मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 221–230
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 221–230
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तीसरा अध्याय | ६१ पितृभ्यो वलिशेषं तु सब दक्षिणतो हरेत् ॥ ६१ ॥
शुनां च पतितानां च श्वपच पापरोगिणाम् ।
वायसानां कुमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥ ६२ ॥
विश्वेदेव के निमित्त आकाश में बलि देवे । दिन देवता और रात्रि देवताको बलि देवे | घर के सब से ऊंचे भाग में 'सर्वात्मभूतये नमः ' कहकर बनि देवे और बलिशेष को ' पितृभ्यो नमः ' कहकर दक्षिण दिशा में पितरों को चलि देना चाहिए । कुत्ता, पतित, चाण्डाल, फोड़ी, पापी, रोगी, कौश्रा, कीड़ों को धीरे से ज़मीन में दी वलि देना चाहिए ॥ ६०-६२ ॥
एवं यः सर्वभूतानि ब्राह्मणो नित्यमर्चति ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्तिः पथर्जुना ॥ ६३ ॥
कृत्यकर्मैवमतिथिं पूर्वमाशयेत् ।
भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद्ब्रह्मचारिणे ॥ ६४ ॥
यत्पुण्यफलमामोति गां दत्त्वा विधिवद्गुरोः ।
तत्पुण्यफलमाप्नोति भिक्षां दत्त्वा द्विजो गृही ॥ ६५ ॥
भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ।. वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ६६ ॥
नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।
भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद्दत्तानि दातृभिः ॥ ६७ ॥
विद्यातपः समृद्धे हुतं विप्रमुखाग्निषु ।
निस्तारयति दुर्गाश्च महतश्चैव किल्विषात् ॥ ६८ ॥
का संत्कार इस प्रकार जो गृहस्थ ब्राह्मण वलि देकर प्राणियोंहै । वलिकर्म के करता है, वह तेजस्वी परमधाम को प्राप्तऔरहोताब्रह्मचारी को भिक्षा याददान करनाश्रतिथिसत्कारचाहिए | करेगुरु फिरको गोदानसंन्यासीकरने से जो पुण्य फल ११
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८२ मनुस्मृति । मिलता है, वही संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा देने से मिलता है । वेदविशारद ब्राह्मण का आदर करके भिक्षा वा एक जलपात्र देवे | वेदपाठरहित, मूर्ख ब्राह्मण को प्रज्ञान से जो भोजन दान दियाजाता है वह सच निष्फल होजाता है । विद्या और तपसे युक्त ब्राह्मणों के मुख रूप श्रग्नि में जो हवन-भोजन कराता है, वह महा- दुःख और पापों से उदारता है ॥ ६३-६८ ॥
संप्राप्ताय त्वतिये प्रदद्यादासनोदके ।
अश्नं चैव यथाशक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६६ ॥
अतिथि सत्कार | गृहस्थको आये हुए अतिथि का श्रासन, जल और असे यथा- शक्ति सत्कार करना चाहिए ॥ ६६ ॥
शिलानप्युच्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः ।
सर्व सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥ १०० ॥
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ॥
एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १०२ ॥
नैकमासीणमतिथिं विघं साङ्गतिकं तथा ।
उपस्थितं रहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ १०३ ॥
जो उवृत्ति ' खेतों से श्रन्न चीनकर निर्वाह ' करता हो और पञ्चाग्नि में हवन करता हो वह भी यदि अतिथि का सत्कार न करे तो अतिथि उसके सब पुण्य को ले लेता है । अन्न न हो तोभी दासन, भूमि, जल और मीठी बात ये सत्पुरुषों के यहां सदा रहते हैं । जो ब्राह्मण एक रात्रि गृहस्थ के यहाँ निवास करता है । उसको अतिथि कहते हैं । वह नित्य नहीं रहता इसी लिए अतिथि कहाजाता है । एक गांव में रहनेवाला, हँसी मज़ाक करके साथ
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तीसरा अध्याय | ८३ रखनेवाला स्त्री और अग्निहोत्री ब्राह्मण को अतिथि न ॥ चाहिए १००-१०३ ॥ मानना
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
तेनते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १०४ ॥
प्रणोद्योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिना ।
काले प्राप्तस्य काले वा नास्यानश्नन् गृहे वसेत्॥ १०५ ॥
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्त्र भोजयेत् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्य वातिथिपूजनम् ॥ १०६॥
