महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 941–950

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950

पृष्ठ 941

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पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वान्‌की पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया । कृपी सदा अग्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी ॥ ४५-४६ ॥

अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च ।

स जातमात्रो व्यनदद् यथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥ ४७ ॥

गौतमी कृपीने द्रोणसे अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया । उस बालकने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा घोड़ेके समान शब्द किया ॥ ४७ ॥

तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् ।

अश्वस्येवास्य यत् स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ॥ ४८ ॥

अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति ।

सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ॥ ४९ ॥

उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा- ' इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा है; अतः यह अश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा । ' उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४८-४९ ॥

तत्रैव च वसन् धीमान् धनुर्वेदपरोऽभवत् ।

स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् ॥ ५० ॥

सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।

ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन् दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ५१ ॥

बुद्धिमान् द्रोण उसी आश्रममें रहकर धनुर्वेदका अभ्यास करने लगे । राजन्! किसी समय उन्होंने सुना कि ' महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं ॥ ५०-५१ ॥

स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह ।

श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ॥ ५२ ॥

द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की । इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया ॥ ५२ ॥

ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः ।

वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ॥ ५३ ॥

फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये ॥ ५३ ॥

ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः ।

क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद् भृगुनन्दनम् ॥ ५४ ॥

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महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान् तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया ॥ ५४ ॥

ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् ।

आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ॥ ५५ ॥

तत्पश्चात् शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया और यह भी कहा कि ' मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है' ॥ ५५ ॥

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् ।

ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषुं तदा ॥ ५६ ॥

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् ।

भरद्वाजात् समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ॥ ५७ ॥

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ । इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया । तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा -' द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ । आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे आया हूँ । मेरा नाम द्रोण है ' ॥ ५६-५७३ ॥ तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ॥ ५८ ॥

यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले - ॥ ५८ ॥

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मेI एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद् वचः ॥ ५ ९ ॥

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु ।

अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ॥ ६० ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है । तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो । ' उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन - रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा - ' महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो ' ॥ ५ ९ -६० ॥ राम उवाच

हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम् ।

ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन ॥ ६१ ॥

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना ।

कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ॥ ६२ ॥

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परशुरामजी बोले – तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया । इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है ॥ ६१-६२ ॥

शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम् ।

अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ॥ ६३ ॥

अब मेरा यह शरीरमात्र बचा है । साथ ही नाना प्रकारके बहुमूल्य अस्त्र- शस्त्रोंका ज्ञान अवशिष्ट है ॥ ६३ ॥

अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्मयोद्यतम् ।

वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ॥ ६४ ॥

अतः तुम अस्त्र - शस्त्रोंका ज्ञान अथवा यह शरीर माँग लो । इसे देनेके लिये मैं सदा प्रस्तुत हूँ । द्रोण! बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र उसे कहो ॥ ६४ ॥

द्रोणउवाच

अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव ।

सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ॥ ६५ ॥

द्रोणने कहा — भृगुनन्दन! आप मुझे प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधिसहित सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंका ज्ञान प्रदान करें ॥ ६५ ॥

तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः ।

सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ॥ ६६ ॥

तब ‘ तथास्तु ' कहकर भृगुवंशी परशुरामजीने द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्र प्रदान किये तथा रहस्य और व्रतसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका भी उपदेश किया ॥ ६६ ॥

प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः ।

प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ॥ ६७ ॥

वह सब ग्रहण करके द्विजश्रेष्ठ द्रोण अस्त्र - विद्याके पूरे पण्डित हो गये और अत्यन्त प्रसन्न हो अपने प्रिय सखा द्रुपदके पास गये ॥ ६७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य भार्गवादस्त्रप्राप्तौ ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र- विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ९ ॥ FUEL O Futal * गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वान्‌को भी गौतम कहा जाता था ।

पृष्ठ 944

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* धनुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं – मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त । छोड़े जानेवाले बाण आदिको ‘ मुक्त’ कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड्ग आदिको ' अमुक्त' कहते हैं । जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र ' मुक्तामुक्त' कहलाता है । जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र ' मन्त्रमुक्त' कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र – ये भी धनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार - इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं ।

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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना वैशम्पायन उवाच

ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् ।

अब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! प्रतापी द्रोण राजा द्रुपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले — ‘ राजन्! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ' ॥ १ ॥

इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्वं जनेश्वरः ।

भारद्वाजेन पाञ्चालो नामृष्यत वचोऽस्य तत् ॥ २ ॥

मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश द्रुपद उनकी इस बातको सह न सके ॥ २ ॥

सक्रोधामर्षजिह्मभ्रूः कषायीकृतलोचनः ।

ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम् ॥ ३ ॥

क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले ॥ ३ ॥

द्रुपदउवाच

अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा ।

यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ॥ ४ ॥

द्रुपदने कहा— ब्रह्मन्! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य - अपरिपक्व है । तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है । तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि ' राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ' ॥ ४ ॥

न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् ।

सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतैः ॥ ५ ॥

ओ मूढ़! बड़े -बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती ॥ ५ ॥

पृष्ठ 946

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सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः ।

सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ॥ ६ ॥

समयके अनुसार मनुष्य ज्यों- ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों - ही- त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है । पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी — उस समय मैं और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे ॥ ६ ॥

न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् ।

कालो ह्येनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत ॥ ७ ॥

लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती । समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है ॥ ७ ॥

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि ।

आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ॥ ८ ॥

इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो । हम दोनों एक- दूसरेके मित्र थे— इस भावको हृदयसे निकाल दो । द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ - साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी ॥ ८ ॥

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुषः सखा ।

न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ ९ ॥

सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो ॥ ९ ॥

ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् ।

तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ १० ॥

जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक- सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है । हृष्ट- पुष्ट और दुर्बलमें ( धनवान् और निर्धनमें ) कभी मित्रता नहीं हो सकती ॥ १० ॥

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ।

नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ ११ ॥

जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय ( वेदवेत्ता ) - का मित्र नहीं हो सकता । जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता । इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता । फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो? ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् ।

मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ १२ ॥

स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चालं प्रति बुद्धिमान् ।

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जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे । वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन - ही- मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये ॥ १२-१३ ॥

स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने ।

भारद्वाजोऽवसत् तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तमः ॥ १४ ॥

हस्तिनापुरमें पहुँचकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके घरमें गुप्तरूपसे निवास करने लगे ॥ १४ ॥

ततोऽस्य तनुजः पार्थान् कृपस्यानन्तरं प्रभुः ।

अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जनाः ॥ १५ ॥

वहाँ उनके पुत्र शक्तिशाली अश्वत्थामा कृपाचार्यके बाद पाण्डवोंको स्वयं ही अस्त्रविद्याकी शिक्षा देने लगे; किंतु लोग उन्हें पहचान न सके ॥ १५ ॥

एवं स तत्र गूढात्मा कंचित् कालमुवास ह ।

कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वयात् ॥ १६ ॥

क्रीडन्तो वीटया तत्र वीराः पर्यचरन् मुदा ।

पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा ॥ १७ ॥

इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया । तदनन्तर एक दिन कौरव -पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली- डंडा खेलने लगे । उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी ॥ १६-१७ ॥

ततस्ते यत्नमातिष्ठन् वीटामुद्धर्तुमादृताः ।

न च ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये ॥ १८ ॥

तब वे उस बीटाको निकालनेके लिये बड़ी तत्परताके साथ प्रयत्नमें लग गये; परंतु उसे प्राप्त करनेका कोई भी उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया ॥ १८ ॥

ततोऽन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनताननाः ।

तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन् ॥ १ ९ ॥

इस कारण लज्जासे नतमस्तक होकर वे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे । गुल्ली निकालनेका कोई उपाय न मिलनेके कारण वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये ॥ १ ९ ॥

तेऽपश्यन् ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम् ।

कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम् ॥ २० ॥

इसी समय उन्होंने एक श्याम वर्णके ब्राह्मणको थोड़ी ही दूरपर बैठे देखा, जो अग्निहोत्र करके किसी प्रयोजनसे वहाँ रुके हुए थे । वे आपत्तिग्रस्त जान पड़ते थे । उनके

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सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीर अत्यन्त दुर्बल था ॥ २० ॥

ते तं दृष्ट्वा महात्मानमुपगम्य कुमारकाः भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मणं पर्यवारयन् ॥ २१ ॥

उन महात्मा ब्राह्मणको देखकर वे सभी कुमार उनके पास गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये । उनका उत्साह भंग हो गया था । कोई काम करनेकी इच्छा नहीं होती थी । मनमें भारी निराशा भर गयी थी ॥ २१ ॥

