मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 651–660

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता भाष्य- एधादतिरेकेण यदन्यद्द्रव्यं तस्याप्यनेन विशेषेण ग्राह्यतोच्यते । ५७३ भिक्षाशब्दश्च प्रशंसायां प्रयुक्तो न भिक्षैव विवक्षिता । यद्यप्ययं सिद्धान्नाल्पता-वचन: । भिक्षा किल स्वल्पत्वान्नातीव दोषावहा । ब्रह्मचारिणश्च सार्ववर्णिकी विहिता । एवमन्यदप्यनेन विशेषेण तत्तुल्यं दृष्टम् । भिक्षाशब्दस्येवंविधार्थविवक्षया प्रयोगः । तथाहि महाभारते ( १।२०६१ )

“ गत्वा ह्युभौ भार्गवकर्मशालां पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ ।

तौ याज्ञसेनीं परमप्रतीतौभिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ ” ॥ इति ॥

आहृतोपहृता तं देशमानीता यत्र प्रतिग्रहीता स्थितः । अभ्युद्यताऽग्रे स्थापिता वचनेनेङ्गितेन वा गृह्यतामिति निवेदिता । पुरस्तात्पूर्वमप्रचोदिताऽयाचिता प्रतिग्रहीत्रा । स्वयं परमुखेन वा दात्रा पूर्वं नोक्तमिदं मे द्रव्यमस्ति तत्प्रसादमाश्रित्य गृह्यतामिति केवलमतर्कितोपपादिता तत्काल एव दर्शिताभिप्राया । तादृशीं भिक्षां प्रजापतिर्हिरण्यगर्भो मेने मन्यते स्म । किमिति दुष्कृतकर्मणोऽपि सकाशाद्ग्राह्येति । दुष्कृतं पापं कर्म यस्यासौ दुष्कृतकर्मा ॥२४८ ॥

हिन्दी — दान लेने वाले के पास सामने रक्खी हुई, स्वयं ( दान लेने वाले के द्वारा ) अथवा अन्य किसी के द्वारा प्रेरणा करके नहीं मँगायी गयी और ' आप ( दान लेने वाले ) को अमुक वस्तु, अमुक प्रमाण या अमुक समय में दूँगा ' इस प्रकार दाता के द्वारा पहले नहीं कही हुई भिक्षा वस्तु ( हिरण्य आदि ) पापियों ( पतित रहित ) से भी लेनी चाहिये; ऐसा ब्रह्मा मानते हैं ॥२४८ ॥

उक्त भिक्षा न लेने में दोष-नाश्नन्ति पितरस्तस्य दशवर्षाणि पञ्च च ।

न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ २४ ९ ॥

भाष्य — अथाग्रहणनिन्दार्थवादः । अथ यो यत्रैतामवधीरयति तस्य पितरः श्राद्धं नाश्नन्ति न प्रतीच्छन्तीति । श्रग्निश्च देवेभ्यो हव्यं न वहति । पित्र्याद्दैवाच्च कर्मणो न फलं लभ्यत इत्यर्थः । अत्र कश्चिदाह । “ अनुपयुज्यमानमपि दातुरनुग्रहार्थमवश्यमीदृशं ग्रहीतव्यम् ” । तत्त्वयुक्तम् । निर्दोषताऽस्यायाचितप्रतिग्रहस्योच्यते । प्रतिप्रसवो ह्ययम् । प्रतिषिद्धस्य च प्रतिप्रसवो भवति । लौकिक्या चार्थितया प्राप्तिः प्रतिषिद्धा सैव प्रतिप्रसूयते ॥२४ ९ ॥ हिन्दी – जो उस ( ४।२४८ ) भिक्षा को अपमानित करता ( नहीं लेता ) है, उससे दिये गये कव्य ( श्राद्धान्न ) को पन्द्रह वर्ष तक पितर लोग नहीं लेते और अग्नि हव्य ( आहुति में दिया गया हविष्यान्न ) को नहीं लेती ॥।२४९ ॥

