मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 751–760

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता भ्युक्षणे । तत्र हि पठितम् " कारुहस्तः शुचिस्तथाऽऽकरद्रव्याणीति ” । ६७१ पण्यं व्यवहाराय यद्द्रव्यं रूपकैर्विक्रीयतेऽन्येन वा द्रव्येणा मीयते, तत्पण्यं तच्च प्रसारितमापणभूमौ शुचि । अनेकक्रेतृसंस्पर्शाद्भूमौ च लेपनादिरहितायां स्थापना-द्युपघातस्तेन नाशुचि पुनः पुनर्दृश्यमानोपघातम् । प्रसारितग्रहणाद्गृहावस्थितस्य बुद्धौ स्थितेऽपि पण्ये न शुद्धिः । सिद्धान्नानां तु सक्त्वपूपादीनां सत्यपि शुचित्वेऽभक्ष्यता शङ्खवचनादेव “ आपणीयान्यभक्ष्याणीति ” । ब्रह्मचारिगतमस्मादेव साहचर्यात्पूर्वोक्ता शुद्धिरीदृश उपघाते विज्ञायते । भिक्ष-माणस्य रथ्याक्रमणमशुचिदर्शनं क्षवथुनिष्ठीवनमनेकहस्तसंपातो भिक्षाया इत्याद्युपघातः संभाव्यते । ' मेध्यतया ' शुचित्वमाह ॥१२७ ॥

हिन्दी – कारीगर का हाथ, बाजार में ( बेचने के लिये ) फैलायी ( या रखी गयी ) वस्तु और ब्रह्मचारी को प्राप्त भिक्षाद्रव्य सर्वदा शुद्ध है; ऐसी शास्त्र - मर्यादा है ॥१२७ ॥

विमर्श - शुद्धि का पूर्णतया विचार न करके भी देवताओं पर चढ़ाने के लिए माला आदि बनाने वाले कारीगर ( माली ) आदि का हाथ सर्वदा शुद्ध माना जाता है । इसी प्रकार जन्म तथा मरण में भी नाई, माली आदि के हाथ को पवित्र माना जाता है । जो. अन्न पकाया नहीं गया हो, ऐसा बाजार में बेचने के लिए फैलाया या रखा गया अन्न तथा फल आदि अनेक लोगों के जैसे - तैसे हाथ से छुए जाने पर भी पवित्र माना जाता है । बिना आचमन किये भी स्त्री आदि के द्वारा ब्रह्मचारी के लिये दी गयी भिक्षा ( भोज्य द्रव्य ) ब्रह्मचारी को प्राप्त होकर शुद्ध मानी जाती है ।

नित्यमास्यं शुचि स्त्रीणां शकुनिः फलपातने ।

प्रस्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ १२८ ॥

भाष्य — सर्वस्त्रीणामास्यं शुचि परिचुम्बनादौ । “ स्त्रियश्च रतिसंसर्गः ” इति स्मृत्यन्तरम् । रतिसम्बन्धिनीष्वेव न मातृभगिन्यादिषु । अत्र उच्छिष्टप्रतिषेधोऽयं न मन्तव्यो योषितः । सत्यपि रतिसम्बन्धित्वे “ नाश्नीयाद्भार्यया सार्धम् ' इतिवचनान्न भुज्येतेति सिद्धं चतुर्थाध्याये । नित्यग्रहणान्न संयोगवेलायामेव, किंतर्हि तदर्थायामेव प्रवृत्तौ । शकुनिः फलपातने । पक्षिमात्रवचनेऽपि शकुनिशब्दः काककङ्कादीनां विट्भुजां नेष्यते समाचारात् । पातनग्रहणावृक्षस्थस्य फलस्यायं विधिः । प्रवे दुह्यमानाया गोर्वत्सः पयःप्रक्षरणार्थं स्तनेषु संश्लिष्यते । अथवोच्यते “ गावो मेध्या मुखादृते ” इति वचनादशुचित्वे प्राप्ते तन्निवृत्त्यर्थं वचनमतस्तदीयास्य-संस्पर्शस्य । न तु श्वा शुचिः । मृगं तु यदाऽऽखेटकादौ गृह्णाति हन्तुं तदा शुचिः ॥१२८ ॥