जो सूर्ख दूसरे के यहां खाने के लोभ से अतिथि बनता है, वह मरकर न देनेवाले का पशु होता है । जो गृहस्थ के घर सूर्यास्त के बाद अतिथि श्रावे समय में या असमय में, तोभी उसको भूखा न रक्खे । जो अतिथि को न खिलाया हो वह पदार्थ खुद भी न खावे । अतिथि का सत्कार यश, आयु और स्वर्ग देनेवाला है ॥ १०४- १०६ ॥
श्रासनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम् ।
उत्तमेषूत्तमं कुर्याने हीनं समे समम्॥ १०७ ॥
वैश्वदेवे तु निर्वृत्ते यद्यन्योऽतिथिराब्रजेत् ।
तस्याप्यन्नं यथाशक्ति प्रदद्यान्न बलिं हरेत् ॥ १०८ ॥
भोजनार्थं स्वे विप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत् ।
भोजनार्थं हिते शंसन्यान्ताशीत्युच्यते बुधैः ॥ १०६ ॥
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते ।
arrat सखा चैव ज्ञातो गुरुरेव च ॥ ११० ॥
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमात्रजेत् ।
भुक्तवत्सूक्तविप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ १११ ॥
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८४. 'मनुस्मृति सबका आसन, स्थान, शय्या, सेना और अरदली में जाना, इन उसके उत्तम श्रतिथि उत्तम, मध्यम को मध्यम श्रीर साधारण से लायक बर्ताव करना चाहिए । वैश्वदेव के बाद जो कोई अतिथि पड़े तो उसको भी भोजन बनाकर खिलावे, पाक में से वलिन देवे 1. विप्र को भोजनार्थ अपना कुलं, गोत्र न बतलाना चाहिए!- यदि बतलावे तो वह, वान्ताशी ' उगलन खानेवाला ' कहा जाता: ' है । ब्राह्मण के घर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपना मित्र, जातीय पुरुष और गुरु ये सब अतिथि नहीं माने जाते । अगर क्षत्रिय अतिथि. कर आवे तो ब्राह्मणभोजन के बाद उसको भी खूब खिला देवे ॥ १०७-१११ ॥
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन्॥ ११२ ॥
इतरानपि संख्यादीन् संप्रीत्या गृहमागतान् ।
संस्कृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ ११३ ॥
'सुवासिनी: कुमारीश्च रोगियों गर्भिणीस्तथा ।
अतिथिभ्योऽय एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण के घर वैश्य, शूद्र भी अतिथिरूप से श्रजाय तो उनको भी नौकरों के साथ खिला देना चाहिए | और भी मित्र -सम्बन्धी श्रादि प्रेम से अपने घर आवे तो स्त्री के साथ उनको भी अच्छा भोजन देना चाहिए | नवीन विवाहवाली, कन्या, रोगीऔर गर्भवती इनको अतिथि के पहले ही विना विचार
किए भोजन करा देना चाहिए । १९१२- ११४ ॥
प्रदस्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्गे विचक्षणः ।
स भुञ्जानो न जानाति श्वशृद्वैर्जग्धिमात्मनः ॥ ११५ ॥
स्थ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि ।
भुयात ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ॥ ११६ ॥
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तीसरा अध्याय | ८५
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितृन्गृह्याश्च देवताः ।
पूजयित्वा ततःपश्चाद्गृहस्थः शेष भुग्भवेत् ॥ ११७ ॥
अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् । यज्ञशिष्टाशिनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते ॥ ११८ star॥ इस प्रकार सबको भोजन दिये विना जो पहले लेता है । मरने पर उसके मांस को कुत्ते और गीध खाते हैं । ब्राह्मण, अतिथि सम्बन्धी आदि को खिलाकर पीछे बचा श्रन आप और स्त्री खावे । देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घर के पूज्य देवताओं का पूजन करके शेष अन गृहस्थ को खाना चा- हिए । जो अपनेही लिए भोजन तैयार करता है वह केवल पाप को ही खाता है, क्योंकि उत्तम पुरुषों को पश्च महायज्ञ से बचे. न काही भोजन फलदायक होता है ॥ ११५-११८ ॥
राजविकस्नातकगुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् ।
अर्हयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ॥ ११६ ॥
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण संपूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ १२० ॥
सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत् । --वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातर्विधीयते ॥ १२१ ॥
राजा, ऋत्विक, स्नातक, गुरु, मित्र, जामाता, प्रिय पुरुष और श्वशुर, मामा, एक साल के चीतने पर घर जावे तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए । राजा और वेदक्ष ब्राह्मण साल के भीतर भी यदिअगरयज्ञयज्ञके मौक़ेन पर तोश्राजांयेंन पूजनतो करेमधुपर्क। स्त्रीसेकोपूजनशाम करनाको पकायेचाहिए ।में से fear as पढ़े ही बलि देना चाहिए । इस बलि को वैश्वदेव कहते हैं । यह सायंकाल और प्रातःकाल करना चाहिए । १ ९ ६ - १२१ ॥
