ । वह यशस्विनी राजकन्या यद्यपि अभी कुमारी थी, तो भी उसने मन्त्रकी परीक्षाके लिये सूर्यदेवका आवाहन किया ॥ ८ ॥
सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् ।
विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महद्भुतम् ॥ ९ ॥
आवाहन करते ही उसने देखा, सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् भास्कर आ रहे हैं । यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर निर्दोष अंगोंवाली कुन्ती चकित हो उठी ॥ ९ ॥
तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत् ।
अयमस्म्यसितापाङ्गि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १० ॥
इधर भगवान् सूर्य उसके पास आकर इस प्रकार बोले- ' श्याम नेत्रोंवाली कुन्ती! यह मैं आ गया । बोलो, तुम्हारा कौन- सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ १० ॥
( आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम् । विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्कं शुचिस्मिते ॥ ) ' भद्रे! मैं दुर्वासा ऋषिके दिये हुए मन्त्रसे प्रेरित हो तुम्हारे बुलाते ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ । पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! तुम मुझे सूर्यदेव समझो । ’ कुन्त्युवाच
कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद् वरं विद्यां च शत्रुहन् ।
तद्विजिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ॥ ११ ॥
कुन्तीने कहा- शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभो! एक ब्राह्मणने मुझे वरदानके रूपमें देवताओंके आवाहनका मन्त्र प्रदान किया है । उसीकी परीक्षाके लिये मैंने आपका आवाहन किया था ॥ ११ ॥
एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये ।
पृष्ठ 808
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
योषितो हि सदा रक्ष्याः स्वापराद्धापि नित्यशः ॥ १२ ॥
यद्यपि मुझसे यह अपराध हुआ है, तो भी इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकर मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि आप क्षमापूर्वक प्रसन्न हो जाइये । स्त्रियोंसे अपना अपराध हो जाय, तो भी श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा उनकी रक्षा ही करनी चाहिये ॥ १२ ॥
सूर्यउवाच
वेदाहं सर्वमेवैतद् यद् दुर्वासा वरं ददौ ।
संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम ॥ १३ ॥
सूर्यदेव बोले- शुभे! मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासाने तुम्हें वर दिया है । तुम भय छोड़कर यहाँ मेरे साथ समागम करो ॥ १३ ॥
अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे ।
वृथाह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्वान्नात्र संशयः ॥ १४ ॥
शुभे! मेरा दर्शन अमोघ है और तुमने मेरा आवाहन किया है । भीरु! यदि यह आवाहन व्यर्थ हुआ, तो भी निःसंदेह तुम्हें बड़ा दोष लगेगा ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता ।
सा तु नैच्छद् वरारोहा कन्याहमिति भारत ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! भगवान् सूर्यने कुन्तीको समझाते हुए इस तरहकी बहुत - सी बातें कहीं; किंतु मैं अभी कुमारी कन्या हूँ, यह सोचकर सुन्दरी कुन्तीने उनसे समागमकी इच्छा नहीं की ॥ १५ ॥
बन्धुपक्षभयाद् भीता लज्जया च यशस्विनी ।
तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद् भरतर्षभ ॥ १६ ॥
यशस्विनी कुन्ती भाई- बन्धुओंमें बदनामी फैलनेके डरसे भी डरी हुई थी और नारीसुलभ लज्जासे भी वह विवश थी। भरतश्रेष्ठ! उस समय सूर्यदेवने पुनः उससे कहा - - ॥ १६ ॥
( पुत्रस्ते निर्मितः सुभ्रु शृणु यादृक्छुभानने ॥
आदित्ये कुण्डले बिभ्रत् कवचं चैव मामकम् ।
शस्त्रास्त्राणामभेद्यं च भविष्यति शुचिस्मिते ॥
नन किंचन देयं तु ब्राह्मणेभ्यो भविष्यति । चोद्यमानो मया चापि नाक्षमं चिन्तयिष्यति । दास्यत्येव हि विप्रेभ्यो मानी चैव भविष्यति ॥ ) ‘ सुन्दर मुख एवं सुन्दर भौंहोंवाली राजकुमारी! तुम्हारे लिये जैसे पुत्रका निर्माण होगा, वह सुनो —शुचिस्मिते! वह माता अदितिके दिये हुए दिव्य कुण्डलों और मेरे कवचको
पृष्ठ 809
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
धारण किये हुए उत्पन्न होगा । उसका वह कवच किन्हीं अस्त्र - शस्त्रोंसे टूट न सकेगा । उसके पास कोई भी वस्तु ब्राह्मणोंके लिये अदेय न होगी । मेरे कहनेपर भी वह कभी अयोग्य कार्य या विचारको अपने मनमें स्थान न देगा । ब्राह्मणोंके याचना करनेपर वह उन्हें सब प्रकारकी वस्तुएँ देगा ही । साथ ही वह बड़ा स्वाभिमानी होगा ।
मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत ।