पृष्ठ 752

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६७२ मनुस्मृतिः [ पञ्चम: हिन्दी — स्त्रियों का मुख सर्वदा शुद्ध है, फल गिराने में पक्षी ( काक आदि का मुख ) शुद्ध है अर्थात् काक आदि पक्षी के चोंच मारने से गिरा हुआ फल शुद्ध है, ( भैंस - गाय को ) पेन्हाने ( दूहने के पहले पीने ) में वत्स ( बछड़ा तथा बछिया या पाड़ा - पाड़ी आदि दूध देने वाली पशु के बच्चों का मुख ) शुद्ध है और ( शिकार के समय ) हरिण ( आदि पशु पकड़ने ) में कुत्ता ( का मुख ) शुद्ध है ॥१२८ ॥

श्वभिर्हतस्य यन्मांसं शुचि तन्मनुरब्रवीत् ।

क्रव्याद्भिश्च हतस्यान्यैश्चण्डालाद्यैश्च दस्युभिः ॥ १२ ९ ॥

भाष्य – पूर्वं ‘ “ श्वा मृगग्रहण " इति मृगवधे श्वा शुचिरित्येतावदेव विवक्षितम् । इह तु तेन गृहीतोऽन्यैर्वा दण्डादिघातेनेति विशेषः । उत्तरार्धश्लोकार्थो विधीयते । क्रव्याद्भिः श्येनजम्बुकप्रभृतिभिः । चण्डालाद्यैः

आदिग्रहणं श्वापदादीनामबाधाय । दस्यवो निषादव्याधादयः, प्राणिवधजीविनः ॥१२ ९ ॥

हिन्दी- ( शिकार में ) कुत्तों से मारे गये ( मृग आदि पशुओं तथा पक्षियों ) के मांस को नु ने शुद्ध कहा है । तथा कच्चे मांस को खाने वाले ( व्याघ्र, भेड़िया आदि पशु तथा गीध - बाज आदि पक्षियों ) तथा व्याध आदि के द्वारा मारे हुए ( पशु - पक्षियों ) का मांस शुद्ध होता है ॥ १२ ९ ॥ अग्नि आदि की नित्य शुद्धता-[ शुचिरग्निः शुचिर्वायुः प्रवृत्तो हि बहिश्चरः । जलं शुचि विविक्तस्थं पन्था सञ्चरणे शुचिः ॥ १७ ॥ ]

[ हिन्दी — अग्नि, बाहर बहती हुई हवा, एकान्त में रखा हुआ पानी और नित्य सञ्चार वाला मार्ग शुद्ध रहता है ॥१७ ॥ ]

स्पर्श में नित्य शुद्ध पदार्थ—

ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः ।

यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलायुताः ॥ १३० ॥

भाष्य – खशब्दोऽयमिन्द्रियवचनः । तेन पादयोर्ग्रहणे कर्मेन्द्रियाणि यान्यध-स्तान्यमेध्यानि इति बहुवचनम् । एतदयुक्तम्, ऊर्ध्वं नाभेरित्यनेन विरोधात् । तत्र नाभेरूर्ध्वं मेध्यतरत्वमुक्तम्, प्रकर्षश्च । यद्यधस्तान्मेध्यत्वं भवति तत उपपद्यते । न हि भवति शुक्लः कृष्णतर इति । न चायमिन्द्रियवचनः । किंतर्हि छिद्रार्थोऽयम् । तदुक्तं " सप्तशीर्षण्याः प्राणाः ” इति । अधो द्वे छिद्रे । स्त्रीपुंसोपस्थभेदाद्बहुचनम् ।

पृष्ठ 753

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य’मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ६७३

एवं सत्यन्तरास्यस्पर्शेऽपि हस्तादेः शुद्धता, यदि तद्गतश्लेष्मसम्बन्धो न भवति ।

तथा दूषिकादुष्टेन पुनश्चासंस्पर्शनाय ॥१३० ॥

हिन्दी —– नाभि से ऊपर जितने छिद्र ( कान, आँख, नाक आदि ) इन्द्रियाँ हैं, वे स्पर्श में शुद्ध ( हैं और ( नाभि के नीचे वाले छिद्र ( गुदा, आदि ) तथा शरीर से निकली मैल ( मल, मूत्र, कफ, थूक, खोंट आदि ) सभी अशुद्ध हैं ॥१३० ॥

मक्षिका विप्रुषश्छाया गौरश्वः सूर्यरश्मयः ।

रजो भूर्वायुरग्निश्च स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत् ॥ १३१ ॥

भाष्य- -मक्षिकाग्रहणं स्वेदजानाम् । गोग्रहणमजैडकस्य । अश्वग्रहणं हस्त्य-श्वतराणाम् । सूर्यग्रहणं ज्योतिषाम् । विप्रुष उदबिन्दवः स्पर्शमात्रानुभवेन या अदृश्य-मानरूपविशेषाः । छाया चण्डालादीनाम् । भूश्चण्डालादिस्पृष्टा पद्भ्भ्यामाक्रम्यमाणा शुद्धा । अन्य-स्यास्तु संमार्जनादि विहितम् । एते मक्षिकादयः पुरीषादि स्पृशन्तो न दूषयन्ति ।

