महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 921–930
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930
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जब कौरव वृक्षपर चढ़कर फल तोड़ने लगते, तब भीमसेन पैरसे ठोकर मारकर उन पेड़ोंको हिला देते थे ॥ २१ ॥
प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः ।
सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुतं त्रस्ताः कुमारकाः ॥ २२ ॥
उनके वेगपूर्वक प्रहारसे आहत हो वे वृक्ष हिलने लगते और उनपर चढ़े हुए धृतराष्ट्रकुमार भयभीत हो फलोंसहित नीचे गिर पड़ते थे ॥ २२ ॥
न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन ।
कुमारा उत्तरं चक्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ॥ २३ ॥
कुश्तीमें, दौड़ लगानेमें तथा शिक्षाके अभ्यासमें धृतराष्ट्रकुमार सदा लाग - डाँट रखते हुए भी कभी भीमसेनकी बराबरी नहीं कर पाते थे ॥ २३ ॥
एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः ।
अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं बाल्यान्न द्रोहचेतसा ॥ २४ ॥
इसी प्रकार भीमसेन भी धृतराष्ट्रपुत्रोंसे स्पर्धा रखते हुए उनके अत्यन्त अप्रिय कार्योंमें ही लगे रहते थे । परंतु उनके मनमें कौरवोंके प्रति द्वेष नहीं था, वे बाल- स्वभावके कारण ही वैसा करते थे ॥ २४ ॥
ततो बलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् ।
भीमसेनस्य तज्ज्ञात्वा दुष्टभावमदर्शयत् ॥ २५ ॥
तब धृतराष्ट्रका प्रतापी पुत्र दुर्योधन यह जानकर कि भीमसेनमें अत्यन्त विख्यात बल है, उनके प्रति दुष्टभाव प्रदर्शित करने लगा ॥ २५ ॥
तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः ।
मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ॥ २६ ॥
वह सदा धर्मसे दूर रहता और पापकर्मोंपर ही दृष्टि रखता था । मोह और ऐश्वर्यके लोभसे उसके मनमें पापपूर्ण विचार भर गये थे ॥ २६ ॥
अयं बलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ।
मध्यमः पाण्डुपुत्राणां निकृत्या संनिगृह्यताम् ॥ २७ ॥
वह अपने भाइयोंके साथ विचार करने लगा कि ' यह मध्यम पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन
भीम बलवानोंमें सबसे बढ़कर है । इसे धोखा देकर कैद कर लेना चाहिये ॥ २७ ॥
प्राणवान् विक्रमी चैव शौर्येण महतान्वितः ।
स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः ॥ २८ ॥
‘ यह बलवान् और पराक्रमी तो है ही, महान् शौर्यसे भी सम्पन्न है । भीमसेन अकेला ही हम सब लोगोंसे होड़ बद लेता है ॥ २८ ॥
तं तु सुप्तं पुरोद्याने गङ्गायां प्रक्षिपामहे ।
अथ तस्मादवरजं श्रेष्ठं चैव युधिष्ठिरम् ॥ २ ९ ॥
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प्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुंधराम् ।
एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा ।
नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ॥ ३० ॥
‘ इसलिये नगरोद्यानमें जब वह सो जाय, तब उसे उठाकर हमलोग गंगाजीमें फेंक दें । इसके बाद उसके छोटे भाई अर्जुन और बड़े भाई युधिष्ठिरको बलपूर्वक कैदमें डालकर मैं अकेला ही सारी पृथ्वीका शासन करूँगा । ' ऐसा निश्चय करके पापी दुर्योधन महात्मा भीमसेनका अनिष्ट करनेके लिये सदा मौका ढूँढ़ता रहता था ॥ २ ९ -३० ॥
ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत ।
चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च ॥ ३१ ॥
जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधनने गंगातटपर जल-विहारके लिये ऊनी और सूती कपड़ोंके विचित्र एवं विशाल गृह तैयार कराये ॥ ३१ ॥
सर्वकामैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च ।
तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः ॥ ३२ ॥
वे गृह सब प्रकारकी अभीष्ट सामग्रियोंसे भरे - पूरे थे । उनके ऊपर ऊँची - ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं । उनमें उसने अलग- अलग अनेक प्रकारके बहुत- से कमरे बनवाये थे ॥ ३२ ॥
उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत ।
प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्य ह ॥ ३३ ॥
भारत! गंगातटवर्ती प्रमाणकोटि तीर्थमें किसी स्थानपर जाकर दुर्योधनने यह सारा आयोजन करवाया था । उसने उस स्थानका नाम रखा था उदकक्रीडन ॥ ३३ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च ।
उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ॥ ३४ ॥
वहाँ रसोईके काममें कुशल कितने ही मनुष्योंने जुटकर खाने - पीनेके बहुत से भक्ष्य', भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य' पदार्थ तैयार किये ॥ ३४ ॥
न्यवेदयंस्तत् पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा ।
ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर राजपुरुषोंने दुर्योधनको सूचना दी कि ' सब तैयारी पूरी हो गयी है । ' तब खोटी बुद्धिवाले दुर्योधनने पाण्डवोंसे कहा- ॥ ३५ ॥
गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम् ।
सहिता भ्रातरः सर्वे जलक्रीडामवाप्नुमः ॥ ३६ ॥
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‘ आज हमलोग भाँति - भाँतिके उद्यान और वनोंसे सुशोभित गंगाजीके तटपर चलें । वहाँ हम सब भाई एक साथ जलविहार करेंगे' ॥ ३६ ॥
एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ।
ते रथैर्नगराकारैर्देशजैश्च गजोत्तमैः ॥ ३७ ॥
निर्ययुर्नगराच्छूराः कौरवाः पाण्डवैः सह ।
उद्यानवनमासाद्य विसृज्य च महाजनम् ॥ ३८ ॥
विशन्ति स्म तदा वीराः सिंहा इव गिरेर्गुहाम् ।
उद्यानमभिपश्यन्तो भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ३ ९ ॥
यह सुनकर युधिष्ठिरने 'एवमस्तु ' कहकर दुर्योधनकी बात मान ली । फिर वे सभी शूरवीर कौरव पाण्डवोंके साथ नगराकार रथों तथा स्वदेशमें उत्पन्न श्रेष्ठ हाथियोंपर सवार हो नगरसे निकले और उद्यान- वनके समीप पहुँचकर साथ आये हुए प्रजावर्गके बड़े - बड़े लोगोंको विदा करके जैसे सिंह पर्वतकी गुफामें प्रवेश करे, उसी प्रकार वे सब वीर भ्राता उद्यानकी शोभा देखते हुए उसमें प्रविष्ट हुए ॥ ३७–३९ ॥
उपस्थानगृहैः शुभ्रैर्वलभीभिश्च शोभितम् ।
गवाक्षकैस्तथा जालैर्यन्त्रैः सांचारिकैरपि ॥ ४० ॥
सम्मार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम् ।
दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पद्माकरैरपि ॥ ४१ ॥
जलं तच्छुशुभे छन्नं फुल्लैर्जलरुहैस्तथा ।
उपच्छन्ना वसुमती तथा पुष्पैर्यथर्तुकैः ॥ ४२ ॥
वह उद्यान राजाओंकी गोष्ठी और बैठकके स्थानोंसे, श्वेत वर्णके छज्जोंसे, जालियों और झरोखोंसे तथा इधर - उधर ले जानेयोग्य जलवर्षक यन्त्रोंसे सुशोभित हो रहा था । महल बनानेवाले शिल्पियोंने उस उद्यान एवं क्रीड़ाभवनको झाड़- पोंछकर साफ कर दिया था । चित्रकारोंने वहाँ चित्रकारी की थी । जलसे भरी बावलियों तथा तालाबोंद्वारा उसकी बड़ी शोभा हो रही थी । खिले हुए कमलोंसे आच्छादित वहाँका जल बड़ा सुन्दर प्रतीत होता था । ऋतुके अनुकूल खिलकर झड़े हुए फूलोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी ढँक गयी थी ॥ ४०–४२ ॥
