मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 51–60
मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयानुक्रमणी करुं ( प्रथम से षष्ठ अध्याय पर्यन्त ) विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० प्रथम अध्याय दश प्रजापतियों की उत्पत्ति ३१ मङ्गलाचरण मनु का महर्षियों को उत्तर देना संसारोत्पत्ति - वर्णन १ दश प्रजापतियों के नाम ३१ ८ पुनः सात मनुओं तथा ९ देवों की सृष्टि ३२ सर्वप्रथम जल की उत्पत्ति १३ यक्ष आदि की सृष्टि ३२ ब्रह्मा की उत्पत्ति १३ | जरायुज जीव के लक्षण ३४ ' नारायण ' शब्द की निरुक्ति अण्डज जीव के लक्षण ३५ १४ ब्रह्मस्वरूपकथन १५ स्वेदज जीव की गणना ३५ अण्डे को दो खण्ड करना उद्भिज तथा औषधि जीव १६ अण्ड - खण्ड से स्वर्गादि की सृष्टि १७ वनस्पति तथा वृक्ष के स्वरूप I ३६ I ३५ मन तथा उससे पूर्व गुच्छ, गुल्म, तृण, प्रतान तथा अहङ्कार की सृष्टि वल्ली का स्वरूप ३६ १७ ' महत् ' आदि तत्त्वों की सृष्टि वृक्षादि में अन्तश्चेतना तथा १८ विनश्वर संसार की उत्पत्ति सुखादि का होना २० प्रत्येक जाति के नाम— ब्रह्मा का अन्तर्धान होना ३७ 3 ३८ m प्रलयकाल में जीवों की अनुत्पत्ति कर्म की पृथक् - पृथक् सृष्टि २१ तथा चेष्टाशून्यता देवगणादि की सृष्टि २२ महाप्रलय का स्वरूप वेदत्रय की सृष्टि २३ | जीव का निर्गमन समयादि की सृष्टि २४ | जीव का देहान्तर धारण करना mm ४० x ४१ x ३ ९ ३ ९ स्थूल तथा सूक्ष्मादि की सृष्टि २६ | जाग्रत तथा स्वप्नावस्था से संसार कर्मानुसारिणी सृष्टि २७ को जिलाना व नष्ट करना ४१ स्वयं स्व - स्व कर्म प्राप्ति में दृष्टान्त २ ९ इस शास्त्र का प्रचार क्रम ४१ ब्राह्मणादिवर्णों की सृष्टि ३० | भृगु से इस शास्त्र को सुनने का कथन ४३ स्त्री - पुरुष की सृष्टि मनु की उत्पत्ति ३० भृगु के द्वारा इस शास्त्र का कथन ४३ ३१ | मन्वन्तर का वर्णन ४३
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२ विषय उन छः मनुओं के नाम दिन - रात का परिणाम सूर्य द्वारा दैव - मानुष दिन - रात का विभाजन पितरों की दिन - रात का परिमाण देवों की दिन - रात का परिमाण सत्ययुग का परिमाण मनुस्मृतिः पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० ४४ वर्णों में ब्राह्मण की श्रेष्ठता ६० ४५ ब्रह्मा के मुखसे ब्रह्मणोत्पत्तिकथन ६० | ब्रह्मज्ञानी की श्रेष्ठता ६२ ४५ समस्त सम्पत्ति का स्वामी ब्राह्मण ६३ ४६ | इस शास्त्र की रचना का उद्देश्य ४६ तथा प्रशंसा ६३ ४७ | इसको पढ़ने का अधिकारी ब्राह्मण ६४ त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का परिमाण ४८ इस शास्त्र के अध्ययन का फल देव युग का परिमाण ब्रह्मा के दिन - रात का परिमाण ब्रह्मा द्वारा मन को सृष्ट्यर्थ लगाना मन से आकाश की सृष्टि आकाश से वायु की सृष्टि वायु