श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 911–920
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920
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पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ ॥ २८ ॥
'पाण्डुपुत्रोंके जन्म, उनकी वृद्धि तथा वेदाध्ययन आदि देखकर आपलोग सदा अत्यन्त प्रसन्न होंगे ॥ २८ ॥
वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य च ।
पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि ॥ २ ९ ॥
'साधु पुरुषोंके आचार- व्यवहारका पालन करते हुए राजा पाण्डु उत्तम पुत्रोंकी उपलब्धि करके आजसे सत्रह दिन पहले पितृलोकवासी हो गये ॥ २९ ॥
तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम् ।
प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मनः ॥ ३० ॥
‘ जब वे चितापर सुलाये गये और उन्हें अग्निके मुखमें होम दिया गया, उस समय देवी माद्री अपने जीवनका मोह छोड़कर उसी अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ३० ॥
सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता ।
तस्यास्तस्य च यत् कार्यं क्रियतां तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥
‘ वह पतिव्रता देवी महाराज पाण्डुके साथ ही पतिलोकको चली गयी । अब आपलोग माद्री और पाण्डुके लिये जो कार्य आवश्यक समझें, वह करें ॥ ३१ ॥
( पृथां च शरणं प्राप्तां पाण्डवांश्च यशस्विनः । यथावदनुगृह्णन्तु धर्मो ह्येष सनातनः ॥ )
इमे तयोः शरीरे द्वे पुत्राश्चेमे तयोर्वराः ।
क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परंतपाः ॥ ३२ ॥
' शरणमें आयी हुई कुन्ती तथा यशस्वी पाण्डवोंको आपलोग यथोचित रूपसे अपनाकर अनुगृहीत करें; क्योंकि यही सनातन धर्म है । ये पाण्डु और माद्री दोनोंके शरीरोंकी अस्थियाँ हैं और ये ही उनके श्रेष्ठ पुत्र हैं, जो शत्रुओंको संतप्त करनेकी शक्ति रखते हैं । आप माद्री और पाण्डुकी श्राद्ध -क्रिया करनेके साथ ही मातासहित इन पुत्रोंको भी अनुगृहीत करें ॥ ३२ ॥
प्रेतकार्ये निवृत्ते तु पितृमेधं महायशाः ।
लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः ॥ ३३ ॥
‘ सपिण्डीकरणपर्यन्त प्रेतकार्य निवृत्त हो जानेपर कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष महायशस्वी एवं सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डुको पितृमेध ( यज्ञ) -का भी लाभ मिलना चाहिये' ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् कुरूणामेव पश्यताम् ।
क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे तापसा गुह्यकैः सह ॥ ३४ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसी बात कहकर उनके देखते -देखते वे सभी तपस्वी मुनि गुह्यकोंके साथ क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ३४ ॥
गन्धर्वनगराकारं तथैवान्तर्हितं पुनः ।
ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मयं ते परं ययुः ॥ ३५ ॥
( कौरवाः सहसोत्पत्य साधु साध्विति विस्मिताः ॥ ) गन्धर्वनगरके समान उन महर्षियों और सिद्धोंके समुदायको इस प्रकार अन्तर्धान होते देख वे सभी कौरव सहसा उछलकर 'साधु- साधु ' ऐसा कहते हुए बड़े विस्मित हुए ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ऋषिसंवादे पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमेंऋषिसंवादविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ३ ९ ३ श्लोक हैं )
