मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 31–40

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 31–40

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भूमिका २३ अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ( मनु०-१.३४ ) पुनः जीव, पशु, पक्षी तथा मनुष्य उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार मनुस्मृति में चेतन से लेकर स्थावर तक की गतिविधियों का विश्लेषण है । महाप्रलय में विनाश का वर्णन है । द्वितीय अध्याय- - - इस अध्याय में मनु द्वारा धर्म का विश्लेषण किया गया है, जिसमें धर्म के उपादान, धर्म के लक्षण, वेद, स्मृति, भद्र लोगों का आचरण तथा आत्मतुष्टि है । यथा— श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ || ( मनु०-२.१० ) वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ ( मनु०-२.१२ ) ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश, मध्य देश, आर्यावर्त की सीमा, यज्ञीय देश, म्लेच्छ देश आदि का विवेचन भी मनुस्मृति में द्रष्टव्य है—

निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ।

तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् ॥

सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥ ( मनु०-२.१६-१७ ) कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः । एष ब्रह्मर्षिदेशो एतद्देशप्रसूतस्य ब्रह्मावर्तादनन्तरः ॥

सकाशादग्रजन्मनः ।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥

हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं

यत्प्राग्विनशनादपि ।

प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥

आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः । कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ॥ ( मनु ० - २.१ ९ -२३ ) मनु व्यक्ति के सर्वोच्च विकास में इन्द्रियों पर विजय महत्त्वपूर्ण मानते हैं । गुरु एवं शिष्य का सम्बन्ध, उनके लक्षण माता - पिता की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है । मनु का

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२४ मनुस्मृतिः उक्त विवेचन भारतीय नैतिकता का उद्घोष है । इसी अध्याय में मनु का राष्ट्रवाद प्रस्तुत होता है । उन्होंने ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त - जैसे भू - भागों का विश्लेषण दूसरे आधार पर किया है । यज्ञिय और म्लेच्छ देश के रूप में दो प्रकार से भूमि का विभाग किया है । वे वैदिकों को इसी आर्यावर्त के विकसित सृष्टि का आदि पुरुष और सारी मानवता का अभिभावक मानते हैं । इस प्रकार भारत - भूमि, भारत और भारतीय नैतिकता का प्रतिपादन ही मनु - प्रणीत शास्त्र का उद्देश्य है । तृतीय अध्याय - इस अध्याय में ब्रह्मचर्य व्रत अर्थात् वेदाध्ययन के उपरान्त धर्म के उपादानभूत गार्हस्थ्य जीवन के प्रवेश पर मनु ने विशद प्रकाश डाला है- — वेदाध्ययन के बाद समावर्तन, विवाह, विवाह में त्याज्य कुल, विवाहयोग्य कन्या, कन्या के लक्षण, विवाह के भेद, विवाहों में वर्णानुसार हीनता तथा श्रेष्ठता, उत्तम ब्राह्म विवाह की प्रशंसा आदि विषयों की चर्चा गई है । विवाहोपरान्त पति - पत्नी के बीच धर्मानुसार कैसा सम्बन्ध हो, इसका विशद वर्णन इस अध्याय में प्राप्त होता है; जिसमें स्त्री - समागम, स्त्री- सम्मान, पञ्चमहायज्ञ, गृहस्थाश्रम की प्रशंसा, नित्यश्राद्ध, पितृश्राद्ध, बलिवैश्वदेव - विधि, दान - विधि, अतिथिसेवा, अतिथियों के प्रकार, श्राद्ध के विविध पक्ष, श्राद्ध में सत्पात्र ब्राह्मण की आवश्यकता असत्पात्र की निन्दा, श्राद्ध की प्रशंसा तथा मृत पितर के वसु आदि देवस्वरूपत्व-प्राप्ति आदि का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन मनु ने प्रकृत अध्याय में प्रस्तुत किया है । चतुर्थ अध्याय— चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः । द्वितीयामायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ ( मनु०-४.१ ) तृतीय अध्याय में गृहाश्रमी बनने की पृष्ठभूमि तैयार कर जीवन के द्वितीय भाग अर्थात् यथाशक्य द्वितीय चतुर्थांश में पूर्ण गृहाश्रमी के दायित्व - निर्वहण का आदेश प्राप्त होता है । जिसमें प्राणियों की श्रेष्ठ जीवनवृत्ति का वर्णन सर्वप्रथम आया है ।

अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।

या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥

यात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः ।

अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥

ऋतामृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा ।

सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥

ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम् । मृतं तु याचितं भैक्षं, प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ ( मनु०-४.२-५ )

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भूमिका

सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते ।

सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥

कुसूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा ।

त्र्यहैहिको वाऽपि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥

चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् । ज्यायान्परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः । ( मनु०-४.६-८ ) २५ इसी अध्याय में वर्णानुसार कर्मों का विवेचन विशद रूप से प्राप्त होता है । जिसमें घर के अन्दर का आचरण तथा सामाजिक आचरण दोनों पक्षों पर मनु की पैनी दृष्टि दिखाई पड़ती है । घर के अन्दर स्त्री के साथ कब - कैसे और क्या व्यवहार करना चाहिए इत्यादि । मल - मूत्र का त्याग कहाँ और किस दिशा में करना आदि व्यावहारिक अवस्थाओं पर ध्यान केन्द्रित कराया गया है । पुनः निवास, अध्ययन, नित्य - नैमित्तिक कर्म तथा उसकी अवस्था एवं समय, वेद - वेदाङ्ग का अध्ययनरूपी कर्म का ज्ञान प्राप्त कराया गया है । जीवन की निर्विघ्नता के लिए शत्रु आदि के साथ नीतिपरक व्यवहार का निर्देश भी इस अध्याय में प्राप्त है— वैरिणं नोपसेवेत सहायं चैव वैरिणः । अधार्मिकं तस्करं च परस्यैव च योषितम् ॥ ( मनु०-४.१३३ ) साथ ही परस्त्री - सेवन के तीव्र विरोधपूर्वक उत्तम आचार का उत्कृष्ट निर्देश भी इसी अध्याय में प्राप्त होता है-न हीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ ( मनु०-४.१३४ ) इस प्रकार अभिवादन, उठना, बैठना, सोना, खाना, पीना, चलना, जीविका चलाना, पूजा करना, किसके साथ सम्बन्ध स्थापित करना, किसके साथ नहीं करना, किसका अन्न ग्रहण करना, किसका नहीं करना आदि का वर्णन करते हुए अपने योग्य पुत्र को समस्त दायित्व सौंपकर ब्रह्मचिन्तन का निर्देश दिया गया है—

महर्षिपितृदेवानां गत्वाऽऽनृण्यं यथाविधि ।

पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थमाश्रितः ॥

एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनः । एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति । ( मनु०-४.२५७-२५८ ) पञ्चम अध्याय — इस अध्याय का प्रारम्भ में बताया गया है कि मृत्यु का कारण तत्त्व क्या है? इसकी जिज्ञासा होती है? भृगु जी ने इसका कारण वेदाध्ययन का

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२६ मनुस्मृतिः अभाव, आचारहीनता, अधर्म, अभक्ष्यभक्षण आदि तत्त्वों को मनुष्य की मृत्यु में कारण माना है । इसी क्रम में किसके लिए क्या भक्ष्य तथा क्या अभक्ष्य है, इसका विचार किया गया है । पुनः आशौच - विचार के क्रम में जनना - मरण दोनों प्रकार के आशौच का विचार किया गया है । मनु ने राजादि को आशौच से मुक्त रक्खा है-न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम् । ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हि ते सदा ॥ राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते । प्रजानां परिरक्षार्थमासनं चात्र कारणम् ॥ ( मनु०-५.९ ३ - ९ ४ ) इस अध्याय में शौच का बहुत ही स्पष्ट तथा सम्यक् प्रकार से वर्णन किया गया है, जिसमें शरीर, अन्न, वस्त्र, थूक, खखार, गाय आदि का वर्णन प्राप्त होता है । षष्ठ अध्याय — गृहस्थ जीवन के उपरान्त वानप्रस्थ जीवन जीने की विधि इस अध्याय में वर्णित है । वानप्रस्थियों के लिए ग्राम्याहार का त्याग, मृगचर्मादि धारण तथा वानप्रस्थियों के अन्य नियमों का साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया गया है । वानप्रस्थ आश्रमियों को क्या खाना, क्या पीना, कहाँ सोना, उस अवस्था में भी अतिथि के उपस्थित हो जाने पर कैसा सत्कार करना, क्षुद्र जीवहत्याजन्य प्रायश्चित्त, प्रियाप्रिय में पाप - पुण्य का त्यागपूर्वक विषय की निःस्पृहता वानप्रस्थाश्रम का मुख्य विवेच्य है—