“ अजाश्वं मुखतो मेध्यं गावो मेध्या मुखादृते ।

मार्जारनकुलौ स्पृश्यौ शुभाश्च मृगपक्षिणः ॥ ” इति स्मृत्यन्तरे ॥१३१ ॥

हिन्दी - मक्खी, ( मुख से निकली छोटी - छोटी ) बूँदे, छाया ( परछाहीं ) गौ, घोड़ा, सूर्यकिरण, धूलि, भूमि, वायु तथा अग्नि को स्पर्श में शुद्ध जानना चाहिये ॥ १३१ ॥

गुदा आदि की शुद्धि-विण्मूत्रोत्सर्गशुद्ध्यर्थं मृद्वार्यादेयमर्थवत् ।

दैहिकानां मलानां च शुद्धिषु द्वादशस्वपि ॥ १३२ ॥

भाष्य- - “ देहाच्चैव मलाश्च्युताः ” इत्यशुद्धतायामिदमुच्यते । विण्मूत्रे उत्सृज्येते येन स विण्मूत्रोत्सर्गः पाय्वादिस्तस्य शुद्ध्यर्थं मृद्वायदियमर्थवत् | अनादृत्य संख्यां यावतीभिर्गन्धलेपावपसर्पतस्तावतीरपो मृदश्च गृह्णीयात् । देहे भवा दैहिका मला अशुचित्वापादकाः । तदर्थास्वपि शुद्धिषु मृद्वारिणो उभे अप्यर्थवती आदेये । स्मृत्यन्तरे पठ्यते—

" आददीत मृदोऽपश्च षट्सु पूर्वेषु शुद्धये ।

उत्तरेषु तु षट्स्वद्भिः केवलाभिस्तु शुध्यति " ॥

विशुद्धेषु श्लेष्मादिषु स्मृत्यन्तरे पठितं स्नेहविस्रंसनं नासिक्यं श्लेष्माऽऽचक्षते । तेषाम् सत्यप्युत्तरषट्कतया न मृद आदातव्या एव ॥१३२ ॥

हिन्दी - मल - मूत्र त्याग करने वाली इन्द्रियों ( गुदा तथा लिङ्ग ) की तथा शरीर के

पृष्ठ 754

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६७४ मनुस्मृतिः [ पञ्चमः वसा आदि मल - मूत्र सम्बन्धी बारह अशुद्धियों की गन्ध- - लेप - क्षय के द्वारा शुद्धि होने के लिये आवश्यकतानुसार मिट्टी तथा पानी लेना चाहिये ॥१३२ ॥

विमर्श — उनमें से प्रथम छ: मलों की शुद्धि के लिये मिट्टी तथा पानी- दोनों और अन्तिम छ: मलों की शुद्धि के लिये केवल पानी लेना चाहिये । अतः प्रकृत मनुवचन बारहों मल की शुद्धि के लिये मिट्टी तथा पानी का ग्रहण व्यवस्थित होने से विरुद्ध नहीं होता । गोबिन्दराज के मत से तो अन्तिम छः मलों की शुद्धि में भी व्यवस्थित विकल्प भाव में मिट्टी तथा पानी का ग्रहण करना चाहिये अर्थात् देव - पितृ - कर्म में मिट्टी पानी ( दोनों ) तथा तद्भिन्न कार्य में केवल पानी ही लेना चाहिये । बारह मल निम्नलिखित हैं—

द्वादश मल-वसाशुक्रमसृङ्मज्जामूत्रविङ्घ्राणकर्णविट् ।

श्लेष्माश्रुदूषिकास्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥ १३३ ॥

भाष्य - एतानि द्वादशमलानि दर्शितानि ।

नृग्रहणं पञ्चनखानां प्रदर्शनार्थम् । श्वशृगालादीनां त्वस्पृश्यत्वादेव सिद्धम् ।

विण्मूत्रे तु सर्वस्याजाविकगवाश्वेभ्योऽन्यत्र ॥१३३ ॥

हिन्दी — वसा ( चर्बी ), वीर्य ( शुक्र - धातु ), रक्त, मज्जा ( मस्तिष्कस्थित धातुविशेष ), मूत्र, मल ( विष्ठा ), नकटी याने नेटा ( नाक की मैल ), खोंट ( कान की मैल ), कफ ( थूक = खकार - पान की पीक आदि मुख की मैल ); आँसू, कीचर ( आंख से निकलने वाली श्वेत वर्ण की मैल ) और पसीना - ये बारह मल मनुष्यों के हैं ॥ १३३ ॥

