मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 341–350
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 341–350
पृष्ठ 341
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
aai अध्याय | २०१ न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ॥ ६७ ॥
इस देह से निकलना, फिर गर्भ में उत्पत्ति और लाखों योनियों मैं इस जीवात्मा का जाना, ये सब अपने कर्मफल हैं । अधर्म से दुःख में पढ़ना और धर्म से अक्षय सुख -मोक्ष मिलना-इसका विचार करे । योग से परमात्मा की सूक्ष्मता का ध्यान करे । और उत्तम प्रथम योनियों में शुभाशुभ फलभोगार्थ जीवों की उत्पत्ति का विचार करे । श्राश्रम के विरुद्ध कोई दोष भी लगे, तोभी जीवों पर समभाव रखकर, धर्माचरण करता रहे । क्योंकि दण्ड- कम-एडलु चिह्न धारण करना ही धर्माचरण नहीं कहलाता । निर्मली के फल का नाम लेने से ही जल निर्मल नहीं होता, उसको जल मैं छोड़ने से होता है । ऐसेही श्राश्रमचिह्न धारण से फल नहीं होता किन्तु श्राचरण से होता है ॥ ६३-६७ ॥
संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा ।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ ६८ ॥
अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥। ६६ ॥
प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ७० ॥
को बचाकर पैर रखनादिनचाहिएया रात। मेंचाहे, संन्यासीशरीर कोको दुःखभूमि करतामेंभी जीवोंमिलेहै, ।उसजो यतिपाप चलताके ना- फिरता नजान में, जीवों की हिंसाकरना चाहिए । यदि ब्राह्मण शार्थ स्नान करके छ प्राणायाम तीन भी प्राणायाम करे तो भी, प्रणव और व्याहृति से विधिपूर्वक॥ ६८-७० ॥ उसको परम तप मानना चाहिए । दन्ते मायमानानां धातूनां हि यथा भलाः
पृष्ठ 342
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
III मनुस्मृति ।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥७१॥
प्राणायामैर्ददोषान्धारणाभिश्च किल्विषम् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ७२॥
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः ।
ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मभिः ॥ ७३॥
सम्यग्दर्शन संपन्नः कर्मभिर्न निवध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥
जैसे सुवर्ण श्रादि धातुओं का मैल अग्नि में धौंकने से जल जाता है वैसेही प्राणयास से इन्द्रियों के दोष जलजाते हैं । प्राणाः याम से दोपों को, ब्रह्म में मनकी धारणा से पाप को, इन्द्रियसंयम से विषयों को और ध्यान से काम, क्रोध, मोहआदि को जलावे । इस जीव की ऊंची, नीची योनियों में जन्मप्राप्ति का ध्यान योग से विचार करे, क्योंकि, जीवगति लब को ज्ञात नहीं होती । ब्रह्म साक्षात्कार करनेवाला पुरुष कर्मबन्धन में नहीं बँधा और जो उससे रहितहै वह जन्म-मरण के बन्धन में पढ़ताहै ॥ ७१-७४ ॥ अहिंसयेन्द्रियासद्वैवैदिकैश्चैव कर्मभिः । • तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ॥ ७५ ॥
अस्थिस्थूर्ण स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्ण मूत्रपुरीषयोः ॥ ७६ ॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ।
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ ७७ ॥
नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा ।
तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छ्राद्ग्राहाद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥
पृष्ठ 343
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
छठवां अध्याय । २०३ श्रहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, वैदिक कर्मानुष्ठान, व्रत आदि उग्र तप से इस लोक में ब्रह्मपद का साधन होता है । यह शरीर हड्डी रूप खंभा में स्नायुरूप डोरियों से बँधा मांस और रुधिर रूप गारा से लिपा चमड़ा से मढ़ा, मल-मूत्र और दुर्गन्धि से पूर्ण है । बुढ़ापा शोक, रोग, दुःख का घर है, रजोगुणी है, अनित्य है, पांच महाभूतों का निवासस्थान है, इससे ममता छोड़नी वा-हिए । जैसे नदीतट को वृक्ष छोड़ देता है, पक्षी वृक्ष को छोड़ देता है, वैसे संन्यासी इस देह की ममता छोड़ देवे तो कठिन संसारी ग्राह से छूट जाता है ॥ ७५–७८ ॥
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।
विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ७६ ॥
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ ८० ॥
अनेन विधिना सर्वास्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः ।
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ ८१ ॥
ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
नह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ ८२ ॥
और श्रप्रियों ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने प्रिय पुरुषोंसेकेसनातनऊपर पुण्यब्रह्मपद को प्राप्त के ऊपर पाप त्यागकर, ध्यानयोग निःस्पृह होजाता है, तब इस होतालोक मेंहै सुख। जबपातासंन्यासीहै औरसबमरणकोभांतिछोड़करके बाद दुःखमोक्षसुखसुख कोसे मुक्तपाताहोकरहै,।इस रीति से धीरे धीरे संग जो धन, पुत्र आदि की समता परमात्मा के ध्यान ब्रह्म में ही स्थित होजाता है । यह से ही होसकताका त्याग कहा है, वह सब का ज्ञान नहीं है वह ध्यानादि कर्मों है । जिसको आत्मा के स्वरूप ॥ का फल नहीं पाता है ॥ ७६-८२
