मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 261–270
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 261–270
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चौथा अध्याय । १२१
नोपगच्छेत् प्रमत्तोऽपिस्त्रियमार्तवदर्शने ।
समानयने चैव न शयीत तथा सह ॥ ४० ॥
उदय और अस्त होतेहुए सूर्य को जानकर कभी न देखना चाहिए | और ग्रहण समय में, जल में और दोपहर में भी न देखना चाहिए । बछड़ा बांधने की रस्सी को लांघना न चाहिए, वर्षा होते समय रास्ते में दौड़ना और जल में अपना मुख देखना न चाहिए । यह धर्मशास्त्र की श्राशा है । मिट्टी का टीला, गौ, देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, शहत, चौराह और घट, पीपल वगैरह वृक्ष, मार्ग में जाते देख पड़े तो उनको दाहिनी तरफ़ करके जाना चाहिए । कामातुर पुरुष को भी रजस्वला स्त्री के साथ भोग न करना चाहिए और न एक शय्या पर सोना ही चाहिए ॥ ३७-४०॥
रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः ।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते ॥ ४१ ॥ 4
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम् ।
प्रज्ञा तेजो वलं चक्षुरायुचैव प्रवर्धते ॥ ४२ ॥
नाश्नीयाद्भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् ।
क्षुवतीं जृम्भमाणां वा न चासीनां यथासुखम् ॥४३॥
स्व नेत्रे न चाभ्यक्तामनावृताम्।
न पश्येत्प्रसवन्ती च तेजस्कामो द्विजोत्तमः ॥ ४४ ॥
बुद्धि, जो पुरुष रजस्वला स्त्री के साथ भोगजोकरताउससेहै बचाउसकीरहता है,,, तेजउसकीयलबुद्धिनेत्र, तेजऔर, बलआयु, नेत्रनष्टऔरहोतीआयुहै । बढ़तेभोजनहैं ।करतीस्त्री और, छकतीपुरुष, साथ बैठकर भोजन न करें । स्त्री को न देखना चाहिए । जंभाई लेती और मनमानी बैठी हुई कभी पैदा होता हो तो अंजन लगाती, तैल मलती, नंगी और चालक उस समय भी न देखे ॥ ४१-४४ १६॥ .
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१२२ मनुस्मृति |
नान्नमद्यादेकवासा न नग्नः स्नानमाचरेत् ।
न सूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि तु गोत्रजे ॥ ४५ ॥
न फालकुष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते ।
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन ॥ ४६ ॥
नं-ससत्वेषु गतेषु न गच्छन्नपि च स्थितः ।
नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥ ४७ ॥
..गृहस्थ को एक वस्त्र से भोजन, नंगा होकर स्नान, मार्ग में, राख के ढेर पर और गोशाला में पेशाब न करना चाहिए । हल से जोती जमीन में, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देवः मंदिर में और बामी पर पेशाब कभी न करना चाहिए । जीवजन्तु वाले गढ़ों में, चलतेहुए, खड़ा होकर, नदी के किनारे पर और पहाड़ की चोटी पर पेशाव न करना चाहिए ॥ ४५-४७ ॥
वाय्वग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः ।
न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ४८ ॥
तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठोष्ठपतृणादिना ।
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः ॥ ४६ ॥
मूत्रोच्चारसमुत्सर्ग दिवा कुर्यादुदङ्मुखः ॥
दक्षिणाभिमुखो रात्रौ सन्ध्ययोश्च यथा दिवा ॥ ५० ॥
छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः ।
यथा सुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधाभयेषु च । च ॥ ५१
वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल और गौ को सामने देखकर कभी मल -मूत्र का त्याग न करना चाहिए । शरीर और शिर को वस्त्र से ढँककर, मौन होकर, लकड़ी, ढेला, वृक्ष का गिरा पत्ता या तिनका से भूमि को ढककर मल-मूत्र त्याग करने को बैठना
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चौथा अध्याय । १२३ चाहिए । दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा को मुख करके मल-मूत्र करना चाहिए । दिन हो या रात हो, छांया में, अंधेरा में या जहां प्राण का भय हो, तव जिस दिशा में इच्छा हो उसी तरफ़ मुख कर सकता है ॥ ४८-५१ ॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्य वा प्रतिसोमोदकद्विजान् ।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥ ५२ ॥
नाग्निं सुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत व खियम् ।
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ ५३ ॥
श्रधस्तान्नोपदध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत् । न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधमाचरेत् ॥ ५४ ॥,,,,, जो गृहस्थ श्रग्नि सूर्य चन्द्रमा जल ब्राह्मण वायु के संमुख होकर मल- मूत्र करता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है ।