तत्रोपविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह ।
उपपन्नान् बहून् कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः ॥ ४३ ॥
वहाँ पहुँचकर समस्त कौरव और पाण्डव यथायोग्य स्थानोंपर बैठ गये और स्वतः प्राप्त हुए नाना प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगे ॥ ४३ ॥
अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्च ते ।
परस्परस्य वक्त्रेभ्यो ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः ॥ ४४ ॥
ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम् ।
विषं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया ॥ ४५ ॥
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तदनन्तर उस सुन्दर उद्यानमें क्रीड़ाके लिये आये हुए कौरव और पाण्डव एक- दूसरेके मुँहमें खानेकी वस्तुएँ डालने लगे । उस समय पापी दुर्योधनने भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके भोजनमें कालकूट नामक विष डलवा दिया ॥ ४४-४५ ॥
स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः ।
स वाचामृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद् यथा ॥ ४६ ॥
स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पापकृत् ।
प्रतीच्छितं स्म भीमेन तं वै दोषमजानता ॥ ४७ ॥
ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव ।
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः ॥ ४८ ॥
उस पापात्माका हृदय छूरेके समान तीखा था; परंतु बातें वह ऐसी करता था, मानो उनसे अमृत झर रहा हो । वह सगे भाई और हितैषी सुहृद्की भाँति स्वयं भीमसेनके लिये भाँति- भाँतिके भक्ष्य पदार्थ परोसने लगा । भीमसेन भोजनके दोषसे अपरिचित थे; अतः दुर्योधनने जितना परोसा, वह सब का सब खा गये । यह देख नीच दुर्योधन मन- ही-मन हँसता हुआ - सा अपने - आपको कृतार्थ मानने लगा ॥ ४६–४८ ॥
ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तदा मुदितमानसाः ॥ ४ ९ ॥
तब भोजनके पश्चात् पाण्डव तथा धृतराष्ट्रके पुत्र सभी प्रसन्नचित्त हो एक साथ जलक्रीड़ा करने लगे ॥ ४ ९ ॥
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क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलंकृताः ।
दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः ॥ ५० ॥
विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् ।
खिन्नस्तु बलवान् भीमो व्यायम्याभ्यधिकं तदा ॥ ५१ ॥
जलक्रीड़ा समाप्त होनेपर दिनके अन्तमें विहारसे थके हुए वे समस्त कुरुश्रेष्ठ वीर शुद्ध वस्त्र धारणकर सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हो उन क्रीड़ाभवनोंमें ही रात बितानेका विचार करने लगे । बलवान् भीमसेन उस समय अधिक परिश्रम करनेके कारण बहुत थक गये थे ॥ ५०-५१ ॥
वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा ।
प्रमाणकोट्यां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत् स्थलम् ॥ ५२ ॥
वे जलक्रीड़ाके लिये आये हुए उन कुमारोंको साथ लेकर विश्राम करनेकी इच्छासे प्रमाणकोटिके उस गृहमें आये और वहीं एक स्थानमें सो गये ॥ ५२ ॥
शीतं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः ।
विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः ॥ ५३ ॥
पाण्डुनन्दन भीम थके तो थे ही, विषके मदसे भी अचेत हो रहे थे । उनके अंग - अंगमें विषका प्रभाव फैल गया था । अतः वहाँ ठंडी हवा पाकर ऐसे सोये कि जडके समान निश्चेष्ट