अथ द्रोणः कुमारांस्तान् दृष्ट्वा कृत्यवतस्तदा ।

प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान् ॥ २२ ॥

तदनन्तर पराक्रमी द्रोण यह देखकर कि इन कुमारोंका अभीष्ट कार्य पूर्ण नहीं हुआ है - ये उसी प्रयोजनसे मेरे पास आये हैं, उस समय मन्द मुसकराहटके साथ बड़े कौशलसे बोले— ॥ २२ ॥

अहो वो धिग् बलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्राताम् ।

भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत ॥ २३ ॥

' अहो! तुमलोगोंके क्षत्रियबलको धिक्कार है और तुमलोगोंकी इस अस्त्र - विद्या-विषयक निपुणताको भी धिक्कार है; क्योंकि तुमलोग भरतवंशमें जन्म लेकर भी कुएँमें गिरी हुई गुल्लीको नहीं निकाल पाते ॥ २३ ॥

वीटां च मुद्रिकां चैव ह्यहमेतदपि द्वयम् ।

उद्धरेयमिषीकाभिर्भोजनं मे प्रदीयताम् ॥ २४ ॥

'देखो, मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस अँगूठी दोनोंको सींकोंसे निकाल सकता हूँ ।

तुमलोग मेरी जीविकाकी व्यवस्था करो ' ॥ २४ ॥

एवमुक्त्वा कुमारांस्तान् द्रोणः स्वाङ्गुलिवेष्टनम् ।

कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदमः ॥ २५ ॥

उन कुमारोंसे यों कहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणने उस निर्जल कुएँमें अपनी अँगूठी डाल दी ॥ २५ ॥

ततोऽब्रवीत् तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने द्रोणसे कहा ॥ २५३ ॥

युधिष्ठिर उवाच कृपस्यानुमते ब्रह्मन् भिक्षामाप्नुहि शाश्वतीम् ॥ २६ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् । युधिष्ठिर बोले— ब्रह्मन्! आप कृपाचार्यकी अनुमति ले सदा यहीं रहकर भिक्षा प्राप्त

करें ।

उनके यों कहनेपर द्रोणने हँसकर उन भरतवंशी राजकुमारोंसे कहा ॥ २६३ ॥

पृष्ठ 949

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द्रोणउवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता ॥ २७ ॥

द्रोण बोले- ये मुट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र- मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया ॥ २७ ॥

अस्या वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते ।

भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया ॥ २८ ॥

तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है । मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूँगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींकको बींधूंगा ॥ २८ ॥

तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरीको तीसरीसे बींधते हुए अनेक सींकोंका संयोग होनेपर मुझे गुल्ली मिल जायगी ॥ २८३ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्वं कृतमञ्जसा ॥ २ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया ॥ २ ९ ॥

तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।

आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ॥ ३० ॥

यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे । इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले ॥ ३० ॥

कुमारा ऊचुः

मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर ।

कुमारोंने कहा – ब्रह्मर्षे! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ॥ ३०

वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय धनुर्द्रोणो महायशाः ॥ ३१ ॥

शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभुः ।

सशरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ॥ ३२ ॥

ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः ।

मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ॥ ३३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - तब महायशस्वी द्रोणने धनुष- बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया । शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे

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बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्चर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा ॥ ३१–३३ ॥ कुमारा ऊचुः

अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते ।

कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ॥ ३४ ॥

कुमार बोले — ब्रह्मन्! हम आपको प्रणाम करते हैं । यह अद्भुत अस्त्र- कौशल दूसरे किसीमें नहीं है । आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं - यह हम जानना चाहते हैं । बताइये, हमलोग आपकी क्या सेवा करें? ॥ ३४ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान् । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा ॥ ३४ ॥

द्रोणउवाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम् ॥ ३५ ॥

स एव सुमहातेजाः साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते ।

द्रोण बोले- तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो ।

वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं ॥ ३५३ ॥

वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः ॥ ३६ ॥

ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् ।

भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—' बहुत अच्छा' कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्मणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया । कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं ॥ ३६-३७ ॥

युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च ।

अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् ॥ ३८ ॥

परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः ।

हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत् ॥ ३ ९ ॥

फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये । वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी