मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 41–50
मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 41–50
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भूमिका ३३ और पितृवत् ही वह सभी अनुजों को प्रेम और व्यवहार प्रदान करे । ज्येष्ठपुत्र को विशेष महत्त्व प्रदान किया है । पितृधन में कन्या को भी अधिकार प्राप्त है । पुत्रहीन पिता कन्यादान करते समय - इस कन्या से जो पुत्र प्राप्त होगा, वह मेरी श्राद्धादि पारलौकिक क्रिया करने वाला होगा - ऐसा जामाता से कहकर उस कन्या का ' पुत्रिका ' कर्म करे । मनु ने कहा है कि पिता पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त करता है, पौत्र ( पुत्र के पुत्र = पोते ) से उन लोकों में अनन्त काल तक निवास करता है तथा परपौत्र ( पुत्र के पौत्र परपोते ) से सूर्यलोक को प्राप्त करता है । जिस कारण पुत्र पुंनामक नरक से पिता की रक्षा करता है, उस कारण से स्वयं ब्रह्मा ने उसे पुत्र कहा है-पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रघ्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥ पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ॥ ( मनु ० - ९.१३७-१३८ ) मनु ने पुत्रहीन पिता कि लिए दत्तक पुत्र का विधान किया है । ब्राह्मण के चारो वर्णों की स्त्रियों से विवाह करने का विधान है और अंश का भी विभाजन किया गया है । आचार्य के ( पितृधन के भागी ) मानते हैं, वे हैं— मनु छः प्रकार पुत्र को दायाद औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूठोत्पन्न तथा अपविद्ध । यहाँ विशेष रूप से ध्यातव्य है कि दायभाग में आचार्य मनु ने सूक्ष्म से सूक्ष्म नियमों तक विधान किया है, जिसमें कोई भी व्यक्ति छूट न जाय तथा राजव्यवस्था में भी सभी की सहभागिता हो, ऐसा जो नहीं करता है, उसे तो वे राष्ट्रद्रोही मानते हैं । मनु के अनुसार राजा युग स्वरूप है । राजा अपने आचरण एवं व्यवहार से सबका पालन पोषण करता है । मनु ने सभी वर्गों को अधिकार से अधिक कर्त्तव्य पर ब्रह्म दिया है । दशम अध्याय – इस अध्याय में मनु ने वेदाध्ययन का अधिकार तो द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को प्रदान किया है, लेकिन उसकी व्यवस्था का अधिकार केवल ब्राह्मण को ही है । यथा— अधीन्यीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः । प्रब्रूयाद् ब्राह्मणस्तेषां नेतराविति निश्चयः ॥ ( मनु०-१०.१ ) मनु ने सभी वर्णों के कर्त्तव्याकर्त्तव्य पर विशेष ध्यान दिया है । उन्होंने आपत्ति-काल में वर्णों के कर्त्तव्य का भी विशद् विवेचन प्रस्तुत किया है । राजा को सभी वर्णों को दण्डित करने का अधिकार है, केवल ब्राह्मण वर्ण को छोड़कर । इस विषय में मनु मनु.I.3
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३४ मनुस्मृतिः का विचार है कि पाप एवं अपराध की प्रवृत्ति ब्राह्मण में नहीं होती है, ऐसा तभी होता है जब राजा भ्रष्ट अथवा मूर्ख होता है— एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः । यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्तिपरमां गतिम् ॥ ( मनु ० - १०.१३० ) मनु ने सजातीय कथन, पिता की जाति के समान जाति होना, वर्णसङ्कर का लक्षण तथा उसके दो भेद अनुलोमज और प्रतिलोमज की भी चर्चा की है । उन्होंने वर्ण-चतुष्टय के सामान्य धर्म का विधान बताते हुए ब्राह्मण वर्ण के षट् कर्मों का भी विधान किया है— अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव षट्कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ ( मनु०-१०-७५ ) अर्थात् साङ्ग वेदों का अध्यापन, अध्ययन, यजन, याजन दान देना और दान लेना - ये छ: कर्म ब्राह्मणों के हैं । इनमें तीन कर्म जीविका के लिए - साङ्ग वेदा-ध्यापन, यज्ञ कराना और दान लेना ब्राह्मण की जीविका के लिए हैं । क्षत्रियों के तीन कर्म कहे गये हैं-त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात् क्षत्रियं प्रति । अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ( मनु०-१०.७७ ) अर्थात् ब्राह्मण की अपेक्षा क्षत्रियों के तीन कर्म – वेदाध्ययन, यज्ञ कराना तथा दान लेना निवृत्त होते हैं । अतः क्षत्रियों को इन तीन कर्मों को छोड़कर शेष तीन कर्म ( वेदाध्ययन, यज्ञ करना तथा दान देना ) ये ही करने चाहिए । वैश्यों के कर्म का भी विधान उन्होंने प्रस्तुत किया है । वैश्य के लिये भी सामान्य धर्म का पालन करने का ही विधान कर्म मान्य है । उन्होंने आपद्धर्म का भी विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है । कुछ वर्णित कर्म आपत्काल में भी नहीं करने का विधान है । उस काल में शिला तथा उञ्छ से भी जीविका चलाना चाहिए । वे सप्तविध धर्मयुक्त धनागम का विवेचन करते हैं-अर्थात्– सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ( मनु०-१०.११५ ) १- दाय ( धर्मयुक्त पितृ - सम्पत्ति का भाग ) २- लाभ ( मूलधन या मियादि प्राप्त ) १३- खरीदा हुआ 1.