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प्रतीत होने लगे ॥ ५३ ॥
ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः स्वयम् ।
मृतकल्पं तदा वीरं स्थलाज्जलमपातयत् ॥ ५४ ॥
तब दुर्योधनने स्वयं लताओंके पाशमें वीरवर भीमको कसकर बाँधा । वे मुर्देके समान हो रहे थे । फिर उसने गंगाजीके ऊँचे तटसे उन्हें जलमें ढकेल दिया ॥ ५४ ॥
स निःसङ्गो जलस्यान्तमथ वै पाण्डवोऽविशत् ।
आक्रामन्नागभवने तदा नागकुमारकान् ॥ ५५ ॥
ततः समेत्य बहुभिस्तदा नागैर्महाविषैः ।
अदश्यत भृशं भीमो महादंष्ट्रेर्विषोल्बणैः ॥ ५६ ॥
भीमसेन बेहोशीकी ही दशामें जलके भीतर डूबकर नागलोकमें जा पहुँचे । उस समय कितने ही नागकुमार उनके शरीरसे दब गये । तब बहुत- से महाविषधर नागोंने मिलकर अपनी भयंकर विषवाली बड़ी - बड़ी दाढ़ोंसे भीमसेनको खूब हँसा ॥ ५५-५६ ॥
ततोऽस्य दश्यमानस्य तद् विषं कालकूटकम् ।
हतं सर्पविषेणैव स्थावरं जङ्गमेन तु ॥ ५७ ॥
उनके द्वारा डँसे जानेसे कालकूट विषका प्रभाव नष्ट हो गया । सर्पोंके जंगम विषने खाये हुए स्थावर विषको हर लिया ॥ ५७ ॥
दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः ।
त्वचं नैवास्य बिभिदुः सारत्वात् पृथुवक्षसः ॥ ५८ ॥
चौड़ी छातीवाले भीमसेनकी त्वचा लोहेके समान कठोर थी; अतः यद्यपि उनके मर्मस्थानोंमें सर्पोने दाँत गड़ाये थे, तो भी वे उनकी त्वचाको भेद न सके ॥ ५८ ॥
ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वं संछिद्य बन्धनम् ।
पोथयामास तान् सर्वान् केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः ॥ ५ ९ ॥
तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन भीम जाग उठे । उन्होंने अपने सारे बन्धनोंको तोड़कर उन सभी सर्पोंको पकड़- पकड़कर धरतीपर दे मारा । कितने ही सर्प भयके मारे भाग खड़े हुए ॥ ५ ९ ॥
हतावशेषा भीमेन सर्वे वासुकिमभ्ययुः ।
ऊचुश्च सर्पराजानं वासुकिं वासवोपमम् ॥ ६० ॥
भीमके हाथों मरनेसे बचे हुए सभी सर्प इन्द्रके समान तेजस्वी नागराज वासुकिके समीप गये और इस प्रकार बोले- ॥ ६० ॥
अयं नरो वै नागेन्द्र ह्यप्सु बद्ध्वा प्रवेशितः ।
यथा च नो मतिर्वीर विषपीतो भविष्यति ॥ ६१ ॥
'नागेन्द्र! एक मनुष्य है, जिसे बाँधकर जलमें डाल दिया गया है । वीरवर! जैसा कि हमारा विश्वास है, उसने विष पी लिया होगा ॥ ६१ ॥
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निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्तः स च दष्टोऽन्वबुध्यत ।
ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु नः ॥ ६२ ॥
पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि । ‘ वह हमलोगोंके पास बेहोशीकी हालतमें आया था, किंतु हमारे डँसनेपर जाग उठा और होशमें आ गया । होशमें आनेपर तो वह महाबाहु अपने सारे बन्धनोंको शीघ्र तोड़कर
हमें पछाड़ने लगा है । आप चलकर उसे पहचानें' ॥ ६२ ॥
ततो वासुकिरभ्येत्य नागैरनुगतस्तदा ॥ ६३ ॥
पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम् ।
आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च ॥ ६४ ॥
तदा दौहित्रदौहित्रः परिष्वक्तः सुपीडितम् ।
सुप्रीतश्चाभवत् तस्य वासुकिः स महायशाः ॥ ६५ ॥
अब्रवीत् तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम् ।
धनौघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम् ॥ ६६ ॥
