मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 141–150

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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श्रीगणेशाय नमः । मनुस्मृति । पहला अध्याय |

मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः ।

प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥

भगवन् सर्ववर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।

अन्तरप्रभवानाञ्च धर्मान्नो वकुमर्हसि ॥ २ ॥

त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयंभुवः ।

प्रचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो ॥ ३ ॥

स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः ।

प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षीच्छूयतामिति ॥ ४ ॥

ॐ नमः शिवाय । पहला अध्याय । महर्पियों ने एकाग्रचित्त बैठे हुए मनु महाराज के पास जाकर और उनका पूजन करके, विधिपूर्वक यह प्रश्न किया-हे भगवन्! आप सच ब्राह्मण श्रादि वर्णों के और सङ्कीर्ण जातियों के वर्णाश्रम- धर्म क्रम से कहने में समर्थ हैं, इस लिये हमलोगों को उपदेश क-रिए । आप सब वैदिक श्रौतस्मार्त कर्मों के अगाध और अनन्त विषयों के एकही जानने वाले हैं ॥ १-३ ॥ इस प्रकार महर्षियों के विनयपूर्वक प्रश्नों को सुनकर, महात्मा मनु ने, सब का लार करके कहा -अच्छा सुनो ॥ ४ ॥

पृष्ठ 142

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मनुस्मृति ।

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ५ ॥

ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्को व्यञ्जयन्निदम् ।

महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासी सोनुदः ॥ ६ ॥

योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।

सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुभौ ॥ ७ ॥

सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।

अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ८ ॥

तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।

तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ६ ॥

जगत् की सृष्टि | यह संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व अन्धकारमय था + श्रज्ञात था, इसका कोई लक्षण न था । किसी अनुमान से जानने लायन न था । चारों तरफ़ से मानो सोया हुआ था । इस महाप्रलय स्थिति के अनन्तर सृष्टि के आरम्भ में, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकोश आदि विश्वको सुक्ष्मरूप से, स्थूलरूप में प्रकट करनेकी इच्छा से अतीन्द्रिय महासूक्ष्म, नित्य, विश्वव्यापक, अचिन्त्य परमात्मा ने, अपने को जाहिर किया । श्रर्थात् महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति द्वारा अपनी शक्ति को संसार में प्रकट किया । उसके वाद नानाविध प्रजासृष्टिकी इच्छा से, पूर्व अलसृष्टि करके, उसमें अपना शक्ति- रूप वीज स्थापित किया ॥५८॥ वह वीज ईश्वरेच्छा से, सूर्य के

समान चमकीला सुवर्ण काला गोला + होगया । उत्तमें संपूर्ण विश्व के पितामह स्वयं ब्रह्मां का प्रादुर्भाव हुआ- ॥ ६॥

+ श्रुति है ' तम आसीत् तमसा गूढमत्र इति । ' * श्रुति है 'तीनमासीत् । ' छान्दोग्य श्रुति है ' सदेव सौम्येदमग्र आसीत् । ' fies से हिरण्यगर्भ नामसे परमात्मा का प्रादुर्भाव हुआ है । वैदिक श्रुतिभी है:- हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातःपतिरेक आसीत् । सदाकारपृथिवीद्यामुतेमाम् । '

पृष्ठ 143

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पहला अध्याय । आपो नारा इति प्रोक्रा आपो वै नरसूनवः ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १० ॥

यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।

तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ ११ ॥

तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।

स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्विधा ॥ १२ ॥

ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे ।

मध्ये व्योम दिशश्चाष्टाव स्थानं च शाश्वतम्॥ १३1. ॥

जल को नार कहते हैं क्योंकि वे नर नामक परमात्मा से पैदा हुए हैं । जल में ही परमात्मा ने ब्रह्मरूप से पहले स्थिति की है । इसलिये परमात्मा को नारायण कहते हैं । जो सारे जगत् का उपादानकारण प्रकट है, सनातन है, सत् -असत् पदार्थों का प्रकृतिभूत है, उसी से उत्पन्न वह पुरुष, संसार में ब्रह्मा नाम से कहा जाता है । ब्रह्मा ने उस एड में ब्राह्ममान से एक वर्ष रहकर अपनी इच्छा से उसका दो टुकड़ा किया । ऊपर के भाग से स्वलोक, नीचे से भूलोक और दोनों के बीच श्राकाश बनाकर, आठों दिशा और जल का स्थिर स्थान -समुद्र को बनाया ॥१०-१३॥ * तैत्तिरीय-चारएंयक में, जल से प्रजापति की उत्पत्तिकावर्णन है । 'श्रापो वै इदमासन् सलिलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्करपणें समभवत् । तस्यान्तर्मनसि कामः समवर्तत, "इदं सृजेयम्' इति । ' पोह वाइदम, सलिलमेवास । शतपथनाहाय १०।१।६ 'तस्याप एव प्रतिष्ठा । स हि इमे लोकाः प्रतिष्ठिताः ) ' [ शतपथ ब्राहाण, ६ । ७ । १ । १७ इस प्रकार कई श्रुति हैं । तैत्तिरीय आरश्य के प्रथम भाग में, सृष्टिवर्धन विस्तारपूर्वक किया गया है ।

पृष्ठ 144

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मनुस्मृति | उद्ववर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम् i मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम् ॥ १४ ॥

महान्तमेव चात्मानं सर्वाणित्रिगुणानि च ।

विषयाणां ग्रहीतृणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च ॥ १५ ॥

तेष त्ववयवान्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम् । 1

सन्निवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे ॥ १६ ॥

यन्सूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तस्येमान्याश्नयन्ति पद् ।

तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्ति सनीषिणः ॥ १७ ॥

अब सृष्टिक्रम कहते हैं: ---- ब्रह्मा ने उस परमात्मा. ( प्रकृति ) से सुन और मन से ब्रहङ्कार, उससे महत्तत्त्व, सत्त्व, रज, तम तीनों गुण और शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों के ग्राहक पांच ज्ञानेन्द्रिय और ब्रहङ्कार इन छ के सूक्ष्म अवयवों को अपनी अपनी मात्रात्रों में अर्थात् शब्द. स्पर्शादिकों में मिलाकर सब स्थावर, जङ्गमरूप विश्व की रचना की । शरीर के सूक्ष्म छ अवयव अर्थात् अहङ्कार और पञ्च- महाभूत सब कार्यों के श्राश्रय होने से उस ब्रह्मा की मूर्ति को

शरीर कहते हैं । १४–१७ ॥

तदा विशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः ।

मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम्॥ १८ ॥

तेषामिदं तु. सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम् ।

सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाय्यम्॥१६ ॥

श्राद्याद्यस्य गुणत्वेषामवाप्नोति परः परः ।

यो यो यावतिथश्चैषां स स तावद्गुणः स्मृतः ॥ २० ॥

पृष्ठ 145

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पहला अध्याय ।

सर्वेषान्तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।

वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥ २१ ॥

पञ्चमहाभूत और मन अपने कार्यों और सूक्ष्म अवयवों के द्वारा सब भूतों की उत्पत्ति के लिये अविनाशी ब्रह्म में प्रविष्ट होते हैं । . उन सात प्रकृतियाँ अर्थात् महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चमहाभूत की सूक्ष्म मात्राओं से पञ्चतन्मात्रा से अविनाशी परमात्मा नाशवान् जगत्को उत्पन्न किया करता है । इन पञ्चमहाभूतों में पहले पहले का गुण दूसरा दूसरा पाता है । जैसा, श्राकाश का गुण शब्द आगे के वायु में व्याप्त हुआ । वायु का गुण स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप जल में इत्यादि । इनमें जिसमें जितने गुण हैं वह उतने गुणवाला है । जैसे श्राकाश में एक गुण शब्द है । वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं इसलिये आकाश एक गुणवाला और वायु दो गुणवाला कहलाया । यो आगे भी जानना चाहिए । परमात्मा ने वेदानुसार ही सबके नाम और कर्म अलग अलग बांट दिये हैं, जैसा गोजाति का नाम गो, अश्व का अश्व और कर्म जैसा ब्राह्मणों का वेदाध्ययन आदि, क्षत्रियों का प्रजारक्षा श्रादि जैसा पूर्वकल्प में था वैसा ही रचा गया है ॥ १८-२१ ॥