safe को सुख से फूँकना और नंगी स्त्री को देखना अनुचित है । अग्नि में कोई पवित्र चीज़ डालना और पैर के तलवा को उसमें सैकना न चाहिए । खाट के नीचे श्राग रखना, उसको उलांघ कर जाना और पैर के नीचे दवाना न चाहिए । जिसमें प्राणबाधा का भय हो ऐसा परिश्रम न करना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥
नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत् ।
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोपहरेत् स्रजम् ॥ । ५५ ॥
नासु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत् अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा ॥ ५६ ॥
नैकः स्वपच्छून्यगेहे शयानं न प्रबोधयेत् ।
aretara भभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ ५७ ॥
दूसरे गाँव को सायंकाल और प्रातःकाल भोजन, एकनखगाँवसे सेलिखना और गले जाना और सोना न चाहिए । ज़मीन
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१२४ I मनुस्मृति । मैं से खुदही अपनी माला निकालना न चाहिए । मूत्र, मल, धूक, जिस वस्तु में अपवित्र कुछ लगा हो और जहर इन सब को जल में न डालना चाहिए । सूने घर में अकेला सोना, अपने से बड़े को उपदेश देना, रजस्वला स्त्री से बातचीत करना और विना निमन्त्रण यज्ञ में जाना यह सब अनुचित है । ५५-५७ ॥ अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ । स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥ -नावारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित् ।:
न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः ॥ ५६ ॥
नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् ।
नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ ६० ॥
न शूद्रराज्ये निवन्नाधार्मिकजनावृते ।
न पाखण्डिंगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ ६१ ॥
श्रग्निस्थान, गोशाला, ब्राह्मण के पास, स्वाध्याय के समय और भोजन के समय दाहना हाथ बाहर करलेना चाहिए । दूध पिलाती गौं को देखकर उसको हटाना नहीं और नबच्चेकिसीको. से कहना | और आकाश में इन्द्रधनुप् देखकर किसीको दिखाना न चाहिए । जहां अधर्मी रहते हों ऐसे ग्राम में और जहां रोग हो, उसमें न रहना । अकेला दूरदेश की यात्रा न करे और पर्वतफैला-. नऊपरचाहिएवहुतऔरदिनतकअधर्मीनिवास, पाखण्डीन करनातथाचाहिएचाण्डालशूद्रकेसेवितराज्य में बसनाके मैं न रहना चाहिए || ५८-६१ ॥ ग्राम आदि
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् ।
नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ॥
न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिवेत् । ६२ ॥
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चौथा अध्याय । १२५. नोत्सङ्गे भक्षयेद्भक्ष्यान्न जातु स्यात्कुतूहली ॥ ६३ ॥; न नृत्येऽथवा गायेन वादित्राणि वादयेत् । नास्फोटयेन्न च क्ष्वेडेन्न च रक्को विरावयेत् ॥ ६४ ॥:
जिस वस्तु से चिकनापन निकला 'हो उसको न खाना और बहुत घबड़ाहट से भोजन न करना । बहुत सुवह और साम को भी भोजन न करना, और जिसने सुबह भोजन कर लिया हो वह साम को भोजन न करे । मुख, हाथ, पाँव से व्यर्थ चेष्टा न करना । अँजुली से पानी पीना, गोद से श्रन्न रखकर खाना और विना मतलब दूसरे की बातों को जानने की आदत रखना, नाचना, गाना, चजाना, किसी चीज़ को ठोंकना, ज्यादा हँसना, खुशी से ज्यादा चिल्लाना -यह सब काम न करना चाहिए ॥ ६२-६४ ॥
न पादौ धावयेत्कांस्ये कदाचिदपि भाजने ।
न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत न भावप्रतिदूषिते ॥ ६५ ॥
! उपानहौ च वासश्च धृतमन्यैर्न धारयेत् ।
उपवीतमलङ्कारं खजं करकमेव च ॥ ६६ ॥
नाविनीतैर्व्रजेदुर्यैर्न च क्षुद्व्याधिपीडितैः ।
न भिन्नशृङ्गाक्षिखुरैर्न बालधिविरूपितैः ॥ ६७ ॥
विनीतैस्तु व्रजेन्नित्यमाशुगैर्लक्षणान्वितैः ।
वर्णरूपोपसंपन्नैः प्रतोदेनातुदन् भृशम् ॥ ६८ ॥
कांस के वर्तन में पैर धोना, फूटे पात्र व जिसमें संदेह हो, उस मैं भोजन न करना । दूसरे के पहनेहुए जूता, कपड़ा, जनेऊ, गहना, फूल की माला और कमण्डलु को धारण न करना। जो सीधा हो, भूखा न हो, सींग, आँख, खुर ठीककीहो, सवारीपूंछ वगै-में 'रह कटजाने से खराब न दीखता हो । ऐसे बैल हो, उनकी बैठना चाहिए । जो सधगये हों, तेज हो, सुन्दरचाहिए ॥ ६५- ६८॥ सवारी में बैठना और ज्यादा हाँकना व मारना न
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१२६ -मनुस्मृति ।
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथासनम् ।
न च्छिन्द्यान्नखलोमानि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान् ॥ ६६ ॥
न मृल्लोष्टं च मृदुनीयानच्छिन्द्यात्करजैस्तृणम् ।
न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ॥ ७० ॥
लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥ ७१ ॥
न विगर्ह्य कथा कुर्यादहिर्माल्यं न धारयेत् ।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकाल का धूप, चिताका धूमं, और फंटा श्रासन इनको चचाना चाहिए । नख और बालों को उखाड़ना और दातों से नख का काटना अच्छा नहीं है । मिट्टी के टुकरों को हाथ से न तोड़े, नख से तिनुका न तोड़े और जिसका नतीजा खराब हो ऐसा काम न " करे । जो मनुष्य ढेला तोड़ता है, तृरा तोड़ता है, नख चवाता है,. चुगली खाता है और भीतर-बाहर से मलिन रहता है वह शीघ्र नष्ट होजाता है । निन्दाकी कोई कथा न करें, वस्त्र के ऊपर फूलः माला न पहने और गौ की पीठ पर बैठकर कहीं न जावे ॥ ६६-७२ ॥
श्रद्वारेण च नातीयाद् ग्रामं वा वेश्म वा वृतम्।
रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७३ ॥
नाक्षैः क्रीडेत् कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत् ।
शयनस्थों न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ॥ ७४ ॥
सर्वं च तिलसम्बद्धं नायादस्तमिते खौ ।
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः कचिद्रजेत् ॥ ७५ ॥
जो गाँव का रास्ता हो उसको छोड़कर किसी खराब गली से... उसमें न घुसना और जो घर बन्द हो उसमें सीढ़ी आदि लगाकर
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चौथा अध्याय । १२७ भीतर न जाना । रात में वृक्षों की जड़ से दूर रहना न खेलना । श्रपन जूता खुदही हाथ में लेकर न चलना। जुना। सोतेकभी न खाना, हाथ में रखकर दूसरे हाथसे न खाना और बैठने के आसनहुए पर रखकर भी न खाना चाहिए । सूर्य अस्त होजाने के बाद जिसमें तिल मिला हो वह चीज़ न खाना नंगा होकर न सोना और जूठे मुँह कहीं इधर उधर न जाना चाहिए ॥ ७३–७५ ॥
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् ।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥
चक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रमाद्येन कर्हिचित् ।
न विरसूत्रसुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत् ॥ ७७ ॥
अधितिष्ठेन केशांस्तु न भस्मास्थिकपालिकाः ।
न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ ७८ ॥
न संवसेच पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः ।
न मूर्खेर्न विलितैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ ७६ ॥
गीला पाँव से अर्थात् पैर धोकर भोजन करना । पर गीले पैरों से सोना न चाहिए । जो हाथ पैर धोकर पवित्रता से भोजन क ताहै वह दीर्घ आयुष्य पाता है । वेजानेहुए किला वगैरह में कभी न जाना | मल-मूत्र को न देखना और दोनों भुजाओं से नदी तैर कर पार न जाना चाहिए । बाल, राख, हड्डी, टूटा ठीकरा, बि-नौल और भूसी के ऊपर न बैठना चाहिए । इनपर जो नहीं ठता उसकी उमर बढ़ती है । पतित, चाण्डाल, सूर्ख, अभिमानी, चमार आदि हीन जाति और नट वगैरह के साथ उठना-बैठना कभी न चाहिए ॥ ७६-७६ ॥
न शूद्राय'मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् ।
न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ ८० ॥
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१२८ मनुस्मृति |
यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥ ८१ ॥
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।
न स्पृशेचैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः ॥ ८२ ॥
शुद्र को वेद आदिशास्त्र न पढ़ाना, झूठा अन्न, हविष्य न देना । उसको धर्मका उपदेश न देना । उसको चान्द्रायण आदि व्रतों का उपदेश वेदमन्त्रों से न बतलाना । जो पुरुष, शद्ध को धर्म, व्रत आदि का उपदेश देता है, वह उसे शूद्र के साथ, असंवृत नामक नरक में पड़ता है । दोनों हाथों से अपना शिर न खुजलाना, झूठे मुख शिर को न छूना और शिर भिंगोए विना स्नान न करना अर्थात् नित्य शिर से स्नान करना चाहिए ॥ २०२ ॥
केशग्रहान्प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् ।
शिरःस्नातस्य तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् ॥ ८३॥
.न राज्ञः प्रतिगृह्णीयादराजन्यप्रसूतिः ।
सूनाचक्रध्वजवतां देशेनैव च जीवताम् ॥ ८४ ॥
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः ।
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः ॥ ८५ ॥
दश॒सूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः ।
तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥ ८६ ॥
• किसी के शिर के बाल खींचना या उसपर मारना अनुचित है । जिस हाथ से शिरपर तेल छोड़े उस हाथ से दूसरे अङ्ग का स्पर्श न करे । जो राजा, क्षत्रिय के वीर्य से न पैदा हुआ हो उसका दान न लेना चाहिए | कसाई, तेली, कलवार, और वेश्याओं के 'जरिये जो जीविका चलाते हैं इन सबसे दान न लेना चाहिए!