से तेज की सृष्टि तेज से जल तथा जल से भूमि की सृष्टि मन्वन्तर का परिमाण मन्वन्तर आदि की असंख्यता ६५ ४ ९ | आचार की प्रधानता ६७ ४ ९ | इस शास्त्र के अध्यायानुसार ५१ विषयसूची ६८ ५१ | प्रथमाऽध्याय का उपसंहार ७१ ५२ द्वितीय अध्याय सामान्य धर्म का लक्षण ५२ | सकाम कर्म का निषेध वेदादि ५३ प्राप्ति की काम्यता ७४ ५३ व्रतों की सङ्कल्पमूलता ७५ सत्ययुग में धर्म की परिपूर्णता ५४ क्रिया की काम - सापेक्षता ७६ त्रेता आदि युगों में उत्तरोत्तर धर्म के प्रमाण ७८ धर्म का ह्रास ५५ धर्मों की देवमूलकता ९ १ सत्युग आदि में मनुष्यों की पूर्णायु५५ धर्म - निश्चय के विषय में विद्वानों M युगानुसार मनुष्यों की आयु आदि युगानुसार मनुष्यों की आयु का होना ५७ युगों की ब्रह्मादि संज्ञा ५८ के कर्त्तव्य ९ २ ५६ श्रुति स्मृत्युक्त धर्म के अनुष्ठान का फल ९ ३ श्रुति और स्मृति का परिचय ९ ३ ब्राह्मणादि के लिए पृथक् - पृथक् नास्तिक - निन्दा ९ ५ कर्मों की सृष्टि ५८ धर्म के चतुर्विधलक्ष ९ ६ ब्राह्मण के कर्म क्षत्रियों के कर्म वैश्यों के कर्म शूद्र के कर्म सर्वाङ्गों में मुख की श्रेष्ठता ५८ | श्रुति स्मृति के विरोध में ५ ९ श्रुति की प्रामाणिकता ५ ९ श्रुति - द्वय के विरोध में दोनों ५ ९ की प्रामाणिकता ६० | श्रुति - द्वय - विरोध का दृष्टान्त ९९ ९ ७ 2. ९ ८ va
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयानुक्रमणी पृ ० सं ० | विषय १०० चर्मादि धारण १०२ मेखला ब्रह्मचारियों के लिये कृष्ण - मृग-४३ पृ ० सं ० १२५ १२६ १०२ | मौञ्जी आदि मेखला का प्रतिनिधि १२६ विषय वैदिक संस्कार से संस्कृत ही इस धर्मशास्त्र का अधिकारी ब्रह्मावर्त देश सदाचार का लक्षण कुरुक्षेत्रादि ब्रह्मर्षि देश उन देशों के ब्राह्मणों से र- शिक्षा ग्रहणोपदेश आचार -1 मध्यदेश आर्यावर्त देश १०३ यज्ञोपवीत दण्ड धारण १०४ | दण्डमान १२७ १२८ १२८ १० ९ १० ९ १११ १०४ | सूर्योपस्थानादि के बाद भिक्षावृत्ति १२ ९ १०५ भिक्षा - विधि यज्ञिय और म्लेच्छ देश वर्णादि - धर्म वैदिक मन्त्रों से द्विजों के संस्कार का विधान संस्कार का पापक्षय कारणत्व स्वाध्यायादि का मोक्षकारणत्व १२ ९ १०५ सर्वप्रथम भिक्षा किन - किन से माँगे १३० १०७ भिक्षाद्रव्य की भोजन - विधि १३१ पूर्व आदि दिशाओं की ओर मुखकर काम्य - भोजन - फल १३१ भोजन के आदि - अन्त में आचमन - विधान १३३ नवजात बालक का श्रद्धा से अन्न- भोजन का विधान १३४ जातकर्म संस्कार ११३ श्रद्धा एवं अश्रद्धा से भोजन नाम - करण संस्कार ११६ करने का सदसत्फल १३५ प्रत्येक वर्ण के नामकरण का भोजन - विषयक अन्य नियम १३५ पृथक् - पृथक् वर्णन ११७ अधिक भोजन का निषेध १३६ स्त्रियों का नामकरण ११ ९ बालकों को प्रथम बार घर में बाहर | आचमन के योग्य एवं अयोग्य तीर्थ १३६ निकालना और अन्नप्राशन संस्कार १२० ब्राह्म आदि तीर्थों के लक्षण १३७ संस्कार का समय १२१ आचमन - विधि १३८ उपनयन संस्कार का समय १२१ अधिक ज्ञानादि प्राप्ति के | आचमन में प्रत्येक वर्ण के लिए जल - प्रमाण १३ ९ लिए प्रतिवर्ण के यज्ञोपवीत उपवीती ( सव्य ) आदि के लक्षण १४० का अन्य समय १२२ यज्ञोपवीत संस्कार का पूर्व मेखलादि के नष्ट होने पर अन्तिम काल १२३ दूसरे का ग्रहण १४१ केशान्त संस्कार का समय १४२ व्रात्य लक्षण १२४ व्रात्य के साथ व्यवहार - त्याग बिना मन्त्र के स्त्रियों के संस्कार का विधान १४२ आवश्यक १२४
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४ मनुस्मृतिः विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० स्त्रियों के यज्ञोपवीतादि का निषेध तथा वेद मन्त्रों से विवाह-एक भी इन्द्रिय के असंयम से प्रज्ञाहानि १६४ संस्कार का विधान १४३ | इन्द्रिय संयम की सर्व पुरुषार्थ यज्ञोपवीत संस्कार के बाद कर्तव्य १४४ हेतु १६४ वेदाध्ययन - विधि १४५ सन्ध्योपासन की अवधि १६४ ब्रह्माञ्जलि का लक्षण १४६ सन्ध्योपासन से पापनाश १६७ गुरुके अभिवादन की विधि १४७ प्रात: सायं सन्ध्योपासन के अध्ययन का आरम्भ तथा समाप्ति१४७ अभाव में शूद्रतुल्य बहिष्कार १६७ वेदाध्ययन के आद्यन्त में अशक्ति में सावित्री मात्र का प्रणवोच्चारण १४८ भी जप १६८ तीन प्राणायाम के बाद प्रणवोच्चारण - विधान सावित्री की उत्पत्ति सावित्री - जप का फल प्रणवादि की प्रशंसा प्रणव की प्रशंसा १५६ से हानि १७३ मानस जप की सर्वश्रेष्ठता १५७ | धर्मादि के अभाव में विद्यादान इन्द्रिय - संयम १५ ९ | की निष्फलता १७३ ग्यारह इन्द्रियाँ १५ ९ ब्राह्मण से विद्या का कथन १७४ प्रथम दश इन्द्रियों के नाम १६० | बिना पढाये वेद - ग्रहण का निषेध १७५ ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय का विभाग १६० अध्यापकों की मान्यता अनध्याय में भी अवर्जनीय कार्य १६ ९ १४ ९ | नित्य कर्म में अनध्याय का अभाव १६ ९ प्रणय तथा व्याहृतियों की उत्पत्ति १५० जपयज्ञ से इष्टसिद्धि १७० १५० समावर्त्तन तक होमादि कर्तव्य १७१ १५१ | पढ़ाने योग्य शिष्य १७१ सावित्री - जप नहीं करने से दोष १५४ प्रश्नादि के बिना तत्त्वकथन का निषेध १७२ १५४ उक्त निषेध के नहीं पालन करने १७६ ग्यारहवीं इन्द्रिय मन १६० अविहिताचार की निन्दा १७६ इन्द्रिय - संयम से सिद्धि विषयोपभोग में इच्छा की पूर्ति न १६१ | गुर्वादि के आसनादि पर बैठने का निषेध तथा उठकर प्रणाम होने का दृष्टान्त १६१ करने का विधान १७७ विषयोपभोग की अपेक्षा उनकी वृद्धों के प्रणाम करने में कारण १७८ उपेक्षा की श्रेष्ठता १६२ | बड़ों को प्रणाम करने का फल १७८ इन्द्रिय संयम के उपाय अनियमित मन की विकार हेतुता १६३ जितेन्द्रिय का स्वरूप १६३ १६२ अभिवादन के विधि १७८ उक्त अभिवादन विधि के अनभिज्ञों तथा स्त्रियों की अभिवादन विधि १७ ९