पृष्ठ 652

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५७४ मनुस्मृतिः वैद्य आदि से भिक्षा मिलने पर -[ चिकित्सककृतघ्नानां शिल्पकर्तुश्च वार्धुषेः । षण्ढस्य कुलटायाश्च उद्यतामपि वर्जयेत् ॥ १८ ॥ ]

[ चतुर्थ: [ हिन्दी – वैद्य, कृतघ्न, शिल्पी, सूदखोर, नपुंसक और कुलटा स्त्री की भिक्षा बिना मांगे सामने आवे, तो भी नहीं लेवे ॥ १८ ॥ । ]

[ न विद्यमानमेवं वै प्रतिग्राह्यं विजानता । विकल्प्याविद्यमाने तु धर्महीनः प्रकीर्तितः ॥ १ ९ ॥ ] [ हिन्दी — अपने यहाँ वस्तु के रहने पर ज्ञानपूर्वक उक्त भिक्षा नहीं लेवे और अपने यहाँ नहीं रहने पर विकल्प कर लेने से धर्महीन हो जाता है ॥ १ ९ ॥ । ] बिना माँगे शय्या आदि लेने का अनिषेध-शय्यां गृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि । धाना मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत् ॥ २५० ॥

भाष्य — शय्यादीन्यानाहृतान्यपि न निर्णुदेन्न प्रत्याचक्षीत । यदि गृहेऽवस्थितानि द्रव्याणि कैश्चिदुच्यते चेदमिदमाहराम्येतत्प्रतीक्ष्यतां तदा न प्रत्याख्येयानि ॥ २५० ॥

-हिन्दी – शय्या, घर, कुशा गन्ध ( चन्दन, कर्पूर, कस्तूरी आदि ), जल, फूल, मणि ( रत्न - जवाहरात ), दही, दाना ( भूने हुए जौ या चावल ), मछली, दूध, मांस और शाक; ये यदि बिना माँगे गृहपर दाता लावे तब इनको मना न करे ( ले लेवे ) ॥ २५० ॥

गुरु आदि के लिए भिक्षाग्रहण-गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन् ।

सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत्स्वयं ततः ॥ २५१ ॥

भाष्य – गुरव उपदेशातिदेशैर्बहवः । भृत्या आश्रिता: स्मृत्यन्तरे तु संख्याता: -“ वृद्धौ तु मातापितरौ भार्या साध्वी सुतः शिशुः ” । तानुद्धर्तुमिच्छुः क्षुधावसन्नान् । देवतातिथींश्चार्चिष्यन्नित्यकर्मसम्पत्त्यर्थमित्यर्थः । सर्वतः प्रतिगृह्णीयात्साधुभ्योऽसाधुभ्यश्च । न तु तृप्येत्स्वयं ततः । ‘ तृप्ति: ' क्षुन्निवृत्तिरुपभोगश्च, तन्न कुर्यात् । गुर्वादिप्रयोजन-मेव तद्ग्रहीतव्यं न त्वात्मार्थम् ॥२५१ ॥

कथं तर्ह्यात्मा यापयितव्योऽत आह-हिन्दी – क्षुधा - पीड़ित गुरु ( माता, पिता, उपाध्यायादि गुरुजन ) और भृत्य ( तथा स्त्री का उद्धार ) ( उन्हें भिक्षान्न द्वारा सन्तुष्ट ) अर्थात् क्षुधा - निवृत्त करने तथा देवता आदि की पूजा करने के लिये ( पतित को छोड़ ) सबसे भिक्षा ग्रहण करे; किन्तु उस भिक्षा वस्तु

पृष्ठ 653

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ५७५ से स्वयं सन्तुष्ट न हो अर्थात् उस भिक्षा वस्तु को अपने काम में न लावे ॥ २५१ ॥

अपने लिये सज्जनों से भिक्षा ग्रहण-गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन् ।

आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ २५२ ॥

भाष्य — अभ्यतीतेष्वतीतेषु विना वा तैर्जीवन्तोऽपि यदि पृथग्वसन्ति । गुरुग्रहणं सर्वेषां च भृत्यानामपि प्रदर्शनार्थम् । आत्मनो वृत्तिं जीवनं प्रतीच्छन्नर्थयमानः साधुभ्यो धार्मिकेभ्यः प्रतिगृह्णीयात् । जातेरत्रानुपादानाच्छूद्रादपि धार्मिकादस्ति परिग्रहः । तदुक्तं " नाद्याच्छूद्रस्य ” इत्यादि ( ४।२२३ ) ॥ २५२ ॥