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८६ मनुस्मृति ।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चेन्दुक्षयेऽग्निमान् ।
पिण्डान्वाहार्थकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥१२२ ॥
पितृणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ १२३ ॥
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १२४ ॥
द्वौ दैवे पितृकायें त्रीनेकैकसुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसजेत विस्तरे ॥ १२५ ॥
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः ।
पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम्॥ १२६ ॥
श्राद्ध-प्रकरण । अग्निहोत्री द्विज श्रमावास्या को पितृयज्ञ पूरी करके प्रतिमास पिण्डान्वाहार्य श्राद्ध को करे । पितरों का हर माल में जो श्राद्ध होता है उसको श्रन्वाहार्य श्राद्ध कहते हैं । वह उत्तम मांस से करना चाहिए । उसमें जो ब्राह्मण ग्राह्य हैं और जो त्याज्य हैं जितने,भोजन कराने चाहिएं और जो न चाहिए उसका विस्तार इस प्रकार है- देवकर्म में दो ब्राह्मण और पितृकर्म में तीन ब्राह्मण या दोनों में एक एक ही भोजन कराना चाहिए | धनी पुरुष भी अधिक ब्राह्मणों के भोजन में न लगे । विस्तार करने से ब्राह्मणों का सत्कार, देश, काल, पवित्रता और श्रेष्ठ ब्राह्मण इन पाँचों को नष्ट करताहै । इसलिए ज्यादा फैलाव कभी न करना चाहिए। १२२-१२६॥
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये ।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी ॥ १२७ ॥
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ॥ १२८ ॥
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तीसरा अध्याय | I
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये व भोजयेत् ।
पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ॥ १२६ ॥
अमावस्या के प्रेतकर्म को पितृकर्म कहते हैं । उसको जो करतां है वह नित्य लौकिक फल को पाता है । वेदपाठी, सदाचारी, ब्राह्मण को ही देव और पितृकर्म का अन्न आदि देना चाहिए, ऐसा दान महाफल को देता है । देवकर्म और पितृकर्म में एक एक भी विद्वान् ब्राह्मण को भोजन देने से बड़ा फल मिलताहै । पर बहुत से मूख को भी खिलाने से वह फल नहीं मिलता ॥ १२७-१२६ ॥
दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
तीर्थं तद्धव्यकव्यानांप्रदाने सोऽतिथिः स्मृतः ॥ १३० ॥
सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते ।
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ १३१ ॥
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च ।
न हि हस्तावग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुध्यतः ॥ १३२ ॥
यावत ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्व मन्त्रवित् ।
तातो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूल योगुडान् ॥ १३३ ॥
वंश से ही वेदश ब्राह्मण को जानदेनेरखेसे क्योंकिअतिथि वहके 'ब्राह्मण हव्य, कव्य देने का पात्र है । उसकोवेद न जाननेवाले दस लाख समान फल होता है ब्राह्मण भोजन करते हों । जिस, उसकाश्राद्धफलमें एकही वेदविशारद ब्राह्मणब्राह्मण को भोजन कराने से होता है । हव्य और कव्य सेज्ञानवृद्धसनेहुए हाथ को देना चाहिए, मूर्ख को नहीं । क्योंकिब्राह्मणरुधिरदेव और पितृकर्म aar से ही शुद्ध नहीं होते । वेदद्दीन उतने ही जलते हुए शल, मेंजितने हव्यकव्य के ग्रास खातानिगलनेहै, पड़ते हैं ॥ १३०-१३३ ॥ ष्ट और लोहगोल यजमान को ।ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे
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मनुस्मृति ।
तपःस्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ॥ १३४ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः ।
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि ॥ १३५ ॥
I श्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः ।
श्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ॥१३६ ॥
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्रियः पिता । सन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ॥ १३७ ॥ '
