मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 561–570
मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 561–570
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अध्यायः ] ( घटी ): ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४८५ हिन्दी — प्रात: काल का धूप ( मेधातिथि के मत से सूर्योदय से वे तीन मुहूर्त । = २ घंटा २४ मिनट तक का धूप । अन्याचार्यों के मत से कन्या संक्रान्ति के सूर्य का धूप ), मृतक का धूम, टूटा हुआ आसन ( का त्याग करे ), नख, रोम और बाल न काटे तथा दाँतों से नाखून न काटे ॥ ६ ९ ॥ [ श्रीकामो वर्जयेन्नित्य मृन्मये चैव भोजनम् । ] [ हिन्दी — और मिट्टी के बर्तन में भोजन करना धन को चाहने वाला सदा त्याग करे ॥४ ॥ ]
मिट्टी का ढेला आदि मसलने का निषेध-न मृल्लोष्ठं च मृद्नीयान्नच्छिन्द्यात्करजैस्तृणम् । न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ॥७० ॥
भाष्य - विमर्दनं खण्डशः करणं लोष्ठस्य मृत्सम्बन्धिनः । भाष्य--केचित्तु मृदो लोष्ठस्य सुधादिसम्बन्धिनोऽपि । मृदश्च ‘ मर्दनं ’ उत्क्षिप्यो-त्क्षिप्य पातनम्, हस्तेन संहननं वा । एतच्च मर्दनं यत्किंचनकारितया प्राप्तं निषिध्यते न निष्फलग्रहणस्य पुरस्तादपकर्षात् । तेनैव सिद्धे प्रायश्चित्तविशेषार्थः पुनरारम्भः । करजा नखाः । तु शौचाद्यर्थे प्रयोजने । न कर्म । ननु च “ न कुर्वीत वृथाचेष्टाम् ” ( श्लो ० ६३ ) इत्यनेनैव निष्फलं कर्म निषिद्धम् । अत्राहुः । ‘ चेष्टा ’ भौतिको व्यापारः । इह तु सामान्यस्य पर्युदासः । तेन मनोराज्यादिकल्पाः परिहरणीयाः । आयतिरागामी कालः । यस्मात्कर्मण आगामिनि काले अमुखं दुःखमुत्पद्यते— यथा अतीर्णभोजनं, कुटुम्बभृतिमचिन्तयित्वा महतो धनस्य व्ययश्च— तं न कुर्यात् ॥७० ॥
अत्रार्थवादः । हिन्दी — मिट्टी के ढेले को ( चुटकी या तलहथी आदि से ) न मसले ( मर्दन करे ), नाखून से तृण को नहीं तोड़े, निष्फल कार्य को न करे और भविष्य में दुःखदायी कर्म को भी न करे ॥७० ॥
" विमर्श —— नाकारण मृल्लोष्ट '. इस आपस्तम्बोक्त वचन के अनुसार निष्प्रयोजन १. “ नाकाररणं मृल्लोष्टं मृद्नीयात् तृणानि च च्छिन्वाद् ” इति । ( म ० मु ० ) मनु I- 35
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४८६ मनुस्मृतिः [ चतुर्थः ढेला के मर्दन और नख से तृण को काटने का निषेध किया गया है । " न कुर्वीत वृथा-चेष्टाम्– ” ( ४।६३ ) पूर्वोक्त वचन से ही उक्त निषेध गतार्थ हो सकने पर भी विशेष दोष प्रदर्शनार्थ यह निषेध किया गया है, इसी प्रकार अगले श्लोक ( ४।७१ ) में “ लोष्ट-मर्दी तृणच्छेदी— ” वचन कहा गया है । इसी प्रकार " न कुर्वीत वृथाचेष्टाम्— ' ' " ( ४।६३ ) वचन के ' चेष्टा ' शब्द से ' देहव्यापार ' अर्थ तथा ' न कर्म निष्फलं कुर्यात् ” ( ४।७ ) इस वचन के ‘ कर्म ' शब्द से ' मन से ग्रहण करने योग्य सङ्कल्पादि रूप कार्य ’ अर्थ होने से उक्त प्रकृत श्लोक में कहा गया ' न कर्म निष्फलं कुर्यात् ' वचन से पुनरुक्ति नहीं समझनी चाहिये ।