प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।

विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥

यदा भावेन भवति सर्वाभावेषु निःस्पृहः । तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ ( मनु०-६.७९ -८० ) एवं प्रकार से प्रियाप्रिय से नि: स्पृह व्यक्ति ही आत्मध्यान तथा वेदाध्ययन करता हुआ वानप्रस्थ आश्रम का निर्वहण कर सकता है । सातवें अध्याय में समाज के नियंत्रण हेतु राजधर्म की विवेचना विस्तृत रूप से की गयी है । आचार्य मनु ने राजा को ईश्वरस्वरूप माना है । उन्होंने राज्य का पहला आधार भौतिक माना है । इनका मत है कि राज्य की स्थापना ऐसे वातावरण में हो, जहाँ अन्न का प्रचुर उत्पादन हो सके । उस राज्य में धार्मिक लोग निवास करें, जनता रोग - व्याधि से रहित हो, वातावरण शान्त हो, रमणीक हो, प्रजागण विनीत हों तथा जीविका का साधन भी सुगमतापूर्वक उपलब्ध हो । मनु ने दूसरा आधार राजनैतिक माना है । राजसत्ता राजनीतिक आधार की अभिव्यक्ति में साधन है । राजा एवं प्रजा के कर्त्तव्य के विषय में उनका विचार स्पष्ट है कि राज्य के सकुशल सञ्चालनार्थ राजा को न्यायालय में स्वयं उपस्थित होकर देश - कुल - काल - परिस्थिति एवं शास्त्रानुसार

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भूमिका २७ न्याय प्रदान करना चाहिए । इसी का विवेचन सातवें अध्याय में करते हुए मनु ने

स्वयं कहा है-राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः ।

संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥

ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि । सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् । ( मनु०-७.१-२ ) अर्थात् राजा के आचार, उत्पत्ति और इस लोक तथा परलोक में होने वाली उत्तम सत्पात्रता हो, ऐसे राजधर्म को कह रहा हूँ । शास्त्रानुसार क्षत्रियकुलोत्पन्न एवं वैदिक विधि से अभिषिक्त राजा न्यायपूर्वक सब प्रजा की रक्षा करे । इस वचन का अभिप्राय यह है कि क्षत्रिय के लिए ही मुख्यतः प्रजापालनरूप कर्त्तव्य निर्दिष्ट किया गया है । आपत्तिकाल में ब्राह्मण भी क्षत्रिय वैश्यवृत्ति का आश्रयण कर सकता है । वैश्य क्षत्रिय वृत्ति कर सकता है और शुद्ध भी क्षत्रिय वैश्य वृत्ति कर सकता है; किन्तु ब्राह्मण शूद्रवृत्ति और शुद्ध ब्राह्मणवृत्ति आपत्तिकाल में भी नहीं कर सकते । आचार्य मनु का कथन है कि इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और कुबेर के सारभूत नित्य अंश लेकर राजा की सृष्टि होती है । राजा राज्य के सकुशल संचालन हेतु तीन अंगों की स्थापना करता है— कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका । कार्यपालिका — आचार्य मनु ने कार्यपलिका को तीन भागों में विभक्त किया है— राजा, मंत्रिमण्डल और लोकसेवा । इसमें पहला राज्य का प्रधान अङ्ग राजा का होता है । मनुस्मृति में उसकी उत्पत्ति दैवी मानी गयी है । उनके अनुसार उसका देवत्व विधि और धर्मसापेक्ष है । दैवी सिद्धान्त मात्र राजा के दैवत्व का विश्लेषण करता है, दैवी अधिकार का नहीं । राजा का अधिकार धर्म - नियंत्रित है, वह समाज से विमुख नहीं है, बल्कि समाज का एक अङ्ग है । मनु राजा के अधिकार की अपेक्षा कर्त्तव्य पर अधिक बल देते हैं । राजा समाज, विधि एवं धर्म का विषय है । राजा दण्ड के अधीन है । दण्ड सामाजिक शक्ति का प्रतीक है । राजा दण्ड का प्रयोग समाजविरोधी तत्वों के विरुद्ध करता है । यदि वह दण्ड का दुरुपयोग करता है, तो उसका उपयोग उसके विरुद्ध भी सम्भव है ।

तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।

ब्राह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥

तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।

भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥

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२८ मनुस्मृतिः

तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।

यथार्हतः सम्प्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्त्तिषु ॥

स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः ।

चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।

दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥

( म ० अ ०७ श्लोक १४-१८ ) राजनीतिक सम्प्रभुता का प्रतीक राजा है । उसमें यह शक्ति प्रजा द्वारा प्रदत्त है । राजा प्रजा के संरक्षण के लिए है । प्रजा राजा के लिए नहीं है । अन्यायी राजा अपने जीवन और राज्य से हाथ धो बैठता है । आचार्य मनु वैसे राजा की बात करते हैं, जो वेद का ज्ञाता हो तथा अत्यनुशासित रहता हो । मनु का राजा विद्वान् होने के साथ ही जनकल्याण एवं राज्य के सुख समृद्धि का कारण बन सकता है । मनुस्मृति में राजा की दिनचर्या का उल्लेख इस बात का संकेत है कि वह कहीं से भी स्वच्छन्द अथवा स्वतन्त्र नहीं है । वह विधि, नियम एवं परम्परा के अधीन है । कार्यपालिका का दूसरा विभाग मंत्रिमण्डल । राजा मंत्रियों की सहायता से शासन का संचालन करता है । मनु का मत है कि जो राजा मंत्री, सेनापति आदि . सहायकों से रहित है, वह मूर्ख है, लोभी है, शास्त्रज्ञानविहीन है और विषयासक्त है । वह राज्यशासन न्यायपूर्वक नहीं कर सकता-तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते । कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहयन्यते ॥

दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।

धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥

ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् ।

अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन्देवांश्च पीडयेत् ॥

सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना ।

न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥

शुचिना सत्यसम्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा । प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ( मनु ७.२७-३१ ) राजा को मंत्रियों की नियुक्ति एवं पदच्युति का अधिकार है । मंत्रियों को युद्धशक्ति के विभाग, मुद्रा, पुलिस और नागरिक कार्य सौपे गये हैं ।

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भूमिका २ ९ कार्यपालिका का तीसरा अंग लोकसेवा है । मनुस्मृति में लोकसेवाहेतु मेधावी, वफादार, बहादुर एवं कुलीन व्यक्तियों की नियुक्ति का अधिकार राजा को दिया गया है । अतएव स्पष्ट है कि मनु के अनुसार कार्यपालिका के तीन अंग होते हैं — राजा, जिनका कर्त्तव्य लोगों की सेवा करना होता है, उसी क्रम में जनता की सहायता हेतु सुपरीक्षित मंत्रिमण्डल एवं प्रशिक्षित लोकसेवकों, राज्य कर्मचारीयों की नियुक्ति करना आदि भी राजा के अधिकार एवं दायित्व के अन्तर्गत आता है । अष्टम अध्याय में न्यायपालिका से सम्बन्धित विषयों का विवेचन विस्तारपूर्वक किया गया है । समाज के कुशलतापूर्वक संचालन हेतु विधि - व्यवस्था बनाये रखना, व्यक्ति एवं समाज के लिए उचित न्याय की व्यवस्था करना इसकी स्थापना का अधिकार है । न्यायपालिका का प्रधान राजा को माना गया है । न्याय - व्यवस्था हेतु विद्वान् ब्राह्मण की नियुक्ति की जाती है । तीन अन्य ब्राह्मण को नियुक्त कर राजा चार ब्राह्मणों को मिलाकर न्यायपालिका को न्यायिक संस्था का रूप प्रदान करता है । यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् । तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ।

