मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 351–360
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 351–360
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सातवां अध्याय । २११
भी दण्डही से दबकर अपने भोग को भोग सकते हैं ॥ २१-२३ ॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात्॥ २४ ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।-प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥ २५ ॥
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ २६ ॥
तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ २७ ॥
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।
धर्माद्विलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥ २८ ॥
दण्ड के विना सब वर्ण विरुद्धाचरण में प्रवृत्त हो जावें और। चतुरूप पुल टूटजावे । और सबलोगों में उपद्रव हो जावेऔर जिस देश में श्यामवर्ण, रक्लनेत्र, पापनाशक दण्ड विचरता है दुःख राजा सब तरफ़ न्यायदृष्टि से देखता है, वहां प्रजाकरताकोहै वह '. नहीं होता । जो राजा उस दण्ड का उचित प्रयोग, अर्थ, धर्म और काम से वृद्धि पाता है । परन्तु कामी जाता है । वास्तव दण्ड मेंहो तो उस दण्ड से स्वयं नष्ट हो राजा नहीं कर सकते हैं । धर्म बड़ा तेज है, उसका धारण साधारण नष्ट कर देता है ॥ २४-२८ ॥ से चलित राजा को यह कुटुम्ब सहित ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् । ॥ २६ ॥
अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन् देवांश्च पीडयेत्। सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना
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२१२ मनुस्मृति ।
न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्नेन विषयेषु च ॥ ३० ॥
शुचिना सत्यसंधेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१ ॥
उसके बाद क़िला, देश और चराचर जगत् का नाश करता है । अन्तरिक्षवासी देवता और मुनियों को भी पीड़ा पहुँचाता है । मन्त्री या सेना की सहायता से रहित, लोभी, मूर्ख, निर्बुद्धि, विषयासक्त राजा से वह दण्ड अर्थात् राजधर्म नहीं चल सकता । न्यायपूर्वक मिले धन से शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार वर्ताव करनेवाला बुद्धिमान् राजा, मन्त्री श्रादि की सहायता से दण्ड- विधान कर सकता है अर्थात् ऐसा राजा शिक्षा करने लायक़ होता है || २६-३१ ॥
स्वराष्ट्रे न्यायवृत्तः स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु ।
सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः ॥ ३२ ॥
एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोच्छेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३ ॥
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतविन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥
स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५ ॥
राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा दण्ड देनेवाला, हितैषियों से कुटिलता रहित और ब्राह्मणों पर क्षमावान् होना चाहिए । ऐसा बर्ताव करनेवाले, शिलोवृत्ति से भी जीते हुए राजा का यश लोक में जल में तेल की बूंद के समान फैलता है । विषयासक्त और उक्तरीति से विपरीत श्राचरण करनेवाले का यश पानी में घी के बूंद की भांति संकोच
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सातवां अध्याय । २१३ को प्राप्त होता है । अपने अपने धर्म में चलनेवाले सय वर्णों और श्राश्रमों की रक्षा करनेवाला प्रजापति ने राजा उत्पन्न किया है ॥ ३२-३५ ॥
तेन यद्यत्सभृत्येन कर्तव्यं रञ्जता प्रजाः ।
तत्तद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणान् पर्युपासीत प्रातरुत्थाय पार्थिवः ।
त्रैविद्यवृद्धान् विदुषस्तिष्ठेत्तेषां च शासने ॥ ३७ ॥
वृद्धांश्च नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदः शुचीन् ।
वृद्धसेवी हि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते ॥ ३८ ॥
इसलिए मन्त्रियों सहित राजा को प्रजारक्षा के लिए जो जो कर्म करने चाहिएं उनको क्रम से कहता हूँ - राजा को प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों में पारङ्गत, श्रेष्ठ, विद्वान्, ब्राह्मणों के साथ बैठना और उनकी आज्ञानुसार श्राचरण करना चाहिए । वेदज्ञ, पवित्र, वृद्ध ब्राह्मणों की नित्य सेवा राजा करे, क्योंकि वृद्धसेवा में तत्पर राजा दुष्ट कुजीवों से भी सत्कार पूजा पाता है ॥ ३६-३८ ॥ तेभ्योऽधिगच्छेद्विनयं विनीतात्मापि नित्यशः ।. facialमा हि नृपतिर्न विनश्यति कर्हिचित् ॥ ३६ ॥