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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः और माद्रीकी अस्थियोंका दाह - संस्कार तथा भाई- पाण्डु बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान धृतराष्ट्रउवाच
पाण्डोर्विदुर सर्वाणि प्रेतकार्याणि कारय ।
राजवद् राजसिंहस्य माद्र्याश्चैव विशेषतः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले- विदुर! राजाओंमें श्रेष्ठ पाण्डुके तथा विशेषतः माद्रीके भी समस्त प्रेतकार्य राजोचित ढंगसे कराओ ॥ १ ॥
पशून् वासांसि रत्नानि धनानि विविधानि च ।
पाण्डोः प्रयच्छ माद्र्याश्च येभ्यो यावच्च वाञ्छितम् ॥ २ ॥
यथा च कुन्ती सत्कारं कुर्यान्माद्र्यास्तथा कुरु ।
यथा न वायुर्नादित्यः पश्येतां तां सुसंवृताम् ॥ ३ ॥
पाण्डु और माद्रीके लिये नाना प्रकारके पशु, वस्त्र, रत्न और धन दान करो । इस अवसरपर जिनको जितना चाहिये, उतना धन दो । कुन्तीदेवी माद्रीका जिस प्रकार सत्कार करना चाहें, वैसी व्यवस्था करो । माद्रीकी अस्थियोंको वस्त्रोंसे अच्छी प्रकार ढँक दो, जिससे उसे वायु तथा सूर्य भी न देख सकें ॥ २-३ ॥
न शोच्यः पाण्डुरनघः प्रशस्यः स नराधिपः ।
यस्य पञ्च सुता वीरा जाताः सुरसुतोपमाः ॥ ४ ॥
निष्पाप राजा पाण्डु शोचनीय नहीं, प्रशंसनीय हैं, जिन्हें देवकुमारोंके समान पाँच वीर पुत्र प्राप्त हुए हैं ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्तं तथेत्युक्त्वा भीष्मेण सह भारत ।
पाण्डुं संस्कारयामास देशे परमपूजिते ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! विदुरने धृतराष्ट्रसे ' तथास्तु ' कहकर भीष्मजीके साथ परम पवित्र स्थानमें पाण्डुका अन्तिम संस्कार कराया ॥ ५ ॥
ततस्तु नगरात् तूर्णमाज्यगन्धपुरस्कृताः ।
निर्हृताः पावका दीप्ताः पाण्डो राजन् पुरोहितैः ॥ ६ ॥
राजन्! तदनन्तर शीघ्र ही पाण्डुका दाह -संस्कार करनेके लिये पुरोहितगण घृत और सुगन्ध आदिके साथ प्रज्वलित अग्नि लिये नगरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥
अथैनामार्तवैः पुष्पैर्गन्धैश्च विविधैर्वरैः ।
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शिबिकां तामलंकृत्य वाससाऽऽच्छाद्य सर्वशः ॥ ७ ॥
इसके बाद वसन्त - ऋतुमें सुलभ नाना प्रकारके सुन्दर पुष्पों तथा श्रेष्ठ ग्रन्धोंसे एक शिबिका ( वैकुण्ठी ) -को सजाकर उसे सब ओरसे वस्त्रद्वारा ढँक दिया गया ॥ ७ ॥
तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः ।
अमात्या ज्ञातयश्चैनं सुहृदश्चोपतस्थिरे ॥ ८ ॥
इस प्रकार बहुमूल्य वस्त्रों और पुष्पमालाओंसे सुशोभित उस शिबिकाके समीप मन्त्री, भाई- बन्धु और सुहृद्- सम्बन्धी - सब लोग उपस्थित हुए ॥ ८ ॥
नृसिंहं नरयुक्तेन परमालंकृतेन तम् ।
अवहन् यानमुख्येन सह माद्र्या सुसंयतम् ॥ ९ ॥
उसमें माद्रीके साथ पाण्डुकी अस्थियाँ भली- भाँति बाँधकर रखी गयी थीं । मनुष्योंद्वारा ढोई जानेवाली और अच्छी तरह सजायी हुई उस शिबिकाके द्वारा वे सभी बन्धु - बान्धव माद्रीसहित नरश्रेष्ठ पाण्डुकी अस्थियोंको ढोने लगे ॥ ९ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन च ।
सर्ववादित्रनादैश्च समलंचक्रिरे ततः ॥ १० ॥
शिबिकाके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था । चँवर डुलाये जा रहे थे । सब प्रकारके बाजों-गाजोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी ॥ १० ॥
रत्नानि चाप्युपादाय बहूनि शतशो नराः ।