शूद्ध्यर्थ मिट्टी आदि लेने की संख्या-एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।

उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥ १३४ ॥

भाष्य- - विण्मूत्रोत्सर्गानन्तरं मेढ्रस्य शुद्ध्यर्थमेका मृद्दातव्या वामेन । स्मृत्यन्तरे शुद्धिविधानाद्यावती तस्मिन्हस्ते याति तावती सोदका ग्रहीतव्या । अहं तु ब्रुवे, अर्थवदितिवचनेनोक्तमेव परिमाणम् । केचित् पठन्ति । “ प्रथमा प्रसृतिर्ज्ञेया द्वितीया तु तदर्धिका । तृतीया मृत्तिका ज्ञेया त्रिभागकरपूरणे । ” एतच्च परिमाणं पायावेव । अन्यत्र त्वर्थवदिति । एकोत्सर्गेऽपीयत्येव संख्या । आवृत्ति-विधानं चेदम् । १. तदाह बौधायनः —— आददात मृदोऽपश्च षट्सु पूर्वेषु शुद्धये । उत्तरेषु च षट्स्वद्भिः केवलाभिर्विशुध्यति ॥ ' इति ( म ० मु ० )

पृष्ठ 755

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्यमणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६७५ मृदां भेदो गवादिवत् । तथा चात्रोच्यते " वल्मीकाद्दूरतरादश्वस्थानाच्चान्येत्यादि । ”

एवमिह सिता कृष्णा लोहितेत्याद्यपि नादरणीयम् ।

अभीप्सता इच्छतेति ॥१३४ ॥

हिन्दी -शुद्धि चाहने वाले को लिङ्ग में एक, गुदा में तीन, हाथ ( बांये हाथ ) में दस और दोनों हाथों में सात बार मिट्टी लगानी चाहिये ॥१३४ ॥

विमर्श- यदि उक्तसंख्यानुसार मिट्टी लगाने पर भी गन्ध तथा चिकनाहट दूर न हो तब अधिक बार पूर्व ( ५।१२६ ) वचनानुसार ( गन्ध तथा चिकनाहट के दूर होने तक ) मिट्टी लगानी चाहिये, इसी आशय से दक्ष ने लिङ्ग में तीन बार मिट्टी लगाने का विधान किया है ' । हाँ, यदि प्रकृत श्लोकोक्त संख्या से कम बार मिट्टी लगाने से ही गन्ध तथा चिकनाहट दूर हो जाए तथापि प्रकृत वचन में संख्या का निर्देश करने से उतनी बार तो मिट्टी लगानी ही चाहिये ।

ब्रह्मचारी आदि के लिये शुद्धि-एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ।

त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनां तु चतुर्गुणम् ॥ १३५ ॥

भाष्य — शौचविधिराश्रमविशेषेण । अनाश्रमिणस्तु मृद्वार्यादेयमर्थवदित्येतदेव ।

शूद्रस्यापि गार्हस्थ्येऽधिकारोऽस्त्येवेत्येषा संख्या । १३५ ॥

हिन्दी — यह ( पूर्व श्लोकोक्त संख्यानुसार ) शुद्धि गृहस्थों के लिये है, ब्रह्मचारियों के लिये उससे द्विगुणित बार, वानप्रस्थों के लिये त्रिगुणित बार, सन्यासियों के लिये चतुर्गुणित बार मिट्टी लगाने आदि की क्रिया करनी चाहिये ॥ १३५ ॥

कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत् ।

वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्रंश्च सर्वदा ॥ १३६ ॥

भाष्य – मूत्रोत्सर्गदेशान्मूत्रादिसम्बन्धान् कृत्वा शोधयित्वा यथोक्तेन विधिना । आचान्तः खानि इन्द्रियाणि उपस्पृशेत् । वेदमध्येष्यमाणश्च द्वितीये स्वाध्यायविधौ । प्राथमिकार्थत्वात्करोतेः ‘ कृत्वा ' उत्सृज्येति प्रतीयते । उन्मृज्य मूत्रं पुरीषं च पायूपस्थं क्षालयित्वा आचामेत् । ' वेदमध्येष्यमाणश्च ', स्वाध्यायविधेर्धर्मतयोक्तं‘अध्येष्य-माणस्त्वाचान्त ' इति । इदं त्वध्यापयतोऽध्येष्यतो वा । अन्यथा ' वेदमुदाहरन्त ' उच्यन्ते । १. तदुक्तं दक्षेन– ' लिङ्गेऽपि मृत्समाख्याता त्रिपूवीं पूर्यते यया । द्वितीया च तृतीया च तदर्धार्धा प्रकीर्तिता ॥ ' इति । ( म ० मु ० )

