महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 951–960

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

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बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया ॥ ३८-३९ ॥ द्रोणउवाच

महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत ।

अस्त्रार्थमगमं पूर्वं धनुर्वेदजिघृक्षया ॥ ४० ॥

द्रोणाचार्यने कहा – अपनी प्रतिज्ञासे कभी च्युत न होनेवाले भीष्मजी! पहलेकी बात है, मैं अस्त्र- शस्त्रोंकी शिक्षा तथा धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये महर्षि अग्निवेशके समीप गया था ॥ ४० ॥

ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः ।

अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रतः ॥ ४१ ॥

वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोंतक रहा । गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया ॥ ४१ ॥

पाञ्चालो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः ।

इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत् तस्मिन्नेव गुरौ प्रभुः ॥ ४२ ॥

उन दिनों पंचालराजकुमार महाबली यज्ञसेन द्रुपद भी, जो बड़े शक्तिशाली थे, धनुर्वेदकी शिक्षा पानेके लिये उन्हीं गुरुदेव अग्निवेशके समीप रहते थे ॥ ४२ ॥

स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे ।

तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो ॥ ४३ ॥

वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे । प्रभो! उनके साथ मिल-जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा ॥ ४३ ॥

बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च ।

स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः ॥ ४४ ॥

बचपनसे ही हम दोनोंका अध्ययन साथ- साथ चलता था । द्रुपद वहाँ मेरे घनिष्ठ मित्र थे । वे सदा मुझसे प्रिय वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे ॥ ४४ ॥

अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम् ।

अहं प्रियतमः पुत्रः पितुर्द्रोण महात्मनः ॥ ४५ ॥

भीष्मजी! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली यह बात बोले— 'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिताका अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ ॥ ४५ ॥

अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चालो यदा तदा ।

त्वद्भोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे ॥ ४६ ॥

मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च ।

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एवमुक्त्वाथ वव्राज कृतास्त्रः पूजितो मया ॥ ४७ ॥

‘ तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा । सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ- मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे। ' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये ॥ ४६-४७ ॥

तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा ।

सोऽहं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद् यशस्विनीम् ॥ ४८ ॥

नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् ।

अग्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम् ॥ ४ ९ ॥

उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था । कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अग्निहोत्र, सत्र तथा शम- दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वान्की पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया ॥ ४८-४९ ॥

अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम् ।

भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम् ॥ ५० ॥

उस गौतमी कृपीने मुझसे मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामाको प्राप्त किया, जो सूर्यके समान तेजस्वी तथा भयंकर पराक्रम एवं पुरुषार्थ करनेवाला है ॥ ५० ॥

पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भरद्वाजो मया यथा ।

गोक्षीरं पिबतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान् ।

अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद् दिशः ॥ ५१ ॥

उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी । एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे । उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल- स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा । इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया—-मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा ॥ ५१ ॥

न स्नातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु ।

इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन् ॥ ५२ ॥

विशुद्धमिच्छन् गाङ्गेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् ।

अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छं पयस्विनीम् ॥ ५३ ॥

मैंने मन-ही- मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत- सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी

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इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया । गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी ॥ ५२-५३ ॥

अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारकाः ।

पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयापि च ॥ ५४ ॥

ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहितः ।

तं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु बालैः परिवृतं सुतम् ॥ ५५ ॥

हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत् ।

द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति ॥ ५६ ॥

मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि ' मैंने दूध पी लिया ' । कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ । उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, ' इस धनहीन द्रोणको धिक्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता ॥ ५४–५६ ॥

पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया ।

नृत्यति स्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाप्युत ॥ ५७ ॥

इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् ।

आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम् ॥ ५८ ॥

अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे ।

परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्यां धनेप्सया ॥ ५ ९ ॥

‘जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि ' मैंने भी दूध पी लिया । ' इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी । मैं स्वयं ही अपने - आपकी निन्दा करता हुआ मन - ही- मन इस प्रकार सोचने लगा- ' मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया । मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता ' ॥ ५७ –५ ९ ॥

इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम् ।

पूर्वस्नेहानुरागित्वात् सदारः सौमकिं गतः ॥ ६० ॥

भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा द्रुपदके यहाँ गया ॥ ६० ॥

अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् ।

प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् ॥ ६१ ॥

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मैंने सुन रखा था कि द्रुपदका राज्याभिषेक हो चुका है, अतः मैं मन-ही- मन अपनेको कृतार्थ मानने लगा और बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए अपने प्रिय सखाके समीप गया ॥ ६१ ॥

संस्मरन् संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत् ।

ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो ॥ ६२ ॥

अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति ।

उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगतः ॥ ६३ ॥

उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था । तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा— ' नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही । ' प्रभो! मैं द्रुपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला ॥ ६२-६३ ||