प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तस्यौर्ध्वदेहिके ॥ ११ ॥
सैकड़ों मनुष्योंने उन महाराज पाण्डुके दाह - संस्कारके दिन बहुत-से रत्न लेकर याचकोंको दिये ॥ ११ ॥
अथच्छत्राणि शुभ्राणि चामराणि बृहन्ति च ।
आजहुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च ॥ १२ ॥
इसके बाद कुरुराज पाण्डुके लिये अनेक श्वेत छत्र, बहुतेरे बड़े - बड़े चँवर तथा कितने ही सुन्दर- सुन्दर वस्त्र लोग वहाँ ले आये ॥ १२ ॥
याजकैः शुक्लवासोभिर्हृयमाना हुताशनाः ।
अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमानाः स्वलंकृताः ॥ १३ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव सहस्रशः ।
रुदन्तः शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम् ॥ १४ ॥
पुरोहितलोग सफेद वस्त्र धारण करके अग्निहोत्रकी अग्निमें आहुति डालते जाते थे । वे अग्नियाँ माला आदिसे अलंकृत एवं प्रज्वलित हो पाण्डुकी पालकीके आगे - आगे चल रही थीं । सहस्रों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शोकसे संतप्त हो रोते हुए महाराज पाण्डुकी शिबिकाके पीछे जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥ अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते ।
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कृत्वा चास्माननाथांश्च क्व यास्यति नराधिपः ॥ १५ ॥
वे कहते जाते थे — ‘ हाय! ये महाराज हमलोगोंको छोड़कर, हमें सदाके लिये भारी दुःखमें डालकर और हम सबको अनाथ करके कहाँ जा रहे हैं ' ॥ १५ ॥
क्रोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च ।
रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ॥ १६ ॥
न्यासयामासुरथ तां शिबिकां सत्यवादिनः ।
सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मणः ॥ १७ ॥
समस्त पाण्डव, भीष्म तथा विदुरजी क्रन्दन करते हुए जा रहे थे । वनके रमणीय प्रदेशमें गंगाजीके शुभ एवं समतल तटपर उन लोगोंने, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रीकी उस शिबिकाको रखा ॥ १६-१७ ॥
ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् ।
शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरूषितम् ॥ १८ ॥
पर्यषिञ्चञ्जलेनाशु शातकुम्भमयैर्घटैः ।
चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन् ॥ १ ९ ॥
कालागुरुविमिश्रेण तथा तुङ्गरसेन च ।
अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन् ॥ २० ॥
तदनन्तर राजा पाण्डुकी अस्थियोंको सब प्रकारकी सुगन्धोंसे सुवासित करके उनपर पवित्र काले अगरका लेप किया गया । फिर उन्हें दिव्य चन्दनसे चर्चित करके सोनेके कलशोंद्वारा लाये हुए गंगाजल से भाई-बन्धुओंने उसका अभिषेक किया । तत्पश्चात् उनपर सब ओरसे काले अगरसे मिश्रित तुंगरस नामक ग्रन्ध -द्रव्यका एवं श्वेत चन्दनका लेप किया गया । इसके बाद उन्हें सफेद स्वदेशी वस्त्रोंसे ढक दिया गया ॥ १८–२० ॥
संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः ।
शुशुभे स नरव्याघ्रो महार्हशयनोचितः ॥ २१ ॥
इस प्रकार बहुमूल्य शय्यापर शयन करनेयोग्य नरश्रेष्ठ राजा पाण्डुकी अस्थियाँ वस्त्रोंसे आच्छादित हो जीवित मनुष्यकी भाँति शोभा पाने लगीं ॥ २१ ॥
( हयमेधाग्निना सर्वे याजकाः सपुरोहिताः । वेदोक्तेन विधानेन क्रियाश्चक्रुः समन्त्रकम् ॥ )
याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुष्ठिते ।
घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलंकृतम् ॥ २२ ॥
