मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 231–240
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 231–240
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तीसरा अध्याय ।
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृतिः ।
ब्रह्मद्विट् परिवित्तिश्च गणाभ्यन्तर एव च ॥ १५४ ॥
कुशीलवोsवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च ।
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ १५५ ॥
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा । शूद्रशिष्यो गुरुश्चैव वाग्दुष्टः कुण्डगोलकौ ॥ १५६ ॥ )
अकारणपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
ब्राह्मयनैश्च सम्बन्धैः संयोगं पतितैर्गतः ॥ १५७ ॥
पढ़, जटाधारी, दुर्बल, जुगारी, बहुत यजमानों को एक साथ चैठाकर यज्ञ करानेवाला, द्रव्य लेकर पूजा करानेवाला, इन को श्राद्ध में न खिलाये । वैद्य, पुजारी, मांस बेचनेवाला और वाणिज्य से जीविका करनेवाला इनको हव्यकव्य में न भोजन देवे । ग्राम श्री राजा का हलकारा, खराब नखवाला, काले दाँतवाला, गुरु- विरोधी, अग्निहोत्रत्यागी, व्याजखोर, क्षयरोगी, चरवाह, बड़े भाई के विवाह विना पूर्व ही विवाहित, पञ्चमहायज्ञ न करनेवाला, ब्राह्मणद्वेषी, छोटे भाई के विवाह होने पर अविवाहित बड़ा भाई, धर्मार्थ इकट्ठा किये धन से जीवन करनेवाला, नांच गान से जी- विका करनेवाला, ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, शूद्रा से विवाहित, पुनर्विवाह, का लड़का, काना, जिस के घर स्त्री का उपपति-जार रहता हो 'येतन लेकर पढ़ानेवाला, वेतन देकर पढ़ा हुआ । शूद्र काके मरनेगुरु,' कटुभाषी, कुण्ड पति के जीते जार से पैदा, गोलकगुरु-पतिको त्यागने पर जार से पैदा, विना कारण माता, पिता औरपतितों से कन्या,,वालासम्बन्धपतितोंकरनेवालाको पढ़ानेवालाइन सब कोपढ़नेवालाश्राद्ध में कभीऔर भोजन न कराना
चाहिए । १५१-१५७ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
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:२ मनुस्मृति 1. 'समुद्रयायी वन्दी च तैलिकः कूटकारकः ॥ ९ ५८ ॥
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशप्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ॥ १५६ ॥
धनुःशराणां कर्ता च यश्चाग्रे दिधिषूपतिः ।
मित्रध्रुक् द्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ १६० ॥
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यथो -पिशुनस्तथा ।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ १६१॥
घर में श्राग लगानेवाला, ज़हर देनेवाला, जार से पैदा हुए का प्रश्न खानेवाला, सोमलता बेचनेवाला, समुद्र पार जानेवाला, राजा की स्तुति करनेवाला, तेल का व्यापारी, भूंठी गवाही देने वाला, पिता से लड़नेवाला, धूर्त, शरावखोर, कोढ़ी आदि पाप- रोगी, निन्दित, पाखण्डी, दूध, दही बेचनेवाला, धनुष और बाए बनानेवाला, जो बड़ी बहिन के कारी रहते छोटी का पति बन गया हो, मित्रद्रोही, जुवा से जीविका करनेवाला, अपने पुत्र से विद्या पढ़नेवाला, मृगीरोगी, गण्डमालारोगी, श्वेतकुष्ठ, चुगल-! खोर, पागल, अन्धा, वेदनिन्दक इतने प्रकार के ब्राह्मण श्राद्ध वर्जित हैं ॥ १५८ - १६१ ॥
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिण पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ १६२ ॥
स्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः ।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एवं च ॥ १६३ ॥
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च ।
हिंस्रो वृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ॥ १६४ ॥
हाथी, बैल, घोड़ा और ऊँटों का सिखानेवाला, नक्षत्र से
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तीसराअध्याय । ६३ जीविका करनेवाला जोशी, पक्षी पालनेवाला, युद्धशिक्षा देने वाला, नहर श्रादि तोड़नेवाला, उसको बंद करनेवाला, घर बनानेवाला, दूत, मज़दूरी लेकर वृक्ष लगानेवाला, खेल के लिए कुत्ता पालनेवाला, बाज पक्षी से जीविका करनेवाला, कन्या को दूषित करनेवाला, हिंसक, शूद्र आचरण करनेवाला, और भूत, पिशाच पुजानेवाला ये सब कर्म करनेवाले ब्राह्मण श्राद्ध में
भोजन न पावें ॥। १६२-१६४ ॥
आचारहीनः क्लीवश्च नित्यं याचनकस्तथा ।
कृषिजीवी श्लीपदी च सद्भिर्निन्दित एव च ॥ १६५. ॥
औरनिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा ।
प्रेतनिर्यातकश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ १६६ ॥
एतान् विगर्हिताचारानपांक्लेयान् द्विजाधमान् ।