ढेला मसलने वाले आदि का नाश-लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥ ७१ ॥
भाष्य — अस्मादेव केवलाल्लोष्ठग्रहणात् पूर्वोक्त ' मृल्लोष्ठमि'ति षष्ठीसमासो विज्ञायते । उभयप्राधान्ये हि मृद्ग्रहणं लोष्ठ इव अत्राकरिष्यत । तस्यैव हस्तेन सुमर्दत्वा-त्प्राप्तः पर्युदासः । सुधायास्तु काठिन्याद्यत्नसाध्यं मर्दनं, तन्नैवासति प्रयोजने प्राप्तम् । मृल्लोष्ठमर्दनं तु हस्तेन पुरुषाणां स्वभावतः केषांचित्प्राप्नोति तस्य पर्युदासः । तृणच्छेदी प्रकृत: । दन्तैर्नखान् खादति । सूचकः पिशुनः कर्णेजपः । यः परस्य दोषानसतः सतो वा परोक्षं व्याख्यापयति । अशुचिरुक्तार्थः । विनाशमाशु व्रजति । न यथाऽन्यानि वैदिकान्यनियतकालानि फलानि एव-मेतत् — किंतर्हि— इहैव जन्मनि अचिराद्धनादिना वियोगो विनाशः ॥७१ ॥
हिन्दी – जो मनुष्य ( निरर्थक ) ढेला मसलने वाला, नाखून से तृण काटने वाला, ( दाँतों से ) नंख काटने वाला, खल ( दूसरों में विद्यमान या अविद्यमान दोषों को कहते फिरने वाला ) और अपवित्र मिट्टी - पानी आदिकृत बाहरी शुद्धि और रागद्वेषादि शून्यता-रूप भीतरी ( अन्त: करण की ) शुद्धि से हीन है, वह शीघ्र ( देह, धन आदि से ) नष्ट हो जाता है ॥७१ ॥
हठ चर्चा और माला - धारणादि निषेध-न विगृह्य कथां कुर्याद्बहिर्माल्यं न धारयेत् ।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ॥७२ ॥
भाष्य — अभिनिवेशेन पणबन्धादिना यल्लौकिकेषु शास्त्रेषु वाऽर्थेष्वितरेतरं जल्पन-
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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता महोपुरुषिका या सा विगृह्य कथा । ४८७ बहिर्माल्यम् । वाससो बहिः कण्ठस्थां स्रजं वाससा छादयेत् । तथा च समाचारः । अपरे बहिरित्यनावृतो देश उच्यते । तत्र नगररथ्यादौ न प्रकटमाल्यो भ्राम्येदित्याहुः । अथवा बहिर्गन्धं ‘ बहिर्माल्यं '; यस्य गन्धो नातिसंवेद्यते । एवं स्मृत्यन्तरम् “ नागन्धां स्रजं धारयेदन्यत्र हिरण्मय्या ' इति । गवां च पृष्ठे यानं पर्याणं विना साक्षाद्गवारोहणं प्रतिषिध्यते । सर्वथेति । पर्याणा-द्यन्तरायेऽपि गन्त्र्यादियुक्तेऽपृष्ठयानत्वादप्रतिषेधः ॥७२ ॥
शास्त्रीय या लौकिक ) चर्चा न करे, ( केश - स हिन्दी - हठपूर्वक ( -समूह के ) बाहर माला न पहने, गौओं के पीठ पर सवारी करना सर्वथा ही निन्दित है ॥ ७२ ॥
विमर्श— इस श्लोक में चतुर्थ चरण के द्वारा गौओं की पीठ पर कोई वस्त्र कम्बल आदि डालकर व्यवधान होने पर भी उनकी पीठ पर चढ़ना निन्दित समझना चाहिये, किन्तु ‘ पृष्ठ ' शब्द के कहने से बैलगाड़ी आदि की सवारी को लोग निन्दित नहीं कहते हैं । बिना द्वार के रास्ते से घर में प्रवेश निषेध-अद्वारेण च नातीयाद्ग्रामं वा वेश्म वा वृतम् । रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७३ ॥
भाष्य — आवृतस्य वाटपरिक्षेपादिना ग्रामस्य अद्वारप्रवेशप्रतिषेधः । अनावृतस्य तु द्वारवतोऽपि यथाकामम् ॥७३ ॥