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भूमिका ४- जय ( धर्मपूर्वक किये गये युद्ध में विजय से प्राप्त ) ५- प्रयोग ( व्याज अर्थात् सूद आदि के द्वारा प्राप्त ) ६- कर्मयोग ( खेती तथा व्यापार आदि उद्योग करने से प्राप्त ) ७- सत्यप्रतिग्रह ( शास्त्रोक्त दान से प्राप्त ) । ३५ ये सात धन के लाभ होने के स्थान धर्मयुक्त कहे गये हैं । जीवन - निर्वाह के इस हेतुओं की चर्चा करते हुए कहते हैं— १ - विद्या ( वेद - वेदाङ्गादि का तथा वैद्यक, तर्क, विष - निराकरण आदि की विद्या ), २- शिल्प ( वस्त्र, तैलादि को सुगन्धित करना ), ३-१ -भृति ( इत्रादि बनाकर वेतन लेना ), ४- सेवा ( दूसरों की दासता, नौकरी करना ), ५- गोरक्षण ( गौ तथा अन्य पशुओं का पालन - संवर्धन आदि ), ६ - व्यापार, ७- खेती, ८- धैर्य ( थोड़े धन पूर्वक भी सन्तोष से निर्वाह करना ), ९- भिक्षासमूह और १०- सूद — ये इस जीवन - निर्वाह के हेतु हैं । वे राजाओं के भी आपद्धर्म का विधान किये हैं । प्रकार इस अध्याय में आपद्धर्म पर भी विशेष चर्चा की गई है । एकादश अध्याय में मनु ने नवविध स्नातकों को दान देना तथा वेदी के भीतर भिक्षान्न देने का विधान किया गया है । सान्ताकिकं
यक्ष्यमाणमध्वगं सर्वदेसम् ।
गुर्यर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायार्श्यपतापिनः ॥
नवैतान्स्नातकान्विद्याद् ब्राह्मणान्धर्मभिक्षुकान् । निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः । ( मनु०-११.१-२ ) अर्थात् सन्तानार्थ विवाहेच्छुक, यज्ञ करने का इच्छुक, पथिक, विश्वजित् आदि यज्ञ करने में अपनी समस्त सम्पत्ति को दान किया हुआ, विद्या गुरु, पिता - माता के लिए भोजन देने के इच्छुक, पढ़ने के लिए भोजन - वस्त्र का इच्छुक और रोगी - इन नव - विध स्नातक ब्राह्मणों को धर्मभिक्षु जानना चाहिए तथा इनके निर्वाह के लिए गौ, सोना, अन्न और वस्त्र आदि दान देना चाहिए । उन्होंने सोमयाग के अधिकारी, एकांग-हीन - यज्ञपूर्त्यर्थ वैश्य आदि से धन लाना, छः उपवास के बाद नीच से भी अन्न लाने का विधान किया है । वे यज्ञशील के धन की प्रशंसा करते हैं । यज्ञार्थ शूद्र से भिक्षा लेने की तथा यज्ञार्थ धन लेकर बचाने का विशेष रूप से निषेध करते हैं । यज्ञ का प्रतिनिधि कैसा होना चाहिए । ब्राह्मणादि को स्वशक्ति से शत्रु पर विजय करना चाहिए । मनु कन्या तथा मूर्खादि को अग्निहोम करने का निषेध करते हैं । कम दक्षिणा देने से यज्ञ कर्त्ता को क्षति पहुँचती है । अगर सामर्थ्ययुक्त व्यक्ति हो, तो उसे अग्निहोम अवश्य करना चाहिए तथा नहीं करने पर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है । प्रायश्चित्त के योग्य मनुष्य तथा
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३४ मनुस्मृतिः का विचार है कि पाप एवं अपराध की प्रवृत्ति ब्राह्मण में नहीं होती है, ऐसा तभी होता है जब राजा भ्रष्ट अथवा मूर्ख होता है— एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः । यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्तिपरमां गतिम् ॥ ( मनु०-१०.