मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 21–30

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 21–30

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विषयानुक्रमणिका १७ विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० शूद्रा पुत्र का दशमांशमात्र भाग ४२१ ‘ पाराशव ’ पुत्र का लक्षण ४३२ अविवाहिता - शूद्रा के पुत्र के का निषेध भाग दासीपुत्र का समान भाग ४३२ ४२२ ' क्षेत्रज ' आदि पुत्र, पुत्र सजातीय अनेक माताओं में के प्रतिनिधि ४३३ उत्पन्न पुत्रों का भाग ४२३ ' औरस ' पुत्र' के रहने का ' दत्तक ' शूद्रकी शूद्रामात्र स्त्री तथा आदि का निषेध. ४३३ शूद्रपुत्रों का समान भाग ४२३ एक भाई के पुत्र से सब भाइयों का दायाद तथा अदायाद का पुत्रवान् होना ४३४ बान्धवत्व ४२४ एक पत्नी के से अन्य पुत्र द्वादशविध पुत्रों में ६ दायाद-पत्तियों का पुत्रवती होना ४३४ बान्धव - पुत्र ४२४ श्रेष्ठ क्रम से पुत्रों का पितृ - धन द्वादशविध पुत्रों में ६ बान्धव पुत्र४२५ का भागी होना ४३५ औरस पुत्र क्षेत्रादिपुत्रों क्षेत्रज आदि पुत्रों को पिता के धन ४२५ का भागी होना ४३५ औरस तथा क्षेत्रज पुत्र के विभाग क्षेत्रजादि पुत्रों को पितामह के धन का निर्णय ४२५ का भागी होना ४३५ पुत्र क्षेत्रज के बाद औरस पुत्र के सपिण्डादि का धन पाने का उत्पन्न होने पर विभाग ४२६ भागी होना ४३६ बारह प्रकार के पुत्रों में ‘ औरस ’ सब के अभाव में ब्राह्मण का पुत्र का लक्षण ४२७ अधिकार ४३७ ' क्षेत्रज ' पुत्र का लक्षण ४२ ९ ब्राह्मणेत्तर धन का राजा अधिकारी ४३७ ' दत्तक ' पुत्र का लक्षण ४२ ९ मृत - पति का नियुक्तपुत्र अधिकारी ४३७ ‘ कृत्रिम ' पुत्र का लक्षण ४३० औरस तथा पौनर्भव पुत्रों का स्व-' गूढ ' पुत्र का लक्षण ४३० स्वपितृधन का अधिकार ४३८ ' अपविद्ध ' पुत्र का लक्षण ४३० माता के धन के अधिकारी ४३८ ' कानीन ' पुत्र का लक्षण ४३१ स्त्री धन के ६ प्रकार ४३८ ' सहोढ ' पुत्र का लक्षण ४३१ | सपुत्र - स्त्री धन के अधिकारी ४३ ९ ' क्रीत ' पुत्र का लक्षण ' पौनर्भव ' पुत्र का लक्षण ४३१ | सन्तानहीना स्त्री के धन का ४३१ अधिकारी ४३ ९ ' पुनर्भू ' स्त्री का लक्षण ' स्वयंदत्त ' पुत्र का लक्षण मनु II 2 ४३२ साधारण से स्त्रीधन करने ४३२ का निषेध ४४०

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१८ मनुस्मृतिः विषय पृ ० सं ० विषय पृ ० सं ० स्त्री - भूषणों की अविभाज्यता ४४० नपुंसक आदि को भाग का अनधिकार नपुंसकादि के क्षेत्रज पुत्र धन प्राप्ति का अधिकार कितवादि को राज्यनिर्वासन में कारण ४५० ४४० उपहासार्थ भी द्यूत का निषेध ४५० को ४४० अविभक्त धन के अधिकारी ४४१ द्यूतकारक का राजेच्छानुसार दण्ड ४५१ दण्ड देने में असमर्थ होने