हिन्दी— ( चहारदिवारी अर्थात् परकोटा, कांटा, बांस आदि से ) घिरे हुए घर में द्वार से ही प्रवेश करे और रात में पेड़ों की जड़ को दूर से ही छोड़ दे ( पेड़ों के नीचे बहुत पास में न ठहरे या न जावे ) ॥ ७३ ॥
पाशा खेलने आदि का निषेध-नाक्षैर्दीव्येत्कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत् ।
शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ॥७४ ॥
भाष्य — अन्तरेणापि ग्लहं, परिहासेन नाक्षैर्दीव्येदिति । कदाचिद्ग्रहणं शलाका-दीनामपि दर्शनार्थम् । तेन सर्वस्य द्यूतस्य प्रतिषेधः । स्वयं — चर्ममयं पादत्राणमुपानहौ— ते आत्मना हस्तेन दण्डादिना वा गृहीत्वा देशान्तरं न नयेत् । आत्मीययोश्चायं प्रतिषेधः, स्वयमिति प्रकृतत्वात् । तेन च गुर्वादि-सम्बन्धिन्योरनिषेधः ।
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४८८ मनुस्मृतिः ' [ चतुर्थ: शयने खट्वादौ उपविश्य न भुञ्जीत । पाणौ च कवलं स्थापयित्वा । भाजनाद्य-नन्तरितेन आसने अन्नं स्थापयित्वा । आनन्तर्याद्भोज्यस्य प्रतिनिर्देशः, न भोक्तुः ॥७४ ॥
हिन्दी - पाशा ( जुआ ) कभी न खेले, अपना जूता ( हाथ आदि में ) स्वयं कहीं न ले जावें ( पहन कर ही जावे ), शय्या पर ( बैठ या सोकर, बिना किसी बर्तन में रखे ही ) भोज्य पदार्थ को हाथ में लेकर या आसन पर ( भोजन की थाली रखकर ) भोजन न करे || ७४ || विमर्श- शय्या ( चारपाई, पलंग आदि ) पर बैठकर या सोकर, हाथ में एक बार अधिक ( ग्रास से अत्यधिक ) भोजन के पदार्थों को लेकर ( जैसा कि बहुत लोग पूरी, कचौड़ी, मिठाई, चबेना आदि हाथ में ही लेकर खाते हैं ) और आसन पर भोजन की थाली आदि रखकर भोजन करने का निषेध प्रकृत श्लोक के उत्तरार्द्ध से अभीष्ट है । रात्रि में तिलयुक्त पदार्थ आदि का भोजननिषेध—
सर्वं च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवौ ।
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥७५ ॥
भाष्य — अस्तमिते आदित्ये । प्रतिलक्षणे कर्मप्रवचनीयत्वात् द्वितीया । न चोच्छिष्टः । “ ननु च ब्रह्मचर्यधर्मेष्वेतत्प्रतिषिद्धम् । पुरुषधर्मता च तस्य ज्ञापिता । न तादर्थ्यमेव ” ।
सत्यम् । व्रतरूपताज्ञापनार्थ उपदेशोऽयम् । तेन यावज्जाविकः संकल्पः कर्तव्यः ॥७५ ॥
हिन्दी - सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त ( तिलकुट आदि ) न खावे, नंगा न सोवे और जूठा मुख ( खाने के बाद बिना कुल्ला किये ) कहीं न जावे ॥७५ ॥
पैर धोकर भोजन करना आदि-आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नाद्रपादस्तु संविशेत् ।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥
भाष्य- –आदिकर्मणि विधिमिमं समाचरेत् । आर्द्रपादो भोजनमाचरेत् । न चातृप्तेः पादौ सिञ्चन्नासीत् । संविशेत् । शयने गात्राणि नावक्षिपेत् । संवेशनं शयने गात्रसंयोजनम् । अस्य फलमाह । दीर्घमायुरिति । नायमायुष्कामस्य विधि: - - किंतर्हि— पूर्व-वन्नित्यः । आयुरनुवादस्त्वर्थवाद एव || ७६ ॥ हिन्दी — गीले पैरों वाला होकर ( भोजन के पहले तत्काल पैर धोकर ) भोजन करे और गीले पैर वाला होकर नहीं सोवे ( यदि सोने के पहले पैर धोया हो तो कपड़े आदि