कर्मात्मनां च देवानां सोऽसृजत्प्राणिनां प्रभुः ।

साध्यानाञ्च गणं सूक्ष्मं यज्ञं चैव सनातनम् ॥ २२ ॥

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्मा सनातनम् ।

दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ॥ २३ ॥

कालङ्कालविभक्रीश्च नक्षत्राणिग्रहांस्त था ।

सरितः सागरान् शैलान् समानि विषमाणिच॥ है२४, ऐसे॥

फिर परमात्मा ने, यज्ञादि में जिनको भाग दिया देवताजाता, साध्य- प्राणवाले इन्द्रादि देवता; वनस्पति आदि के स्वामी II • वेद में लिखा है- ' धाता यथापूर्वमकल्पयत्

पृष्ठ 146

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६ मनुस्मृति । नामक सूक्ष्म देवगण और यज्ञों को रचा । अग्नि, वायु और सूर्य इन तीनों से क्रम से यज्ञकर्म संपादन के लिये, ऋक्, यजु, साम इस त्रयी विद्या को उत्पन्न किया । काल और काल का विभाग वर्ष, मास, पक्ष, तिथि, प्रहर, घटिका, पल, विपल आदि नक्षत्र, ग्रहहुई, ॥ नदी२२-२४, समुद्र॥, पर्वत3 और ऊंची, नीची भूमि की सृष्टि

तपो वाचं रतिं चैव कामं च क्रोधमेव च ।

सृष्टिं ससर्ज चैवेमां त्रष्टुमिच्छन्निमाः प्रजाः ॥ २५ ॥

कर्मणां च विवेकार्थं धर्माधर्मो व्यवेचयत् ।

द्वन्द्वैरयोजयश्चेमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः ॥ २६ ॥

अण्व्यो मात्राविनाशिन्यो दशार्द्धानां तु याः स्मृताः ।

ताभिः सार्द्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः ॥ २७ ॥

यस्तु कर्मणि यस्मिन् स न्ययुक्त प्रथमं प्रभुः ।

स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ॥ २८ ॥

* अग्नि, वायु और रवि से वेदत्रयी की उत्पत्ति, छान्दोग्य उपनिषद में इसी प्रकार हैं । जैमा–' प्रजापतिलोंकानम्यतपत् । तेषां तप्यमानानां रसान् प्रावृहत् । अग्नि पृथिव्या, वायुमन्तरिक्षातु, यादित्यं दिवः । स एतास्तिस्रो देवता श्रभ्यतपत् । तासां तप्यमानानां रसान् प्रावृहत् । अग्नेर्ऋचो, वायोर्यजूंषि, सांम यादित्यात् । स एतां त्रयीं विद्यां श्रभ्यतपत् । तस्था तप्यमानाचा रसान् प्रावृहत् । भूरिति ऋग्भ्यो भुवारेति यजुर्भ्यः, स्वरिति सामभ्यः ॥'. तैत्तिरीय ब्राह्मण ( २ । ३ । १० ) में, 'प्रजापतिः सोमं राजानमसृजत । तं त्रयो वेदा अन्वसृव्यन्त । ' ' प्राजापत्यो वेदः । इत्यादि लेखों से और शतपथ ब्राह्मण की श्रुतियों से, वेद की उत्पत्ति प्रजापति से सिद्ध होती है । इसके सिवा कई प्रकार के लेख मिलते हैं । परन्तु मूलभाव में भेद नहीं है । अग्नि, वायु और रवि से वेदोत्पत्ति होने से ही,ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्निस्तुति है । गजु का वायु और साम का सूर्यस्तुति विषय का है ।

पृष्ठ 147

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पहला अध्याय ।

हिंस्राहिंसे मृदुकर धर्माधर्मावृतानृते ।

यद्यस्य सोऽद्धात्सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् ॥ २६ ॥

सृष्टि की इच्छा करके ब्रह्मा ने तप, वाणी, रति, काम और क्रोध को उत्पन्न किया । भले और बुरे कर्मों के विचार के लिये धर्म और धर्म को बनाया । सुख, दुःख, काम, क्रोध आदि द्वन्द्वधर्मो के अधीन संसार के प्राणियों को किया । पञ्चमहाभूतों.. की सूक्ष्ममात्रा-पञ्चतन्मात्राओं के साथ यह सारी सृष्टि क्रम से पैदा हुई है । सृष्टि के आदि में उस प्रभु ने, जिस स्वाभाविक कर्म में, जिसकी योजना की उसका जब जब जन्म हुआ उसी कर्म को उसने स्वयं किया । हिंस्रकर्म अहिंस्रकर्म, मृदु -दया, कर-कठोरता, धर्मचर्य, गुरुसेवा, अधर्म- सूंठ बोलना आदि जो पूर्वकल्प में 'जिसका था वही सृष्टि के समय उसमें प्रविष्ट होगया । २५-२६ ॥