पर ४५१ स्त्री, बाल आदि को दण्ड ४५१ विद्यादि प्राप्त धन की अविभाज्यता ४४२ राजनियुक्त अधिकारी को कार्य न सशक्त भाई के भागग्रहण में करने पर दण्ड ४५२ उपेक्षा करने पर ४४३ | कपटपूर्वक लेखादि लिखने वालों अविभाज्य धन ४४३ को दण्ड ४५२ पितामह के अप्राप्त धन का धर्मपूर्वक किये कार्यादि का अविभाजन ४४४ अपरिवर्तन ४५३ पुनः सम्मिलित किये धन का अधर्मपूर्वक किये गये कार्यादि अविभाजन ४४४ का परिवर्तन ४५३ विदेशादिगत भाई के भाग का चतुर्विध महापातकी ४५४ लोपाभाव ४४५ प्रायश्चित्त नहीं करने वाले महा-वञ्चक ज्येष्ठ भाई का उद्धाराभाव ४४६ पातकियों को दण्ड ४५४ विकर्मियों को भाग की अप्राप्ति ४४६ महापातकी ब्राह्मण को दण्ड ४५६ पिता के जीवित रहने पर उपार्जित धन का समभाग महापातकी क्षत्रियादि को दण्ड ४५६ ४४७ महापातकी के धनग्रहण का निषेध ४५७ पितृधन विभाजन होने के बाद महापातकियों के धन नहीं लेने पुत्रोत्पन्न होने पर ४४७ की प्रशंसा ४५७ सन्तानहीन पुत्र के धन ब्राह्मण को पीड़ित करनेवाले का अधिकारी ४४८ ४५८ ऋण तथा धन का समान विभाग ४४८ वध्य को छोड़ने से दोष ४५८ अविभाज्य वस्तु ४४८ कण्टकोद्वार करना राजा का कर्तव्य ४५ ९ द्यूतकर्म ४४ ९ आर्यरक्षण तथा कण्टकशोधन द्यूतादि का निषेध ४४ ९ का फल ४६० द्यूत तथा समाह्वय के लक्षण ४५० चौरादि के शासन नहीं करने द्यूतादि करने वालों को दण्ड ४५० पर दोष ४६० कितवादि का देशनिर्वासन ४५० निर्भय राज्य की समृद्धि ४६१

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विषयानुक्रमणिका १ ९ दण्डाभाव में पापनिवारण की असमर्थता विषय पृ ० सं ० | विषय प्रत्यक्ष तथा परोक्ष चौर का ज्ञान ४६१ प्रत्यक्ष तथा परोक्ष चोर के लक्षण ४६१ उन द्विविध चोरों का शासन ४६३ पृ ० सं ० प्राकार आदि तोड़नेवाले को दण्ड ४७१ अभिचार कर्म करने वाले को दण्ड ४७२ दूषित बीज आदि बेचने पर दण्ड ४७२ चोर सोनार को दण्ड ४७३ ४६३ खेती के साधन हल आदि का चोरों का अन्वेषण करना ४६३ चुराने आदि पर दण्ड ४७३ उन चोरों को पकड़ने का उपाय ४६४ सात प्रकृतियाँ या सप्ताङ्ग राज्य ४७४ चुराये गये धन का पता सात प्रकृतियों में पूर्व - पूर्व न लगाने पर की श्रेष्ठता ४६५ ४७५ चोरों के आश्रयदाताओं को दण्ड ४६५ त्रिदण्डवत् सात प्रकृतियों सेंध मारनेवाले चोर को दण्ड अपराधी सीमारक्षकों को दण्ड ४६५ धर्मभ्रष्ट धर्मजीवि ब्राह्मण को दण्ड ४६५ चौरादि के उपद्रव निवारणादि में सहायक नहीं होने वाले को दण्ड ४६६ राजकोष के चोर आदि को दण्ड ४६६ ४६६ की समानता ४७५ स्वपरशक्ति का ज्ञान ४७६ कार्यारम्भ में राज्य का कर्तव्य ४७६ उद्योगशील को श्रीप्राप्ति ४७७ राजा को युगकथन ४७७ इन्द्रादि के तेज के समान आचरण करना राजा का कर्तव्य ४७८ गिरहकट चोर को दण्ड ४६७ राजा को इन्द्रादि