१३० ) ने सजातीय कथन, पिता की जाति के समान जाति होना, वर्णसङ्कर का लक्षण मनु तथा उसके दो भेद अनुलोमज और प्रतिलोमज की भी चर्चा की है 1 । उन्होंने वर्ण-चतुष्टय के सामान्य धर्म का विधान बताते हुए ब्राह्मण वर्ण के षट् कर्मों का भी विधान किया है— अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव षट्कर्माण्यग्रजन्मनः । ( मनु०-१०-७५ ) अर्थात् साङ्ग वेदों का अध्यापन, अध्ययन, यजन याजन दान देना और दान लेना - ये छ: कर्म ब्राह्मणों के हैं । इनमें तीन कर्म जीविका के लिए — साङ्ग वेदा-ध्यापन, यज्ञ कराना और दान लेना ब्राह्मण की जीविका के लिए हैं । क्षत्रियों के तीन कर्म कहे गये हैं--त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात् क्षत्रियं प्रति । अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ( मनु०-१०.७७ ) अर्थात् ब्राह्मण की अपेक्षा क्षत्रियों के तीन कर्म – वेदाध्ययन, यज्ञ कराना तथा दान लेना निवृत्त होते हैं । अतः क्षत्रियों को इन तीन कर्मों को छोड़कर शेष तीन कर्म ( वेदाध्ययन, यज्ञ करना तथा दान देना ) ये ही करने चाहिए । वैश्यों के कर्म का भी विधान उन्होंने प्रस्तुत किया है । वैश्य के लिये भी सामान्य धर्म का पालन करने का ही विधान कर्म मान्य है । उन्होंने आपद्धर्म का भी विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है । कुछ वर्णित कर्म आपत्काल में भी नहीं करने का विधान है । उस काल में शिला तथा उञ्छ से भी जीविका चलाना चाहिए । वे सप्तविध धर्मयुक्त धनागम का विवेचन करते हैं— अर्थात्– सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च । ( मनु०-१०.११५ ) १- दाय ( धर्मयुक्त पितृ - सम्पत्ति का भाग ) २- लाभ ( मूलधन या मियादि प्राप्त ) ३- खरीदा हुआ 2.1.
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भूमिका ४- जय ( धर्मपूर्वक किये गये युद्ध में विजय से प्राप्त ) ५- प्रयोग ( व्याज अर्थात् सूद आदि के द्वारा प्राप्त ) ६- कर्मयोग ( खेती तथा व्यापार आदि उद्योग करने से प्राप्त ) ७- सत्यप्रतिग्रह ( शास्त्रोक्त दान से प्राप्त ) । ३५ ये सात धन के लाभ होने के स्थान धर्मयुक्त कहे गये हैं । जीवन - निर्वाह के इस हेतुओं की चर्चा करते हुए कहते हैं - १ - विद्या ( वेद - वेदाङ्गादि का तथा वैद्यक, तर्क, विष - निराकरण आदि की विद्या ), २- शिल्प ( वस्त्र, तैलादि को सुगन्धित करना ), ३ - भृति ( इत्रादि बनाकर वेतन लेना ), ४- सेवा ( दूसरों की दासता, नौकरी करना ), ५- गोरक्षण ( गौ तथा अन्य पशुओं का पालन - संवर्धन आदि ), ६- व्यापार, ७- खेती, ८- धैर्य ( थोड़े धन पूर्वक भी सन्तोष से निर्वाह करना ), ९- भिक्षासमूह और १०- सूद – ये इस जीवन - निर्वाह के हेतु हैं । वे राजाओं के भी आपद्धर्म का विधान किये हैं । प्रकार इस अध्याय में आपद्धर्म पर भी विशेष चर्चा की गई 1 एकादश अध्याय में मनु ने नवविध स्नातकों को दान देना तथा वेदी के भीतर भिक्षान देने का विधान किया गया है । सान्ताकिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सर्वदेसम् गुर्यर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायार्श्यपतापिनः ॥ नवैतान्स्नातकान्विद्याद् ब्राह्मणान्धर्मभिक्षुकान् । निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ॥ ( मनु०-११.