सोऽस्य कार्याणि संपश्येत्सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।

सभामेव प्रविश्याग्र्यामासीनः स्थित एव वा ॥

यस्मिन्देशे निषीदन्ति विप्रा वेदविदस्त्रयः । राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान्ब्राह्मणस्तां सभां विदुः ॥ ( म ० अ ० ८.९ -११ ) मनु के अनुसार न्यायपालिका में १८ प्रकार के विवादों पर विचार होता है; जो निम्नवत् है— १. ऋण लेना, २. धरोहर रक्षा ३. किसी वस्तु या भूमि आदि का स्वामी न होने पर भी उसे बेच देना, ४. अनेक व्यक्तियों का मिलकर संयुक्त रूप से कार्य करना, ५. दान आदि में दी गयी सम्पति या किसी वस्तु को क्रोध, लोभ आदि के कारण वापस ले लेना, ६. नौकरों को वेतन या मजदूरों की मजदूरी देना, ७. पूर्व - निर्णीत सन्धिपत्रादि को नहीं मानना, ८. क्रय - विक्रय में विवाद उपस्थित होना, ९. स्वामी तथा रखवाली करने वाले में परस्पर विवाद होना, १०. सीमा के विषय में विवाद होना, ११. दण्ड-पारुष्य ( अत्यधिक मारपीट करना ), १२. वाक्पारुष्य ( अनधिकार गाली आदि देना ), १३. चोरी करना, १४. अतिसाहस करना ( डाका डालना, आग लगाना आदि ), १५. स्त्री का परपुरुष से सम्भोग आदि करना, १६. स्त्री - पुरुष का धर्म, १७. पैतृक ( पिता के ) धन - सम्पत्ति या भूमि आदि का बँटवारा करना और १८. जुआ खेलना या द्रव्यादि रखकर ( बाजी लगाकर अर्थात् दाँव पर धन आदि लगाकर ), पशु ( भेड़ा, भैंस

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३० मनुस्मृतिः आदि ), पक्षी ( मुर्गा, तीतर, बटेर आदि ) को लड़ाना । ये १८ स्थान व्यवहार ( मुकदमें ) की स्थिति में रक्खे गये हैं । यहाँ ध्यातव्य है कि न्याय करना राजा का पदेन कर्त्तव्य है तथा न्याय की अवहेलना किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए । न्याय सामाजिक जीवन का आधार है । न्याय करते समय विभिन्न परिस्थितियाँ तथा उनसे सम्बधित मामलों को ध्यान में रखा जाना अनिवार्य है । सामाजिक स्थिति न्यायिक शक्ति का केन्द्रविन्दु है । विधायिका —- राज्य सरकार की तीसरी शक्ति विधायिका है, जो विधि - निर्माण की प्रक्रिया को पूरी करती है । यहाँ मनु ने कहा है कि इस कार्य में लगे लोग विशिष्ट विद्वान् होने चाहिए । उन्होंने वेदों या उसकी टीकाओं का भी ज्ञान उन विद्वानों के लिए अनिवार्य माना है; क्योंकि विधि श्रुति - स्मृति, सदाचार एवं आत्मविवेक से आती है । इस विधायिका संगठन को दशवरा तथा त्र्यम्वरा सभा कहा गया है, जिसमें सदस्यों की संख्या १० होती है उनको दशवरा सभा कहते हैं इसमें तीन व्यक्ति एक-एक वेद के ज्ञाता, ' एक निर्वक्ता, एक मीमांसक, एक निरुक्त, एक धर्मशास्त्रवक्ता एवं तीन व्यक्ति मुख्य व्यवसायों के होते हैं । त्र्यम्वरा सभा तीनों वेदों के एक - एक विद्वान् को मिलाकर बनायी जाती है । त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ॥ ( मनु ० १२.१११ ) यहाँ ध्यातव्य है कि मनु विकेन्द्रित प्रशासनिक व्यवस्था पर विशेष बल देते हैं । उनके अनुसार स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से राज्य के प्रत्येक भाग की सुरक्षा संभव है । शासन - व्यवस्था हेतु उन्होंने एक ग्राम, दश ग्राम, सौ ग्राम और एक हजार ग्रामों के पृथक् - पृथक् संगठनों की व्यवस्था की है । करप्रणाली के विषय में मनु का स्पष्ट मत है कि राज्य की कर - व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये, जिसमें राज्य एवं नागरिक को समान लाभ प्राप्त हो सके एवं प्रजा पर अधिक कर का बोझ भी न पड़े ।

यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम् ।

तथावेक्ष्य नृपो राष्ट्रं कल्पयेत्सततं करान् ॥

यथाल्पाल्पमदन्त्याद्यं वार्योकोवत्सषट्पदाः ।

तथाल्पाल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्रद्राज्ञाब्दिकः करः ॥

( मनु०- ७.१२८-१२९ ) आचार्य मनु ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन युद्ध एवं शास्त्र दो विषयों के ' अन्तर्गत किया गया है । उन्होंने युद्ध की विधियाँ, सन्धि, आक्रमण, सुरक्षा, शक्तियों

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भूमिका ३१ का बँटवारा, व्यूहरचना इत्यादि का भी वर्णन किया है । उन्होंने अन्ताराष्ट्रीय नीति के चार आधार निर्धारित किये हैं- समझौता, दुर्व्यवहार, राज्य का विभाजन एवं युद्ध । मनुस्मृति में राज्य का सावयवरूप निर्धारित किया गया है । राज्य के घटक हैं— स्वामी, अमात्य, पुर, राष्ट्र, कोष, दण्ड तथा सुहृद् । ये सभी अंग एक - दूसरे से सम्बद्ध हैं । इनमें प्रत्येक अंग एक - दूसरे से अधिक शक्तिशाली है । मनु ने राजा के कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है । मुख्य रूप से राजा के दो कार्य हैं— आन्तरिक शक्ति -विकास एवं बाह्य शक्ति - नियंत्रण | मूल्य पर नियंत्रण करना राजा का आन्तरिक कर्त्तव्य है । समाज में उत्पन्न विवादों को निर्णीत करने में राजा की भूमिका निर्णायक होती है । श्रेणी एवं परिजन के मध्य विवाद का भी निपटारा राजा करता है । जातिजानपदान्धर्माञ्श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् । ( मनु०- ८.४१ ) प्रत्येक वर्ण अपने निश्चित कार्यों में संलग्न रहता है या नहीं - यह देखना राजा का कर्त्तव्य है; अन्यथा सामाजिक व्यवस्था के छिन्न - भिन्न होने का खतरा रहता है— वाणिज्यं कारयेद् वैश्यं कुसीदं कृषिमेव च । पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् || ( मनु ८.४१० ) आचार्यमनु ने शिक्षा पर विशेष बल दिया है । उन्होंने कहा है कि राजा को समुचित शिक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए । शिक्षा ही एकमात्र ऐसा धर्म है, जो न तो नष्ट होता है, न ही उसे कोई चुरा सकता है । राजा को विद्वानों को पुरस्कृत करना चाहिये । उनका कथन है कि वेदज्ञ विद्वान् से राष्ट्र के कल्याण एवं समृद्धि में सहायता मिलती है । मनु ने सामाजिक समरसता को कायम रखने के लिए कुछ लोगों को करमुक्त रक्खा है; यथा — ग्रामीण स्त्री, संन्यासी, योगी, वेदज्ञ आदि पर कर का बोझ नहीं होना चाहिए । नाबालिकों के सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिये । नाबालिक ही समाज के बीज हैं । उन्होंने अपंगों की भी उचित देख - भाल करने की व्यवस्था करने को कहा है; जैसे— सन्तानविहीन स्त्रियाँ, विधवाओं एवं बीमार स्त्रियों की देखभाल करें । राजा अन्धे, लंगड़े, लूले, वृद्ध आदि से कर वसूल करने के लिए बल प्रयोग का निषेध किया है । गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः । ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव दाप्यास्तारिकं तरे ॥ ( मनु०- ८.४०७ ) इस प्रकार मनुस्मृति के द्वारा राजा को समस्त प्रजाओं को सभी प्रकार से सुरक्षा प्रदान करना तथा असामाजिकों को दण्डित करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है ।