के तेज के चोरों के सहायक तथा चोरित धन लेने वालों को दण्ड ४६७ तडागादि के तोड़ने वालों को दण्ड ४६७ अन्नागारादि तोड़नेवालों को दण्ड ४६८ व्यक्तिगत तड़ागादि के तोड़ने वाले को दण्ड ४६८ समान आचरण करने का प्रकार ४७८ इन उपायों से चोर का निग्रह करना ४८० ब्राह्मणों को क्रुद्ध करने का निषेध ४८० ब्राह्मण - प्रशंसा ४८१ मूर्ख ब्राह्मण का भी पूज्यता में दृष्टान्त ४८१ राजमार्ग को गन्दा करने पर दण्ड ४६८ ब्राह्मण में क्षत्रिय को शान्त होने अज्ञ चिकित्सक को दण्ड ४६ ९ के दृष्टान्त ४८२ संक्रम तथा प्रतिमादि तोड़ने पर दण्ड ४७० शुद्ध पदार्थ को दूषित करनेवाले को दण्ड ४७० विषम व्यवहार करने पर दण्ड ४७१ बन्धनगृह को राजमार्ग पर बनवाना ४७१ तेजस्वी क्षत्रिय द्वारा भी ब्राह्मण को पीड़ित करने का निषेध ४८२ ब्राह्मण - क्षत्रिय का परस्पर सहायकत्व ४८३ पुत्र को राज्य सौंपकर युद्ध में प्राणत्याग करना राज्यकर्तव्य ४८३

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२० मनुस्मृतिः विषय पृ ० सं ० विषय वैश्य-य - शूद्रके कर्मविधान का कथन ४८४ सङ्कीर्ण जाति वैश्य के धर्म ४८४ मणि आदि के मूल्य का ज्ञान करना वैश्य का कर्तव्य ४८५ में कारण बीजादि का ज्ञान करना वैश्य ' व्रात्य ' क्षत्रिय से उत्पन्न ‘ व्रात्य ' वैश्य से उत्पन्न सङ्कीर्ण जाति ५०२ वर्णसङ्कर सन्तान के उत्पन्न होने यज्ञोपवीत संस्कार के योग्य पुत्र ५१० पृ ० सं ० ५०२ ५०२ का कर्त्तव्य ४८६ तप तथा वीर्य के प्रभाव से वस्तुओं की सारासारतादि का ज्ञान जातिश्रेष्ठता ५११ करना वैश्य का कर्त्तव्य ४८६ क्रियालोप से जातिहीनता ५११ अन्न देना वैश्य का कर्त्तव्य ४८७ शूद्र का धर्म ४८७ द्विज सेवादि सेशूद्र उत्तमजातिलाभ ४८७ दशम अध्याय केवल ब्राह्मण को अध्यापनाधिकार ४८ ९ क्रियालोप से शूद्रत्वप्राप्त जातियाँ ५१२ इन वर्णसङ्करों का निवास - स्थान ५१४ चण्डाल तथा श्वपाक के कर्मादि ५१४ चण्डाल तथा श्वपचों के साथ भाषणादि का निषेध दस्यु जातियाँ वर्णसङ्करों के कर्म ५१२ ५१३ ५१५ ब्राह्मण को सब वर्णों का स्वामित्व ४ ९ ० द्विजवर्ण कथन ४ ९ १ स्वोत्पादक गुण का त्यागाभाव वर्णसङ्कर की निन्दा ५१७ ५१७ सजातीय कथन ४ ९ २ ब्राह्मणादि के लिए वर्णसङ्करों पिता की जाति के समान जाति होना ४ ९ ६ का प्राण त्याग श्रेष्ठ ५१७ ४ ९९ अनुलोमज वर्णसङ्करों का कथन ४ ९ ७ उक्त षड्विध पुत्रों का हीनत्वकथन ४ ९ ८ प्रतिलोमज वर्णसङ्करों का कथन ४ ९ ८ क्षत्ता तथा वैदेहक की स्पर्शयोग्यता ४ ९९ । अनन्तरादि वर्ण की स्त्री में उत्पन्न पुत्र का मातृजातीय संस्कार अन्यान्य वर्ण सङ्कर जातियों सप्तम जन्म में नीच सन्तान को वर्णचतुष्टय के सामान्य धर्म ५१८ ब्राह्मणत्वादि की प्राप्ति ५१ ९ दो वर्णसङ्करों से श्रेष्ठत्व का निर्णय ५२१ उक्त विधान में दृष्टान्त ५२२ बीज तथा क्षेत्र के बलाबल में मतभेद तथा निर्णय ५२२ का कथन हीन वर्णसङ्कर ' व्रात्य ' संज्ञक पुत्र ५०० बीजप्राधान्य में दृष्टान्त ५२३ ५०० कर्मानुसार समानता और ५०१ असमानता का अभाव ५२३ व्रात्य ब्राह्मण से उत्पन्न सङ्कीर्ण जाति ५०१ | षट् कर्म करना ब्राह्मणों का कर्तव्य ५२४