एवमुक्त्वा स भगवान् कुन्तिराजसुतां तदा ॥ १७ ॥
प्रकाशकर्ता तपनः सम्बभूव तया सह ।
तत्र वीरः समभवत् सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
आमुक्तकवचः श्रीमान् देवगर्भः श्रियान्वितः ॥ १८ ॥
‘ रानी! मेरी कृपासे तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा । ' कुन्तिराजकुमारी कुन्तीसे यों कहकर प्रकाश और गरमी उत्पन्न करनेवाले भगवान् सूर्यने उसके साथ समागम किया । इससे उसी समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था । उसने जन्मसे ही कवच पहन रखा था और वह देवकुमारके समान तेजस्वी तथा शोभासम्पन्न था ॥ १७-१८ ॥
सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ।
अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥ १९ ॥
जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहा था । इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यात है ॥ १ ९ ॥
प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः ।
दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ॥ २० ॥
उत्तम प्रकाशवाले भगवान् सूर्यने कुलीको पुन: कन्यात्व प्रदान किया । तत्पश्चात् तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्य देवलोकमें चले गये ॥ २० ॥
दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा ।
एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥ २१ ॥
उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुलीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ ।
उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा ॥ २१ ॥
गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात् तदा ।
उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ॥ २२ ॥
उस समय कुटुम्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीने महाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया ॥ २२ ॥
तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः ।
पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ॥ २३ ॥
पृष्ठ 810
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जलमें छोड़े हुए उस नवजात शिशुको महायशस्वी सूतपुत्र अधिरथने, जिसकी पत्नीका नाम राधा था, ले लिया । उसने और उसकी पत्नीने उस बालकको अपना पुत्र बना लिया ॥ २३ ॥
नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तायुभौ ।
वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति ॥ २४ ॥
उन दम्पतिने उस बालकका नामकरण इस प्रकार किया; यह वसु ( कवच- कुण्डलादि धन ) -के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिये वसुषेण नामसे प्रसिद्ध हो ॥ २४ ॥
स वर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेपूद्यतोऽभवत् ।
आ पृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ॥ २५ ॥
वह बलवान् बालक बड़े होनेके साथ ही सब प्रकारकी अस्त्रविद्यामें निपुण हुआ । पराक्रमी कर्ण प्रातःकालसे लेकर जबतक सूर्य पृष्ठभागकी ओर न चले जाते, सूर्योपस्थान करता रहता था ॥ २५ ॥
तस्मिन् काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः ।
नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् किंचिद् वसु महीतले ॥ २६ ॥
उस समय मन्त्र- जपमें लगे हुए बुद्धिमान- वीर कर्णके लिये इस पृथ्वीपर कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे सके ॥ २६ ॥
( ततः काले तु कस्मिंश्चिचत् स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत् ।
आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम ॥
प्रभातायां रजन्यां त्वामागमिष्यति वासवः ।
न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति ॥
निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा ।
अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मर्तासि वचनं मम ॥
किसी समयकी बात है, सूर्यदेवने ब्राह्मणका रूप धारण करके कर्णको स्वप्नमें दर्शन दिया और इस प्रकार कहा - ' वीर! मेरी बात सुनो- आजकी रात बीत जानेपर सबेरा होते ही इन्द्र तुम्हारे पास आयेंगे । उस समय वे ब्राह्मण वेषमें होंगे । यहाँ आकर इन्द्र यदि तुमसे भिक्षा माँगें तो उन्हें देना मत । उन्होंने तुम्हारे कवच और कुण्डलोंका अपहरण करनेका निश्चय किया है । अतः मैं तुम्हें सचेत किये देता हूँ। तुम मेरी बात याद रखना । ’ कर्णउवाच
शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज ।
कथं चास्मै न दास्यामि यथा चास्म्यवबोधितः ॥
विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम् ।
तं देवदेवं जानन् वै न शक्नोम्यवमन्त्रणे ॥