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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४८ ९ से पोंछकर उसे सुखा ले ) गीले पैरों वाला होकर भोजन करने वाला लम्बी आयु को प्राप्त करता है ॥७६ ॥
दुर्गम स्थान में जाने का निषेध-अचक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रपद्येत कर्हिचित् ।
न विण्मूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत् ॥ ७७ ॥
भाष्य - दुर्गं दुर्गारोहं पर्वतादि तरुगुल्मलतागहनं चारण्यम् । तन्न प्रपद्येत । नाक्रामेन्न गच्छेदचक्षुर्विषयं सर्पचौरादेरन्तर्हितस्य भावाशङ्कया । चक्षुर्ग्रहणमागमादेरपि प्रमाणस्य लक्षणम् । न विण्मूत्रम् । “ उदीक्षणं ” वर्णादिना निरूपणम् । निरूपणं च चिरकालप्रेक्षणेन
भवतीत्यत एव तन्न कर्तव्यम् । दैवात्क्वचिद्दृश्यमाने न दोषः ।
नदीबाहुतरणं च स्वस्थस्य निषिध्यते । न वृकादिभये ॥७७ ॥
हिन्दी — नहीं दिखते हुए ( लता - गुल्म आदि के कारण गहन होने से स्पष्ट नहीं मालूम पड़ते हुए ) दुर्गम स्थान ( सघन बन या झाड़ी आदि ) में कदापि न जावे, मल तथा मूत्र को न देखे और बाहुओं से नदी को न तैरे ( तैरकर पार न करे, किन्तु नाव आदि से नदी के पार जावे ) ॥७७ ॥
केश या राख आदि की ढेर पर ठहरने का निषेध-अधितिष्ठेन्न केशांस्तु न भस्मास्थिकपालिकाः । न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥७८ ॥
भाष्य— कपालिकाः भग्नशकलानि ।
दीर्घमायुः । व्याख्याता द्वितीया ॥७८ ॥
हिन्दी — अधिक आयु तक जीने की इच्छा करने वाला बाल, राख, हड्डी, फूटे मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, बिनौला और भूसा इनके ऊपर न बैठे ( या न खड़ा होवे ) ॥७८ ॥
पतितादि के साथ बैठने का निषेध-न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः ।
न मूर्खेर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ ७ ९ ॥
भाष्य— “ ननु च ‘ नाधार्मिकजनावृते ' ' नोपसृष्टेऽन्त्यजैः ' इति चोक्तमेवैतत् । ” नेति ब्रूमः । तत्र निवासः प्रतिषिद्धः । इह तु संवासः । यत्र ग्रामे ते वसन्ति न तत्र वस्तव्यं गृहस्थित्येति तत्रोक्तम् । संवासस्तु तैः सह संव्यवहारो दानग्रहणादिभिर्मैत्री-
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४ ९ ० मनुस्मृतिः [ चतुर्थः करणम्, तद्गृहसमीपे च वासोऽपि एकतः छायोपजीवनमित्यादि । ' आवृत ' ग्रहणाच्च तत्र बाहुल्यं गम्यते । यस्मिन् ग्रामे भूयांसस्ते तस्य समीपेऽपि न वस्तव्यमिति तस्यार्थः । इह त्वबाहुल्येऽपि समीपवासादि प्रतिषिध्यत इत्येष विवेकः । पुल्कसा निषादाः शूद्रायां जाताः । अन्त्या भेदप्रभृतयो म्लेच्छाः । अन्त्यावसायीति निषादस्त्रियां चण्डालाज्जातो वक्ष्यते ( अ ० १० श्लो ० ३ ९ )
“ निषादस्त्री चण्डालात् ” इत्यादि ।
अवलिप्ता मदोद्धताः धनादिना गर्विताः ॥ ७ ९ ॥