तब वासुकिने उन नागोंके साथ आकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमसेनको देखा । उसी समय नागराज आर्यकने भी उन्हें देखा, जो पृथाके पिता शूरसेनके नाना थे । उन्होंने अपने दौहित्रके दौहित्रको कसकर छातीसे लगा लिया । महायशस्वी नागराज वासुकि भी भीमसेनपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले – ' इनका कौन -सा प्रिय कार्य किया जाय? इन्हें धन, सोना और रत्नोंकी राशि भेंट की जाय' ॥ ६३–६६ ॥
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत ।
यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः ॥ ६७ ॥
उनके यों कहनेपर आर्यक नागने वासुकिसे कहा – ' नागराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यह धनराशि लेकर क्या करेगा' ॥ ६७ ॥
रसं पिबेत् कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः ।
बलं नागसहस्रस्य यस्मिन् कुण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६८ ॥
‘ आपके संतुष्ट होनेपर तो इस महाबली राजकुमारको आपकी आज्ञासे उस कुण्डका रस पीना चाहिये, जिससे एक हजार हाथियोंका बल प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥
यावत् पिबति बालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम् ।
एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत ॥ ६ ९ ॥
‘ यह बालक जितना रस पी सके, उतना इसे दिया जाय । ' यह सुनकर वासुकिने आर्यक नागसे कहा 'ऐसा ही हो ' ॥ ६ ९ ॥
ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः ।
प्राङ्मुखश्चोपविष्टश्च रसं पिबति पाण्डवः ॥ ७० ॥
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तब नागोंने भीमसेनके लिये स्वस्तिवाचन किया। फिर वे पाण्डुकुमार पवित्र हो पूर्वाभिमुख बैठकर कुण्डका रस पीने लगे ॥ ७० ॥
एकोच्छ्वासात् ततः कुण्डं पिबति स्म महाबलः ।
एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिबत् पाण्डुनन्दनः ॥ ७१ ॥
वे एक ही साँसमें एक कुण्डका रस पी जाते थे । इस प्रकार उन महाबली पाण्डुनन्दनने आठ कुण्डोंका रस पी लिया ॥ ७१ ॥
ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुजः ।
अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदमः ॥ ७२ ॥
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेन नागोंकी दी हुई दिव्य शय्यापर सुखपूर्वक सो गये ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमसेनरसपाने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके रसपानसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
FUEL O FUTE १. दाँतोंसे काट- काटकर खाये जानेवाले मालपूए आदिको भक्ष्य कहते हैं । २. दाँतका सहारा न लेकर केवल जिह्वाके व्यापारसे जिसे भोजन किया जाता है, जैसे हलुआ, खीर आदि । ३. पीनेयोग्य दुग्ध आदि । ४. चूसनेयोग्य वस्तु जिसका रसमात्र ग्रहण किया जाय और बाकी चीजको त्याग दिया जाय, वह चोष्य है, जैसे ईख-आम आदि । ५. लेह्य– चाटनेयोग्य चटनी आदि ।
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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा वैशम्पायन उवाच
ततस्ते कौरवाः सर्वे विना भीमं च पाण्डवाः ।
वृत्तक्रीडाविहारास्तु प्रतस्थुर्गजसाह्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर समस्त कौरव और पाण्डव क्रीड़ा और विहार समाप्त करके भीमसेनके बिना ही हस्तिनापुरकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
रथैर्गजैस्तथा चाश्वैर्यानैश्चान्यैरनेकशः ।
ब्रुवन्तो भीमसेनस्तु यातो ह्यग्रत एव नः ॥ २ ॥
ततो दुर्योधनः पापस्तत्रापश्यन् वृकोदरम् ।
भ्रातृभिः सहितो हृष्टो नगरं प्रविवेश ह ॥ ३ ॥