पृष्ठ 344
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०४ मनुस्मृति । अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च ।. आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ॥८३॥
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम् ।
इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ॥ ८१ ॥
अनेन क्रमयोगेन परिन्नजति यो द्विजः ।
स विधूयेह पाप्मानं परंब्रह्माधिगच्छति ॥ ८५ ॥
एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् ।
वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत ॥ ८६ ॥
यश, देवता और श्रात्मा के विषय में जो वेदमन्त्र हैं और के दान्त ( ब्रह्मज्ञान ) प्रतिपादक जो मन्त्र हैं उनका सदा पाठ और जप विचार करे | यह वेद ज्ञानी, श्रज्ञानी और स्वर्ग, मोक्ष की इच्छावालों का भी शरण है अर्थात् वेद ही सर्वस्व है । इस क्रम से जो द्विज संन्यास धारण करता है, वह सब पापों से छूटकर, ब्रह्मभाव में लीन होजाता है । इस प्रकार, यह धर्म जितेन्द्रिय यतियों का कहा गया है अब वेद संन्यासी, अर्थात् जो चिह्न धारण गृहत्याग न करके ज्ञान सेही संन्यासी है उनका कमर्थमि सुनो ॥ ८३-८६ ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ ८७ ॥
सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः ।
यथोककारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ८८ ॥
सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्त्ति हि ॥८६ ॥
पृष्ठ 345
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
छठवां अध्याय । २०५
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणःसर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ६० ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति ये चार अलग अलग श्राश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हैं । ये चारों श्राश्रम नियम से सेवित हो तो उत्तमगति देनेवाले हैं । इन सबश्राश्रमों में वेद और स्मृतियों के अनुसार गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ कहा गया है । क्योंकि यह तीनों का पा लन करता है । जैसे सब नदी और नद समुद्र में जाकर ठहरते हैं, वैसे सच श्रश्रमी गृहस्थ में श्राश्रम रखते हैं ॥ ८७-६० ॥
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ६१ ॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
सत्यमक्रोध दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ६२ ॥
दशलक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
प्रधीत्य चानुवर्त्तन्ते ते यान्ति परमांगतिम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मचारी श्रादि चारों श्राश्रमवाले द्विजों को दशलक्षणवाले धर्म का सेवन यज्ञ से करना चाहिए । उनके लक्षण इस प्रकार हैं- १-धैर्य, २-क्षमा, ३-दम -मनको रोकना, ४-अस्तेय -चोरी न करना, ५- शोध- बाहर भीतरसे शुद्ध, ६-इन्द्रिय -निग्रह, ७-धी-न शास्त्रज्ञान, ८- विद्या-ब्रह्मविद्या, सत्य, १० - क्रोध-कोध अनु करना । जो विप्र धर्म के दशलक्षणों को पढ़तेहैं हैं॥ और६१-६३उसके॥ सार आचरण करते हैं, वे परमगति को पाते
दशलक्षणकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः ।
वेदान्तविधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ६४ ॥
·संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।
पृष्ठ 346
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०६ मनुस्मृति ।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ ६५ ॥
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ६६ ॥
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयज्ञः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत ॥ ६७ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां षष्टोऽध्यायः ॥ ऋषि, देव और पितरों के ऋण से मुक्त होकर, दशलक्षण धर्म का सेवन करता हुआ द्विज वेदान्त को सुनकर संन्यास धारण करे । सव अग्निहोत्रादि कर्मों को छोड़कर, पापों का प्राणायाम से नाश करके, जितेन्द्रिय होकर वेद का अध्ययन करे के दिये भोजन, वस्त्रादि का सुख से उपभोग करे । इस प्रकार सब कर्मों को छोड़कर, केवल श्रात्मसाक्षात्कार में तत्पर रहकर, संन्यास धारण करने से ब्रह्मपद को पहुँचता है । यह पवित्र, और परलोक मैं अक्षय फल देनेवाला ब्राह्मण काचारों प्रकार
का धर्म कहा गया है । अब राजधर्म को सुनो ॥ ६४-६७ ॥
छठवां अध्याय पूरा हुआ ।
पृष्ठ 347
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ सप्तमोऽध्यायः । राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नरः संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ १ ॥
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्तव्यं परिरक्षणम् ॥ २ ॥
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ॥ ३ ॥
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ४ ॥
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥ ५ ॥
तपत्यादित्यवच्चैत्र चक्षूंषि च मनांसि च ।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ ६ ॥