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयानुक्रमणी ४५ विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० अभिवादन में स्वनाम के अन्त में अवस्थादि की वेदज्ञान से श्रेष्ठता २०० " भोः " शब्द का कथन १८० वर्ण के क्रम से ज्ञानादि की श्रेष्ठता २०० प्रत्यभिवादन विधि १८१ अवस्था की अपेक्षा ज्ञान द्वारा वृद्धत्व २०१ विद्वान् को मूर्खाभिवादन का निषेध १८२ प्रतिवर्ण से कुशल प्रश्न विधि १८२ दीक्षित के नामोच्चारण का निषेध १८३ परस्त्री के नामोच्चारण का निषेध १८३ छोटे मामा आदि के अभिवादन का निषेध मूर्ख की निन्दा २०१ शिष्यों से मधुर भाषण २०२ वचन तथा मन के संयम से वेदान्त फल की प्राप्ति २०२ परद्रोहादि का निषेध २०३ १८४ | अपमान होने पर क्षमा करना २०३ १८६ गुरु ( पिता ) का लक्षण १ ९ ४ वेदाधिकार ऋत्विक् का लक्षण अध्यापक की प्रशंसा मौसी आदि को गुरुपत्नी समान पूज्यता भौजाई आदि की अभिवादन विधि १८५ मौसी आदि की पूज्यता तथा माता की पूज्यतमता नागरिक आदि के साथ मैत्रीकाल का वर्णन सौ वर्ष के क्षत्रिय द्वारा दशवर्षीय ब्राह्मण की पूज्यता उक्त वचन का अपवाद धन, बन्धु आदि की उत्तरोत्तर मान्यता १ ९ ० रथी आदि के लिये मार्ग देना १ ९ १ सबको स्नातक के लिये मार्ग देना १ ९ २ आचार्य का लक्षण उपाध्याय का लक्षण उपाध्याय, आचार्य तथा पिता से माता की श्रेष्ठता पिता से आचार्य की श्रेष्ठता वेदाध्ययन | वेदाभ्यास की श्रेष्ठता बिना यज्ञोपवीत संस्कार के द्विजकर्म का अनधिकार यज्ञोपवीत के पूर्व वेदमन्त्रोच्चारण १ ९ २ का निषेध १ ९ ३ | यज्ञोपवीत संस्कार युक्त का १ ९ ४ | गोदानादि व्रत में यज्ञोपवीतोक्त १ ९ ५ दण्डादिधारण तपोवृद्धि के लिये नियम पालन २१४ १ ९ ६ | नित्य स्नान, तर्पण तथा हवनादि २१५ १ ९ ७ | इच्छा से वीर्यपात करने का निषेध २१ ९ बालक भी आचार्य पिता के समान १ ९ ८ स्वप्न में वीर्यपात होने पर उक्त विषय में आङ्गिरस का दृष्टान्त १ ९९ स्नानादि कार्य उक्त विषय में कारण २१ ९ १ ९९ | आचार्य के लिये जलादि लाना २२० अपमान के सहन में कारण २०४ १८४ | तपो - व्रतादि के द्वारा सरहस्य २०५ २० ९ १८५ | वेदाभ्यास की प्रशंसा २० ९ वेदाभ्यास के विना अन्य शास्त्राभ्यास का निषेध २१० | द्विजत्वनिरूपण २११ १८७ | द्वितीय जन्म में आचार्य - पिता तथा १८८ सावित्री - -माता म २११ २१२ २१३ २१३ २१४