हिन्दी – गुरु ( माता - पितादि गुरुजन ) के स्वर्गवास हो जाने पर या ( उनके संन्यास आदि लेने के कारण जीते रहने पर भी ) उनसे अलग गृह में रहता हुआ अपनी वृत्ति की इच्छा करता हुआ सर्वदा सज्जनों से भिक्षा को ग्रहण करे ॥२५२ ॥

अन्न भोजन करने योग्य शूद्र-आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ ।

एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥ २५३ ॥

भाष्य — अर्धसीरी अर्धिकः कुटुम्बी भूमिकर्षक इति य उच्यते । गोपाल-दासौ सम्बन्धिशब्दौ । यो यस्य गाः पालयति स तस्य भोज्यान्नः । यश्चात्मानं निवेदयेत् | अहं त्वच्छरणः त्वयि विश्रब्धो वत्स्यामीत्येवं य आत्मान-मर्पयति सोऽपि भोज्यान्नः ॥२५३ ॥

हिन्दी -खेती करने वाला, वंश का मित्र, गोपाल, दास, नाई और जिसने अपने को समर्पण कर दिया है; शूद्रों में ये भोज्यान्न हैं ( इन शूद्रों के अन्न का भोजन करना अनिषिद्ध है ) ॥२५३ ॥

विमर्श - उक्त सभी शब्द सम्बन्ध - परक हैं । अतः जो अपने यहाँ खेती का कार्य करे, जो अपने वंश का मित्र हो, जो अपना चरवाहा या गौओं को खिलाने - पिलाने वाला हो, अपना नौकर हो, अपना नाई हो और ' मैं अपने को आपके लिये ही समर्पण करता हूँ ' इस प्रकार जिसने ' आत्मसमर्पण ' कर दिया हो, उन्हीं के यहाँ भोजन करना चाहिये, उक्त जातियों अथवा व्यवसायों के सब शूद्रों के यहाँ नहीं ।

शूद्रों का आत्मनिवेदन करना-यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशं च चिकीर्षितम् ।

यथा चोपचरेदेनं तथाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥ २५४ ॥

फारडी

पृष्ठ 654

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५७६ मनुस्मृतिः [ चतुर्थ: भाष्य —– आत्मनिवेदनमेव व्यक्तीकरोति । अस्य शूद्रस्य यादृश आत्मा भवेत् यत्कुलीनो यद्देशो यच्छिल्पश्च । यच्चिकीर्षितम् । अनेककार्येण त्वामहमाश्रितो धर्मेण अन्येन वा प्रयोजनेन राजकुलरक्षादिना । यथा वोपचरेच्छिल्पेनानेन त्वां सेवे पादवन्दनादि गृहकृत्यकरत्वे सर्वस्मिन्निवेदित आत्मा निवेदितो भवति । अन्ये तु “ आत्मा वै पुत्रनामासि ” इत्यपत्यवचनमात्मशब्दं मन्यमानाः यस्य शूद्रस्य कामत: प्रवृत्ता दुहिता विवाह्यते तस्यानेन भोज्यान्नतोच्यत इत्याहुः । तदयुक्तम् । न तावदयमात्मशब्दो दुहितरि विस्पष्टं प्रयुक्तः । पुत्रशब्दो हि पुंस्येव प्रसिद्धतरः । न च परोक्षशब्दोपदेशेन किंचित्प्रयोजनम् । एतावदेव वक्तुं युक्तं ' दद्याद्दुहितरं चय ' इति । अन्ये त्वार्धिकादिग्रहणं शूद्रोपलक्षणार्थं वर्णयन्ति । तेन पारशवस्य श्वशुरस्य च भोज्यान्नता सिद्धा भवति ॥२५४ ॥