बहवोऽविनयान्नष्टा राजानः सपरिच्छदाः ।
वनस्थापि राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ॥ ४० ॥
वेन विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिवः ।
सुदासो यवनश्चैव सुमखो निमिरेव च ॥ ४१ ॥
पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान् मनुरेव च ।
कुबेरश्च धनैश्वर्य ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥ ४२ ॥
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२१४ मनुस्मृति | शिक्षित राजा भी ऐसे योग्य ब्राह्मणों से नित्य चिनय सीखे । क्योंकि विनीत राजाको कभी हानि नहीं पहुँचती । बहुत से राजा श्रविनय से धन सम्पत्ति सहित नष्ट होगये और बहुत से जङ्गल रहकर भी अपने विनय से राज्य पागए हैं । राजा वेन, नहुपमैं, सुदास, यवन, लुमुख और निमि श्रपने श्रविनय -दुराचार से नष्ट होगये । पृथु और मनुने विनय से राज्य पाया । कुवेर ने धनाधिपत्य और विश्वामित्र ने ब्राह्मण्य को पाया ॥ ३६-४२ ॥
त्रैविद्येभ्यस्त्रयों विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भश्च लोकतः॥४३॥
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद्दिवानिशम् ।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥ ४४ ॥ 1
दशकामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च ।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्तेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः ।
वियुज्यन्तेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ ४६ ॥
वेदों से वेद, दण्डनीति, ब्रह्मविद्या को पढ़े । और अर्थशास्त्रं वगैरह व्यवहार विद्या को पढ़े । इन्द्रियों को वश में रखने का सदा ' उद्योग करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख सकता है । काम से पैदाहुए दश और क्रोध से पैदाहुए आठ व्यसनों का कोई अस्त नहीं है इनसे राजा को यत्नपूर्वक बचना चाहिए । काम से पैदा व्यसनों में श्रासक्तं राजा अर्थ और धर्म से हीन होजाता है और क्रोध से पैदाहुए व्यसनों में लग जाने से अपने शरीर से ही नष्ट होजाता है ॥ ४३-४६ ॥
मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परीवादःखियो दमः ।
तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ४७ ॥
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सातवां अध्याय । २१५ पैशुन्यं साहसं द्रोहं ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् । i वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ॥ ४८ ॥
द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः ।
तंय्लेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ४६ ॥
पानमक्षास्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम् ।
एतत्कष्टतमं विद्याञ्चतुष्कं कामजे गणे ॥ ५० ॥
दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे ।. airs पि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा i ५१ ॥ शिकार, जुना, दिन में सोना, दूसरे के दोषों को कहना, स्त्री- संभोग, मद्यपान, नाच, बाजा और व्यर्थघूमना ये दश कामके व्यसन है अर्थात् काम से पैदा हुए हैं । चुराली, साहस, द्रोह, ईर्षा, दूसरे के गुणों में दोष लगानी,द्रव्य हरलेना, गाली देना, कठोरपन ये आठ क्रोध से उत्पन्न व्यसन हैं । विद्वान् लोग इन दोनों प्रकार के दोषों का कारण लोभ कहते हैं, इसलिए लोभ को अवश्य छोड़ देना चा हिए | काम से पैदा व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्रीसंग और शिकार ये एक से एक बढ़कर दुःखदायी हैं । और क्रोध से पैदा व्यसनों में मारपीट, कठोर वचन, दूसरे की धनहानि करना ये
तीन बड़े दुःखदायी हैं ॥। ४७-५१ ॥
सप्तकस्यास्यं वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः ।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनमात्मवान् ॥ ५२
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते ।
व्यसन्यधोऽधो ब्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥ ५३ ॥