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विषयानुक्रमणिका २१ विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० ब्राह्मणों के षट् कर्म ५२४ सप्तविध धर्मयुक्त धनागम ५४१ ब्राह्मण - जीविकार्थ कर्मत्रय ५२५ जीवन के दस हेतु ५४२ क्षत्रियों के कर्म ५२५ ब्राह्मण - क्षत्रिय को सूद लेने वैश्यों के कर्म ५२६ का निषेध ५४३ क्षत्रियों तथा वैश्यों के जीविकार्थ राजाओं के आपद्धर्म ५४३ कर्म तथा धर्म ५२६ आपत्ति में वैश्यों से ग्राह्य राजकर ५४४ ब्राह्मणादि वर्णत्रय के विशिष्ट कर्म ५२६ शूद्र के आपद्धर्म ५४५ आपद्धर्म के कर्म ५२७ शूद्र के लिए ब्राह्मणसेवा श्रेष्ठ ५४५ कृषि आदि का बलाबल कथन ५२८ शूद्र की वृत्ति नियत करना ५४५ ब्राह्मण - क्षत्रियों द्वारा अविक्रेय वस्तु ५२ ९ स्वोत्पादित तिल का तत्काल विक्रय ५३१ सेवक शूद्रके लिए उच्छिष्ट अन्नादि देना ५४६ तिल - विक्रयादिनिन्दा ५३२ शूद्र का मन्त्रहीन धर्मकार्य ५४६ लाक्षादि, विक्रय - निन्दा ५३२ शूद्रको धनसंग्रह करने का निषेध ५४८ परस्पर बदलने योग्य पदार्थ ५३३ अध्याय का उपसंहार ५४८ श्रेष्ठ जातीयवृत्ति निषेध ५३४ श्रेष्ठ जाति की वृत्ति करनेवाले... एकादश अध्याय को दण्ड ५३४ नवविध स्नातक के लिए दान देना ५५० परधर्मसेवन निन्दा -५३४ नवविध स्नानकों को वेदी के वैश्य आपद्धर्म ५३५ भीतर सिद्धान्न देना ५५१ शूद्र के आपद्धर्म ५३५ भिक्षा प्राप्त धन से द्वितीय आपत्ति में ब्राह्मण को हीन से विवाह का निषेध ५५२ दानादि - ग्रहण ५३६ परिवार वाले वेदज्ञ ब्राह्मण आपद्गत ब्राह्मण का को दान देना ५५२ निषिद्धाध्यापनादि से दोषहीनता ५३७ सोमयाग के अधिकारी ५५२ उक्त दोषाभाव में पुरातन दृष्टान्त ५३७ परिवार का पालन बिना कि प्रतिग्रह निन्दा -५३ ९ दान देने से दोष ५५३ प्रतिग्रहनिन्दा में कारण ५३ ९ एकाङ्गहीन यज्ञपूर्त्यर्थ वैश्य प्रतिग्रहादि का पापनाश ५३ ९ आदि ५५४ शिल तथा उञ्छ से जीविका ५४० छः उपवास के बाद नीच से भी राजा से धन - याचना ५४० अन्नं लाना ५५७ भूमि गौ आदि में पूर्व - पूर्व ब्राह्मण के धन लेने का निषेध ५५८ अल्पदोषता ५४१ दुष्टों से धन लेकर सज्जनों को देना ५५८