१-२ ) अर्थात् सन्तानार्थ विवाहेच्छुक, यज्ञ करने का इच्छुक, पथिक, विश्वजित् आदि यज्ञ करने में अपनी समस्त सम्पत्ति को दान किया हुआ, विद्या गुरु, पिता - माता के लिए भोजन देने के इच्छुक, पढ़ने के लिए भोजन - वस्त्र का इच्छुक और रोगी — इन नव - विध स्नातक ब्राह्मणों को धर्मभिक्षु जानना चाहिए तथा इनके निर्वाह के लिए गौ, सोना, अन्न और वस्त्र आदि दान देना चाहिए । उन्होंने सोमयाग के अधिकारी, एकांग-हीन - यज्ञपूर्त्यर्थ वैश्य आदि से धन लाना, छः उपवास के बाद नीच से भी अन लाने का विधान किया है । वे यज्ञशील के धन की प्रशंसा करते हैं । यज्ञार्थ शूद्र से भिक्षा लेने की तथा यज्ञार्थ धन लेकर बचाने का विशेष रूप से निषेध करते हैं । यज्ञ का प्रतिनिधि कैसा होना चाहिए । ब्राह्मणादि को स्वशक्ति से शत्रु पर विजय करना चाहिए । मनु कन्या तथा मूर्खादि को अग्निहोम करने का निषेध करते हैं । कम दक्षिणा देने से यज्ञ कर्त्ता को क्षति पहुँचती है । अगर सामर्थ्ययुक्त व्यक्ति हो, तो उसे अग्निहोम अवश्य करना चाहिए तथा नहीं करने पर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है । प्रायश्चित्त के योग्य मनुष्य तथा
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३६ मनुस्मृतिः कर्त्तव्य, प्रायश्चित्त में मतभेद एवं प्रायश्चित्त शब्द का अर्थ भी समझाया गया है— प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते । तपोनिश्चयसंयुक्तं प्रायश्चित्तमिति स्मृतम् ॥ ( मनु०-११.५ ) अर्थात् ‘ प्राय: ’ तप को कहते हैं और ' चित्त ' निश्चय को कहते हैं; अत एव तप का निश्चय के साथ संयुक्त होना ' प्रायश्चित्त ' कहा जाता है । कुरूप होने में कारण सुवर्ण - चौर्यादि से कुनखित्वादि होना आदि कहा गया है । वे पञ्चमहापातक की चर्चा अपनी स्मृति में विशेष रूप से करते हैं-ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥ ( मनु०-११.५४ ) अर्थात् १ · ब्रह्महत्या करना, २ - निषिद्ध मद्य का पीना, ३- ब्राह्मण के सुवर्ण को चुराना, ४- गुरु की भार्या के साथ सम्भोग करना और इन चारो में से किसी एक के साथ भी एक वर्ष तक संसर्ग — ये पाँच महापातक हैं । इन पञ्चमहापातकों के समान कर्म भी बतलाये गये हैं । तत्पश्चात् उपपातक आदि का भी विधान गोवधोऽयाज्यसंयाज्यं पारदार्यात्मविक्रयाः । हैं । यथा— " करते " गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ ( मनु०- ११.५८ ) अर्थात् गोवध, अयाज्य - यजन, परस्त्रीगमन, आत्मविक्रय, गुरु माता - पिता का त्याग अर्थात् उनकी सेवा शुश्रूषा नहीं करना, ब्रह्मयज्ञ ( वेदाध्ययन ), स्मार्त अग्नि और पुत्र का त्याग ( पुत्र को संस्कृत तथा भूषणादि से अलंकृत नहीं करना आदि अनेक उपपातक का वर्णन किया है तथा उसके प्रायश्चित्त का भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है । द्वादश अध्याय में मनु मृत्यु के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हैं । व्यक्ति के शारीरिक, वाचिक एवं मानासिक कर्म से उसकी शुभ एवं अशुभ फल की प्राप्ति होती है । दूसरा तथ्य है कि क्रिया - प्रतिक्रिया के फलस्वरूप व्यक्ति उत्तम, मध्यम एवं अधमगति को प्राप्त होता है । यथा— • शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसंभवम् । कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ( मनु ० - १२.३ ) अर्थात् उसके शरीरसम्बन्धी विविध ( उत्तम, मध्यम, अधम ) एवं दश लक्षण-युक्त मन, वाणी एवं शरीर के अधिष्ठानों के आश्रय में रहने वाले धर्मों के प्रवर्त्तक व्यक्ति का मन एवं भावनायें होती हैं । तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है कि व्यक्ति मन में जो विचार करता है, वही कर्म करता है । आचार्य मनु ने दस लक्षण वाले कर्मों में विविध मानासिक कर्मों को स्पष्ट किया है ।