समस्त याजकों और पुरोहितोंने अश्वमेधकी अग्निसे वेदोक्त विधिके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं । याजकोंकी आज्ञा लेकर प्रेतकर्म आरम्भ करते समय माद्रीसहित अलंकारयुक्त राजाका घृतसे अभिषेक किया गया ॥ २२ ॥
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तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना ।
अन्यैश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन् ॥ २३ ॥
फिर तुंग और पद्मकमिश्रित सुगन्धित चन्दन तथा अन्य विविध प्रकारके गन्ध-द्रव्योंसे भाई- बन्धुओंने युधिष्ठिरद्वारा विधिपूर्वक उन दोनोंका दाह- संस्कार कराया ॥ २३ ॥
ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता ।
हा हा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि ॥ २४ ॥
उस समय उन दोनोंकी अस्थियोंको देखकर माता कौसल्या ( अम्बालिका ) ' हा पुत्र! हा पुत्र! ' कहती हुई सहसा मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २४ ॥
तां प्रेक्ष्य पतितामार्तां पौरजानपदो जनः ।
रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या कृपान्वितः ॥ २५ ॥
उसे इस प्रकार शोकातुर हो भूमिपर पड़ी देख नगर और जनपदके लोग राजभक्ति तथा दयासे द्रवित एवं दुःखसे संतप्त हो फूट- फूटकर रोने लगे ॥ २५ ॥
कुन्त्याश्चैवार्तनादेन सर्वाणि च विचुक्रुशुः ।
मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ २६ ॥
कुन्तीके आर्तनादसे मनुष्योंसहित समस्त पशु और पक्षी आदि प्राणी भी करुणक्रन्दन करने लगे ॥ २६ ॥
तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः ।
सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन् भृशदुःखिताः ॥ २७ ॥
शन्तनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर तथा सम्पूर्ण कौरव भी अत्यन्त दुःखमें निमग्न हो रोने लगे ॥ २७ ॥
ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः ।
उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोषितः ॥ २८ ॥
तदनन्तर भीष्म, विदुर, राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डवोंके सहित कुरुकुलकी सभी स्त्रियोंने राजा पाण्डुके लिये जलांजलि दी ॥ २८ ॥
चुक्रुशुः पाण्डवाः सर्वे भीष्मः शान्तनवस्तथा ।
विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्रुश्चाप्युदकक्रियाः ॥ २ ९ ॥
उस समय सभी पाण्डव पिताके लिये रो रहे थे । शन्तनुनन्दन भीष्म, विदुर तथा अन्य
भाई- बन्धुओंकी भी यही दशा थी । सबने जलांजलि देनेकी क्रिया पूरी की ॥ २ ९ ॥
कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान् ।
सर्वाः प्रकृतयो राजन् शोचमाना न्यवारयन् ॥ ३० ॥
जलांजलिदान करके शोकसे दुर्बल हुए पाण्डवोंको साथ ले मन्त्री आदि सब लोग स्वयं भी दुःखी हो उन सबको समझा- बुझाकर शोक करनेसे रोकने लगे ॥ ३० ॥
यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपुः सह बान्धवैः ।
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तथैव नागरा राजन् शिश्यिरे ब्राह्मणादयः ॥ ३१ ॥
तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् ।
बभूव पाण्डवैः सार्धं नगरं द्वादश क्षपाः ॥ ३२ ॥