पृष्ठ 756

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६७६ मनुस्मृतिः [ पञ्चमः

लौकिकानि क्रियान्तराणि कृत्वा नानाचान्तो वेदाक्षराण्युच्चारयेत् ।

अन्नमश्नंश्च ॥१३६ ॥

हिन्दी — मल या मूत्र का त्यागकर वेदाध्ययन का इच्छुक या भोजन करता हुआ उक्त ( ५।१३६-१३७ ) शुद्धि करके ( तीन बार ) आचमन कर छिद्रेन्द्रियों ( नाक, कान तथा नेत्र, मस्तक आदि ) का स्पर्श करे ॥ १३६ ॥

आचमन - विधि—

त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् ।

शारीरं शौचमिच्छन्हि स्त्री शूद्रस्तु सकृत्सकृत् ॥ १३७ ॥

भाष्य — अयमनुवादः स्त्रीशूद्रार्थः । उक्तमप्येतत्स्त्रीशूद्रार्थमुच्यते । केचिद्व्याचक्षते ‘ शूद्रः स्पृष्टाभिरद्भिरिति ' स्पर्शमात्रमपां शूद्रेण कर्तव्यम् । अतः परिमार्जनं श्रोत्रादिस्पर्शनं वा प्राप्तं सच्छूद्रविषयतया विधीयते । स्त्रीणां तु “ हृद्गाभि: पूयते विप्रः ” इति जातिनिर्देशात्पुंवत्प्राप्ताविदमुच्यते । शारीरं शौचमन्विच्छन् इतिवचनसामर्थ्याद्यद्यध्ययनभोजनयोः शुद्धः प्रवर्तेत तदा नावश्यं त्रिरावृत्तिः स्यात् । नापि प्रमार्जनम् । किंतर्हि आचमनम् यावतीनां तावती-नामपामिन्द्रियस्पर्शनं च । नान्यो ब्रह्मचारिधर्मोक्त आचमनविधिः ॥१३७ ॥

हिन्दी — शारीरिक शुद्धि को चाहता हुआ मनुष्य तीन बार जल से आचमन करे, दो बार मुख पोछे और स्त्री तथा शूद्र एक - एक बार आचमन करे ॥१३७ ॥

शूद्रों के लिए प्रतिमास मुण्डन तथा द्विज का उच्छिष्ट भोजन—

शूद्राणां मासिकं कार्यं वपनं न्यायवर्तिनाम् ।

वैश्यवच्छौचकल्पश्च द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ॥ १३८ ॥

भाष्य — सामान्योक्तः सच्छूद्राणां प्रसंगेनायं धर्म उच्यते । न्यायवर्तिनो द्विजशुश्रूषवो महायज्ञानुष्ठायिनश्च । तैर्वपनं मुण्डनं मासिकं कर्तव्यम् । तृतीयार्थे षष्ठी । अथवा ब्राह्मणा-श्रितास्तत्परतन्त्राः । ब्राह्मणै: ' कार्यम् ' । अनेकार्थत्वात्करोतेरुपदेष्टव्यमिति प्रतिपत्तिः ।

वैश्यवत् शौचकल्पविशेषाः, सूतकादावाचमने च ।

द्विजोच्छिष्टं च भोजनं एतत्प्राग्व्याख्यातम् ॥१३८ ॥

हिन्दी – यथाशास्त्र आचरण ( द्विज - सेवा ) करने वाले शूद्रों को एक मास पर मुण्डन कराना चाहिये, वैश्य के समान ( मृतक सूतक आदि में ) शुद्धि विधान करना चाहिये और ब्राह्मण के उच्छिष्ट का भोजन करना चाहिये ॥ १३८ ॥

पृष्ठ 757

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता थूक की छोटी बूँदों आदि से उच्छिष्ट नहीं होना—

नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गं न यन्ति याः ।

न श्मश्रूणि गतान्यास्यं न दन्तान्तरधिष्ठितम् ॥ १३ ९ ॥

६७७ भाष्य- -'निष्ठीव्योक्त्वानृतानि चेति ' ( ५ | १४४ ) निष्ठीवने आचमनविधानादना-चान्तस्याशुद्धता ज्ञापिता । विप्रुषामपि मुखान्निष्क्रमणं निष्ठीवनमेव । अतो विप्रुषां श्लेष्म-निरसनरूपनिष्ठीवनादाचमनप्राप्ताविदमाह । मुखे भवा मुखनिर्गता वा मुख्याः विप्रुषः इत्यनुच्छिष्टं कुर्वन्ति न चेदङ्गे निपतन्तीति । ननु च विप्रुषः शुद्धा इत्युक्तं " मक्षिका विप्रुष " इत्यत्र । ” दैहिकमलव्यतिरेकेणान्यत्र । इदमेव ज्ञापकम् । न सर्वो विषयः संदर्शितः । श्मश्रूणि दाडिकालोमानि । आस्यगतानि प्रविष्टानि । नोच्छिष्टं कुर्वन्तीत्य-नुषङ्गः । अतश्चान्यत्पूगफलादि जनयत्येव । तथा दन्तान्तरधिष्ठितं लग्नम् । स्मृत्यन्तरे विशेषः । “ दन्तश्लिष्टे तु दन्तवदन्यत्र जिह्वाविमर्शनात् — प्राक्च्युतेरित्येके— च्युतेष्वास्रावद्विद्यान्निगिरन्नैव तच्छुचिरिति " । च्युतेष्वजिह्वयेति विद्यात्, जिह्वासंस्पर्शे शुचित्वनिषेधात् ॥१३ ९ ॥ हिन्दी – मुख से निकलकर शरीर पर पड़ने वाली छोटी - बूँदें, मुख में पड़ते हुए मूँछ के बाल और दाँतों के बीच में अटका हुआ अन्नादि मनुष्य को जूठा नहीं करते हैं ॥१३९ ॥

अजा, गौ, ब्राह्मणादि को अङ्ग भेद से शुद्धता-अजाश्वं मुखतो मेध्यं गावो मेध्याश्च पृष्ठतः । ब्राह्मणः पादतो मेध्याः स्त्रियो मेध्याश्च सर्वतः ॥ १८ ॥

हिन्दी — बकरी और घोड़ा मुख से, गौ पीछे से, ब्राह्मण चरणों से, स्त्रियाँ सर्वाङ्ग से पवित्र होती हैं अर्थात् बकरी आदि के उक्त अङ्ग पवित्र होते हैं ॥१८ ॥

गौ आदि की अङ्ग - भेद से-गौरमेध्या मुखे प्रोक्ता अजा मेध्या ततः स्मृता ।

गौः पुरीषं च मूत्रं च मेध्यमित्यब्रवीन्मनुः ॥ १ ९ ॥

हिन्दी – गौ का मुख अशुद्ध होता है किन्तु बकरी का मुख शुद्ध होता है और गौ के गोबर तथा मूत्र पवित्र होते हैं ऐसा मनु ने कहा है ॥१९ ॥

मनु I- 47

पृष्ठ 758

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६७८ मनुस्मृतिः

पैर पर गिरी कुल्ले की बूँदों की शुद्धता-स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।

भौमिकैस्ते समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ १४० ॥

भाष्य – परानाचामयतः परेभ्य आचमनं ददत इत्यर्थः । पञ्चमः एतदुक्तं भवति । यः परस्मा आचमनं ददाति तस्याचमयितृहस्तादधोऽङ्गुलि-विवरेभ्यः पतद्भिरुदबिन्दुभिर्भूम्यभिघातोत्यैर्यद्याचमनस्य दातुः पादौ स्पृश्येते तदा न तैरशुचिर्भवति । ‘ भौमिकै’र्यथाऽनुपहतायां भूमौ स्थिताः काश्चिदुदकमात्राः शुद्धा एवं तेऽप्युच्छिष्टा हस्तात्पतन्त उदबिन्दवः । न तैः स्पृष्टः अप्रयतः अशुचिः । परग्रहणाद्य आचामति तेन तत्संसर्गो रक्षितव्यः अन्येन च समीपस्थेन । पाद-ग्रहणाच्च जङ्घाद्यन्तस्पर्शो दुष्ट एव ॥ १४० ॥

हिन्दी – ( दूसरे को ) कुल्ला कराते या पानी पिलाते हुए व्यक्ति के पैरों पर पड़ने वाली बूँदों ( छीटों ) को भूमि पर पड़े हुए ( जल ) के समान मानना चाहिए, उनसे ( वह व्यक्ति अशुद्ध होकर ) आचमन करने योग्य नहीं होता अर्थात् वह शुद्ध ही रहता है ॥ १४० ॥