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६ विषय भिक्षायोग्य गृह मनुस्मृतिः पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० २२० | गुरु की सवर्ण स्त्रियों के साथ व्यवहार २३ ९ गुरुस्त्रियों में अभ्यङ्गादि का निषेध २३ ९ २२१ युवा शिष्य को युवती गुरुस्त्री का पादस्पर्श निषेध २३ ९ गुरु के कुल तथा अपनी जाति आदि में भिक्षा याचना - निषेध योग्य गृहाभाव में सम्पूर्ण ग्राम में भिक्षा - याचना २२१ २२२ समिधा का लाना तथा प्रातः - सायं हवन करना भिक्षा - याचना तथा हवन के त्याग से अवकीर्णिव्रत करना २२२ भिक्षा - याचना के विना भोजन निषेध २२३ पूर्वोक्त निषेध अपवाद अध्ययन तथा आचार्य - हित में तत्परता गुरु की आज्ञा का पालन गुरु से कम अन्नवस्त्रादि को रखना आदि गुरु के आज्ञापालन का प्रकार गुरु के समीप नीचे आसन रखना तथा चाञ्चल्य का निषेध गुरु के नामग्रहण तथा चेष्टादि के अनुकरण करने का निषेध गुरु निन्दा सुनने का निषेध | उक्त निषेध में स्त्रीस्वभाव कारण २४० | माता - बहन आदि के साथ एकान्तवास का निषेध २४१ युवती गुरुपत्नी की अभिवादन विधि २४१ प्रवास से लौटकर गुरुपत्नी का चरणस्पर्शपूर्वक अभिवादन २४१ २२४ | गुरु सेवा का फल ब्रह्मचारी के तीन प्रकार तथा २२ ९ ग्रामवास निषेध २४२ २४२ २२ ९ | उक्त कर्म के भङ्ग होने पर प्रायश्चित्त २४३ | उक्त प्रायश्चित न करने पर दोष २४४ २३० | सन्ध्योपासना की आवश्यकता २४४ २३१ | स्त्री - शूद्रादि के भी उत्तम कार्य को करना २४५ २३२ | भिन्न - भिन्न आचार्यों के मत से त्रिवर्ग का स्वरूप २४६ २३२ माता, पिता से उद्धार पाना असम्भव २४७ २३३ | माता, पिता और आचार्य की तुष्टि गुरु की बुराई आदि करने का फल २३३ से तप: पूर्णता स्वयं गुरुपूजा - विधान आदि प्रतिकूलादि वायु में गुरु के साथ २३४ | माता - पितादि की आज्ञा के विना बैठने का निषेध आदि २३५ बैलगाड़ी आदि में गुरु के साथ बैठना २३५ गुरु के गुरु में गुरुतुल्य आचरण २३६ विद्यागुरु आदि में आचरण विद्यादि में श्रेष्ठ लोगों के साथ आचरण २४८ अन्य धर्माचरण का निषेध २४८ माता आदि तीनों लोकादि का स्वरूप २४ ९ माता, पिता और आचार्यरूप त्रेताग्नि की श्रेष्ठता २३६ | माता, पिता और आचार्य के २४ ९ २३७ सेवा का फल २४ ९ माता आदि की सेवा का प्राधान्य २५१ नीच आदि से भी विद्यादि २५२ छोटे गुरुपुत्रादि के साथ आचरण २३८ गुरुपुत्र में अभ्यङ्गादि का निषेध २३८ का ग्रहण
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषय विष आदि से भी अमृत आदि की ग्राह्यता विषयानुक्रमणी ४७ पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० अन्य वर्णज स्त्रियों के २५३ साथ विवाह २७७ स्त्री, रत्न आदि की सबसे ग्राह्यता २५४ हीन वर्णोत्पन्न स्त्री से विवाह निषेध २७८ आपत्तिकाल में अब्राह्मण से | हीन वर्णोत्पन्ना के साथ विवाह अध्ययन करना २५४ से कुल की शूद्रता २७ ९ अब्राह्मणादि गुरु के पास आत्यन्तिक वास निषेध शूद्राके साथ विवाह करने में २५५ मतान्तर २७ ९ २८० आत्यन्तिक वास में रुचि होने पर २५६ गुरुकुल में आत्यन्तिक वास से ब्रह्मलोक प्राप्ति ब्राह्मण के लिये शूद्रा के साथ सम्भोग का निषेध २५६ | शूद्रा पत्नी द्वारा यज्ञादि की निष्फलता २८० क्षेत्र, सुवर्ण आदि गुरुदक्षिण २५७ | शूद्रा पति की शुद्धि का भी अभाव २८१ आचार्य के मरने पर गुरुपुत्रादि में | विवाह के आठ भेद २८२ गुरुतुल्य व्यवहार २५८ | पूर्वोक्त अष्टविध विवाहों के नाम २८२ उक्त गुरुपुत्रादि के अभाव में कर्तव्य २५ ९ उक्त विवाहों में से वर्णानुसार विधान २८३ जीवनपर्यन्त गुरुकुल सेवा का फल २५ ९ प्रतिवर्ण के लिए धर्मयुत विवाह २८३ तृतीय अध्याय | पैशाच तथा आसुर विवाह की निन्दा २८४ क्षत्रिय के लिये पृथक् - पृथक् या ब्रह्मचर्य पालन की अवधि वेद पढ़े हुए ब्रह्मचारी का पिता द्वारा पूजन समावर्त्तन के बाद विवाह असपिण्डादि कन्या का विवाह योग्यत्व विवाह में निन्दित कुल उक्त दश त्याज्य कुलों के नाम कपिला आदि कन्या विवाह * के अयोग्य नक्षत्र आदि के नाम वाली कन्या विवाह के अयोग्य कन्या के शुभ लक्षण भाई से रहित आदि कन्या विवाह के अयोग्य सवर्णा स्त्री की श्रेष्ठता २६० मिश्र विवाह २८५ ' ब्राह्म ' विवाह का लक्षण २६६ | ' दैव ' विवाह का लक्षण २६७ ' आर्ष ' विवाह का लक्षण २८६ २८७ २८८ ' प्राजापत्य ' विवाह का लक्षण २८८ २८ ९ २ ९ ० २ ९ ० २ ९ ० २६ ९ | ' आसुर विवाह का लक्षण २७२ | ' गान्धर्व ' विवाह का लक्षण २७२ ' राक्षस ' विवाह का लक्षण ' पैशाच ' विवाह का लक्षण २७३ | जलदानपूर्वक ब्राह्मण का विवाह २ ९ २ ब्राह्म विवाह का गुण २ ९ ३ २७३ | दैव, आर्ष, प्राजापत्य विवाहों के गुण २ ९ ४ २७४ | ब्रह्मादि चार विवाहों की श्रेष्ठ सन्तान २ ९ ५ २७५ आसुर आदि चार विवाहों की निकृष्ट सन्तान २ ९ ५ २७६ | विवाहों का सङ्क्षिप्त में फल २ ९ ६
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ विषय मनुस्मृतिः । पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० सवर्णा कन्या के साथ विवाह विधि २ ९ ६ अहुत आदि की व्याख्या असवर्णा कन्या के साथ विवाह विधि २ ९ ६ असमर्थावस्था में भी ब्रह्मयज्ञ ३१४ ऋतुकालमें पर्वभिन्न दिनों तथा हवन आवश्यक ३१५ में स्त्री - सम्भोग २ ९ ७ | हवन से वृष्टि आदि ३१५ ऋतुकाल की अवधि ३०० गृहस्थाश्रम की प्रशंसा ३१६ स्त्री सम्भोग में निन्दित समय ३०० | ऋषि आदि की पूजा की कर्तव्यता ३१८ सम दिनों में पुत्रोत्पत्ति ३०१ | नित्यश्राद्ध ३१ ९ पुत्रादि की उत्पत्ति में अन्य कारण ३०१ पितृश्राद्ध में ब्राह्मण भोजन ३१ ९ वानप्रस्थ में भी ऋतुगमन ३०२ बलिवैश्वदेव कर्म ३२० वर से कन्याशुल्क ( मूल्य ) ग्रहण बलिवैश्वदेव कर्म के देवता ३२० का निषेध ३०३ | बलि को देने की विधि ३२१ स्त्रीधन लेने का निषेध ३०३ | भिक्षादान ३२५ आर्ष विवाह में उक्त गोमिथुन भिक्षादान का फल ३२६ लेने का निषेध ३०४ | सङ्कल्पपूर्वक भिक्षादान ३२७ कन्यार्थ द्रव्य लेना भी शुल्क नहीं ३०५ अपात्र को दान देने का फल ३२७ कन्या कोवस्त्राभूषण | सत्पात्र को दान देने का फल ३२८ अलङ्कृत करना ३०५ अतिथि सत्कार ३२ ९ कन्या के आदर तथा अनादर के फल ३०६अतिथि की पूजा नहीं करने पूजनीयता उत्सवादि में स्त्रियों की विशेष दम्पति की सन्तुष्टि का फल स्त्री को अलङ्कारादि से सन्तुष्ट नहीं करने का फल कुल के नीच बनाने वाले कर्म कुल को उच्च बनाने वाले कर्म पञ्चमहायज्ञ का अनुष्ठान पञ्चसूना के निवृत्यर्थ पञ्चमहा-यज्ञानुष्ठान पञ्चमहायज्ञों का नामतः निर्देश पञ्चमहायज्ञ से पञ्चपापमुक्ति का फल ३२ ९ ३०७ | अन्नादि के अभाव में ३०७ अतिथि सत्कार ३३० अतिथि का लक्षण ३३१ ३०७ | लोभवश दूसरे के यहाँ ३०८ भोजनेच्छा का निषेध ३३२ ३०८ अतिथि को बिना दिये श्रेष्ठ ३०८ पदार्थों को खाने का निषेध ३३४ बहुत अतिथियों के आने पर ३११ यथायोग्य सत्कार ३३४ ३११ अतिथ्यर्थ पुनः बनाये गये भोज्य-३१३ देवता अतिथ्यादि को सन्तुष्ट नहीं करने से निन्दा पदार्थ से बलि का निषेध भोजन प्राप्ति के लिए अपने कुल ३३४ ३१३ गोत्र का कथन - निषेध ३३५ मतान्तर से पञ्चमहायज्ञ ३१४ | ब्राह्मण के क्षत्रिय आदि अतिथि नहीं ३३५
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयानुक्रमणी ४ ९ विषय पृ ० सं ० | विषय क्षत्रियादि को बाद में भोजन कराना ३३६ अविद्वान् को श्राद्ध में दानादि वैश्य तथा शूद्र को भृत्यों के साथ भोजन कराना निष्फल पृ ० सं ० ३५७ ३३६ | विद्वान को दिये गये की सफलता ३५७ गृहागत मित्रादि को भोजन कराना ३३७ वेदज्ञाता के अभाव में मित्र नवोढा, कुमारी आदि को पहले भोज ३५८ भोजन कराना ३३८ | वेदपारङ्गत विद्वान को पहले स्वयं भोजन का निषेध ३३८ प्रयत्नपूर्वक भोजन ३५८ गृहस्थ - दम्पति को सब के बाद नाना आदि को श्राद्ध में भोजन ३६० भोजन करना ३३ ९ देवकार्य में ब्राह्मण परीक्षा का निषेध ३६० केवल अपने लिए भोजन बनाने का निषेध अपाङ्क्तेय ब्राह्मण ३६१ ३४० मूर्ख ब्राह्मण को हविर्दान गृहागत राजादि का पूजन ३४१ की निष्फलता ३७२ राजा तथा स्नातक की पूजा में सङ्कोच ३४२ स्त्रियों के द्वारा अमन्त्रक बलि देना ३४३ पङ्क्तिदूषक के लिए दानादि का निषेध ३७३ अमावस्या को पार्वणश्राद्ध मास से श्राद्ध भोजनीय ब्राह्मणों की संख्या ३४५ ३४५ ३४६ परिवेत्ता तथा परिवित्ति का लक्षण ३७३ परिवेत्ता आदि को असत्फल प्राप्ति ३७४ | दिधिषूपति का लक्षण ३७५ ब्राह्मण भोजन में विस्तार का निषेध पार्वण श्राद्ध की अवश्य कर्त्तव्यता हव्य तथा कव्य को श्रोत्रियों ३४७ ३४८ कुण्ड तथा गोलक पुत्र का लक्षण ३७६ कुण्डाशी का लक्षण ३७६ कुण्ड तथा गोलक को हव्य-के लिये देना कव्य - दान की निष्फलता ३७६ ३४ ९ श्रोत्रिय की प्रशंसा अपाङ्क्तेय - भोजन का दूषण ३७७ ३४ ९ श्रोत्रियों की परीक्षा शूद्र याजक का निषेध ३७८ ३५० दश लाख ब्राह्मणों से एक विद्वान् शूद्र याचक से प्रतिग्रह लेने का निषेध ३७८ ब्राह्मण की श्रेष्ठता सोम - विक्रयी