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३२ मनुस्मृतिः नवम अध्याय — नवें अध्याय में मनु स्त्री - पुरुष के धर्म के विषय में विशद् विवेचन प्रस्तुत हुए कहते हैं कि स्त्री की रक्षा बचपन में पिता, युवावस्था में पति एवं वृद्धावस्था में पुत्र करता है-पिता रक्षति कौमारे भर्त्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति । ( मनु ० - ९.३ ) यहाँ मनु का विशेष अभिप्राय वैदिक मूल्यों का संरक्षण करना है । असंयमित काम से बलात्कार जैसी सामाजिक बुराई का जन्म होता है I । वे बलात्कारी के लिये कठोर दण्ड की व्यवस्था करते हैं— न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् । एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ ( मनु ० - ९.१० ) स्त्रीरक्षा के उपाय का विशेष रूप से वर्णन करते हुए मनु कहते हैं कि पिता, पति या पुत्रादि अभिभावक उस स्त्री को धनसंग्रह, व्यय, वस्तु तथा पदार्थों की शुद्धि, पति तथा अग्नि की सेवा ( पति एवं गुरुजन की शुश्रूषा तथा अग्निष्टोम कर्म ), घर तथा घर के बर्तन आदि की सफाई में नियुक्त करे । धर्मपूर्वक भी उनकी रक्षा अनिवार्य है । स्त्रियों के छ: दोष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं - ( मद्यादि मादक द्रव्यों का ) पति के साथ विरह, इधर - उधर घूमना, ( असमय में ) सोना और दूसरों के घर में विवाद करना— ये स्त्रियों के छः दोष हैं 1 । स्त्रियों का स्वभाव, स्त्रियों की सामान्य क्रिया का निषेध, व्यभिचार - प्रायश्चित्त, पति- गुणानुकूल स्त्री - गुण होना, पति - संसर्ग से स्त्री- प्रशंसा, अव्यभिचार का सत्पुत्र, व्यभिचार का कुपुत्र, क्षेत्र के अप्राधान्य में दृष्टान्त, पर - स्त्री में बीजवपन का निषेध, पुत्राधिकारी होने का उदाहरण, स्त्री - पुरुष की एकता, विक्रय या त्याग से स्त्रीत्व से अनुमित भाग - विभाजनादि, एक बार सेव्य स्त्री - धर्म, वियोग प्रकरण की व्याख्या का भी विस्तृत रूप से वर्णन किया है । नियोगनिन्दा, वर्णसङ्कर, वाग्दत्ता कन्या के पति के मरने पर दूसरे पति से विवाह, सप्तपदी से पूर्व दोषवती कन्या का त्याग, स्त्री के मद्यपायन करने पर राजदण्ड, वर्णानुसार स्त्रियों का दाय क्रियाज्ञानादि सजातीय स्त्री के संग धर्मकार्य का विधान, गुणी वर के लिए कन्या का विधान, स्वयं वरण का समय, विवाह की आवश्यकता, स्त्री के साथ धर्म कार्यार्थ सम्भोग करने का विधान है— प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थं च मानवाः । तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः ॥ ( मनु०- ९.९ ६ ) पति से किसी प्रकार का शुल्क प्राप्त करना निन्दनीय माना गया है । तदनन्तर दायभाग का भी विवेचन प्राप्त होता है । इसमें बड़े भाई का विशेष अधिकार प्राप्त है