मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 251–260
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 251–260
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तीसरा अध्याय । १११
यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम् ।
तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मघासु च ॥ २७३ ॥
अपि नः स कुले जायायो नो दद्यात् त्रयोदशीम् ।
पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्लाये कुञ्जरस्य च ॥ २७४ ॥
यद्यद्ददाति विधिवत् सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ २७५ ॥.
कालाशाक, महाशल्क- मछली का भेद, गेंडा, लाल बकरा, शहद और सब प्रकार के मुनिश्रन्नों से, अनन्त वर्षों तक पितर तृप्त रहते हैं । वर्षाऋतु, मघानक्षत्र और त्रयोदशी तिथिको कोई भी पदार्थ मधु मिलाकर पितरों के निमित्त देने से, उनको अक्षय तृप्ति होती है । पितर श्राशा करते हैं -हमारे कुल में कोई ऐसा हो जो त्रयोदशी घी, मधु सेको मिलेया हाथीहुए पायसकी छाया- खीरपूर्वसे, दिशाहमकोमें तृप्तपड़े करेंऐसे |समयभक्तिहै,, और श्रद्धा से विधिपूर्वक जो कुछ पितरों को दिया जाता ॥ उसका अनन्त फल उनको परलोक में पहुँचता है || २७२-२७५
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ।
श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैमा न तथेतराः ॥ २७६ ॥
क्षु कुर्वन् दिनक्षेषु सर्वान् कामान् समश्नुते॥ ।२७७. ॥
युक्षु तु पितृन्सर्वान् प्रजां प्राप्नोतिपुष्कलाम् यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते । ॥ २७८ ॥
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्णादपराह्नो विशिष्यते से श्रमावास्या तक चतुर्दशी को छोड़कर, कृष्णपक्ष कीपवित्रदशमीहै वैसी दूसरी नहीं है । की तिथि पितृकार्य के लिए जैसीमें ( जैसा द्वितीया, चतुर्थी, भरणी, समतिथि और समनक्षत्रों
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११२ मनुस्मृति 1: रोहिणी ) श्राद्ध करने से, सब कामना पूरी होती हैं । और विषमः तिथि, नक्षत्रों में ( प्रतिपदा, तृतीया, अश्विनी, कृत्तिका आदि ): श्राद्ध करने से, बहुत सन्तान होती है । जैसे, शुक्लपक्ष से कृष्णपक्ष'. श्राद्ध में श्रेष्ठ माना जाता है, वैसेही पूर्वाह्न से अपराह्न- दोपहर बाद काल उत्तम गिना जाता है । २७६-२७८ ॥ -
प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा ।
पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना ॥ २७६ ॥
रात्र श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा ।
सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ॥ २८० ॥
अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरन्दस्येह निर्वपेत् ।
हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञिकमन्वहम् ॥ २८ ९ ॥
' हाथ में कुश लेकर, शास्त्रविधि से मृत्यु तक श्राद्ध किया करे । रात्रि में श्राद्ध न करे, क्योंकि वह राक्षसी समय है । और सूर्योदय, सूर्यास्त समय और सूर्योदय के कुछ काल बाद भी श्राद्ध न करना चाहिए | इस विधि के अनुसार, गृहस्थ यदि प्रतिमास श्राद्ध न करके तो वर्ष में, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षाऋतु में श्राद्ध और नित्य पञ्चमहायज्ञ करे ॥ २७६-२८१ ॥ न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेऽग्नौ विधीयते । न दर्शन विना श्राद्धमाहिताग्नेर्द्विजन्मनः यदेव तर्पयत्यद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः । तेनैव कृत्स्नमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ॥ - २८३!
वसून वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् ।
प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छुतिरेषा सनातनी ॥ २८४ ॥
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं वामृतभोजनः ।
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ २८५ ॥
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तीसरा अध्याय | ११३.