हिन्दी — इस ( शूद्र ) की जैसी आत्मा ( कुल- शीलादि = मर्यादा का स्वरूप ) हो, जैसा अभीष्ट कर्त्तव्य हो और जैसे इसकी सेवा करनी हो; वैसे अपने को निवेदन ( आत्म-समर्पण ) कर दे ॥२५४ ॥

आत्मसमर्पण में असत्य भाषण से दोष -योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते ।

स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥

भाष्य — अन्यथाभूतमधार्मिकं सन्तं सत्सु शिष्टेष्वन्यथा भाषते धार्मिकोऽह-मिति I । अन्येन वा प्रयोजनेन चाश्रितोऽन्यद् दर्शयति स सर्वेषां पापकृतामधिकतमः पापकृत् ।

स्तेनश्चौरः ।

आत्मापहारकोऽन्यश्चौरो द्रव्यमपहरत्ययं पुनरात्मानमेवेति निन्दातिशयः ॥२५५ ॥

1516 हिन्दी — जो स्वयं अन्यथा होते हुए सज्जनों से उसके विपरीत ( झूठा ) बतलाता है, वह संसार में बड़ा पापी और चोर है; क्योंकि वह आत्मा को अपहरण करने ना और चार है, क्याकि वह अ वाला है ॥२५५ ॥

विमर्श - आत्मापहारक- सामान्य चोर लोगों की सम्पत्ति आदि चुराकर संसार में पापी होता है; किन्तु जो आत्मा ( अपने कुलशील के स्वरूप ) की चोरी करता अर्थात् छिपाता है वह संसार में बड़ा पापी होता है ॥

पृष्ठ 655

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता असत्यभाषी सर्वापहारक—

वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः ।

तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥

भाष्य — शब्दार्थयोर्नित्यसम्बन्धाद्वाचि शब्देऽर्था नियता उच्यन्ते । ५७७ वाङ्मूला वक्तुः स्वाभिप्रायप्रकाशनस्य तदधीनत्वात्तन्मूला उच्यन्ते । वाचो विनिःसृताः संभूताः श्रोतुरपि प्रतिपत्तेस्तत्तुल्यत्वाद्वाग्विनिः सृता उच्यन्ते । न चात्र पौनरुक्त्याशङ्कापरिहारे प्रयतितव्यम् । अनुवादत्वादस्य यथाकथंचिद्वस्तु-परिहारत्वात् । तां वाचं यश्चोरयति मुष्णात्यन्यदुक्त्वाऽन्यदनुतिष्ठत्यन्येनाभिप्रायेण सङ्गच्छतेऽ-न्यच्च दर्शयति स सर्वस्तेयकृत् । नास्ति तद्द्रव्यं सुवर्णादि यत्तेन नापहृतं भवतीति निन्दार्थवादोऽनृतवचनस्य ॥२५६ ॥

हिन्दी - वचन ( शब्द ) में सब अर्थ निश्चित है और वचन से ही सबका ( प्रतीति द्वारा ) ज्ञान होता है । जो मनुष्य उस वचन को चुराता ( कपटपूर्वक छिपाकर कहता ) है, वह सब कुछ का चोर समझा जाता है ॥ २५६ ॥

विमर्श - मनु भगवान् के वचनानुसार ( १।९ १ ) द्विजाति मात्र की सेवा करना ही शूद्र का एकमात्र कर्तव्य है, अत एव किसी धनिक के यहाँ जब कोई शूद्र नौकरी आदि के लिए जाता है, तब उसे अपने कुल, मर्यादा, आचार - विचार आदि का परिचय देना आवश्यक होता है । उस समय यदि कोई अपनी जीविका प्राप्ति के लिये असत्य भाषण कर उस धनिक सज्जन के यहाँ जीविका प्राप्त भी कर लेगा तो वास्तविकता का पता लगने पर उस नौकर पर से विश्वास उठ जायेगा तथा लगी हुई जीविका से भी उसे हाथ धोना पड़ेगा । अत एव अपने कुलादि का परिचय सच्चा ही देना चाहिये, इसी विषय को इन ( ४।२५४-२५६ ) वचनों में मनु भगवान् ने कहा है । साथ ही ये वचन यद्यपि ' शूद्र ' के द्वारा ‘ आत्मसमर्पण ' प्रकरण को लेकर कहे गये हैं, तथापि सामान्यतः सब वर्णों के लिए लागू होते हैं, जिस कार्य के करने ( कुलशीलादि के सम्बन्ध में असत्य भाषण करने ) से शूद्र तक को भी पाप - भागी होना पड़ता है, उस कार्य के करने से द्विजाति को तो अधिक पाप - भागी होना पड़ेगा, यह निश्चित सिद्धान्त है । अत एव मनुष्य मात्र को जीविका प्राप्ति के लिए अपने कुल आदि को नहीं छिपाना चाहिए ॥ योग्य पुत्र में गृह - कार्य का समर्पण—