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् ॥ १६७ ॥
श्राचाररहित, नपुंसक, रोज़ भीख मांगनेवाला, खेती से जीनेभैंस वाला, पीलपांव रोगवाला, सत्पुरुषों से निन्दित, भैड़ा और से जीनेवाला, जो दूसरे की होचुकी हो उसके साथ विवाह करनेवाला और प्रेत का धन लेनेवाला इनको श्राद्धऔर मेंपंक्तिवाह्यवर्जित करना चाहिए । इन सब दूषित श्राचारवाले ब्रह्मणों को देव और पितृकार्य में विद्वान् पुरुष त्याग देवे ॥ १६५ - १६७ ॥
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ १६८ ॥
दाने यो दातुर्भवत्यूर्ध्वं फलोदयः । -दैवे हविषि पित्र्ये वा तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १६६ ॥
अत्रतैर्यद्विजैर्भुक्तं परिवेत्रादिभिस्तथा ।
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६४ ′ मनुस्मृति ।
अपक्तियैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ १७० ॥
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽयजे स्थिते ।
परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वज्ञः ॥ १७१ ॥
वेद न पढ़नेवाला ब्राह्मण फूल के श्राप की तरह निर्जीव हो जाता है । ऐसे को हव्य और कव्य न देना चाहिए । क्योंकि, राख, में होम नहीं किया जाता है । पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को हव्य, कव्य देने से, जो दाता को फल होता है, वह सव कहता हूं । वेदव्रतरहित ब्राह्मण और परिवेत्ता श्रादि और पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को जो देव, पितृकार्य में भोजन कराया जाता है वह राक्षसभोजन है । जो छोटा भाई बड़े भाई के रहते, उसके पहले विवाह और श्रग्निहोत्रं " करता है उसको परिवेत्ता कहते हैं ।और बड़े भाई को परिवित्ति कहते हैं ॥ १६८- १७१ ॥ परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते ।. सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ १७२ ॥
भ्रातुर्नृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः ।
धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥ १७३ ॥
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्ड गोलको ।
पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥ १७४ ॥
तौ तु जाती परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च ।
दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम् ॥ १७५ ॥
परिवित्ति, परिवेत्ता और ये जिस कन्या से विवाह करते हैं वह पांचवां कन्या' देनेवाला और विवाह करनेवाला संव नरक को जाते हैं । भाई की मृत्यु होनेपर उसकी स्त्री से कामवश जो नियोग करता है उसको ' दिधिषूपति ' कहते हैं । दूसरे की स्त्री से उत्पन्न दो पुत्रों की कुण्ड और गोलक संज्ञा है । पति के जीते जार से
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तीसरा अध्याय । ६५ पैदा हुआ कुण्ड और मरने पर पैदा हुआ गोलक,. ये दोनों परस्त्री से पैदा होकर लोक और कहलाता. है । देनेवाले का नाश करते हैं । १७२-१७५ ॥ परलोक में हव्यकव्य
अपांक्तयो यावतः पांक्यान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावतांन फलं प्रेत्य दाता प्राप्नोति बालिशः ॥ १७६ ॥
वीक्ष्यान्धो नवतेः काणः षष्टेः श्वित्री शतस्य तु ।
पापरोगी सहस्रस्य दातुर्नाशयते फलम् ॥ १७७ ॥
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्ब्राह्मणाञ्छूद्रयाजकः ।
तावतां न भवेदातुः फलं दानस्य पौर्तिकम् ॥ १७८ ॥
पंक्ति वा पुरुष श्राद्ध मेंजितने योग्य ब्राह्मणों को भोजन करते देखता है उनका फल परलोक में उस मूर्ख भोजन देनेवाले को नहीं मिलता । श्रन्था देखकर नन्ये श्रोत्रिय ब्राह्मणों के भोजन का फल नष्ट करता है, काना साठ ब्राह्मणों का, सफ़ेद कोढ़ का सौका, पापरोगी एक हज़ार का फल नष्ट कर देता है । शूद्रों को यज्ञ करानेवाला जितने ब्राह्मणों को अपने श्रङ्गों से छूता है अर्थात् श्राद्ध में जितने ब्राह्मणों की पाँत में बैठता है, उतनों के पूर्तस स्वन्धी श्राद्ध का फल दाता को नहीं मिलता है ॥ १७६-१७८ ॥
वेदविचापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् ।
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥ १७६ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ।
नष्टं देव के दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धुव ॥ १८० ॥
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् ।
भस्मनी हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥ १८ ९ ॥
इतरेषु त्वयेषु यथोद्दिष्टस्वसाधुषु ।