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चौथा अध्याय । १२६ दश कसाई के वरावर एक तेली, दश तेली वार, दश कलवारों के बराबर एक वेश्याजीवीके समान एक कल- जीवियों के बराबर एक राजा होताहै । दशहजार, और दश वेश्या- चलानेवाले एक कसाई के समान राजा कहा गया कसाई खाना है । इसलिए उसका दान बड़ा भयानक है ॥ ८३-८६ ॥
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः ।
स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ ८७ ॥
तामिश्रमन्धतामिश्रं महारौरवरोवो ।
नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ ८८ ॥
संजीवनं महावीषि तपनं संप्रतापनम् ।
संहातं व सकाको कुडलं प्रतिमूर्तिकम् ॥ ८६ ॥
लोहशङ्कुमृजीषं च पन्थानं शाल्मली नदीम् ।
असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥ ६० ॥
जो ब्राह्मण लोभी और शास्त्र के विरुद्ध कर्म करनेवाले राजा से दान लेताहै वह क्रम से, नीचे लिखे इक्कीस नरकों में पड़ता है । तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौख, रौरव, कालसूत्र, महानरक, संजीवन, महावीची, तपन, संप्रतापन, संहात, सकाकोल, कुड्मल, प्रतिमूर्तिक, लोहशङ्क, ऋजीष, पंथा, शाल्मली, वैतरणी नदी, सिपत्रवन और लोहदारक ॥ ८७-६० ॥
एतद्विदन्तो विद्वांसोब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ।
न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः ॥ ६१ ॥
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थों चानुचिन्तयेत्! कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ ६२ ॥
उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः । १७
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१३० मनुस्मृति ।
पूर्वी सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् स्वकाले चापरां चिरम् ॥ ६३॥
' पयो दीर्घसन्ध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः ।
प्रज्ञां यशश्च कीर्ति च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥ ६४ ॥
इस प्रकार जो सब विषय जानते हैं वे वेदज्ञ विद्वान ब्राह्मण परलोक में सुख पाने की इच्छा से राजा का दान नहीं लेते हैं । ब्राह्ममुहूर्त -दो घड़ी सवेरे उठकर अपना धर्म और अर्थ का और उसके लिए आवश्यक शरीर श्रम का विचार करना । वेदचिन्तन और परमात्मा का स्मरण करना । प्रातःकाल उठकर शौच श्रादि से निवृत्त होकर स्नान और सन्ध्या करके गायत्रीजप करना । और सायंकाल को भी नक्षत्र दर्शन तक सन्ध्या-गायत्री का अनुष्ठान करना । ऋपियों ने चिरकाल तक सन्ध्या, गायत्री की उपासना से दीर्घायु, बुद्धि, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज को पाया था ॥ ६१-६४ ॥
श्रावण्यां प्रोष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि ।
युक्तश्छन्दस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्॥६५॥
पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद्वहिरुत्सर्जनं द्विजः ।
साघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्णे प्रथमेऽहनि ॥ ६६ ॥
यथाशास्त्रं तु कृत्वैवमुत्सर्गं छन्दसां बहिः ।
विरमेत् पक्षिणीं रात्रिं तदेवैकमहर्निशम् ॥ ६७ ॥
श्रत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि शुक्लेषु नियतः पठेत् ।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु संपठेत् ॥ ६८ ॥
श्रावणकी पूर्णां या भाद्र की पूर्णा को विधि से उपाकर्म करके; ब्राह्मण साढ़े चार महीने तक नियम से वेदाध्ययन करे पौपकी पूर्णाको या माघकी प्रतिपदाको नगर के बाहर जाकर । फिर मैं वेद का उत्सर्ग करना । उसके बाद 'दिन और विचली पूर्वाहरात