महर्षिपितृदेवानां गत्वाऽऽनृण्यं यथाविधि ।

पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमास्थितः ॥ २५७ ॥

पृष्ठ 656

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५७८ मनुस्मृतिः ॥ चतुर्थः भाष्य — गृहस्थस्यैवेदं प्रकारान्तरमुच्यते ॥ महर्षीणामानृण्यं स्वाध्यायेन पितॄणामपत्योत्पादनेन देवानां यज्ञैर्यथोक्तं " त्रिभिर्ऋण-ऋणवा ” इति गत्वा कृत्वैत्त्रयं पुत्रे प्राप्तव्यवहारे सर्वगृहकुटुम्बव्यवहारं समासज्य संन्यस्य वसेद् गृह एव । माध्यस्थ्यमास्थितस्त्यक्तहङ्कारः । इदं मे धनमिदं मे पुत्रदारमिदं मे दासीदासमिति स्वबुद्धिं सन्त्यज्यासीत । नाहं कस्यचिन्न कश्चिन्ममेति त्यक्तस्वतृष्णता माध्यस्थ्यम् । अयं च संन्यासः काम्यानां च दृष्टानां च कर्मणां, न सर्वेषाम् । उत्तरत्र दर्श-यिष्यामः॥२५७ ॥

हिन्दी — विधिपूर्वक महर्षि, पितर और देवताओं के ऋण से छुटकारा पाकर सब ( गृह कार्यभार ) पुत्र को देकर माध्यस्थ्यभाव धारण कर ( धन - धान्य तथा पुत्रादि परिवार में ममता से रहित होकर घर में ही ) रहे ॥ २५७ ॥

विमर्श — वेद के स्वाध्याय से महर्षियों के, श्राद्ध से पितरों के और यज्ञों से देवों के ऋण से मनुष्य छुटकारा पा जाता है । संन्यास का यह प्रकार गृहस्थ के लिए है । विशेष प्रकार छठे अध्याय में कहेंगे ।

ब्रह्मचिन्तन-एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनि ।

एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ २५८ ॥

भाष्य-–कृते सर्वकर्मसंन्यास इदं तस्य विशेषतः कर्तव्यम् । एकाक्यसहायः सन्नविद्यमानसम्भाषणोऽनाकुले विविक्ते निर्जने रहसि चिन्तये-द्ध्यायेद्धितमात्मन्युपनिषत्सु या ब्रह्मोपासना विहितास्ता अभ्यस्येत् । तच्चिन्तया तदभ्यासे परं श्रेयो मोक्षाख्यमधिगच्छति प्राप्नोति ॥ २५८ ॥

हिन्दी— ( अभीप्सित कर्म तथा धनोपार्जन आदि की चिन्ता को छोड़कर पुत्र से भोजनादि को पाता हुआ ) एकान्त स्थान में अकेला ही अपने हित ( जीविका ब्रह्मरूप हो जाने ) का ध्यान करता रहे; क्योंकि अकेला ही ( जीव के ब्राह्मभाव में परिणाम को चिन्तन करता हुआ मनुष्य श्रेष्ठ कल्याण ) ( मोक्ष ) को प्राप्त करता है ॥२५८ ॥