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६.६ मनुस्मृति ।: मेदोसृड्यांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२ ॥
वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता वेंचने वाले को जो हव्यं कव्य देवे वह विष्ठा होती हैं । वैद्य को देने से. पीव -रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित मनुष्य है उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए- मेंद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६ १८२ ॥
पक्रियोपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कात्स्न्येनद्विजाग्यान्पंक्तिपावनान्॥१८३ ॥
प्रग्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः ॥ १८४ ॥
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ।.. ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥
दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार के होने चाहिएं जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके श्रङ्गा के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति. पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामंक.ऋग्वेद के भाग को. पुत्रपढ़नेवालाऔर, शिक्षासाम गानआदि छःकरनेवालाअङ्गों का ज्ञाता,छः ब्राह्मविवाहपंक्तिपावन सेजाननापैदा चाहिए || १८३-१८५ ॥
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः ।
शतायुश्चैव विज्ञेषा ब्राह्मणाः प्रक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥
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तीसरा अध्याय । हज
पूर्वेपर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते ।
निमन्त्रयेतत्र्यवरान्सम्यग्विप्रान् यथोदितान्॥ १८७॥
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा ।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥१८८॥
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् ।
वायुच्चानुगच्छन्ति तथा सीतानुपासते ॥ १८९ ॥
वेदार्थ का ज्ञाता, उसका अध्यापक, ब्रह्मचारी, हज़ार गोदान करनेवाला और सौ वर्षका ये पंक्तिपावन होते हैं । श्राद्ध के पहले दिन वा उसी दिन उक्त गुणवाले ब्राह्मणों को श्रादर से तीन वा कम को निमन्त्रण देवे । श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण उस दिन नियम से रहे और वेदाध्ययन न करे । और यही नियम श्राद्ध करानेवाले को भी पालन करना चाहिए । पितरपीछे उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के पास श्राते हैं और वायु के समान चलते और बैठते हैं ॥ १८६-१८६ ॥
केतितस्तु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः ।
कथंचिदप्यतिक्रामन् पापः शूकरर्ता व्रजेत् ॥ १६० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदतें । ॥ -'दातुर्यहुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ १६१। ोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः ॥ १६२ ॥
न्यस्तशस्त्रा महाभागाः पितरःकिसीपूर्वदेवताःकारण भोजन न करने earऔर कव्य में नेता पाकरमें शुकर होना पड़ता है । निम- वह दाता के पाप सेन्त्रणउसपाकरब्राह्मणकामुकको दूसरेस्त्री सेजन्मजो भोग, करतापवित्रहै- रागद्वेषरहित,, सदाका भागी होता है । क्रोधरहित , शील आदि युक्त, देवता ब्रह्मचारी, युद्धत्यागी, भोजनमहाभागकरनेवालों- दया को श्राचार, विचार से रूप पितर हैं । इसलिए
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मनुस्मृति ।
यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः ।
ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ॥ १६३ ॥
मनोहरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः ।
तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥ १६४ ॥
विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः ।
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः ॥ १६५ ॥
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता वर्हिषदोऽत्रिजाः ॥ १६६ ॥
इन सब पितरों की जिससे उत्पत्ति हुई है और जो पितर जिन नियमों से जिसके पूज्य हैं वह सुनो । हिरण्यगर्भ के पुत्र मनु के जो मरीचि श्रादि पुत्र हैं, उनके पुत्र सोमपा श्रादि पितृगण हैं । बिराट्र के पुत्र सोमसद्नामक साध्यों के पितर हैं और मरीचि के पुत्र अग्निवान् देवताओं के पितर कहे जाते हैं । दैत्य, दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, पक्षी और किन्नरों के वहिंपदनामक
पितर हैं । १६३-१६६ ॥
सोमपानांस विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः ।- वैश्यानामाज्यंपानास शूद्राणां तु सुकालिनः ॥१६७॥
सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः ।
पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १६८॥
श्रग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्बर्हिषदस्तथा ।
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्चविप्राणामेव निर्दिशेत्॥१६६॥
य एते तु गणा मुख्याः पितॄणां परिकीर्त्तिताः ।
तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ २०० ॥
सोमपा ब्राह्मणों के, हविर्भुज क्षत्रियों के, श्राज्यपा वैश्यों के और सुकालिननामक शूद्रों के वितर हैं । सोमपा भृगु के पुत्र,
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तीसरा अध्याय । हन्ति श्रङ्गिरा के पुत्र, श्राज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका- लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं । श्रग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्, sarara और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं । ये पितरों के मुख्य गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर,जानना चाहिए । १६७-२०० ॥
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः ।
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं वरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २० ९ ॥
राजतैर्भाजनैरेषामथ वा राजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥
देवकार्याद्विजातीनां पितृकार्य विशिष्यते ।
देवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥
पामारक्षभूतं तु पूर्व दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम्॥ २०४ ॥
मरीचि श्रादि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और मनुष्य हुए हैं । देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत् उत्पन्न हुआ है । इन सब पितरों को चांदी के पात्र सेवा चांदी लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है । देवकार्य से पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है । पितृश्राद्ध प्र धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है । देवकर्म पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है । पितृकर्म का रक्षक देव-कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश करें देते हैं ॥ २०१ - २०४ ॥
दैवाद्यन्तं तदीत पित्राद्यन्तं न तद्भवेत् ।
पित्राद्यन्तं त्वहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥ २०५ ॥
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणप्रवणं चैव प्रयत्वेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥
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१०० मनुस्मृति ।:
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि ।
विविक्त्रेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ २०७ ॥
प्रासनेषूपक्लृतेषु वर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् ।
उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रांस्तानुपवेशयेत् ॥ २०८ ॥
इस कारण श्राद्ध में आरम्भ और समाप्ति देवतापूर्वक करे पित्रादिपूर्वक न करे । उसको करनेवाला वंशसहित नष्ट होजाता है । एकान्त और पवित्र देश में गोबर से भूमि लीपकर उसमें दक्षिण को झुकी वेदी वनावे । खुला स्थान, पवित्र देश, नदीतीर या निर्जन देश में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं । उस स्थान में अलग अलग बिछे हुए कुशासनों पर निमन्त्रित ब्राह्मणों को बैठाना चाहिए || २०५-२०८ ॥.
उपवेश्य तु तान् विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् ।
गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेद्देवपूर्वकम् ॥ २०६ ॥
येषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि ।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ॥ २१० ॥
अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादितः ।
हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्संतर्पयेत् पितृन् ॥ २१ ९ ॥
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥ २१२ ॥
उन सदाचारी 'ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाकर सुगन्ध, चन्दन, पुष्प, धूप आदि से पहले विश्वेदेव फिर पितरों का पूजन करे । ,उसके बाद कुश और तिल मिला अर्घ्यजल दान करे और सब 'की श्राज्ञा लेकर श्राद्ध करनेवाला ब्राह्मणों के साथ अग्नि में हवन करे | पहले हवन से अग्नि, सोम और यम को तृप्त करे फिर अन्न यदि हवि से पितरों को तृप्त करमा चाहिए । यदि अग्नि न हो तो