मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1–10

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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698 ॥ श्रीहरिः ॥ मार्क्सवाद और रामराज्य गीताप्रेसगोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

पृष्ठ 2

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पृष्ठ 3

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पृष्ठ 4

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सं० २०७० आठवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल मुद्रण २६,५०० मूल्य- I १५० ( एक सौ पचास रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ ( गोबिन्दभवन -कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९७ e -mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.org 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_1_1_Back

पृष्ठ 5

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॥ श्रीहरिः ॥ प्रस्तावना अखिल भारतीय रामराज्यपरिषद्, हिन्दूमहासभा, जनसंघ आदि राजनीतिक दलोंद्वारा १ ९ ५३ में ' जम्मू-काश्मीर- आन्दोलन ' चलाया गया । उसी सम्बन्धमें श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज दिल्लीमें गिरफ्तार हुए और वहाँकी जेलमें नजरबन्द कर दिये गये । वहाँ उन्होंने, जो भी कम्युनिष्ट साहित्य उपलब्ध हो सका, उसे अच्छी तरह पढ़ा और फिर संस्कृतमें उसपर एक लम्बा लेख लिखना आरम्भ किया । वह लेख पूरा न हो पाया और वे जेलसे छोड़ दिये गये । अनेक कार्योंमें व्यस्त होनेके कारण वह लेख अधूरा ही पड़ा रह गया । बादमें यह विचार हुआ कि यदि संस्कृत लेखका हिन्दी - अनुवाद कर दिया जाय और हिन्दीमें उसे आगे बढ़ाया जाय तो उससे अधिक लोग लाभ उठा सकेंगे । बम्बईके उत्साही युवक विद्वान् श्रीवासुदेव व्यासने, जो श्रीमहाराजजीके अनन्य भक्त हैं, संस्कृतके लेखका बड़े परिश्रमसे हिन्दीमें अनुवाद किया; किंतु निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण वह लेख आगे न बढ़ सका । फरवरी १ ९ ५५ में प्रयाग कुम्भसे लौटनेपर काशीमें श्रीविश्वनाथमन्दिर- सत्याग्रहके सम्बन्धमें वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और उन्हें जिला जेलमें रखा गया । वहाँ उस लेखको आगे बढ़ानेका प्रयत्न फिर आरम्भ हुआ । कम्युनिष्ट साहित्यकी कई पुस्तकें जेलमें पहुँचायी गयीं । जेल अधिकारियोंने बहुत - सी सुविधाएँ दे रखी थीं । दिनभर दर्शनार्थियोंका ताँता लगा रहता था । जेलमें भी अधिक अवकाश न मिलता था, पर तब भी लेखमें कुछ प्रगति हुई । महीनेभर बाद प्रयाग उच्चन्यायालयने उनकी गिरफ्तारी अवैध बतलाते हुए उन्हें 'छोड़ देनेकी आज्ञा दी, पर साथ ही यह भी लिखा कि ' उत्तरप्रदेशीय सामाजिक अयोग्यता- निवारण कानून ' के अन्तर्गत उनपर मुकदमा चलता रहे । जेलसे निकलते ही यात्राक्रम फिर चल पड़ा और लेखका 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_1_2_Front

पृष्ठ 6

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पृष्ठ 7

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॥ श्रीहरिः ॥ 698 मार्क्सवाद और रामराज्य त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ लेखक- श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

पृष्ठ 8

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सं० २०७० आठवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल मुद्रण २६,५०० मूल्य- I १५० ( एक सौ पचास रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक- गीताप्रेस, गोरखपुर- २७३००५ ( गोबिन्दभवन -कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.org 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_1_1_Back