हिन्दी — पतित ( ११ अध्यायोक्त ), चाण्डाल ( शूद्र से ब्राह्मणों में उत्पन्न - १०।१२ ), पुल्कस ( मल्लाह से शूद्रा में उत्पन्न - १०।१८ ), मूर्ख अभिमानी और अन्त्यज ( धोबी आदि ) और अन्त्यावसायी ( चाण्डाल से मल्लाहिन स्त्री में उत्पन्न - १० । ३ ९ ) के साथ न बैठे । ( समीप में एक आसन पर या वृक्ष की छाया आदि में एक साथ न बैठे ) ॥ ७ ९ ॥ [ न कृतघ्नैरनुद्युक्तैर्न महापातकान्वितैः । न दस्युभिर्नाशुचिभिर्नामित्रैश्च कदाचन ॥ ५ ॥ ]
[ हिन्दी — कृतघ्न, उद्योगहीन महापातकों ( ११।५४ ) से युक्त, डाकू, अपवित्र और शत्रुओं के साथ न बैठे ॥५ ॥ ]
शूद्र को व्रतादि देने का निषेध-न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् ।
न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ ८० ॥
भाष्य - शूद्रस्य दृष्टादृष्टविषये हिताहितोपदेशो न कर्तव्यः । शूद्रस्य मन्त्रित्वं न कर्तव्यमिति यावत् । वृत्त्यर्थश्चायं निषेधः । सौहार्दादिना तु न दोषः । भवन्ति हि शूद्राः कुलमित्राणि । मैत्र्या चावश्यं हितमुपदिश्यते । अनुज्ञाता च सर्ववर्णे ब्राह्मणस्य मैत्री " मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । ” ये तु व्याचक्षते— अपृच्छतो न ब्रूयादित्युपन्यस्य युक्तं शास्त्रान्तरसिद्धत्वात् । “ नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयादिति ” ( अ ० २ श्लो ० ११० ) – तदयुक्तम् । तत्र हि स्वा-ध्यायविषयं स्वरवर्णगतमन्यद्वाऽसंगतं कुर्वतो ' विनाशितं त्वये ' त्यादावपृष्टेन न वक्तव्यम् । तथा चामी नाध्याप्या इत्यस्मिन्प्रसङ्ग इदमुक्तं नापृष्टो ब्रूयादिति ” । अशिष्यस्यापृच्छतो विस्वरं व्यक्षरं वा पठतो न किंचिद्वक्तव्यमिति तस्यार्थः ।
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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४ ९ १ नोच्छिष्टमिति । उच्छिष्टशब्दोऽयं भुजिनिमित्तेऽप्राशस्त्ये वर्तते । कृतमूत्रपुरीषोऽ-प्यनाचान्त ‘ उच्छिष्ट ’ उच्यते । यथा वक्ष्यामो “ न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टः ” । बाहुल्येनो-च्छिष्टप्रयोगो भुजिसम्बन्धेन । भुञ्जानस्य ह्यन्तराऽऽस्यसंस्पर्शेन बहिरन्तः । स्थितस्योच्छिष्टत्वं भवति । तथा च “ न श्मश्रूणि गतान्यास्यमिति ” श्मश्रुभ्योऽन्यदास्यानुप्रविष्टमुच्छिष्टं करोतीति ज्ञापयति । अतश्च भोक्तुर्भुज्यमानस्य पात्रादेरधिकरणस्य चोच्छिष्टव्यवहारः । क्वचिच्चायं उपयुक्तेतरवचनोऽपि, ' हविरुच्छिष्टं दक्षिणेति ' । तत्र समाचारात्पात्रगृहीत-मुच्छिष्टपुरुषसम्बद्धमीषद्भुक्तमुच्छिष्टमुच्यते । यदपि विशदमोदनादि पात्रस्थमस्पृष्टमपि भोक्त्रा तदपि सम्बद्धसम्बन्धात्समाचारतः परिहियते । तत्र ' उच्छिष्टमन्नं दातव्यम् ', ‘ नोच्छिष्टमिति ’ विधिप्रतिषेधावेकविषयावृतानृतशूद्रव्यवस्थया हविःशेषभेदेन वा विकल्प्येत । अथवा स्थालीस्थमतिथ्यादिभुक्तशिष्टं पर्युषितप्रायं उच्छिष्टं— तन्न शूद्राय दातव्यम् । तत्रोच्यते । जीर्णवसनसाहचर्याच्चैतदेव प्रतिपत्तुं युक्तम् । उपयुक्तेतरवचनत्वाच्च शिषेरुप-सर्गस्य तदर्थानुगुण्येन वर्तनाद्धविरुच्छिष्टं दक्षिणेतिवत्प्रयोगोऽप्यविरुद्धः । एवमनयोः स्मृत्योरविरोधो भविष्यति । यद्यपि रुढ्याऽऽचमनार्हाः प्रायोऽत्र वचने दृश्यन्ते । यत्तु “ वैश्यवच्छौचकल्पश्चेति ” तद्दासशूद्रविषयम् भुक्तोञ्झितमेव प्रतीयत इति दर्शयिष्यामः । न हविष्कृतम् । हविषे कृतं हरिवर्थं कल्पितम् । बाहुल्यात् बहुवचनः समास-स्तादर्थ्येनोपकल्पितप्रतिषेधात् । दण्डापूपिकया यत्र हविर्गन्धोऽस्ति तत्सर्वं प्रतिषिध्यते । तेन हविरर्थितया सङ्कल्पितस्य हविषः प्रवृत्तस्य हविः शेषस्याभुक्तोज्झितस्य हविषः प्रतिषेधः सिद्धो भवेत् । तथा च कृतमिति करोति: क्रियासामान्यवचनः प्रयुक्तः । हविरर्थं यत्कृतं सङ्कल्पितमिति वचनम् । तेनोच्छिष्टस्यापि यावत्प्राक्कृतेन सङ्कल्पेन हविष्कृतव्यपदेशो न यथावत्सर्वावस्थस्य प्रतिषेधो विज्ञायते । अन्यैस्तु हविर्मिश्रं हविष्कृतमिति व्याख्यातम् । संसृष्टप्रतिषेधाच्च केवलस्यापि प्रतिषेधः । विप्रसंसृष्टप्रतिषेधे विप्रस्येवेत्युक्तम् । “ कथं पुनः संसृष्टप्रतिषेधे केवलप्रति-षेध: ’ ” । केवलप्रतिषेधेनाप्रधानः कदाचित्संसृष्टप्रतिषेधः शक्यते वक्तुम् । यत्र संसृष्टावपि पृथक्त्वेन प्रतिभासेते, यत्र वा चक्षुषा, प्रतिभासमाने रूपे रसादिना तत्प्रयोगो भवति, तत्रापि भवत्येव तदाश्रयो व्यवहारः । यथा सुरादिसंपृक्तासु सक्तुपिण्डीष्वन्तर्हितेऽपि . सुरादिरूपे रसे तत्प्रत्ययादस्त्येव सुरापानप्रायश्चित्तम् । “ ननु चैवमप्यद्रवरूपत्वात्पिण्डीभिरेकतापन्नायाः सुराया न पानोपपत्तिः ” । नैष दोषः । प्रायिकेणौचित्यानुवादेन पानमुपादीयते । अभ्यवहार एव तु निषिध्यते । यथा च भक्ष्याभक्ष्यप्रकरणमेतत् । भक्षणं चाभ्यवहारमात्रम् । तस्य विशेषाः पानखादन-चर्वणादयः । गन्धस्य पुनरनाश्रयस्याप्युपलब्धेर्न ततो द्रव्यसद्भावावगमः । दूरस्थेऽपि कर्पूरादौ गन्ध उपलभ्यते । सूक्ष्मद्रव्यावयवावगमकल्पनायां द्रव्यस्य परिमाणावयवः
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४ ९ २ मनुस्मृतिः [ चतुर्थः स्यात् । यत्र तु संसृष्टयोरेकीभावो न चान्यस्तत्प्रत्ययो न तत्र केवलाश्रयौ विधिप्रति-षेधौ प्रवर्तितुमर्हतः । यथा क्षीरं पातव्यमिति सम्मिश्रितयोः क्षीरोदकयोः पीतयोर्न क्षीरं भवति नोदकं, द्रव्यान्तरत्वात् । अन्यद्धि तत्र रूपमन्यश्च रससंस्थानादि तत्प्रत्ययहेतुर-स्तीति द्रव्यान्तरं तत् । यदि भवेतां, तदा मद्यपानप्रायश्चित्तं न प्राप्नोति । “ यद्येवं मद्योदके सह पीते यदि भव द्रव्यान्तरत्वात् ” । नैष दोषः । अभिभवति रसान्तराणि मद्यं तिक्तरसवत् । ततो रसप्रत्यभिज्ञानाद्भव-त्येव तत्प्रायश्चित्तम् । यत्र तु बहूदकं स्वल्पं मद्यादि, तत्र संसर्गप्रायश्चित्तमपि निपुणमेका-दशे निरूपयिष्यामः । तस्मात्केवलाश्रयः प्रतिषेध आस्कन्देदपि संसर्गम् । यथा भाषा न भोक्तव्या इति मिश्रा अपि न भुज्यन्ते । संसर्गाश्रयस्तु केन