दाँतों में अँटके अन्न की शुद्धता-[ दन्तवद्दन्तलग्नेषु जिह्वास्पर्शेषु चेन्न तु । परिच्युतेषु तत्स्थानान्निगिरन्नेव तच्छुचिः ॥ २० ॥ ]

[ हिन्दी – यदि जीभ से न लगता हो तो दाँतों में अँटका हुआ अन्न दाँतों के समान ( शुद्ध ) है और वहाँ से निकलने पर निगल ( घोंट ) जाने पर वह अन्न शुद्धहै || २० || ] भोजन लिए हुए के द्वारा उच्छिष्ट व्यक्ति का स्पर्श होने पर शुद्धि-उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथञ्चन । अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ १४१ ॥

भाष्य — आचमनार्हेण प्रायश्चित्तेन युक्तः पुरुष उच्छिष्ट उच्यते । तद्यथा - कृत-मूत्राद्युत्सर्गश्चाकृतशौचाचमनादिश्च यश्चामेध्यादिसंस्पर्शदूषितो यदि पुरुषो ‘ द्रव्यहस्त: ’ हस्तेन च गृहीतं भक्ष्यभोज्यादि द्रव्यवस्त्रादि वा येन स उच्यते द्रव्यहस्तः । वज्र-हस्तादिवत्प्रयोगव्यवस्था । स चेत्स्पृष्टो भवति । तदा अनिधायैव तद्द्रव्यम् अन-पनीय, हस्तगृहीतद्रव्य एवाचामेत् । “ कथं पुनर्हस्तस्थे द्रव्य आचमनसंभवः । आ मणिबन्धनात्पाणी प्रक्षालयेदिति तत्र विधिः ” ।

पृष्ठ 759

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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६७ ९ केचिदाहुः । शरीरसंस्पर्शमात्रं द्रव्यस्य विवक्षितम्, न हस्तस्यैव, एवमशुद्धावपि स्कन्धाद्यारोपितेऽपि द्रव्ये उच्छिष्टस्याशुद्धतैव, तथैवाचान्ते शुद्धिः । अतो हस्तात्प्रदे-शान्तरे प्रकोष्ठोत्सङ्गादिके तु द्रव्यं गृहीत्वाऽऽचामेत् । अभिप्रायो यथैव पुरुषाशौच-सम्बन्धादशुच्येवं तच्छौचाच्छुद्धिः । गौतमेन तु “ द्रव्यहस्त उच्छिष्टो निधायाचामेत् " इत्युक्तम् ( अ ० १ सू ० २८ ) । अत्र व्याख्यानयन्ति सत्यपि तुल्यसहितत्वेऽत्र निधानमेवाभिप्रेतम् । इतरथा द्रव्यहस्तस्यो-भयोः शुद्धौ कर्तव्यायां कः प्रसंगो द्रव्यनिधानस्य । अतोऽन्तरेण वचनं निधानाप्राप्ते-र्वचनं निधानार्थमेव । “ कथं तर्हि द्रव्यस्य शुद्धिः ” । प्रयतेन पुरुषेण ग्रहणात् । स्मृत्य-न्तरविहितेन वा प्रोक्षणेन ॥ “ प्रचरन्नन्नपानेषु उच्छिष्टं संस्पृशेद्यदि । आचामेद्द्रव्यमभ्युक्ष्य एवं चैव न दुष्यति ॥ ” इति । यद्यन्तरेण वचनमत्र निधानं लभ्यते, अप्यनिधायैवेति वचनमनर्थकम् ” । एक-वाक्यत्वात् स्मृतीनामिह निश्चितेन विधानेन तथाऽप्येवं विज्ञायते । अद्य पुनर्मतभेदो गम्यते । ततश्च विकल्पः । तस्य च व्यवस्था । गरीयो द्रव्यं निधीयते, अन्यदङ्गस्थं कृत्वाऽवगम्यते । यदाऽपि स्वयमन्नमश्नाति, भूयिष्ठं वा उच्छिष्टं स्पृशति, आचमनार्हेन वाऽकृताचमनेन स्पृश्यते, सर्वोऽपि द्रव्यस्योच्छिष्टं संस्पर्शः ॥१४१ ॥

हिन्दी — भोजन - सामग्री ( पका हुआ अन्न — कच्चा अन्न या फल आदि नहीं ) को लिया हुआ व्यक्ति यदि किसी जूठे मुँह वाले व्यक्ति का स्पर्श कर ले तो वह भोजन-सामग्री को बिना रखे ही आचमन करने से शुद्ध हो जाता है ॥१४१ ॥