यथर्तुलिङ्गानृतवः स्वयमेवपर्यये ।

स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः ॥ ३० ॥

लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः ।

ब्राह्मण क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्त्तयत् ॥ ३१ ॥

द्विधाकृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोभवत् ।

अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः ॥ ३२ ॥

तपस्तप्त्वास्सृजयं तु स स्वयं पुरुषो विराट् ।

तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ॥ ३३ ॥

अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।

पतीन्प्रजानामस्सृजं महर्षीनादितो दश ॥ ३४ ॥

मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।

प्रचेतसं वशिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 148

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८ मनुस्मृति । जिस प्रकार वसन्त श्रादि ऋतु अपने स्वाभाविक चिह्नों को जैसे श्राम की मञ्जरी ( चौर ) धारण करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य, अपने अपने पूर्व कर्मों को प्राप्त होते हैं । परमात्मा ने लोक की वृद्धि के लिये, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को पैदा किया । इनमें विराट्रूप परमात्मा के मुख से ब्राह्मण, " भुजा से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य श्ररे पैर से शुद्ध उत्पन्न... हुए । इस संसार के दो भाग करके एक पुरुष और दूसरा स्त्री •बनाया.* स्त्रीभाग से विराट्पुरुष पैदा किया । उस विराट्पुरुषरूप " प्रजापति ने तप करके जिस पुरुष को उत्पन्न किया वही मैं, सारे विश्व का बनानेवाला हूं-ऐसा आपलोग जानिये | मैंने प्रजासृष्टि की इच्छा से कठिन तप करके पहले दश महर्षियों को उत्पन्न किया । उनके नाम इस प्रकार हैं-मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, प्रचेतस, वशिष्ठ, भृगु और नारद ॥ ३०-३५॥

एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजन् भूरितेजसः ।

"देवान् देवनिकायांश्च महर्षीश्चामितौजसः ॥ ३६ ॥

यक्षरक्षःपिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोऽसुरान् ।

नागान्सर्पान्सुपर्णाश्च पितॄणां च पृथग्गणान्॥३७ ॥

विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च ।. उल्कानिर्घातकेतूंश्च ज्योतींष्युच्चावचानि च ॥ ३८ ॥

किन्नरान्वानरान्मत्स्यान् विविधांश्च विहंगमान् ।

पशून्मृगान्मनुष्यश्चि व्यालांश्चोभयतोदतः ॥ ३६ ॥

* शुक्लयजुर्वेदीय ' वाजसनेयीसंहिता के पुरुषसूक्त में लिखा है- ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्द्बह्णे राजन्यः कृतः । ऊरूं यदस्य तद्वैश्यः पदम्या 28 शूद्रो अजायत ।.' ' "तैत्तिरीयब्राह्मण में लिखा है:- अथो अर्धो वै एष श्रात्मनो यत्पत्नी । यज्ञो वै एष योऽपत्नीकः । ' ३' । ३ । ३ । ५ । शतपथब्राह्मण में, प्रजापति द्वारा सृष्टि- प्रक्रिया का विवरण विस्तारपूर्वक है । मनुकी सृष्टिप्रक्रिया उससे मिलती है ।

पृष्ठ 149

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पहला अध्याय | कृमिकीटपतङ्गश्च यूकामक्षिकमत्कुणम् । सर्वञ्च दंशमशकं स्थावरञ्च पृथग्विधम्॥ ४० ॥! एवमेतैरिदं सर्वं मन्नियोगान्महात्मभिः ।

यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ४१ ॥

.इन दश प्रजापतियों ने दूसरे प्रकाशमान सात मनुओं को, देवता और उनके निवासस्थानां को, ब्रह्मर्पियों को पैदा किया । श्रीर यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, सुपरी- गरुडादि, और पितरों को * उत्पन्न किया । विद्युत्- बिजली, शनि- एक तरह की बिजली, मेघ, रोहित - एक विचित्र वर्ण दण्डाकार श्राकाश का चिह्न, इन्द्रधनुप, उल्का जो श्राकाश से रेखाकार ज्योति गिरती है, निर्धात उत्पातशब्द, केतु- पूंछदार तारा, और नाना भांति के ज्योति ध्रुव, अगस्त्य आदि को उत्पन्न किया । कि- नर-श्रश्वमुख-नरदेह, वानर, मत्स्य, तरह तरह के पक्षिगण, पशु, मृग, मनुष्य, सर्प, ऊपर, नीचे दांतवाले जीव, कृमि, कीट, पतङ्ग, जूका, मक्खी, खटमल और संपूर्ण काटनेवाले छोटे जीव मच्छर श्रदि, मेरी श्राशा और अपनी तपस्या से मरीचि आदि महात्मानों ने इस स्थावर, जङ्गम विश्व को कर्मानुसार रचाहै ॥ ३६-४१ ॥ येषां तु यादृशं कर्म भूतानामिह कीर्तितम् । तत्तथा वोsभिधास्यामि क्रमयोगं च जन्मनिं ॥ ४२॥ ·

पशवश्च मृगाश्चैव व्यालाश्चोभयतोदतः ।

रक्षांसि च पिशाचाश्च मनुष्याश्च जरायुजाः ॥ ४३ ॥

से असुरों की सृष्टि * तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है -प्रजापति ने अपने निश्वास ' करके, कमसे पितृगण, देवगण श्रादिकी सृष्टि की है । ' प्रजातिरकामयत ' प्रजायेय ' इति । स तपोऽभ्यतप्यत । तेनासना असुगनसृ- । ' सिरीय जत । तदनु पितॄनसृजत । तदन मनुष्यानसृजत | तेन देवानसृजत श्रादाय २ ॥ 5 । *

पृष्ठ 150

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मनुस्मृति |

अण्डजाः पक्षिणः सर्पा नका मत्स्याश्च कच्छपाः ।

यानि चैवं प्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च ॥ ४४ ॥

स्वेदजं वंशमशकं यूकामक्षिकम कुणम् ।

ऊष्मणरवोपजायन्ते यच्चान्यत्किञ्चिदीदृशम् ॥ ४५ ॥

उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः ।

श्रोषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ ४६ ॥

अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः ।

पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ ४७ ॥

गुच्छ गुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः ।

बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च ॥ ४८ ॥

इस जगत् में जिन प्राणियों का जो कर्म कहा है वैसा ही हम कहेंगे और उनके जन्म का क्रम भी वर्णन करेंगे । सृष्टि चार प्रकार की है, उनको क्रम से कहते हैं-पशु, सिंह, ऊपर नीचे दाँतवाले, सद राक्षस, पिशाच और मनुष्य ये सवं ' जरायुज ' कहलाते हैं । पक्षी, साँप, नाक, मछली, कछुआ और जो ऐसेही भूमि या जल मैं पैदा होनेवाले जीव हैं वे सब ' श्रएडज ' हैं । मच्छर, दंश, जूँ, मक्खी, खटमल आदि पसीने की गर्मी से पैदा होनेवाले ' स्वेदज़ ' ' होते हैं । वृक्ष आदि को 'उद्भिज ' कहते हैं । ये दो तरहके हैं, बीज से पैदा होनेवाले और शाखा से पैदा होनेवाले । जो वृक्ष फलोंके पकजाने पर सुख जाते हैं और जो बहुत फल, फूलवाले होते हैं उनको 'ओषधि' कहते हैं । जिन में फल श्रावें पर फूल नहीं उनको 'वनस्पति' कहते हैं । और जो फल, फूलवाले हैं वे 'वृक्ष' कहे जाते हैं । जिस में जड़ से ही लेता का मूलहो, शाखा न हो उसको 'गुच्छ' कहते हैं । गुल्म- ईख वगैरह, तृराजाति-कई भांति के बीज और शाखा से पैदा होनेवाले, प्रतान-जिस में सूतसा निकले और वल्ली- गुर्व आदि सव 'उद्भिज' हैं ॥ ४२-४८ ॥