अध्याय का उपसंहार-एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती ।

स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ॥ २५ ९ ॥

भाष्य — अध्यायार्थोपसंहारः । किए लिए

पृष्ठ 657

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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ५७ ९ एषा वृत्तिर्विप्रस्य गृहस्थस्योक्ता । शाश्वती नित्या । अनित्या त्वापदि या वक्ष्यते । विप्रग्रहणाद्ब्राह्मणस्यैव स्नातकव्रतानां कल्पो विविधः । सत्त्वं नामात्मगुणस्तस्य वृद्धिकरः ।

शुभः प्रशस्त: ।

प्रशंसैषा ॥२५९ ॥

हिन्दी- – ( भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि ) – यह गृहस्थ ब्राह्मण के नित्य वृत्ति ( आपात्तिकालिक, वक्ष्मयाण अनित्य वृत्ति से भिन्न ऋतादि वृत्ति ) सत्त्वगुण की वृद्धि करने वाला शुभ स्नातकों के व्रतविधान को ( मैंने तुम लोगों से ) कहा ॥२५९ ॥

उक्त वृत्ति के आचरण से ब्रह्मलोक की प्राप्ति-अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन् वेदशास्त्रवित् । व्यपेतकल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६० ॥

इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

भाष्य — सर्वस्यास्य फलकथनमेतत् । अनेन विप्रो वर्तयन्वर्तमानो वेदशास्त्रविद्व्यपेतकल्मषः प्रतिषेधापराधजं पापं कल्मषं तद्व्यपेतं व्यपनीतं प्रायश्चित्तैः । तेनैतदुक्तं भवति । विहितकरणात्प्रतिषिद्धस्या-नासेवनात्कथंचित्कृतस्य प्रायश्चित्तैर्निष्क्रीतत्वात् । ब्रह्मलोके महीयते ब्रह्मलोके स्थान-विशेषे महिमानं प्राप्नोति । दर्शनान्तरं ब्रह्मरूपः सम्पद्यत इति सिद्धम् ॥ २६० ॥

इति श्री भट्टमेधातिथिविरचिते मनुभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

हिन्दी — इस वृत्ति से आचरण करता हुआ, वेद - शास्त्र का ज्ञाता ब्राह्मण पाप रहित होकर सर्वदा ब्रह्म में विलीन होकर उत्कृष्टता को प्राप्त करता है ॥२६० ॥

मानवे धर्मशास्त्रेऽस्मिन् वृत्तिर्गृहिव्रतानि च ।

अन्नपूर्णाप्रसादेन चतुर्थे पूर्णतामयुः ॥४ ॥

ए किसी

पृष्ठ 658

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शिवार ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ श्रुत्वैतानृषयो धर्मान् स्नातकस्य यथोदितान् । इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ १ ॥

भाष्य – ब्रह्मचारिगृहस्थयोरध्यायत्रयेण ये धर्मा विहितास्ताञ्चछ्रुत्वा ऋषयो मरीच्यादयो भृगुमाचार्यमिदं वक्ष्यमाणं वस्त्वब्रुवन् पृष्टवन्तः । “ ननु चात्र स्नातकस्येति श्रूयते । तत्र ब्रह्मचारिग्रहणं किमर्थम्? ” उच्यते । वृत्तसंकीर्तनमेतत् । ब्रह्मचारिणो धर्मा उक्ता एव । महात्मानमनलप्रभवमिति च भृगुविशेषणम् 1 । अनलादग्नेः प्रभव उत्पत्तिर्यस्य तम् । “ ननु प्रथमेऽध्याये ' अहं प्रजाः सिसृक्षुः ' इत्यत्र मनोरपत्यं भृगुरुक्तः ” । सत्यम् । अर्थवादः । अमुत्र अग्नेः सकाशाद्भृगोर्जन्म श्रुतं तद्दर्शनेनैवमुक्तम् तथा च नामनिर्वचनम् । “ भ्रष्टाद्रेतसः प्रथममुददीप्यत तदसावादित्योऽभवत् यद्विती-यमासीत्तद्भृगुरिति । उपचारतो वैतदुच्यते । तेजस्वितासामान्यादग्नेरिव प्रसव इति । न चात्राभिनिवेष्टव्यं कतरः पक्षो युक्त इति । अनिदंपरत्वादस्य शास्त्रस्य । सर्व एवायं प्रश्नप्रतिवचनसन्दर्भो वक्ष्यमाणस्यान्नदोषस्य गौरवज्ञापनार्थः । परिग्रह-दुष्टादन्नस्वभावदुष्टं गुरुतरमिति । सम्बन्धिदोषात्स्वरूपदोषो बलवानन्तरङ्गत्वात् । “ ननु च पूर्वं बहुतरं प्रायश्चित्तं श्रूयते ' अमत्या क्षपणं त्र्यहमिति ’ । इह तु ‘ शेषेषू-पवसेदहरिति ’ । तत्कथमस्य गुरुतरत्वम्? ” । उच्यते । लशुनाद्यपेक्षमेतत् । तेषु हि ' मत्या जग्ध्वा पते'दिति पतितप्रायश्चित्तं भवति ॥ १ ॥