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भूमि ३७ १- दूसरों की सम्पत्ति को अन्यायपूर्वक लेने का विचार करना २- मन से निषिद्ध कर्मों को करने की इच्छा करना, ३- असत्य, हठ, मानसिक अशुभ कार्य हैं । परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् । वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ( मनु०-१२.५ ) मनु ने स्पष्ट किया है कि जिस व्यक्ति में वाग्दण्ड, मनोदण्ड, शरीरदण्ड – ये तीनों स्थित हैं, वही दुष्कर्मों से रहित पूर्ण व्यक्ति है । मनु का अभिप्राय है कि यदि प्राणी मनुष्य - शरीर से धर्म - कर्म करता है, तो वह स्वर्गसुख भोगता है; लेकिन पाप करता है तो वह नरक को जाता है । मनु ने मनुष्य में रहने वाले सत्य एवं तम प्रवृत्तियों की भी व्याख्या विस्तृत रूप से की है । उन्होंने कहा है कि शुभ कर्मों से मनुष्य अपने कर्मदोषों का नाश कर सकता है । अतः मनुष्य को समाहित चित्त होकर सत्, असत् सभी को अपने में देखना चाहिए यहाँ यह ध्यातव्य है कि मनुष्य के सभी कर्मों, व्यवहारों, आचारों का सम्यक् विवेचन इस स्मृति में विशद् रूपेण वर्णित है । धर्मशास्त्र - प्रवर्त्तक ऋषि स्मृतियों के सन्दर्भ में संख्याविषयक मतभेद भी स्पष्टतः परिलक्षित होता है । भिन्न - भिन्न ऋषियों द्वारा अलग - अलग संख्या में अनेकानेक ऋषियों को धर्मशास्त्र-प्रवर्त्तक के रूप में मान्यता प्रदान की गई है । महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी के याज्ञ-वल्क्यस्मृति ( १.४-५ ) में धर्मशास्त्र - प्रवर्त्तक ऋषियों को निम्नवत् परिगणित किया है— मन्वत्रि - विष्णु - हारीत - याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यमापस्तम्ब - संवर्ताः कात्यायन - बृहस्पती ॥
पराशर - व्यास - शङ्ख - लिखिता दक्ष - गौतमौ ।
शातापतो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्र - प्रवर्त्तकाः ॥
जबकि देवल ( बालम्भट्टी ) के अनुसार यह संख्या निम्नवत् है—
मनुर्यमो वसिष्ठोऽत्रिर्दक्षो विष्णुस्तथाऽङ्गिराः ।
उशना वाक्पतिर्व्यास आपस्तम्बोऽथ गौतमः ॥
कात्यायनो नारदश्च याज्ञवल्क्यः पराशरः ।
संवर्तश्चैव शङ्खश्च हारीतो लिखितस्तथा ॥
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३८ मनुस्मृतिः इसी प्रकार बोधायन के अनुसार ( स्वसमेत ) ८, वसिष्ठ के अनुसार ६, आपस्तम्ब के अनुसार ११, पराशर के अनुसार २०, कुमारिलभट्ट के अनुसार १८ तथा पैठी - नसि के अनुसार ३६ ऋषियों को स्मृतिकार के रूप में परिगणित किया गया है । इन स्मृतियों के अतिरिक्त १८ उपस्मृतियों तथा २१ अन्य स्मृतियों का भी नाम आता है । मनुस्मृति का सर्वातिशायित्व मनुस्मृति का प्रभाव भारत ही नहीं; अपितु भारतेतर देशों पर भी पड़ा है । सत्य तो यह