रथ, हाथी, घोड़े तथा अन्य अनेक प्रकारकी सवारियोंद्वारा वहाँसे चलकर वे आपसमें यह कह रहे थे कि भीमसेन तो हमलोगोंसे आगे ही चले गये हैं । पापी दुर्योधनने भीमसेनको वहाँ न देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो भाइयोंके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा ह्यविदन् पापमात्मनि ।
स्वेनानुमानेन परं साधुं समनुपश्यति ॥ ४ ॥
राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा थे, उनके पवित्र हृदयमें दुर्योधनके पापपूर्ण विचारका भानतक न हुआ । वे अपने ही अनुमानसे दूसरेको भी साधु ही देखते और समझते थे ॥ ४ ॥
सोऽभ्युपेत्य तदा पार्थो मातरं भ्रातृवत्सलः ।
अभिवाद्याब्रवीत् कुन्तीमम्ब भीम इहागतः ॥ ५ ॥
भाईपर स्नेह रखनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उस समय माताके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके बोले— ' माँ! भीमसेन यहाँ आया है क्या? ' ॥ ५ ॥
क्व गतो भविता मातर्नेह पश्यामि तं शुभे ।
उद्यानानि वनं चैव विचितानि समन्ततः ॥ ६ ॥
तदर्थं न च तं वीरं दृष्टवन्तो वृकोदरम् ।
मन्यमानास्ततः सर्वे यातो नः पूर्वमेव सः ॥ ७ ॥
‘ मातः! वह कहाँ गया होगा? शुभे! यहाँ भी तो मैं उसे नहीं देख रहा हूँ । वहाँ हमलोगोंने भीमसेनके लिये उद्यान और वनका कोना- कोना खोज डाला । फिर भी जब
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वीरवर भीमको हम देख न सके, तब सबने यही समझ लिया कि वह हमलोगोंसे पहले ही चला गया होगा ॥ ६-७ ॥
आगताः स्म महाभागे व्याकुलेनान्तरात्मना ।
इहागम्य क्व नु गतस्त्वया वा प्रेषितः क्व नु ॥ ८ ॥
‘ महाभागे! हम उसके लिये अत्यन्त व्याकुल हृदयसे यहाँ आये हैं । यहाँ आकर वह कहीं चला गया? अथवा तुमने उसे कहीं भेजा है? ' ॥ ८ ॥
कथयस्व महाबाहुं भीमसेनं यशस्विनि ।
न हि मे शुध्यते भावस्तं वीरं प्रति शोभने ॥ ९ ॥
‘ यशस्विनि! महाबाहु भीमसेनका पता बताओ । शोभने! वीर भीमसेनके विषयमें मेरा हृदय शंकित हो गया है ॥ ९ ॥
यतः प्रसुप्तं मन्येऽहं भीमं नेति हतस्तु सः ।
इत्युक्ता च ततः कुन्ती धर्मराजेन धीमता ॥ १० ॥
हा हेति कृत्वा सम्भ्रान्ता प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ।
न पुत्र भीमं पश्यामि न मामभ्येत्यसाविति ॥ ११ ॥
‘ जहाँ मैं भीमसेनको सोया हुआ समझता था, वहीं किसीने उसे मार तो नहीं डाला? ’ बुद्धिमान् धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर कुन्ती ' हाय - हाय' करके घबरा उठी और युधिष्ठिरसे बोली — ' बेटा! मैंने भीमको नहीं देखा है । वह मेरे पास आया ही नहीं ॥ १०-११ ॥
शीघ्रमन्वेषणे यत्नं कुरु तस्यानुजैः सह ।
इत्युक्त्वा तनयं ज्येष्ठं हृदयेन विदूयता ॥ १२ ॥
क्षत्तारमानाय्य तदा कुन्ती वचनमब्रवीत् ।
क्य गतो भगवन् क्षत्तर्भीमसेनो न दृश्यते ॥ १३ ॥
' तुम अपने छोटे भाइयोंके साथ शीघ्र उसे ढूँढ़नेका प्रयत्न करो । ' कुन्तीका हृदय पुत्रकी चिन्तासे व्यथित हो रहा था, उसने ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरसे उपर्युक्त बात कहकर विदुरजीको बुलवाया और इस प्रकार कहा-' भगवन्! भीमसेन नहीं दिखायी देता, वह कहाँ चला गया? ॥ १२-१३ ॥
उद्यानान्निर्गताः सर्वे भ्रातरो भ्रातृभिः सह ।
तत्रैकस्तु महाबाहुर्भीमो नाभ्येति मामिह ॥ १४ ॥
‘ उद्यानसे सब लोग अपने भाइयोंके साथ चलकर यहाँ आ गये, किंतु अकेला महाबाहु भीम अबतक मेरे पास लौटकर नहीं आया! ॥ १४ ॥
न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः ।
क्रूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः ॥ १५ ॥