एतद्वोऽभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयज्ञिकम् ।
द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति ॥ २८६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहिताय तृतीयोऽध्यायः ॥.. पितृकर्म लौकिक अग्नि में न करना चाहिए । श्रग्निहोत्री अमा वास्या के सिवाय दूसरी तिथियों में श्राद्ध न करे तोभी कोई हानि नहीं है । द्विज से न कुछ बन करे तोभी पितृयज्ञ का फल मिलता पड़े तो |जलवेद सेमें पितापितृतर्पणको करावसु, पितामह को रुद्र और प्रपितामह को श्रादित्य कहते हैं । समर्थ पुरुष, नित्य विघस था अमृत का भोजन किया करे । श्राद्ध में ब्राह्मणभोजन से बचा श्रन्न विघस और वैश्वदेव आदि यज्ञशेष मृत कहलाता है । यह पञ्चमहायज्ञ की सब विधि तुमसे कही हैं, अब छिज़ों में मुख्य ब्राह्मण की वृत्ति का विषय सुनो ॥ २८२ -२८॥ तीसरा श्रध्याय समाप्त ।
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अथ चतुर्थोऽध्यायः । चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाद्यं गुरौ द्विजः ।: द्वितीयमायुषो भागं कृतदासे गृहे वसेत् ॥ १ ॥
श्रद्रोहेणैव भूतानामरूपद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥ २ ॥
यात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः ।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम्॥ ३ ॥
चौथा अध्याय । गृहस्थाश्रम-धर्म । द्विज अपने जीवन का चतुर्थांश गुरुकुल में, विद्याभ्यासमें वितावे और दूसरे चतुर्थांश में विवाह करके गृहस्थाश्रम में रहे । आपत्तिकाल में किसीको कुछ दुःख देकर भी और समय में किसी को कष्ट न देकर जो निर्वाह के लिए जीविका बनपड़े उसको करना चाहिए । अपने और परिवार के पालन के लिए कोई खराब काम न करना चाहिए । शरीर को दुःख न देकर धन उपार्जन करना चाहिए ॥ १-३ ॥
तानृताभ्यां जीवे मृतेन प्रसृतेन वा ।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ ४ ॥
ऋतसुञ्छशिलं ज्ञेयमसृतं स्यादयाचितम् ।
मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ ५ ॥
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते ।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
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चौथा अध्याय | ११५ ब्राह्मण को ऋत से, अनृत से,मृत से और प्रमृत से या सत्य और - - 1 सेश्रमृतनिर्वाहनसे जीविकाकरनाकरनीचाहिएचाहिए। उच्छ। लेकिनऔर शिलश्ववृत्तिको ऋतंनौकरीविनागुलामी मिलाहुआ अनृतं मांगी हुई भिक्षा मृत और खेती को प्रमृत कहतेमांगें हैं । सत्यानृत - सच -झूठ वाणिज्य-व्यापार को कहते हैं, उससे भी जीविका चलाना श्रेष्ठ है । श्ववृत्ति-अर्थात् कुत्ता की वृत्ति सेवा को कहते हैं, इसलिए उसको छोड़ देना चाहिए ॥ ४-६ ॥
कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा ।
त्र्यहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥ ७ ॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
ज्यायान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ ८ ॥
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते 1 द्वाभ्यामेकचतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ ६ ॥
ब्राह्मणं इतना श्रश्न संग्रह करे जिसमें कोठी भरजाय, या छोटी कोठरी भरजाने भरका अन्न संग्रह करे, या तीन दिन के गुज़र लायक अथवा एकही दिन के प्रयोजन भरको इकट्ठा, रक्खे | इन चारों प्रकार के संग्रह को करनेवालों में अगला अगला ब्राह्मण श्रेष्ठ माना जाता है और वह धर्म से स्वर्गफल को जीतनेवाला होता हैं । इन चार प्रकार के गृहस्थों में ऋतं आदि छ प्रकार की वृत्ति से निर्वाह करना बड़े गृहस्थ के लिए है । जो साधारण कुटुम्ब रखते हैं, वे यज्ञ कराना, वेदपढ़ाना और दान लेना इन तीन प्रकार की जीविकाओं से निर्वाह करें । प्रतिग्रह -दान लेना जो नहीं चाहते, उनको याजन और अध्यापन इन दो वृत्तियों से और चौथा केवल वेद पढ़ाकर एकही वृत्ति से निर्वाह करना चाहिए ॥ ७-६ ॥ "
वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टीः पावयनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा ॥ १० ॥
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११६ मनुस्मृति ।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन ।