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२२ मनुस्मृतिः विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० यज्ञादि के लिए चोरी करनेवाले सुवर्णचौर्यादि से कुनखि-ब्राह्मण को दण्ड निषेध ५५ ९ त्वादि होना ५७३ क्षुधापीडित ब्राह्मण के लिए वृत्ति कल्पना पाँच महापातक ५७५ ५५ ९ ब्रह्महत्या के समान कर्म ५७५ यज्ञार्थ शूद्र से भिक्षा का निषेध ५६० मद्यपान के समान कर्म ५७६ यज्ञार्थ धन लेकर बचाने का निषेध ५६० देव तथा ब्राह्मण के धनहरण का निषेध ५६० सोमयाग नहीं कर सकने पर सुवर्ण चुराने के समान कर्म ५७६ गुरुपत्नी सम्भोग के समान कर्म ५७६ उपपातक कथन ५७७ जातिभ्रंशकारक कर्म ५८२ वैश्वानर याग करना ५६१ वर्णसङ्कर करनेवाले कर्म ५८३ यज्ञ में समर्थ कोअनुकूलकरने अपात्र करनेवाले कर्म ५८३ का निषेध ५६२ मलिन करनेवाले कर्म ५८३ सोमयाग का प्रतिनिधि ५६२ ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त ५८४ ब्राह्मणादि को स्वशक्ति से गर्भ तथा यजमान क्षत्रिय - वैश्यादि शत्रुविजय करना ५६२ की हत्या का प्रायश्चित्त ५ ९ २ ब्राह्मण के लिए शत्रु - निग्रह आत्रेयी का लक्षण ५ ९ ३ का उपाय ५६३ साक्षी में असत्यभाषणादि करने ब्राह्मण से दूषित वचन कहने पर प्रायश्चित्त ५ ९ ३ का निषेध ५६४ सुरापान का प्रायश्चित्त ५ ९ ४ कन्या तथा मूर्खादि को अग्निहोत्र मदिरा पीने में दोष का कारण ५ ९ ६ करने का निषेध ५६५ सुरा - भेद तथा उसे पीने का निषेध ५ ९ ६ • दक्षिणा में अश्व को देना ५६६ मद्य - पान से ब्राह्मणत्वनाशादि ५ ९९ कम दक्षिणा देने का निषेध ५६६ सुवर्ण चुराने का प्रायश्चित्त ६०० अग्निहोत्र नहीं करने पर प्रायश्चित्त५६७ गुरुस्त्री गमन का प्रायश्चित्त ६०२ शूद्र से धन लेकर अग्निहोत्र अवकीर्णि का प्रायश्चित्त ६०८ का निषेध ५६७ अवकीर्णी का लक्षण ६०८ प्रायश्चित्त के योग्य मनुष्य ५६८ वायु आदि के उद्देश्य से कर्त्तव्य प्रायश्चित्त में मतभेद ५७० हवन करने में कारण ६० ९ प्रायश्चित्ती से संसर्ग का निषेध ५७२ जातिभ्रंशकर कर्म का प्रायश्चित्त ६१० प्रायश्चित्त शब्द का अर्थ ५७३ सङ्करीकरणादि का प्रायश्चित्त ६१० कुरूप होने में कारण ५७३ क्षत्रियादि के वध का प्रायश्चित्त ६११

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विषयानुक्रमणिका २३ विषय अनिच्छा से क्षत्रियघाती ब्राह्मण को प्रायश्चित्त पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० शुक्तपानादि का प्रायश्चित्त ६२४ ६११ सूकरादि के मल - मूत्रादिक भक्षण क्षत्रियवध का अन्य प्रायश्चित्त ६१२ का प्रायश्चित्त ६२४ वैश्यवध का अन्य प्रायश्चित्त ६१२ शुष्क मांसादि भक्षण का प्रायश्चित्त ६२५ शूद्रवध का प्रायश्चित्त ६१२ व्याघ्रादि भक्षण का प्रायश्चित्त ६२५ बिल्ली आदि के वध का प्रायश्चित्त ६१३ ब्रह्मचारी को मासिक श्राद्धान्त साँप तथा नपुंसक को मारने का प्रायश्चित्त ६१५ सूअर आदि के वध का प्रायश्चित्त ६१५ हंसादि के वध का प्रायश्चित्त ६१५ खाने पर प्रायश्चित्त ६२६ ब्रह्मचारी को मधुमांसादि खाने पर प्रायश्चित्त ६२६ मार्जार आदि का जूठा आदि घोड़ा आदि के वध का प्रायश्चित्त ६१६ खाने पर प्रायश्चित्त ६२७ बाघ आदि के वध का प्रायश्चित्त अभक्ष्यभक्षित पदार्थ का ६१६ वमन करना व्यभिचारिणी ब्राह्मणी स्त्री आदि ६२७ के वध का प्रायश्चित्त धान्यादि चुराने पर प्रायश्चित्त ६२८ ६१६ सर्पादिवध का अन्य प्रायश्चित्त मनुष्य आदि के चुराने पर प्रायश्चित्त६२ ९ ६१७ हड्डीवाले आदि जीवों के वध अल्पमूल्य कीवस्तु चुराने पर प्रायश्चित्त का प्रायश्चित्त ६२ ९ ६१७ मिठाई, सवारी आदि चुराने ६२ ९ वध का प्रायश्चित्त ६१ ९ खेती आदि से ओषधिनाशादि का प्रायश्चित्त ६१ ९ अमुख्य सुरापान का प्रायश्चित्त ६२० सुरा के वर्तन का जल पीने पर प्रायश्चित्तं मद्यप के मुख का गन्ध सूँघने पेड़, लता आदि काटने पर प्रायश्चित्त ६१८ अन्न आदि में होनेवाले जीवों के पर प्रायश्चित्त तृण - काष्ठ आदि चुराने पर प्रायश्चित्त ६३० मणि, मोती आदि चुराने पर प्रायश्चित्त ६३० रूई, रेशम आदि चुराने पर प्रायश्चित्त ६३१ सोदर भगिनी आदि के साथ सम्भोग करने का प्रायश्चित्त ६३१ फुआ की पुत्री आदि के साथ ६२१ सम्भोग करने का प्रायश्चित्त ६३२ सुरा - स्पर्शादि करने पर प्रायश्चित्त ६२१ उक्त तीनों बहनों से विवाह का निषेध ६३२ पर प्रायश्चित्त ६२२ अमानुषी के साथ सम्भोग करने मल - मूत्र - भक्षणादि का प्रायश्चित्त ६२२ पर प्रायश्चित्त ६३३ पुन: संस्कार में त्याज्य ६२३ पुरुषादि के साथ मैथुन करने अभक्ष्य भक्षणादि का प्रायश्चित्त ६२३ पर प्रायश्चित्त ६३४

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२४ मनुस्मृतिः विषय पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० चाण्डाली आदि के साथ प्रायश्चित्त का विधान नहीं कहे सम्भोग करने पर प्रायश्चित्त ६३४ गये दोषों पर ६५२ व्यभिचारिणी स्त्री का विरोध और प्रायश्चित्त प्राजापत्य ( कृच्छ्र ) व्रत की विधि ६५४ ६३५ कृच्छ्रसान्तपन व्रत की विधि ६५५ चण्डाली सम्भोग का प्रायश्चित्त ६३७ | अतिकृच्छ्र व्रत की विधि ६५५ पतित - संसर्गादि से पतित होना ६३८ तप्तकृच्छ्र व्रत की विधि ६५६ उक्त कर्म का प्रायश्चित्त ६३ ९ पराककृच्छ्र व्रत की विधि ६५६ ज्येष्ठ महापातकी का ' उद्धार ' छोटे ( पिपीलिकामध्य ) चान्द्रायण व्रत भाई को मिलना ६४२ की विधि ६५७ प्रायश्चित्त कियेहुए संसर्ग ६४२ यवमध्य चान्द्रायण की विधि ६५७ पतित - स्त्रियों के लिए अन्नादि देना ६४३ यतिचान्द्रायण व्रत की विधि ६५८ प्रायश्चित्त नहीं करनेवालों से संसर्गत्यागादि शिशुचान्द्रायण व्रत की विधि ६५८ ६४४ चान्द्रायण व्रत का महत्त्व ६५ ९ बालघाती आदि का त्याग ६४४ उपर्युक्त व्रतों में सामान्यतः व्रात्यादि