पृष्ठ 9

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॥ श्रीहरिः ॥ प्रस्तावना अखिल भारतीय रामराज्यपरिषद्, हिन्दूमहासभा, जनसंघ आदि राजनीतिक दलोंद्वारा १ ९ ५३ में ' जम्मू-काश्मीर- आन्दोलन ' चलाया गया । उसी सम्बन्धमें श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज दिल्लीमें गिरफ्तार हुए और वहाँकी जेलमें नजरबन्द कर दिये गये । वहाँ उन्होंने, जो भी कम्युनिष्ट साहित्य उपलब्ध हो सका, उसे अच्छी तरह पढ़ा और फिर संस्कृतमें उसपर एक लम्बा लेख लिखना आरम्भ किया । वह लेख पूरा न हो पाया और वे जेलसे छोड़ दिये गये । अनेक कार्योंमें व्यस्त होनेके कारण वह लेख अधूरा ही पड़ा रह गया । बादमें यह विचार हुआ कि यदि संस्कृत लेखका हिन्दी - अनुवाद कर दिया जाय और हिन्दीमें उसे आगे बढ़ाया जाय तो उससे अधिक लोग लाभ उठा सकेंगे । बम्बईके उत्साही युवक विद्वान् श्रीवासुदेव व्यासने, जो श्रीमहाराजजीके अनन्य भक्त हैं, संस्कृतके लेखका बड़े परिश्रमसे हिन्दीमें अनुवाद किया; किंतु निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण वह लेख आगे न बढ़ सका । फरवरी १ ९ ५५ में प्रयाग कुम्भसे लौटनेपर काशी में श्रीविश्वनाथमन्दिर- सत्याग्रहके सम्बन्धमें वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और उन्हें जिला जेलमें रखा गया । वहाँ उस लेखको आगे बढ़ानेका प्रयत्न फिर आरम्भ हुआ । कम्युनिष्ट साहित्यकी कई पुस्तकें जेलमें पहुँचायी गयीं । जेल अधिकारियोंने बहुत- सी सुविधाएँ दे रखी थीं । दिनभर दर्शनार्थियोंका ताँता लगा रहता था । जेलमें भी अधिक अवकाश न मिलता था, पर तब भी लेखमें कुछ प्रगति हुई । महीनेभर बाद प्रयाग उच्चन्यायालयने उनकी गिरफ्तारी अवैध बतलाते हुए उन्हें छोड़ देनेकी आज्ञा दी, पर साथ ही यह भी लिखा कि ' उत्तरप्रदेशीय सामाजिक अयोग्यता निवारण कानून ' के अन्तर्गत उनपर मुकदमा चलता रहे । जेलसे निकलते ही यात्राक्रम फिर चल पड़ा और लेखका 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_1_2_Front

पृष्ठ 10

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( ४ ) कार्य रुक गया । उसी वर्ष श्रीचरणोंका चातुर्मास्य ' श्रीधर्मसंघ शिक्षामण्डल ' दुर्गाकुण्ड, काशीमें हुआ । चातुर्मास्यमें यात्रा स्थगित होनेसे कुछ अवकाश मिलता है, अतः लेखन- कार्य कुछ आगे बढ़ा । उन्हीं दिनों 'सिद्धान्त ' का जो पहले ' साप्ताहिक ' था और तीन वर्षोंसे बन्द था, ' पाक्षिक ' रूपमें पुनः प्रकाशन आरम्भ हुआ । वह लेख उसीमें क्रमशः प्रकाशित होने लगा । पर लेखका कलेवर धीरे- धीरे बढ़ने लगा । मूल विषयसे सम्बद्ध कितने ही विषय सामने आ गये और उनपर लेखनी चल पड़ी । चातुर्मास्य समाप्त होनेके कुछ ही दिनों बाद श्रीविश्वनाथमन्दिर - सत्याग्रह -सम्बन्धी मुकदमेमें उन्हें एक महीनेकी जेल हो गयी । जेलमें लेखका क्रम फिर चल पड़ा । जेलमें मिलने जानेवाले विद्वानोंसे बराबर इसी विषयपर चर्चा चलती रहती थी । थोड़े ही दिनोंमें यह अनुभव होने लगा कि विषय केवल मार्क्सवादके दर्शनतक ही सीमित नहीं रह सकता । उसमें तो समस्त पाश्चात्य दर्शनकी आलोचना और अपने मतका प्रतिपादन आ जाता है । इसपर एक स्वतन्त्र पुस्तक ही हो सकती है । इस दृष्टिसे अनेक विषयोंका समावेश होने लगा । महीनेभरका कारावास पूरा होनेपर श्रीमहाराजजी यात्रापर फिर निकल पड़े । परंतु अब यात्रामें भी जहाँ कहीं कुछ अवकाश मिल गया, उन्होंने थोड़ा बहुत लिखा डाला । सब सामग्री मिलाकर कई सौ पृष्ठ हो गये । कोई योजना बनाकर क्रमसे उन्होंने पुस्तक नहीं लिखी । जहाँ जिस विषयपर ध्यान चला गया, उसीपर कुछ-न-कुछ लिख डाला । कभी - कभी कोई ऐसी पुस्तक हाथमें पड़ जाती, जिसमें पूर्वपक्ष मिल गया तो उसीपर कुछ लिख डालते थे । इस तरह कई सौ पृष्ठ लिख डाले गये । यह सामग्री क्रमबद्ध करनेकी कठिन समस्या खड़ी हो गयी । श्रीमहाराजजीको इतना अवकाश नहीं रहा कि वे सब सामग्री पुनः पढ़कर उसे ठीक करते । पुस्तक समाप्त करनेकी दृष्टिसे ही १ ९ ५६ का चातुर्मास्य काशीमें ही किया गया । उन दिनों ' कल्याण ' 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_1_2_Back