जिह्मामशठां शुद्धां जीवेद्ब्राह्मणजीविकाम् ॥ ११ ॥
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । • संन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥ १२ ॥
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः । स्वर्गयुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ॥ १३ ॥ - जो ब्राह्मण उञ्छवृत्ति से जीविका चलाता हो उसको सदा
अग्निहोत्र में तत्पर रहना चाहिए । और श्रमा, पूर्णा की दृष्टि आदि सहज यज्ञ करना चाहिए । जीविका के लिए दुनियादारी में ज्यादा न फँसना चाहिए अर्थात् भूंठी बड़ाई खुशामद वगैरह न करे, किन्तु शुद्ध, निष्कपट बर्ताव रक्खे और बनियों की नौकरी न करके, पवित्र ब्राह्मण के सम्बन्ध में जीविका करनी चाहिए । सुख चाहने वालों को चाहिए कि सन्तोषवृत्तिको रखकर जो मिले उसीमें निर्वाह करे अधिक माया में न फँसे-सन्तोष सुखका मूल और असन्तोष दुःखका मूलहै । इसलिए ऊपर कही किसी एक जीविका के सहारे सुख से काल बितावे और आगे कहे हुए व्रतों का पालन किया करे ॥ १०-१३ ॥
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १४ ॥
नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा ।
न विद्यमानेष्वर्थेषु नायमपि यतस्ततः ॥ १५ ॥
इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः ।
अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा संनिवर्तयेत् ॥ १६ ॥
ब्राह्मण को अपने वेदोक्त कर्मका श्राचरण नित्य निरालस होकर करना चाहिए । उसको भरशक करने से परमगति को पुरुष प्राप्त
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चौथा अध्याय । ११७ होताकरके हैदुःख। ब्राह्मणके समयको मेंगानाभी, धंनबजानापानेकाऔरउद्यमशास्त्रन केकरनाखिलाफ़ कर्म इन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्श आदि में कामना से न लगनाचाहिए । वरन् इन सब बातों से मनको रोकना चाहिए । १४- १६ -॥....चाहिए' + सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ।.. यथा तथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १७ ॥.
वयसःकर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च । वेषवाग्बुद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेदिह ॥ १८ ॥ "
बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च ।
नित्यं-शास्त्राण्यवेक्षेत निगमश्चैव वैदिकान् ॥ १६ ॥
जिन कामों को करने से अपने स्वाध्याय में बाधा पड़े उन संब को छोड़ देना उचित है । किसी क़दर स्वाध्याय लगा रहने से ही ब्राह्मण की कृतार्थता है । गृहस्थ ब्राह्मण को अपनी आयु कर्म, धन- विद्या और कुल के अनुसार वेष-पहनाव, वाणी और बुद्धि से काम लेता हुआ इस संसार में बर्ताव करना चाहिए । बुद्धि को शीघ्र ही बढ़ानेवाले श्रागम और विविध भांतिके शास्त्रों का श्रध्य न नित्य करना चाहिए । उनके देखने से 'हित अनहित बातों का पूरा ज्ञान होता है ॥ १७-१६ ॥ -
यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति ।
तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ २० ॥
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥ २१ ॥
एतानेके महायज्ञान् यज्ञशास्त्रविदो जनाः ।
अनीहमानाः सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति ॥ २२ ॥
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११८ मनुस्मृति ।
वाच्येके जुह्वति प्राणं प्राणे वाचं च सर्वदा ।
वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिर्वृत्तिमक्षयाम् ॥ २३ ॥
ज्ञानेनैवापरे विप्रा यजन्त्येतैर्मखैः सदा । ज्ञानमूर्ला क्रियमिषां पश्यन्तो ज्ञानचक्षुषा ॥ २४ ॥ ·
पुरुष जैसे जैसे शास्त्रको देखता जाता है वैसे वैसे उसको ज्ञान होता है और उसकी प्रीति बढ़तीहै । स्नातक ब्राह्मण को वेदाध्ययन, होम, भूतबलि, अतिथिसत्कार और श्राद्ध जहतिक होसके छोड़ना न चाहिए । बहुत से यज्ञविषय के ज्ञाता पुरुष इन पाँच महाशों को न करके इन्द्रियों को ही अग्निरूप मानकर उसीमें विषयों का होम करतें हैं अर्थात् इन्द्रियों के बाहरी विषयों को अपने वंश में करने का उपाय किया करते हैं । कितने ही ज्ञानी पुरुष वाणी का लय का प्राण में और ज्ञानयज्ञ से ही संच प्राण' यज्ञोंमेंकावाणीअनुष्ठान करतेकरतेहैं हैंक्योंकि। दूसरेज्ञानहींलोग