आदि के लिए ३५० का फल मनु.I. 4 मूर्ख ब्राह्मण को भोजन कराने ब्राह्मणों का ज्ञाननिष्ठ आदि होना ३५२ ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण को हव्य - दान ३५३ श्राद्ध में मित्रादि के भोजन का निषेध ३५५ श्राद्ध तथा यज्ञ में मित्रों को भोजन कराना निष्फल का उपक्रम ३५५ | पंङ्गिपावन ब्राह्मण दान निषेध ३७ ९ व्यापारी आदि ब्राह्मण के लिए ३५१ दान निषेध ३७ ९ अन्य अपाङ्क्तेय ब्राह्मण के लिए दान- निषेध ३८० पङ्गिपावन ब्राह्मणों के कथन ३८० ३८१
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५० विषय मनुस्मृतिः पृ ० सं ० | विषय ब्राह्मण को निमन्त्रित करने का समय ३८३ पिण्ड के कुछ भाग का पितृ-श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण तथा श्राद्धकर्ता के कर्तव्य ब्राह्मण को भोजन कराना ३८३ | पिता के जीते रहने पर पितामह पूर्वोक्त नियम के पालन में युक्ति ३८४ निमन्त्रण स्वीकार कर भोजन न करने पर दोष ३८४ निमन्त्रित ब्राह्मण को शूद्रा - गमन पृ ० सं ० ४०३ आदि का पार्वणश्राद्ध ४०३ पिता के मरने तथा पितामह के जीवित रहने पर पार्वण श्राद्ध ४०५ ब्राह्मण भोजन विधि ४०५ का ( विशेष ) निषेध ३८५ | अन्न परोसने की विधि ४०६ श्राद्धभोक्ता को क्रोधादि करने का निषेध एक हाथ से भोजन - पात्र लाने ३८६ का निषेध ४०६ पितरों की उत्पत्ति ३८६ मुख्यपितृगणों के अनन्त व्यञ्जन आदि को भूमि पर रखना ४०७ रोदन आदि का निषेध ४०८ पुत्र - पौत्रादि भी पितर ३ ९ १ ब्राह्मण की रुचि के अनुसार पितरों के लिये चाँदी का पात्र ३ ९ २ परोसना आदि ४० ९ श्राद्ध की प्रधानता ब्राह्मणों को ३ ९ २ सन्तुष्ट करना ४० ९ पितृकार्य के आद्यन्त में देवकार्य३ ९ ३ दौहित्र ( पुत्री के पुत्र ) को श्राद्ध में श्राद्ध के योग्य स्थान अवश्य भोजन कराना ३ ९ ४ ४१० एकान्त वन या नदीतट आदि श्राद्ध में दौहित्र, कुतप तथा की श्रेष्ठता तिल की श्रेष्ठता ३ ९ ५ ४१० निमन्त्रित ब्राह्मणों को आसन देना३ ९ ५ अन्न की उष्णता तथा मौन आसन स्थित उन ब्राह्मणों की होकर भोजन करना ४११ गन्धादि से पूजा उष्ण अन्न तथा मौन आदि की प्रशंसा ४१२ ३ ९ ६ उनकी आज्ञा से हवनकर्म ३ ९ ६| पगड़ी आदि बाँधे भोजन का निषेध ४१२ अग्नि, सोम आदि के हवन के चाण्डाल आदि के ब्राह्मण - भोजन देखने का निषेध बाद पितरों का हवन ४१३ ३ ९ ७ अग्नि के अभाव में ब्राह्मण के हवन गोदानादि को भी चाण्डाल हाथ पर आहुतिदान आदि के देखने का निषेध ४१३ ३ ९ ७ अपसव्य होकर हवनादि सूअर के सूँधने आदि से ब्राह्मण-४०० भोजन की निष्फलता ४१४ पिण्डदान की विधि ४०० कुशाकी जड़ में हाथ पोछना लंगड़े आदि को भी ब्राह्मण भोजन ४०१ देखने का निषेध ४१४ ऋतु का नमस्कार आदि ४०२ प्रत्यवनेजन आदि भिक्षुक आदि को भोजन कराना ४१५ ४०२ अनग्निदग्धादि के लिये अन्न बिखेरना ४१५