राजन्! बारह रात्रियोंतक जिस प्रकार बन्धु- बान्धवों सहित पाण्डव भूमिपर सोये, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि नागरिक भी धरतीपर ही सोते रहे । उतने दिनोंतक हस्तिनापुर नगर पाण्डवोंके साथ आनन्द और हर्षोल्लाससे शून्य रहा । बूढ़ोंसे लेकर बच्चेतक सभी वहाँ दुःखमें डूबे रहे । सारा नगर ही अस्वस्थचित्त हो गया था ॥ ३१-३२ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदाहे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके दाहसंस्कारसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं )
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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना वैशम्पायन उवाच
ततः कुन्ती च राजा च भीष्मश्च सह बन्धुभिः ।
ददुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमयं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर कुन्ती, राजा धृतराष्ट्र तथा बन्धुओंसहित भीष्मजीने पाण्डुके लिये उस समय अमृतस्वरूप स्वधामय श्राद्धदान किया ॥ १ ॥
कुरूंश्च विप्रमुख्यांश्च भोजयित्वा सहस्रशः ।
रत्नौघान् विप्रमुख्येभ्यो दत्त्वा ग्रामवरांस्तथा ॥ २ ॥
उन्होंने समस्त कौरवों तथा सहस्रों मुख्य- मुख्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें रत्नोंके ढेर तथा उत्तम उत्तम गाँव दिये ॥ २ ॥
कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान् भरतर्षभान् ।
आदाय विविशुः सर्वे पुरं वारणसाह्वयम् ॥ ३ ॥
मरणाशौचसे निवृत्त होकर भरतवंशशिरोमणि पाण्डवोंने जब शुद्धिका स्नान कर लिया, तब उन्हें साथ लेकर सबने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥
सततं स्मानुशोचन्तस्तमेव भरतर्षभम् ।
पौरजानपदाः सर्वे मृतं स्वमिव बान्धवम् ॥ ४ ॥
नगर और जनपदके सभी लोग मानो कोई अपना ही भाई- बन्धु मर गया हो, इस प्रकार उन भरतकुलतिलक पाण्डुके लिये निरन्तर शोकमग्न हो गये ॥ ४ ॥
श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम् ।
सम्मूढां दुःखशोकार्तां व्यासो मातरमब्रवीत् ॥ ५ ॥
श्राद्धकी समाप्तिपर सब लोगोंको दुःखी देखकर व्यासजीने दुःख - शोकसे आतुर एवं मोहमें पड़ी हुई माता सत्यवतीसे कहा- ॥ ५ ॥
अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः ।
श्वः श्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना ॥ ६ ॥
‘ माँ! अब सुखके दिन बीत गये । बड़ा भयंकर समय उपस्थित होनेवाला है । उत्तरोत्तर
बुरे दिन आ रहे हैं । पृथ्वीकी जवानी चली गयी ॥ ६ ॥
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बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः ।
लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥ ७ ॥
‘ अब ऐसा भयंकर समय आयेगा, जिसमें सब ओर छल- कपट और मायाका बोलबाला होगा । संसारमें अनेक प्रकारके दोष प्रकट होंगे और धर्म-कर्म तथा सदाचारका लोप हो जायगा ' ॥ ७ ॥
कुरूणामनयाच्चापि पृथिवी न भविष्यति ।
गच्छ त्वं योगमास्थाय युक्ता वस तपोवने ॥ ८ ॥
'दुर्योधन आदि कौरवोंके अन्यायसे सारी पृथ्वी वीरोंसे शून्य हो जायगी; अतः तुम योगका आश्रय लेकर यहाँसे चली जाओ और योगपरायण हो तपोवनमें निवास करो ॥ ८ ॥
मा द्राक्षीस्त्वं कुलस्यास्य घोरं संक्षयमात्मनः ।
तथेति समनुज्ञाय सा प्रविश्याब्रवीत् स्नुषाम् ॥ ९ ॥
' तुम अपनी आँखोंसे इस कुलका भयंकर संहार न देखो। ' तब व्यासजीसे ‘ तथास्तु ’ कहकर सत्यवती अंदर गयी और अपनी पुत्रवधूसे बोली- ॥ ९ ॥
अम्बिके तव पौत्रस्य दुर्नयात् किल भारताः ।
सानुबन्धा विनङ्क्ष्यन्ति पौराश्चैवेति नः श्रुतम् ॥ १० ॥
' अम्बिके! तुम्हारे पौत्रके अन्यायसे भरतवंशी वीर तथा इस नगरके लोग सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट हो जायँगे - ऐसी बात मैंने सुनी है ॥ १० ॥