स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् ।

अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा ॥ ६४ ॥

परंतु द्रुपदने मुझे नीच मनुष्यके समान समझकर उपहास करते हुए इस प्रकार कहा - ' ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त असंगत एवं अशुद्ध है ॥ ६४ ॥

यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ।

संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः ॥ ६५ ॥

' तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि ' राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ! ' समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों - त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है ॥ ६५ ॥

सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ।

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ॥ ६६ ॥

'पहले तुम्हारे साथ मेरी जो मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी - उस समय हम दोनोंकी शक्ति समान थी ( किंतु अब वैसी बात नहीं है ) । जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय ( वेदवेत्ता ) -का, जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता ॥ ६६ ॥

साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यान्नोपपद्यते ।

न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित् ॥ ६७ ॥

‘ सब बातोंमें समानता होनेसे ही मित्रता होती है । विषमता होनेपर मैत्रीका होना असम्भव है । फिर लोकमें कभी किसीकी मैत्री अजर - अमर नहीं होती ॥ ६७ ॥

कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत ।

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि ॥ ६८ ॥

' समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीकी उपासना ( भरोसा ) न करो । हम दोनों एक-

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दूसरेके मित्र थे, इस भावको हृदयसे निकाल दो ' ॥ ६८ ॥

आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ।

न ह्यनाढ्यः सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुषः सखा ॥ ६ ९ ॥

न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते ।

न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् ॥ ७० ॥

सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतैः ।

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ॥ ७१ ॥

नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ।

अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम् ॥ ७२ ॥

'द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह ( साथ- साथ खेलने और अध्ययन करने आदि ) स्वार्थको लेकर हुई थी । सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े -बड़े राजाओंकी तुम्हारे - जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता । फिर तुम मुझे जीर्ण- शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है ॥ ६ ९ –७२ ॥

एकरात्रं तु ते ब्रह्मन् कामं दास्यामि भोजनम् ।

एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा ॥ ७३ ॥

'ब्रह्मन्! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता हूँ । ' राजा द्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया ॥ ७३ ॥

तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव ।

द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ ७४ ॥

चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा । द्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ ॥ ७४ ॥

अभ्यागच्छं कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः ।

ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः ॥ ७५ ॥

इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान् शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ । बताइये, मैं आपका कौन- सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ ७५३ ॥

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वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ॥ ७६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा ॥ ७६ ॥

भीष्मउवाच

अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय ।

भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥ ७७ ॥

भीष्मजी बोले - विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धनुर्वेद एवं अस्त्र- शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये । कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये ॥ ७७ ॥

कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् ।

त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव ॥ ७८ ॥

कौरवोंके पास जो धन, राज्य- वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं ।

समस्त कौरव आपके अधीन हैं ॥ ७८ ॥

यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् ।

दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ७९ ॥

ब्रह्मन्! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्षे! आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है । आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है ॥ ७९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-द्रोण-समागमविषयक एक सौतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥

*• जौके आकारकी बनी हुई काठकी मोटी गुल्लीको ' बीटा' कहते हैं ।

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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा वैशम्पायन उवाच

ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः ।

विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी द्रोणाचार्यने भीष्मजीके द्वारा पूजित हो कौरवोंके घरमें विश्राम किया । वहाँ उनका बड़ा सम्मान किया गया ॥ १ ॥

विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन् पौत्रानादाय कौरवान् ।

शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ॥ २ ॥

गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् ।

भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः ॥ ३ ॥

गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंको लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया । साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन- धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया ॥ २-३ ॥

स ताञ्शिष्यान् महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् ।

पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः ॥ ४ ॥

महाधनुर्धर आचार्य द्रोणने प्रसन्नचित्त होकर उन धृतराष्ट्र- पुत्रों तथा पाण्डवोंको शिष्यरूपमें ग्रहण किया ॥ ४ ॥

प्रतिगृह्य च तान् सर्वान् द्रोणो वचनमब्रवीत् ।

रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा ॥ ५ ॥

उन सबको ग्रहण कर लेनेपर एक दिन एकान्तमें जब द्रोणाचार्य पूर्ण विश्वासयुक्त मनसे अकेले बैठे थे, तब उन्होंने अपने पास बैठे हुए सब शिष्योंसे यह बात कही ॥ ५ ॥

द्रोणउवाच

कार्यं मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि सम्परिवर्तते ।

कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं मे तदेतद् वदतानघाः ॥ ६ ॥

द्रोण बोले- निष्पाप राजकुमारो! मेरे मनमें एक कार्य करनेकी इच्छा है । अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर लेनेके पश्चात् तुमलोगोंको मेरी वह इच्छा पूर्ण करनी होगी । इस विषयमें तुम्हारे