मौलाछात्रविदः शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान् ।
सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ५४ ॥
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२१६ मनुस्मृति । इस प्रकार ये सात व्यसन और इनके सम्वन्धवाले व्यसनों मैं एक से दूसरा अधिक कष्टदायक है । मृत्यु से व्यसन अधिक कष्टदायक माना जाता है । व्यसनी पुरुष मरकर नरक में पड़ता है। और जो व्यसन से दूर है, वह स्वर्गगामी होता है | परंपरा से राजसेवक, नीतिविद्या में चतुर, शूरवीर, अच्छा निशाना लगाने वाले, कुलीन और असमय में परीक्षित, सात या आठ मुख्य राजमंत्री रखना चाहिए ॥ ५२-४४ ॥
अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ ५५ ॥
तैः सार्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं संधिविग्रहम् ।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च ॥ ५६ ॥
तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक् ।
समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः ॥ ५७ ॥
सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता ।
मन्त्रयेत्परमं मन्त्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
नित्यं तस्मिन् समाश्वस्तः सर्वकार्याणि निःक्षिपेत् ।
तेन सार्धं विनिश्चित्य ततः कर्म समारभेत् ॥ ५६ ॥
श्रन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् ।
सम्यगर्थसमाहर्तृनमात्यान्सुपरीक्षितान् ॥ ६० ॥
जबकि गृहस्थ का एक छोटासा भी काम एक पुरुष को करना क ठिन पड़ता है तब बड़ा भारी राजकार्य विना सहाय अकेला राजा. कैसे कर सकता है? उन मन्त्रियों के साथ साधारण संधि- विग्रह. की सलाह और दण्ड, पुर, राष्ट्र, स्थान आदि का विचार करे । द्रव्य मिलने के उपाय, घनरक्षा, देशरक्षा आदि का भी परामर्श करे | उन मन्त्रियों की अलग अलग सलाह लेकर जो अपना हित-
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सातवां अध्याय । २१७ कर कार्य हो वह करे । उन मन्त्रियों में विद्वान्, धार्मिक ब्राह्मण मन्त्री के साथ संधि, विग्रह, आदि छ गुणांवाला विचार करे । विश्वास के साथ उस मंत्रीपर, सब कामों का भार रक्खे और उसके साथ सम्मति लेकर कार्य करे । पवित्र, बुद्धिमान, स्थिर- स्वभाव, सन्मार्ग से धन लानेवाले, परीक्षा किये हुए और भी मन्त्रयों को रखे ॥ ५५-६० ॥
निवर्तेतास्य यावद्भिरिति कर्तव्यता नृभिः ।
तावतोऽतन्द्रितान् दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान्॥ ६१ ॥
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान् दक्षान् कुलोद्गतान् ।
. शुचीनाकरकर्मान्ते भीरुनन्तर्निवेशने ॥ ६२ ॥
जितने मनुष्यों से पूरा काम निकले, उतने निरालस बुद्धिमान् राजकर्मचारियों की भरती करे । उनमें शूर, चतुर, कुलीन को ख़ज़ाने के काम में नियुक्त करे, और डरपोकों को महलों के भीतर नियुक्त करे ॥ ६१-६२ ॥
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् ।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ६३ ॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित् ।
पुष्मान् वीतभर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ ६४ ॥
श्रमात्ये दण्डआयतो दण्डे वैनयिकी क्रिया ।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधिविपर्ययौ ॥ ६५ ॥
दूत एव हि संधत्ते नित्येव च संहतान् ।
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ ६६ ॥
सविद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः । २८
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२१८ मनुस्मृति ।
श्राकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ ६७ ॥
बुद्ध्वा च सर्वं तत्त्वेनं परराजचिकीर्षितम् ।
तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत् ॥ ६८ ॥
और दूत उसको रक्खे.जो बहुश्रुत हो और हृदय के भाव, श्र कार, चेष्टाओं को जानने वाला, अन्तःकरण का शुद्ध, चतुर और कुलीन हो । शत्रु का भी प्रेमपात्र, श्राचारपवित्र, कार्यकुशल, पूर्वापर बातों का स्मरण रखनेवाला, देश- कालशाता, सुन्दर, निर्भय और वाचाल राजा का दूत प्रशंसा के लायक होता है । मन्त्री के अधीन दण्ड और दएड के अधीन शिक्षा है । राजा के. अधीन देश और खजाना है और दूत के अधीन मेल वा विगाड़ रहता है । दूत ही श्रापस के शत्रुओं को मिलाता है और मिले हुए को श्रलगाता है । दूत वह काम करता है जिससे मनुष्य लड़कर जुदा होजाते हैं । दूत शत्रु के श्राकार, मनोभाव, और चैटालों से उस के छिपे अभिप्राय को जाने । दूत द्वारा शत्रु की सय वालों को ठीक ठीक जानकर, राजा ऐसा उपाय करे, जिससे वह शत्रु राजा कोई पीड़ा न देखके ॥ ६३-६८ ॥