हेतुनाऽसंसृष्टे वर्तेत । गङ्गायमुनयोः सङ्गमाज्जलमानयेत्युक्ते न केवलाया गङ्गाया आनयति, न यमुनायाः । समाचार एवेति चेत्समाचार एवोदाहर्तव्यः । न चास्योपदिशेद्धर्मम् । “ ननु च ' न शूद्राये ' त्यविशेषेण दृष्टादृष्टविषयमतिदानप्रतिषेधाद्धर्मोपदेशनिषेधो-ऽपि सिद्ध एव ” । सत्यम् । पुनर्वचनं शेषार्थम् । ततः प्रायश्चित्तोपदेशोऽनुज्ञातो भवति । “ शरणागतं परित्यज्य ” इत्यत्र ( अ ० ११ श्लो ० १ ९ ८ ) चैतद्दर्शयिष्यामः । अन्ये तु पार्वणश्राद्धपाकयज्ञादिष्वितिकर्तव्यतां न शिक्षयेत् याजकत्वादि रूपेणेत्याहुः । अत्र चोदयन्ति । “ यदि धर्मोपदेशः, शूद्रस्य निषिध्यते कुतस्तर्हि धर्मवित्त्वम् । अविदुषश्च नानुष्ठानसम्भवस्ततः शूद्रानुष्ठातृकधर्मशास्त्रानर्थक्यम् ” । अचोद्यमेतत् । अतिक्रान्तनिषेधस्य लिप्सया ब्राह्मणस्य चोपदेष्टृत्वसम्भवात् । न हि ब्रह्महत्या सर्वस्वदानचोदनाप्रतिग्रहं प्रयुंक्ते । सम्भवति लिप्सा प्रयोक्त्री । “ ननु चास्ति वचनं ‘ प्रब्रूयादितरेभ्यश्चेति ’ । ” वृत्त्युपायप्राप्तौ । अत एवं प्रकृतं “ सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि । प्रब्रूयादितरेभ्यश्चेति ” ( अ ० १० श्लोक २ ) । यस्त्वाश्रितशूद्रस्तस्यावश्यमुपदेशः कर्तव्यः । अविदुषा विधिप्रतिषेधातिक्रमात्संवासो निषिद्धः “ न मूर्खेर्नावलिप्तैश्चेति ” ( श्लो ० ७ ९ ) । यत्तु व्याचक्षते— “ धर्मशास्त्रोपदेशस्तदर्थव्याख्यानं वाऽनेन निषिध्यते शास्त्रद्वयेन— ‘ न चाऽस्योपदिशेदिति ’ । एकेन शास्त्राध्ययनमपरेणार्थव्याख्यानम् । अग्रन्थकस्तूपदेशो
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अध्याय: ] न केनचिन्निषिद्धः ” । ‘ मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता तेषामेवंवदतां ‘ तस्य शास्त्रविचार ' इति सिद्धत्वात्पुनरुक्तम् । ४ ९ ३ इह वदन्ति— “ व्याकरणादौ धर्मावबोधार्थशास्त्रे धर्मशब्दः । तद्धि न धर्मशास्त्र-मतीन्द्रियार्थमितिप्रतिषेधानुपदेशात् । भवति तु धर्मशास्त्रावबोधार्थम् । शक्नोति हि वैया-करणः पदार्थानुसरणेन गहनं वाक्यार्थमुन्नेतुम् । धर्मशास्त्रत्वाच्च ‘ तस्य शास्त्र ' इत्यनेना-गतत्वात्पृथगुच्यते " । युक्तमेतत्, यदि कश्चिन्न ब्रूयात्प्रधानेऽनधिकृतस्य कुतोऽङ्गेषु प्राप्तिरिति । वेदः स्मृतिशास्त्रे च प्रधानम् । न च तत्र शूद्रस्याधिकारः । न चास्य व्रतमादिशेत् । व्रतशब्देन कृच्छ्राण्युच्यन्ते । ' एतैर्व्रतै’रितिप्रयोगदर्शनात् । तान्यभ्युदयकामस्य नोपदिशेत् । प्रायश्चित्तार्थतया त्विष्यत एवोपदेशः । स्नातकव्रतानां प्राप्तिरेव नास्ति, अस्नातकत्वात् । एवं सावित्रादीनामप्यध्ययनाभावादध्ययनं चोपनयना-भावादुपनयनं च तद्विधौ जातित्रयश्रवणात् ॥८० ॥
हिन्दी – शूद्र को इष्टार्थक उपदेश, उच्छिष्ट ( जूठा ), यज्ञ कर्म से बचा हुआ हविष्य धर्म और व्रत ( प्रायश्चित्त ) का उपदेश साक्षात् न दे ॥ ८० ॥
[ अन्तरा ब्राह्मणं कृत्वा प्रायश्चित्तं समादिशेत् ॥ ६ ॥ ]