है कि यह भारतीय ग्रन्थ न होकर विश्वग्रन्थ के रूप में वन्द्य है । दक्षिण - पूर्व एशिया से लेकर चीन, फारमोसा, फिलीपीन्स, न्यूजीलैण्ड तथा दक्षिण - पूर्व एशिया के अन्य देशों की सामाजिक - राजनीतिक व्यवस्था पर भी मनुस्मृति का प्रभाव दृग्गोचर होता है । मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म, भाषा, वंश, राजनीति के प्रसार के सङ्केत उन देशों में स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं । सुमेरिया की परम्परा में स्थापित दैवी विधि तथा सूर्यमन्त्र एवं वैदिक मन्त्र की समानता वैदिक परम्परा का द्योतक है । इसके अतिरिक्त अन्यान्य देशों पर भी वैदिक परम्परा की छाया दिखाई पड़ती है, जिसका श्रेय मनु - स्मृति को ही जाता है । वर्मा आदि देशों के विधिपुस्तक अर्थात् कानून की किताबें तो मनुस्मृति से सर्वथा प्रभावित दिखाई देती हैं । विश्ववन्द्य मनुस्मृति की लोकप्रियता इसी से सिद्ध हो जाती है कि विश्व के प्रायः सभी भाषाओं में आज इसका अनुवाद किया जा चुका है । भारतीय जीवन, जीवनपद्धति, भारतीय कानून, विधान आदि का तो अस्तित्व भी मनुस्मृति के विना कल्पना से परे की बात है । सत्य तो यह है कि मनुस्मृति एक धार्मिक पुस्तक ( धर्मशास्त्र ) के साथ - साथ सामाजिक संहिता भी है, जो कि विश्वमानव को जन्म से मृत्युपर्यन्त सुसंगठित, सुसज्जित तथा संस्कारित करने का दीर्घ काल से कार्य करता चला आ रहा है । यद्यपि मनुस्मृति के सैकड़ों संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं; फिर भी कोई भी ऐसा संस्करण उपलब्ध नहीं होता, जो मनु के भावों को सरलतापूर्वक सामान्य जन को हृदयङ्गम कराने में सक्षम सिद्ध हो सके । किसी संस्करण में हिन्दी टीका होने पर मूल भाष्य का अभाव है तो किसी संस्करण की हिन्दी व्याख्या ही ग्रन्थकार के भाव को स्पष्ट करने में असहाय दिखाई देती है । अतः सुरभारती की सेवा में अविच्छिन्न रूप से जुड़े चौखम्बा कृष्णदास अकादमी के सञ्चालकद्वय श्री वृजमोहन दास गुप्त एवं श्री कमलेश कुमार गुप्त ने मनुस्मृति को उसकी अतिप्राचीन तथा सर्वतोभावेन प्रतिष्ठित मेधातिथि टीका के साथ विमर्श द्वारा मनु के भावों को पूर्णतः स्पष्ट करते हुये विश्व-व्यवस्था के प्राणभूत उक्त मनुस्मृति को सर्वसाधारण के लिए उपयोगी बनाने वाली
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भूमिका ३ ९ लब्धप्रतिष्ठ मणिप्रभा हिन्दी टीका के साथ सम्पादित करने का आग्रह किया था, जिसे मूर्त स्वरूप प्रदान करना अब सम्भव हो सका है । ग्रन्थकार के मूल भाव को स्पष्ट रूप से विस्तार के साथ विमर्श द्वारा सामान्य लोगों के लिये बोधगम्य बनाने में प्रकृत संस्करण सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है । एतदर्थ प्रस्तुत संस्करण के प्रकाशक चौखम्बा कृष्णदास अकादमी के सञ्चालकद्वय सर्वविध साधुवाद के पात्र हैं, जिन्होंने इस महनीय ग्रन्थ का प्रकाशन कर सर्वसाधारण को सुलभ कराने का सराहनीय प्रयास किया है । वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में पुस्तकों का लेखन एवं सम्पादन वस्तुतः एक सर्वथा दुष्कर कार्य है, जो गुरुकृपा एवं आवश्यक परिवेश के अभाव में कथमपि सम्भव नहीं है । प्रकृत संस्करण भी पूज्य