सर्व यज्ञों का मूल है । २६--२४ ॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते युनिशोः सदा ।: दर्शेन चार्धमासान्ते पौर्णमासेन चैव हि ॥ २५ ॥
सस्यान्ते नवसस्यैष्ट्या तथर्वन्ते द्विजोऽध्वरैः ।
पशुना त्वयनस्यादौ समान्ते सौमिकैर्मखैः ॥ २६ ॥
प्रातःकाल और सायंकाल में अग्निहोत्र श्रमावास्या को दर्श- नामक यज्ञ और पूर्णिमा को पौर्णमासयज्ञ जरूर करना चाहिए । पहला अन्न हो चुके औरनया अन्न पैदा हो तब शरद् ऋतु मैं नवीन अन्न से इष्ट करे और प्रत्येक ऋतु के अन्त में चातुर्मास यज्ञ करे, उत्तरायण - दक्षिणायन के आरम्भ में पशुयाग और वर्ष पूरा होने पर वसन्तऋतु मैं सोमयाग को करना चाहिए ॥२५-२६ ॥
तानिष्ट्वा नवसस्यैष्ट्या पशुना चाग्निमान् द्विजः ।
नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ २७ ॥
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चौथा अध्याय | ११६
मानर्चिता ह्यस्य पशुव्येन चाग्नयः ।
प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगर्द्धितः ॥ २८ ॥
प्रासनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा ।
नास्य कविसेद्गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः ॥ २६ ॥
पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान् ।
हैतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ ३० ॥
वेदविद्याव्रतस्नातान् श्रोत्रियान् गृहमेधिनः ।
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत्॥ ३ ९ ॥
नवीन अन्न से इष्टि करके नया अन्न और पशुयाग करके मांस. कियेखाने बिनासे दीर्घायुकोई नयाहोती हैऔर। यदिमांसनवीनखाताअन्नहै उसकीऔर मांसप्रजा सेकोयज्ञही अग्निदेव खाने की इच्छा करते हैं । गृहस्थ के यहां आसन, भोजन, शय्या, जल, फल और फूल से यथाशक्ति अतिथि का सत्कार ज़रूर होना चाहिए इसके विनां वह न रहने पावे । वेद के खिलाफ़ श्राचरण करनेवाले पाखण्डी, आश्रम के विरुद्ध वृत्ति से जीविका करनेवाले, दम्भ से, वैडालव्रत -बिल्ली के भांति मौन साधनेवालेसे भी शठ, कुतर्की और बंगलाभक्त इन सब कपटियों का ज़बान सत्कार गृहस्थ को न करना चाहिए ॥ २७-३१ ॥
शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना ।
संविभागश्च भूतेभ्यः कर्त्तव्योऽनुपरोधतः ॥ ३२ ॥
'राजतो धनमन्विच्छेत् संसीदन् स्नातकः क्षुधा ।
याज्यान्तेवासिनोर्वापि नत्वन्यत इति स्थितिः ॥इन३३तीन॥
विद्यास्नातक, व्रतस्नातक और विद्याव्रतस्नातकमें सत्कार करना प्रकार के श्रोत्रिय गृहस्थों का देव पितृकर्मचाहिए । गृहस्थ को चाहिए । जो ऐसे न हों. उनको पूछना न
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१२० मनुस्मृति । चाहिए, अपने हाथ से भोजन न बनानेवाले ब्रह्मचारी - संन्यासी. को पक्कान्न आदि देवे और जहांतक होसके जड़ -चेतन सब प्राणियों को अन्न, जब से श्रादर करे । स्नातक गृहस्थ यदि. भोजन के लिए दुःखी हो तो वह क्षत्रिय राजा, यजमान और शिष्य से धन लेने की इच्छा करे, परन्तु पतित-अधर्मियों से कभी: न लेय, यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है ॥ ३२-३३ ॥
न सीदेत् स्नातको विप्रः क्षुधाशक्तः कथंचन ।
न जीर्णमलवद्वासा भवेच्च विभवे सति ॥ ३४ ॥
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः ।
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महिते रतः ॥ ३५ ॥
वैगावीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ।
यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले ॥ ३६ ॥
· स्नातक ब्राह्मण को किसी प्रकार भी क्षुधा से पीड़ित न रहना चाहिए । यदि धन न हो तो पुराने और मैले कपड़ों को भी न पहने । केश, नख और दाढ़ी को कटवाया करे, सफ़ेद वस्त्र पहने और पवित्र होकर रहा करे । अपने स्वाध्याय में लगा रहे और अपनी शरीररक्षा के लिए उपाय किया करे । बांस की लकड़ी, जलपूर्ण कमण्डलु, यज्ञोपवीत, वेदपुस्तक और सोने के सुन्दर कुण्डल को धारण करे ॥ ३४-३६ ॥
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन ।
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥ ३७॥
न लङ्घयेद्वत्सतन्त्रं न प्रधावेच्च वर्षति ।
न चोदके निरीक्षेत स्वं रूपमिति धारणा ॥ ३८
मृदंगां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम् ।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् ॥ ३६ ॥