वमनादि करने पर शुद्धि-वान्तो विरिक्तः स्नात्वा तु घृतप्राशनमाचरेत् ।

आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नं स्नानं मैथुनिनः स्मृतम् ॥ १४२ ॥

भाष्य — वमनविरेचने प्रसिद्धे । अशितमन्नं येन मुखेनोद्गीर्णं स वान्तः पुरुषः । यस्योच्चारवेगा अष्टसंख्याया ऊर्ध्वं जाताः, हरीतक्यादि भक्षणेन व्याधिना वा, स विरिक्तः । तौ स्नानं प्रथमं कुर्याताम् । ततोऽन्ते घृतप्राशनं कृत्वैतदन्यदन्नमद्याताम् । न चानेन घृतप्राशनेन भोजनान्तर-निवृत्तिः । प्रायश्चित्तेषु द्रव्यशुद्धिरियं भस्मोदकमार्जनवद्घृतप्राशनम् । आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नम् । अन्नं भुक्त्वा तदहरेव यदि वमनविरेचने स्यातां तदाऽऽचमनमेव केवलम्, न स्नानघृतप्राशने ।

पृष्ठ 760

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री, पृष्ठ 760 का मूल पृष्ठ
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६८० मनुस्मृतिः [ पञ्चमः अपरैस्तु स्वतन्त्रं व्याख्यायते । भुक्त्वाऽऽचामेदेव । भोजनानन्तरमाचमनं विहितं

तस्यैवायमपवादः ।

मैथुनिनः । स्त्रियां कृतशुक्रोत्सर्गः स्नानेन शुद्ध्यति ॥१४२ ॥

हिन्दी - वमन एवं शौच करने पर स्नान कर घी खाने से तथा भोजन करते ही वमन करे तो आचमन करने से और ऋतुकाल के बाद शुद्ध स्त्री के साथ सम्भोग करके स्नान करने से शुद्धि होती है ॥१४२ ॥

[ अनृतौ तु मृदा शौचं कार्यं मूत्रपुरीषवत् । ऋतौ तु गर्भं शङ्कित्वा स्नानं मैथुनिनः स्मृतम् ॥ २१ ॥ ]

[ हिन्दी – ऋतु भिन्न काल में स्त्री प्रसंग करने पर मल - मूत्र करने के बाद जैसी शुद्धि कही गई है उसी भाँति मूत्रेन्द्रिय की मिट्टी से शुद्धि करनी चाहिए । ऋतुकाल में गर्भ स्थिति की शंका हो जाने पर मैथुनकर्त्ता की स्नान से शुद्धि होती है ॥२१ ॥ ]

सोने आदि के बाद शुद्धि-सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनृतानि च । पीत्वाऽपोऽध्येष्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन् ॥१४३ ॥

क्षुत्वा अनिच्छतो वायुप्रेर्यमाणस्य यो नासिकाच्छिद्रादुपजायते शब्दः स क्षवथुस्तं कृत्वा । प्रयतोऽपि सन् । एतदध्येष्यमाणपदेनैव सम्बध्यते । प्रयतोऽप्यध्येष्यमाण आचम्याधीयीत, अध्ययनविध्यङ्गतयाऽऽचमनं कुर्यादित्यर्थः । स्नानादिभ्यस्त्वनन्तरं सकृदेव । यत्पुनरुक्तम्— “ सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्त्वा च पीत्वाऽऽपो वै मुनिस्तथा । आचान्तः पुनराचामेन्निष्ठीव्योक्त्वाऽनृतं वचः ॥ ” इति । एवमभिसम्बन्धोऽत्र कर्तव्यः, ' आचान्तो भुक्त्वा पुनराचामेत् ' । यत्र पुनर्द्विराचामे-दिति पठ्यते तत्रानन्तर्येणैकक्रियावृत्तिः ॥ १४३ ॥

हिन्दी – सोकर, छींककर, भोजनकर, थूककर, असत्य बोलकर और पानी पीकर तथा भविष्य में पढ़ने वाला व्यक्ति शुद्ध रहने पर भी आचमन करे ॥ १४३ ॥

स्त्री - धर्म - कथन-एष शौचविधिः कृत्स्नो द्रव्यशुद्धिस्तथैव च ।

उक्तो वः सर्ववर्णानां स्त्रीणां धर्मान्निबोधत ॥ १४४ ॥

भाष्य — आद्येन पादत्रयेण शुद्धिप्रकरणोपसंहारश्चतुर्थेन वक्ष्यमाणसंक्षेपवचनम् ।