हिन्दी — स्नातकों के लिये यथावत् कथित इस ( चतुर्थाध्यायोक्त ) धर्मों को सुनकर ऋषियों ने अग्नि से उत्पन्न भृगु मुनि से यह कहा- — 11211 विमर्श- पहले ( १।३५ में ) मनुसे भृगु मुनि की उत्पत्ति कही गई है तथा इस

श्लोक में उसी भृगु मुनि की उत्पत्ति अग्नि से बतलाई गई है । अत: उभय वचनों के

पृष्ठ 659

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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ५८१ पूर्वापर विरोध का कल्पभेद से परिहार करना चाहिए । इसमें वेदवचन भी प्रमाण है ' तथा उसी के आधार पर ‘ भ्रष्टाद्रेतस उत्पद्यत इति भृगुः ' ( गिरे हुए वीर्य से उत्पन्न होने वाला ' भृगु ' ) का यह विग्रह भी संगत होता है । महर्षियों का मनुष्य की मृत्यु का कारण पूछना—

एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।

कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ २ ॥

भाष्य — यन्महर्षिभिः पृष्टं तदिदानीं दर्शयति । एवमिति शास्त्रव्यापारपरामर्शः । यथोक्तमिति शास्त्रार्थं परामृशति । एतेन शास्त्रसन्दर्भेण यादृशो धर्म उक्तस्तत्पुनस्तमनुतिष्ठतां द्विजातीनाम् । ‘ विप्र’ग्रहणस्य दर्शनार्थत्वाद्वक्ष्यति ( श्लो ० २६ ) " एतदुक्तं द्विजातीनामिति ’ ” । कथं मृत्युः प्रभवति— स्नातकावस्थायां ब्रह्मचर्यावस्थायां वा । यतः परिपूर्णायुर्भि-स्तैर्भवितुं युक्तं पुरुषायुषजीविभिः । शतवर्षं पुरुषाणामायुस्ततः पुराऽपमृत्युना मरण-मेषां न युक्तम् । यत उक्तम् “ आचाराल्लभते ह्यायुः ” ( ४।१५६ ) “ जपतां जुह्वतामिति ’ ’ ( ४।१४६ ) ॥२ ॥

हिन्दी - हे प्रभो! इस प्रकार यथायोग्य कहे गये तथा वेदशास्त्रज्ञाता अपने धर्म का आचरण करते हुए ब्राह्मणों की मृत्यु कैसे होती है? ॥२ ॥

भृगु का महर्षियों के प्रश्न का उत्तर देना-स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन्मानवो भृगुः । श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्रान् जिघांसति ॥ ३ ॥

हिन्दी — धर्मात्मा एवं मनु के पुत्र भृगु जी ने उन महर्षियों से कहा— जिस दोष से मृत्यु ब्राह्मणों को मारने की इच्छा करती है, ( उसे ) आप लोग सुनिये ॥ ३ । ब्राह्मणों की मृत्यु में वेदानभ्यास आदि कारण-अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् । आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्रान् जिघांसति ॥४ ॥