आचार्य प्रो ० श्रीनारायण मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, कला सङ्काय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी तथा महामहोपाध्याय पद्मभूषण पं ० गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर जी की कृपा एवं वात्सल्यवत् स्नेह का ही प्रतिफल है । एतदर्थ सर्वप्रथम उन दोनों के श्रीचरणों में नमन करना मैं अपना पुनीत कर्त्तव्य समझता हूँ । इस अवसर पर अपने विभागीय गुरुजनों सर्वश्री प्रो ० श्रीकिशोर मिश्र, डॉ ० उमेशप्रसाद सिंह, डॉ ० पर्णदत्त सिंह, डॉ ० आनन्द कुमार श्रीवास्तव, डॉ ० जमुना पाठक आदि से प्राप्त स्नेह को भी मैं कथमपि विस्मृत नहीं कर सकता । इसी क्रम में अपने पितृचरण डॉ ॰ विजय शर्मा, प्राध्यापक, श्री वेङ्कटेश पराङ्कुश संस्कृत महा-विद्यालय, अस्सी, वाराणसी, प्रवर्त्तक, " श्रीपराङ्कुश पञ्चाङ्गम् " जिनके स्नेहाभिषिञ्चन द्वारा अपनी बाल्यावस्था से ही अनवरत अभिषिक्त होने के फलस्वरूप आज मैं एवंविध दुरूह कार्य को करने में सक्षम हो सका हूँ, अतः उनके श्रीचरणों में कोटिशः नमन करते हुए स्नेह का सतत आकांक्षी हूँ । आज अपने मामा डॉ ० शिवदीपक शर्मा, रीडर, संस्कृत विभाग, अन्तर्गत बाबा भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय - लंगट सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर, बिहार तथा चाचा श्री विनय कुमार, डॉ ० रविन्द्र कुमार, श्री श्रीनिवास शर्मा, वेङ्कटेश पराङ्कुश संस्कृत महाविद्यालयीय परिवार, डॉ ० विजय कुमार राय, प्राचार्य, प्रशिक्षण महा-विद्यालय, हरिद्वार, उत्तराञ्चल से प्राप्त स्नेह को विस्मृत करना कथमपि सम्भव नहीं है । साथ ही साथ अपने बन्धुओं - चिरञ्जीवी कौशल, विकास, शुभम् एवं भगिनियों — पद्मा, भार्गवी एवं कमला ( मालिक ) को शतशः शुभाशीर्वचनों से सिक्त करना सर्वविध उपयुक्त होगा, क्योंकि इनके द्वारा अहर्निश उत्साहवर्द्धन के परिणामस्वरूप ही इस महनीय कार्य को सम्पन्न करने में मैं समर्थ हो सका हूँ । प्रकृत कार्य में जिन विद्वानों की कृतियों से सहायता ली गई है, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए दृष्टिदोष के कारण इस पुस्तक में होने वाली न्यूनताओं एवं
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४० श्रीराजेन्द्रयतीन्द्रपादयुगले विजया दशमी सं ० २०६३ कंग्र मनुस्मृतिः सद्भभक्तिमानन्वहं विधुः श्रीरङ्गरामानुजं - केशव किशोर कश्यप च्युतियों के लिए सुधी पाठकों से क्षमा प्रार्थी हूँ । आशा एवं विश्वास है कि मनुस्मृति का प्रकृत संस्करण विद्वज्जनों एवं सामान्य पाठकों — दोनों के लिये ही सर्वविध उपयोगी सिद्ध होगा और वे मनु के भावों को आत्मसात करने में समर्थ हो सकेंगे । अन्त में अपने दीक्षागुरु के प्रति नमन करना सर्वतोभावेन आवश्यक समझता हूँ, जिनके कृपाकटाक्षों से सिञ्चित होने के प्रसादस्वरूप ही मैं इस सारस्वत - साधना में प्रवृत्त हो सका हूँ-श्रीकौण्डिन्यकुले पराङ्कुशमुनीर्जातौ महाब्धौ तत्पादाश्रितलब्धबोधनिखिलं श्रीमत्काश्यपवंशजं गुरुवरं भक्त्या सदा संश्रये ॥
कौण्डिन्यगोत्रसरसीरुहबालभानुं श्रीरङ्गदेशिकपदाब्जरसैकभृङ्गम् ।
राजेन्द्रसूरिचरणाश्रितमप्रमेयं श्रीमत्पराङ्कुशगुरुं शरणं प्रपद्ये ॥