कोई ब्राह्मण श्रात्मज्ञानी, कोई तप में तत्पर, कोई तप और स्वाध्याय में तत्पर और कोई कर्मनिष्ठ ही होते हैं । इनमें ज्ञानी को श्राद्ध में ग्रहण करे, और देवकर्म में इन चारों को ग्रहण करना चाहिए | जिसका पिता वेद न हो, पर पुत्र वेदपारंगत हो अथवा पुत्र वेदवेत्ता न हो, पिता वेदपारंगत हो इन दोनों में जिसका पिता वेदपारगामी हो वह श्रेष्ठ है और दूसरा भी मान्य होता है ॥ १३४-१३७ ॥
न श्रद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः ।
'नारिंन मित्रं यं विद्यात्तंश्राद्धे भोजयेद्विजम् ॥१३८॥
यस्य मित्रप्रधानानिश्राद्धानि च हवींषि च! तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥ १३६ ॥
यः संगतानि कुरुते मोहाच्छाडेन मानवः ।
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रोद्विजाधसः॥ १४० ॥
श्राद्ध में मित्र को भोजन न करावे, मित्रों का संग्रह धन से करना चाहिए । जो अपना शत्रु वा मित्र न हो उसी ब्राह्मण को भोजन देना चाहिए । जो श्राद्ध और यज्ञ कर्म में केवल मित्रों को ही भोजन देता है, उसका फल परलोक में नहीं मिलता । जो ज्ञानी पुरुष श्राद्ध के द्वारा मैत्री बांधता है उसको स्वर्ग नहीं होता ॥ १३८-१४० ॥
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तीसरा अध्याय । ५६.
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः ।
वास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे वीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽचे हविर्दत्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतृच कुरुते फलभागिनः ।
विदुषे दक्षिणां दवा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह ' पैशाची द-क्षिणा ' कहलाती है । यह दक्षिणा -जैसे भोजन आदि श्रधी गौ एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।. परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज यो- फर, योनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही मूर्ख -वेदहीन ब्राह्मण को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोकं में फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्श्वयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बहुवृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्यतृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्त्रयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् । १२
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मनुस्मृति ।
दौहित्रं विपतिं वन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत् ॥ १४८॥
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ १४६ ॥..
ये. स्तेनपतितक्लीवा ये व नास्तिकवृत्तयः ।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननहीन् मनुरब्रवीत् ॥ १५० ॥
यदि योग्य ब्राह्मण न मिलें तो श्राद्ध में मित्र कोही खिलादे । पर शत्रु विद्वान् को भी न भोजन करावे-वह निष्फल होता है । वेदपारगामी ऋग्वेदी ब्राह्मण को, यजुर्वेदी को, समाप्ति तक सामवेद जाननेवाले को, श्राद्ध में अच्छीभांति भोजन कराना चाहिए | इन में से कोई भी ब्राह्मण जिसके श्राद्ध में श्रादर से भोजन पाता है, उसके सात पीढ़ी तक के पितर तृप्त होते हैं । यह हव्यऔर कव्य की प्रथम विधि है और सत्पुरुषों से श्राच रित गौण विधि इस प्रकार है- यदि ऊपर कहे ब्राह्मण न मिलें तो नाना, मामा, भानजा, संसुर, गुरु, जामाता, मौसेरा भाई, ऋत्विज और यज्ञ करानेवालों को भोजन देना । देवकर्म में ब्राह्मण की परीक्षा न करे और पितृकर्म में यत्न से परीक्षा करनी चाहिए । जो चोर पतित वा नपुंसक हो, नास्तिकभाव से जीविका करता हो उन ब्राह्मणों को मनुजी ने देवकर्म और पितृकर्म में योग्य कहा है ॥ १४४ - १५० ॥
जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा ।
याजयन्ति च ये पूगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत्॥ १५१ ॥
चिकित्सकान् देवलकान् मांसविक्रयिणस्तथा ।
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ॥ १५२ ॥
प्रेप्यो ग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः ।
प्रतिरोधा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वार्ध्वषिस्तथा ॥ १५३ ॥