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमःस धर्मराट् ।
सकुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥ ७ ॥
सातवां अध्याय । राजधर्म | जैसा राजा का श्राचरण होनापरमचाहिएसिद्धि, जैसेप्राप्तउसकीहोतीउत्पत्तिहै वह", हुईसबहैकहाऔरजाताजिसहैप्रकार। उपनयनउसकोसंस्कारवाले क्षत्रिय राजा को न्याया
पृष्ठ 348
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
III मनुस्मृति | राजा ' नुसार इस जगत् की रक्षा करनीचाहिए । इस जगत् में जबने जगत् नहीं था और प्रजा भय से व्याकुल होने लगी, तब परमात्मा की रक्षा के लिए राजा को उत्पन्न किया । इन्द्र, वायु, यम, सूर्य,.. अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और कुबेर इन आठ लोकपालों के सनातन श्रंश को लेकर परमात्मा ने राजा बनाया है । इन लोकपालों की मात्रा से राजा बनाया गया है, इसलिए वह अपने तेज से सब प्रा गियों को दबा देता है । राजा को जो देखता है उसके आँख और मन पर सूर्य का सा प्रभाव पड़ता है, इसलिए सामने होकर कोई.. राजा को देख नहीं सकता । राजा अपने प्रभाव में अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र के समान है ॥ १-७ ॥
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ८ ॥
एकमेव दहत्यग्निर्नरं दुरुपसर्पिणम् ।
कुलं दहति राजाग्निः सपशुन्द्रव्यसञ्चयम् ॥ ६ ॥
कार्य सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।
कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं विश्वरूपं पुनः पुनः ॥ १० ॥
यस्य प्रसादे पद्माश्रीर्विजयश्च पराक्रमे ।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजमयो हि सः ॥ ११
तं यस्तु द्वेष्टि संमोहात्स विनश्यत्यसंशयम् ।
तस्य ह्याशु विनाशाय राजा प्रकुरुते मनः ॥ १२ ॥
. राजा बालक हो तो भी यह मनुष्य है ऐसा मानकर उसका अपमान न करे । क्योंकि यह मनुष्य रूप में बड़ाभारी देवता स्थित है | अग्नि एकही मनुष्य को उसकी असावधानी से जलाता है, पर राजारूप अग्नि कुचाल से कुल, धन और पशु सहित भस्म कर देता है । राजा देश, काल, कार्य और शक्ति को
पृष्ठ 349
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
| सातवां अध्याय २०६ ठीक ठीक विचार कर, अपने राजधर्म्म की सिद्धिं के लिए अनेक रूप कभी क्षमा, कभी कोप, कभी मित्रता इत्यादि धारण करता है । जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में जय और क्रोध में मृत्यु का वास है, वह राजा सर्वतेजोमय है । उसके साथ अज्ञान से जो द्वेष करता है, वह निःसंदेह नष्ट होजाता है । क्योंकि उसके नाश का विचार शीघ्रही राजा मन में करता है ॥ ८०१२ ॥
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
निष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्मं न विचालयेत् ॥ १३ ॥
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोतारं धर्ममात्मजम् ।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ १५ ॥
इसलिए राजा अपने अनुकूल मित्र और शत्रु के लिए जिस धर्म क़ानून का स्थापन करे उसको कभी न तोड़ना चाहिए । प्रजापति ने राजा के लिए सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले, ब्रह्मतेजमय, धर्मरूप और अपने पुत्ररूप दण्ड को पहले ही से पैदा किया है । दण्ड के भय से चराचर सब प्राणी अपने भोग को प्राप्त होते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते ॥ १३-१५ ॥
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ १६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः स नेताशासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ । १७ ॥
दण्डो शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ॥
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ १८
२७
पृष्ठ 350
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१० मनुस्मृति ।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ १६ ॥
यदि प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ २० ॥
देश, काल, शक्ति और विद्या का विचार करके यथायोग्य अप राधियों को दण्ड देवे । वह दण्ड ही राजा है, पुरुष है, वही राज्य को नियम में रखनेवाला है, शासक है और वही चारों श्र का प्रतिभू-जामिन है । दण्ड सम्पूर्ण प्रजा का शांसन करता है. दण्ड ही रक्षा करता है, सोते हुए दण्ड ही जांगता है, विद्वान् लोग दण्ड को ही धर्म मानते हैं । उस दण्ड का विचारपूर्वक प्रयोग होने से वह सब प्रजा प्रसन्न करता है और श्रविचार से, सब तरह से नाशकारक होता है । यदि राजा निरालस होकर. अपराधियों को दण्ड न दे तो काँटे में मछलियों की भांति बल- वान्लोग निर्बलों को भून डाल ॥ १६–२० ॥
श्रद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ २१ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वरक्षांसि पतगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ २३ ॥
राजा दण्ड न करे तो कौत्रा पुरोडाश खा जायँ, कुत्ता यश चलि चाट जायें, कोई किसी का स्वामी न हो सके और ऊंची नीची चातों का विचार भ्रष्ट जाय । पवित्र मन का सर्व दुर्लभवैभव कोहै ।भागसब संकतेलोग हैंदण्डही। देव, दानवसे सन्मार्ग, गन्धर्कमें, रहतेराक्षसहैं, औरपक्षी जगतऔरपुरुष-सर्प