प्रायश्चित्त ६४५ कर्त्तव्य कर्म ६५ ९ ६४७ ६४८ निन्दित के उपार्जित धन का त्याग ६४६ असत्प्रतिग्रह का प्रायश्चित्त व्रात्ययाजनादि का प्रायश्चित्त पाप कहने आदि से पापनिवृत्ति ६६२ पापानुताप से पापनिवृत्ति ६६३ शुभ कर्म करने का उपदेश ६६३ शरणागत त्याग आदि का प्रायश्चित्त ६४ ९ पापकर्म की निन्दा ६६४ कुत्ता आदि के काटने पर प्रायश्चित्त ६४ ९ कुत्ते के सूँघे आदि पदार्थों की शुद्धि ६४ ९ अपाङ्क्य की शुद्धि ऊँटगाड़ी आदि पर चढ़ने मन को प्रसन्न होने तक प्रायश्चित्त करना ६६५ ६४ ९ तप की प्रशंसा ६६५ वर्णक्रम से तप ६६६ का प्रायश्चित्त ६५० तप का लक्षण ६७० जलरहित होकर तथा जल में वेदाभ्यासादि से महापातकादि मूत्रादि त्याग करने का प्रायश्चित्त ६५० वेदोक्त कर्मादि के त्याग का प्रायश्चित्त ६५० ब्राह्मण को अपमानित करने का नाश ६७० गुप्त पापों का प्रायश्चित्त ६७१ मद्यपान का प्रायश्चित्त ६७२ का प्रायश्चित्त ६५१ सुवर्ण स्तेय का प्रायश्चित्त ६७२ ब्राह्मण को मारने के लिए उद्यत गुरुपत्नी सम्भोग का प्रायश्चित्त ६७३ होने पर दोष ६५२ स्थूल तथा सूक्ष्म पापों का प्रायश्चित्त ६७३ ब्राह्मण को गुरेरने का प्रायश्चित्त ६५२ अग्राह्य दान लेने आदि का प्रायश्चित्त ६७४

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विषयानुक्रमणिका २५ विषय पृ ० सं ० विषय पृ ० सं ० विविध पापों का प्रायश्चित्त ६७४ धर्म में मन को लगाना ६ ९ १ जल में मल - मूत्र त्याग करने त्रिविध गुणकथन ६ ९ २ आदि का प्रायश्चित्त ६७४ अधिक गुण के अनुसार महापातकादि का प्रायश्चित्त ६७५ देह का होना ६ ९ २ अघमर्षण मन्त्र की प्रशंसा ६७६ सत्त्वादि गुणत्रय केलक्षण ६ ९ २ ऋग्वेद प्रशंसा ६७६ सत्त्वगुण का लक्षण ६ ९ ३ ऋग्वेदादि के अभ्यास से रजोगुण का लक्षण ६ ९ ३ सर्वपाप मुक्ति ६७७ तमोगुण का लक्षण ६ ९ ४ ' त्रिवत् ' का लक्षण ६७७ सात्त्विक गुण का लक्षण ६ ९ ४ राजसिक गुण का लक्षण ६ ९ ५ द्वादश अध्याय तामसिक गुण का लक्षण ६ ९ ५ महर्षियों का भृगुजी से प्रश्न ६७ ९ संक्षेप में तामस गुण का लक्षण ६ ९ ६ भृगुजी का महर्षियों को उत्तर ६८१ शुभाशुभ कर्मों के फल ६८१ संक्षेप में राजस गुण का लक्षण ६ ९ ६ संक्षेप में सात्त्विक गुण का लक्षण ६ ९ ६ मन को कर्मप्रवर्तकत्व ६८१ पुनः सत्त्वादि गुणत्रय का अति-दश लक्षणवाले कर्मों में संक्षिप्त लक्षण ६ ९ ७ त्रिविध मानसिक कर्म ६८२ गुणत्रय से त्रिविध गतियों की प्राप्ति ६ ९ ७ चतुर्विधवाचिक कर्म ६८३ कर्मादिवश अप्रधान नवधा गतियाँ ६ ९ ८ त्रिविध शारीरिक कर्म ६८३ जघन्य तामसी गति ६ ९ ८ मानसिक आदि कर्मों का मध्यम तामसी गति ६ ९ ८ फलभोक्ता मन आदि ६८४ उत्तम तामसी गति ६ ९ ८ शारीरिक आदि कर्मों के फल ६८४ जघन्य तामसी गति ६ ९९ क्षेत्रज्ञ आदि का परिचय ६८६ मध्यम राजसी गति ६ ९९ जीवात्मा का परिचय ६८६ उत्तम राजसी गति ६ ९९ जीवों की असङ्ख्यता ६८८ जघन्य सात्त्विकी गति ७०० परलोक में पाञ्चभौतिक शरीर मध्यम सात्त्विकी गतियाँ ७०० ६८८ उत्तम सात्त्विकी गति ७०१ उनका भोग के बाद अन्तरात्मा पाप से निन्दित गति पाना ७०२ में लीन होना ६८ ९ पापविशेष से गतिविशेष की प्राप्ति ७०२ धर्म के अधिक होने से ब्रह्मघाती को कुत्ते आदि की स्वर्गमुख होना ६ ९ ० योनि- मिलना ७०३ पाप के अधिक होने से यम-मद्यप ब्राह्मण को कृमि आदि यातना होना ६ ९ १ की योनि मिलना ७०३

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२६ विषय मनुस्मृतिः पृ ० सं ० | विषय पृ ० सं ० वेदोक्त कर्म की श्रेष्ठता ७१२ चोर ब्राह्मण को मकड़ी आदि की योनि मिलना ७०३ गुरुतल्पग को तृणादि योनि मिलना ७०४ हिंसावृत्तिका आदि को मार्जारादि द्विविध वैदिक कर्म ७१५ प्रवृत्त तथा निवृत्त कर्म का लक्षण ७१५ प्रवृत्त - निवृत्त कर्मों के फल ७१६ समदर्शी होने पर ब्रह्मत्वप्राप्ति ७१७ योनि मिलना ७०४ पतितसंसर्गी आदि के ब्रह्म-वेदाभ्यासादि में प्रयत्नवान् होना ७१८ राक्षस - योनि मिलना ७०५ वेदाभ्यास - प्रशंसा ७१८ मणि आदि के चोर को वेदबाह्य स्मृत्यादि की निन्दा ७२० हेमकार की योनि मिलना ७०५ वेद प्रशंसा ७२१ धान्यादि चोर को चूहे आदि की वेदज्ञाता को सेनापति आदि होना ७२२ योनि मिलना ७०५| वेदज्ञाता की प्रशंसा ७२३ मांसादि चोर को गीध आदि वेदव्यवसायी की श्रेष्ठता ७२३ की योनि मिलना ७०५ तप तथा विद्या से मुक्ति ७२४ रेशमी वस्त्रादि के चोर को तित्तिर प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शास्त्ररूप आदि की योनि मिलना ७०५ प्रमाण का ज्ञान ७२४. कस्तूरी आदि के चोर को छुछुन्दरी धर्मज्ञ का लक्षण ७२५ आदि की योनि मिलना ७०६ अकथित धर्मस्थल में शिष्ट-अग्नि आदि के चोर को बगुला वचनानुसार कर्त्तव्य ७२७ आदि की योनि मिलना ७०६ शिष्ट के लक्षण ७२८ मृग आदि के चोर को भेड़िया परिषद्वर्णन ७२८ ७०६ ७०६ आदि की योनि मिलना बलपूर्वक साधारण वस्तु लेने पर भी तिर्यक् योनि मिलना उक्त वस्तु चुरानेवाली स्त्रियों को स्त्रीरूप में उक्त योनि मिलना ७०७ नित्यकर्म के त्याग से शत्रुओं का दास होना ७०७ स्वकर्मभ्रष्ट ब्राह्मणादि का प्रेत होना ७०७ विषयसेवन से नरक प्राप्ति आत्मज्ञान को पृथक् करके उपदेश ७३१ आत्मा की प्रशंसा ७३३ वायु, आकाश आदि का लयकथन ७३३ ७३४ परमात्मदर्शन की अवश्यकर्त्तव्यता ७३६ इस शास्त्र के पढ़ने का फल ७३६ आत्मा का स्वरूप ७०८ भावानुसार फलयोग ७१० मोक्षसाधक षट्कर्म ७११ ब्रह्मज्ञान की मुख्यता ७११ परिशिष्ट: मनुस्मृति का स्वरूप ७३ ९ दश ब्राह्मणों की सभा ७२ ९ तीन ब्राह्मणों की सभा ७२ ९ मूर्खपरिषद् को धर्मनिर्णय का निषेध ७३०