जाङ्गलं सस्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् ।
रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ॥ ६६ ॥
धन्वदुर्गं महीदुर्गमदुर्गं वार्क्षमेव वा ।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥ ७० ॥
जहां जङ्गल हो, खेती अच्छी हो, शिष्ट पुरुष बसते हो, रोगादि उपद्रवों से रहित हो, देखने में सुन्दर हो, आसपास के मनुष्य श्रव रखते हो, ऐसे स्वाधीन देश में राजा को रहना चाहिए । धनुदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, सेनादुर्ग वा गिरिदुर्ग इन दुर्ग- किला में किसीके श्राश्रय में नगर बसाना चाहिए ॥ ६६-७० ॥ सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।
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सातवां अध्याय । २१६
एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्ग विशिष्यते ॥ ७१ ॥
त्रीण्याद्यान्याश्रितास्तेषां मृगगतश्रयाप्चराः ।
श्रीयुत्तराणि क्रमशः प्रवङ्गमनरामराः ॥ ७२ ॥
यथा दुर्गाश्रितानेतान्नोपहिंसन्ति शत्रवः ।
तथारयो न हिंसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ॥ ७३ ॥
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते ॥ ७४ ॥
तत्स्यादायुधसंपन्नं धनधान्येन वाहनैः ।
ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ ७५ ॥
तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहमात्मनः ।
गुतं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम्॥ ७६ ॥
इन दुर्गों में गिरिदुर्ग श्रेष्ठ है । इसलिए सब यक्षों से उसका आश्रय ठीक हैं । उक्त दुर्गों में प्रथम तीन में कम से मृग, चूहा और नाक रहते हैं । बाकी तीनों में वानर, मनुष्य और देवता निवास करते हैं । जैसे इम दुर्गों में रहनेवाले मृगादि को कोई हिंसक नहीं मार सकते, ऐसे ही गिरिदुर्ग का श्राश्रय करनेवाले राजा को शत्रु नहीं मार सकते हैं । किले के भीतर रहनेवाला एक धनुर्धर सौ योद्धाओं से लड़ सकता है और सौ धनुर्धर दश हज़ार के साथ लड़ सकते हैं । इसीसे क़िला बनाया जाता है । वह क़िला हथियार, धन, धान्य, वाहन, ब्राह्मण, शिल्पविशारद, यन्त्र-कल, घास और जव से परिपूर्ण रक्ले । उस क़िले के बीच में, प्रयोजन भर के लिए एक मकान बनावे, जो सब ऋतुओं के फल- पुष्प युक्त, सफ़ेदी किया हुआ, जल और वृक्षों के सहित हो ॥ ७१-७६ ॥ तदध्यास्योद्वद्भार्यां सवर्णालक्षणान्विताम् ।
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२२० मनुस्मृति ।
कुले महति संभूतहृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ ७७ ॥
पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चविजम् ।
तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ॥ ७८ ॥
उस अकान - महल में रहकर राजा, अपने वर्ग की, कुलीन मनो-हारिणी, रूपवती, गुणवती कन्या का विवाह करे । और शान्तिक, पौष्टिक कर्म करनेवाला पुरोहित और ऋत्विज का वरण करे जो होत्रादि कर्म करें ॥ ७७-७८ ॥
यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान् धनानि च॥७६ ॥
सांवत्सरिकमाप्तेश्च राष्ट्रादाहारयेद्बलिम् ।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ ८० ॥
अध्यक्षान् विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः ।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ ८१ ॥
श्रावृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् ।
नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्रह्मोऽभिधीयते ॥ ८२ ॥
न तं स्तेना न चामित्रा हरन्ति न च नश्यति ।
तस्माद्राज्ञा निधातव्यो ब्राह्मणेष्वक्षयो निधिः ॥ ८३ ॥
राजा, बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए ब्राह्मणों को नाना विधि दान- दक्षिणा देवे | किसी विश्वासपात्र मनुष्य के द्वारा साल में राजकर का संग्रह करावे, प्रजा में नीति से वर्ताव करें और पिता के समान स्नेह करे । नाना प्रकार के को जानने वाले पुरुष, अलग अलग कामों पर अध्यक्ष- कामों नियुक्त करे । जो, राजा के सब कार्यकर्ताओं पर निगरानी अफ़सररखें ।