भाष्य— “ ननु च स्वधर्ममनुतिष्ठतामिति प्रश्नेन युक्तं ' येन दोषेणेति ' उत्तरश्च ग्रन्थो नैवोपपद्यते ” । १. तथा च श्रुतिः — ' तस्य यद्रेतसः प्रथमं देदीप्यते तदसावादित्योऽभवद्, यद्द्द्वितीयमासीत् भृगुः ' इति ( म ० मु ० ) । मनु I- 41

पृष्ठ 660

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५८२ मनुस्मृतिः [ पञ्चमः उच्यते । अनभ्यासेनेत्यादिदृष्टान्तत्वेनोच्यते । यथा भवद्भिः प्रतिपन्ना वेदानभ्या-सादयः पुरायुषो मरणहेतवः, एवं वक्ष्यमाणोऽन्नदोषः । सत्स्वपि वेदाभ्यासादिषु न तावत्स्वधर्मो यः पूर्वत्र कथितः, किं त्वयमन्नदोषो गरीयस्तरः । पृथक् प्रकरणाच्चैतद-भिधीयते ॥४ ॥

हिन्दी — वेदों का अभ्यास नहीं करने से, आचार के त्याग से; आलस्य से और अन्न ( भोज्य पदार्थ ) के दोष से मृत्यु ब्राह्मणों को मारने की इच्छा करती है || ४ ||

लहसुन आदि के भक्षण का निषेध-लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च ।

अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च ॥५ ॥

भाष्य— लशुनादयः पदार्था लोके प्रसिद्धा एव । कवकशब्दो जातिशब्दः । क्वचित्कृयाकुरिति प्रसिद्धेऽर्थे मन्यते । छत्राकानि कव-कान्येव । तथाहि कवकशब्देन प्रतिषिद्धं, छत्राकशब्देन प्रायश्चित्तं वक्ष्यति ( श्लो ० १ ९ ) “ छत्राकं विड्वराहं चेति ” । न च छत्राकं नाम पदार्थान्तरं प्रसिद्धम् । न चाक्षरवर्णसामान्येन यो यच्छत्राकारस्तं तं छत्राकमिति युक्तं प्रतिपत्तुम् । तथा सति सुवर्चलादीनां समाचार-विरोधी प्रतिषेधः प्राप्नोति । तस्माद्यान्येव कवकानि तान्येव छत्राकाणि । तथा च निरुक्तकारः— “ क्षुण्णमहिच्छत्रकं भवति यत् क्षुद्यत इति ” । तेन यान्येतानि भूमाव-कृष्टायामनुपूर्वजायां च सितवर्णानि जायन्ते तानि च कवकानि । वक्ष्यति च “ भौमानि कवकानीति ” । दर्शितं च ‘ पदाक्षुण्णमिवेति ' । पादप्रहारेण यानि क्षुद्यन्ते 1 । तयो यानि वृक्षाद्गुल्माज्जायन्ते तेषां तदाकाराणामप्रतिषेधः । कुकुण्डानि कवकानि वैद्यके व्याख्यातानि । एतच्च व्याख्यानं न गवादिशब्दवत् । शाके कवकशब्दो लोके प्रयुज्यते । अतोऽस्य समाचाराद्वैद्यकादिशास्त्रार्थे निश्चयः । प्रदर्शितश्चासौ 1 लशुनादीनां तु समानवर्णगन्धा अपि विष्णुना प्रतिषिद्धाः पाराशरिकायां तु शब्देनैव निषेधः प्रायश्चित्तविशेषार्थ उक्तः " चान्द्रायणमिति ” ( अ ० ११ श्लो ० १०६ ) । तेन लवतककर्णिकारादीनां प्रतिषेधः । अमेध्यप्रभवान्यमेध्यजातानि च संसर्गजातानि । अन्ये त्वाहुर्मूलवास्तूकवत्केवलामेध्यप्रभवानां युक्तः प्रतिषेधः । ततश्च यान्यधिक-पुष्ट्यर्थं धान्यशाकादीन्यमेध्यक्षेत्रजातानि संसृज्यन्ते तानि न दुष्यन्तीति । तदयुक्तम् । श्रुतेः सर्वस्याप्यभक्ष्यत्वात् । इहापि च यद्यमेध्यसंसर्गमन्तरेण न