तत् कौसल्यामिमामार्तां पुत्रशोकाभिपीडिताम् ।
वनमादाय भद्रं ते गच्छामि यदि मन्यसे ॥ ११ ॥
' अतः तुम्हारी राय हो, तो पुत्रशोकसे पीड़ित इस दुःखिनी अम्बालिकाको साथ ले मैं
वनमें चली जाऊँ । तुम्हारा कल्याण हो ' ॥ ११ ॥
तथेत्युक्ता त्वम्बिकया भीष्ममामन्त्र्य सुव्रता ।
वनं ययौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत ॥ १२ ॥
अम्बिका भी ‘ तथास्तु ’ कहकर साथ जानेको तैयार हो गयी। जनमेजय! फिर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सत्यवती भीष्मजीसे पूछकर अपनी दोनों पतोहुओंको साथ ले वनको चली गयी ॥ १२ ॥
ताः सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम ।
देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा ॥ १३ ॥
भरतवंशशिरोमणि महाराज जनमेजय! तब वे देवियाँ वनमें अत्यन्त घोर तपस्या करके शरीर त्यागकर अभीष्ट गतिको प्राप्त हो गयीं ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
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अथाप्तवन्तो वेदोक्तान् संस्कारान् पाण्डवास्तदा ।
संव्यवर्धन्त भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उस समय पाण्डवोंके वेदोक्त ( समावर्तन आदि) संस्कार हुए । वे पिताके घरमें नाना प्रकारके भोग भोगते हुए पलने और पुष्ट होने लगे ॥ १४ ॥
धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तो मुदिताः सुखम् ।
बालक्रीडासु सर्वासु विशिष्टास्तेजसाभवन् ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ सुखपूर्वक खेलते हुए वे सदा प्रसन्न रहते थे । सब प्रकारकी बालक्रीड़ाओंमें अपने तेजसे वे बढ़ - चढ़कर सिद्ध होते थे ॥ १५ ॥
जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे ।
धार्तराष्ट्रान् भीमसेनः सर्वान् स परिमर्दति ॥ १६ ॥
दौड़नेमें, दूर रखी हुई किसी प्रत्यक्ष वस्तुको सबसे पहले पहुँचकर उठा लेनेमें, खान-पानमें तथा धूल उछालनेके खेलमें भीमसेन धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका मानमर्दन कर डालते थे ॥ १६ ॥
हर्षात् प्रक्रीडमानांस्तान् गृह्य राजन् निलीयते ।
शिरःसु विनिगृह्यैतान् योधयामास पाण्डवैः ॥ १७ ॥
शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम् ।
एक एव निगृह्णाति नातिकृच्छ्राद् वृकोदरः ॥ १८ ॥
कचेषु च निगृह्यैनान् विनिहत्य बलाद् बली ।
चकर्ष क्रोशतो भूमौ घृष्टजानुशिरोंऽसकान् ॥ १ ९ ॥
राजन्! हर्षसे खेल- कूदमें लगे हुए उन कौरवोंको पकड़कर भीमसेन कहीं छिप जाते थे । कभी उनके सिर पकड़कर पाण्डवोंसे लड़ा देते थे । धृतराष्ट्रके एक सौ एक कुमार बड़े बलवान् थे; किंतु भीमसेन बिना अधिक कष्ट उठाये अकेले ही उन सबको अपने वशमें कर लेते थे । बलवान् भीम उनके बाल पकड़कर बलपूर्वक उन्हें एक- दूसरेसे टकरा देते और उनके चीखने - चिल्लानेपर भी उन्हें धरतीपर घसीटते रहते थे । उस समय उनके घुटने, मस्तक और कंधे छिल जाया करते थे ॥ १७–१९ ॥
दश बालाञ्जले क्रीडन् भुजाभ्यां परिगृह्य सः ।
आस्ते स्म सलिले मग्नो मृतकल्पान् विमुञ्चति ॥ २० ॥
वे जलमें क्रीड़ा करते समय अपनी दोनों भुजाओंसे धृतराष्ट्रके दस बालकोंको पकड़ लेते और देरतक पानीमें गोते लगाते रहते थे । जब वे अधमरे से हो जाते, तब उन्हें छोड़ते थे ॥ २० ॥
फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ते तदा ।
तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान् ॥ २१ ॥