[ हिन्दी— ( किन्तु ) बीच में ब्राह्मण को करके ( शूद्र के लिए ) प्रायश्चित्त ( धर्मोपदेश, इष्टार्थोपदेश आदि ) का उपदेश करे ॥ ६ ॥
शूद्र को धर्मोपदेश देने से दोष-यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥ ८१ ॥
भाष्य - पूर्वस्य प्रतिषेधस्य निन्दार्थवादः । तेनैव सेहेति । उभयोर्दोषमाह, शृण्वतः श्रावयतश्च । मज्जत्यवगाहते तत्प्राप्नो-तीति यावत् ॥८१ ॥
हिन्दी - क्योंकि जो इस ( शूद्र ) को धर्मोपदेश करता है, व्रत ( प्रायश्चित्त - विधान ) बतलाता है, वह उसके साथ ही ' असंवृत ' नाम के नरक में प्रवेश करता है ॥ ८१ ॥
विमर्श - पहले ( ४।८० ) उक्त पाँच कर्मों का निषेध होने पर भी इस श्लोक में उक्त धर्मोपदेश तथा व्रतोपदेश का पुनः निषेध अधिक दोष का सूचक है । १. अस्य पूवार्द्धं तु “ तथा शूद्रं समासाद्य सदा धर्मपुरस्सरम् " इत्येवमङ्गिरसोक्तम् ।
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४ ९ ४ मनुस्मृतिः
दोनों हाथों से शिर खुजलाने का निषेध-न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।
न स्पृशेच्चैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः ॥८२ ॥
[ चतुर्थ: भाष्य- - संहताभ्यां संश्लिष्टाभ्यामितरेतरसंसृष्टाभ्यां युगपद्द्वाभ्यां प्रतिषेधः । पाणिभ्यामिति बाहू संहतौ निषेधति । आत्मन इति न परस्य । अतश्चान्येन संहताभ्यां कण्डूयतो न दोषः । शिरोग्रहणात्पृष्ठादावदोषः । न स्पृशेच्चैव शिरः । हस्तेनात्मनोऽन्येन वाऽवयवेनेति केचित् । तन्न, पाणिभ्यामिति प्रकृतत्वात् । न च स्नायाच्छिरसा विना । नित्यनैमित्तकयोः स्नानयोरयं विधिः । “ ननु स्विन्नस्य लौकिके स्नाने कुत एतत् ” । स्नानविधिनैकवाक्यत्वात् । “ विहितस्नानापेक्षा प्रत्यासत्त्या युक्तिमती । लोके तु विधेरभावादप्राप्तिः ” । स्नातिश्चायं सर्वाङ्गसम्बन्धिनि सलिलगोमूत्रादि प्रक्षालने वर्तते, शिरोवर्जिते च । तत्र चण्डालादिस्पर्शने शिरोवर्जितमपि यदृच्छाप्रसक्तं निवार्यते— न च स्नाया-द्विना ततः । अस्ति च लौकिकमशिरस्कमपि स्नानम् । येन शिरः स्नानं “ शिरः स्नातस्तु तैलेनेति ” ॥८२ ॥
हिन्दी — दोनों हाथों को एकत्रित ( मिला ) कर शिर न खुजलावे, जूठा मुख रहने पर शिर न छूए और शिर को छोड़कर ( नित्य और नैमित्तिक ) स्नान न करे ( स्नान करने में असामर्थ्य रहने पर बिना शिर से भी स्नान करने में दोष नहीं है ) ॥ ८२ ॥
बाल पकड़ने आदि का निषेध-केशग्रहान्प्रहारांश्च
शिरस्येतान्विवर्जयेत् ।
शिरः स्नातश्च तैलेन नाङ्गं किंचिदपि स्पृशेत् ॥ ८३ ॥
भाष्य — आत्मनः परस्य वेत्यविशेषेण केचिदिच्छन्ति । अन्ये त्वात्मन इति प्रकृतमभिसंबध्नन्ति । क्रोधनिमित्तश्चायं प्रतिषेधः । सुरतसम्भोगे तु कामिन्याः केशग्रहः, स न निषिध्यते । “ शिरः ’ ” ‘ स्नातं ’ क्षालितमनेनेति राजदन्तादेराकृतिगणत्वात् परिनिपातः । शिरःस्नात
इति बाहुलकेन समासः । नाङ्गमात्मीयम् ॥८३ ॥
१. अशक्तस्वस्तु– “ अशिरस्कं भवेत्स्नानं स्नानाशक्तौ तु कर्मिणाम् " इति जावालिना विहितमेव । ( म ० मु ० )