पृष्ठ 958

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क्या विचार हैं, बतलाओ ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन् विशाम्पते ।

अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली ॥ ७ ॥

ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः ।

प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ॥ ८ ॥

तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े ॥ ८ ॥

ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च ।

ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ॥ ९ ॥

तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों ( तथा अन्य शिष्यों)|- को नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र- शस्त्रोंकी शिक्षा देने लगे ॥ ९ ॥

राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ ।

अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ॥ १० ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समय दूसरे- दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे ॥ १० ॥

वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः ।

सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ॥ ११ ॥

वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण— ये सभी आचार्य द्रोणके पास ( अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये ) आये ॥ ११ ॥

स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः ।

दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ॥ १२ ॥

सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग- डाँट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था ॥ १२ ॥

अभ्ययात् स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया ।

शिक्षाभुजबलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः ।

अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ॥ १३ ॥

तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च ।

सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः ॥ १४ ॥

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पाण्डुनन्दन अर्जुन ( सदा अभ्यासमें लगे रहनेसे ) धनुर्वेदकी जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योगकी दृष्टिसे उन सभी शिष्योंमें श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोणकी समानता करनेयोग्य हो गये । उनका अस्त्र - विद्यामें बड़ा अनुराग था, इसलिये वे तुल्य अस्त्रोंके प्रयोग, फुर्ती और सफाईमें भी सबसे बढ़ - चढ़कर निकले ॥ १३-१४ ॥

ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत ।

एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ १५ ॥

आचार्य द्रोण उपदेश ग्रहण करनेमें अर्जुनको अनुपम प्रतिभाशाली मानते थे । इस प्रकार आचार्य सब कुमारोंको अस्त्र - विद्याकी शिक्षा देते रहे ॥ १५ ॥

कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात् ।

पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात् ॥ १६ ॥

यावत् ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम् ।

द्रोण आचष्ट पुत्राय तत् कर्म जिष्णुरौहत ॥ १७ ॥

वे अन्य सब शिष्योंको तो पानी लानेके लिये कमण्डलु देते, जिससे उन्हें लौटनेमें कुछ विलम्ब हो जाय; परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामाको बड़े मुँहका घड़ा देते, जिससे उसके लौटनेमें विलम्ब न हो ( अतः अश्वत्थामा सबसे पहले पानी भरकर उनके पास लौट आता था ) । जबतक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तबतक वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको अस्त्र-संचालनकी कोई उत्तम विधि बतलाते थे । अर्जुनने उनके इस कार्यको जान लिया ॥ १६-१७ ॥

ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम् ।

सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः ॥ १८ ॥

आचार्यपुत्रात् तस्मात् तु विशेषोपचयेऽपृथक् ।

न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः ॥ १ ९ ॥

अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद् गुरुपूजने ।

अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत् ॥ २० ॥

अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्वत्थामासे किसी बातमें कम न रहे । वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे । अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा- पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे । अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी । इसीलिये वे द्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये ॥ १८–२० ॥

तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम् ।

आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत ॥ २१ ॥

अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन ।

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न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया ॥ २२ ॥

अर्जुनको धनुष - बाणके अभ्यासमें निरन्तर लगा हुआ देख द्रोणाचार्यने रसोइयेको एकान्तमें बुलाकर कहा - ' तुम अर्जुनको कभी अँधेरेमें भोजन न परोसना और मेरी यह बात भी अर्जुनसे कभी न कहना' ॥ २१-२२ ॥

ततः कदाचिद् भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने ।

तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः ॥ २३ ॥

तदनन्तर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, बड़े जोरसे हवा चलने लगी; उससे वहाँका जलता हुआ दीपक बुझ गया ॥ २३ ॥

भुङ्क्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते ।

हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात् ॥ २४ ॥

उस समय भी कुन्तीनन्दन अर्जुन भोजन करते ही रहे । उन तेजस्वी अर्जुनका हाथ अभ्यासवश अँधेरेमें भी मुखसे अन्यत्र नहीं जाता था ॥ २४ ॥

तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः ।

योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः ॥ २५ ॥

उसे अभ्यासका ही चमत्कार मानकर महाबाहु पाण्डुनन्दन अर्जुन रातमें भी धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगे ॥ २५ ॥

तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत ।

उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥

भारत! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार द्रोणने सोते समय सुना । तब वे उठकर उनके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर बोले ॥ २६ ॥

द्रोणउवाच

प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः ।

त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥

द्रोणने कहा - अर्जुन! मैं ऐसा करनेका प्रयत्न करूँगा, जिससे इस संसारमें दूसरा

कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो । मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च ।

रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत् ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्य अर्जुनको पुनः घोड़ों, हाथियों, रथों तथा भूमिपर रहकर युद्ध करनेकी शिक्षा देने लगे ॥ २८ ॥

गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु ।

द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ॥ २ ९ ॥