मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 11–20

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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( ५ ) सम्पादनविभागके श्रीजानकीनाथ शर्माने, जो जेलमें भी श्रीचरणोंके साथ ही रहे, बड़े परिश्रमसे सब सामग्री क्रमबद्ध करनेका प्रयत्न किया । ' गीताप्रेस गोरखपुर ' ने पुस्तक छापनेकी इच्छा प्रकट की और पाण्डुलिपि उसे भेज दी गयी । पर इसका प्रूफ- संशोधन भी सहज कार्य न था । लेखोंके अंश काट- काटकर क्रमसे एक साथ जोड़े गये थे । प्रेस- कापी ठीक न होनेसे प्रूफ-संशोधनमें बड़ी अड़चनें पड़ीं । पर श्रीजानकीनाथजीने बड़ा परिश्रम किया । फिर भी प्रूफकी अनेक अशुद्धियाँ रह गयी हों तो कोई आश्चर्य नहीं । जिस प्रकार पुस्तक लिखी गयी, उसमें कहीं - कहीं क्रम कुछ टूट जाना या कहीं पुनरुक्ति हो जाना अनिवार्य था, पर तब भी लेखोंका ऐसा क्रम बना दिया गया कि पढ़नेसे विचारधारा कहीं टूटती नहीं । पुस्तकमें पाश्चात्य मतकी आलोचनाके साथ अपने पक्षका प्रबल प्रतिपादन किया गया है । अपने यहाँकी प्राचीन शैली है कि पहले पूर्वपक्ष चलता है फिर उत्तरपक्ष । इस पुस्तकमें भी उसीका अनुसरण किया गया है । फलतः यदि किसी विषयका एक स्थलपर विवेचन हो गया, तो फिर उसे उस परिच्छेदमें विस्तारपूर्वक नहीं उठाया गया है, जिसका वह मूल विषय है । पुस्तकके पढ़नेसे सबसे बड़ा लाभ यह है कि दोनों पक्षोंका समुचित ज्ञान हो जाता है । पर पढ़नेके लिये चाहिये धैर्य और जिज्ञासा । पुस्तकके कुछ पन्ने उलट देने या एकाध अध्याय पढ़ लेनेमात्रसे प्रतिपाद्य विषयका पूरा ज्ञान नहीं हो सकता । पुस्तकके नामके सम्बन्धमें भी कुछ विचार चला । यद्यपि ' मार्क्सवाद ' शब्द रखा गया है, पर उसके साथ समस्त पाश्चात्य दर्शनका आलोचन आ गया है । मार्क्सवादका बहुत कुछ सम्बन्ध राजनीति है । उसके जोड़में ' रामराज्य ' शब्द ही ऐसा है, जिसमें समस्त भारतीय राजनीतिका समावेश हो जाता है । दोनोंका ही आधार दर्शन है । इस दृष्टिसे सभी दार्शनिक विषय भी आ जाते हैं । दोनोंके मूल सिद्धान्त लेकर ही विचार उठाया गया है । पर इतनेसे ही उसका

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( ६ ) क्षेत्र इतना व्यापक हो गया कि जिसमें धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सभी प्रकारके विषयोंपर विचार चल पड़ा । इसीलिये किसी विषयपर कोई अध्याय पढ़ लेनेमात्रसे उसका सम्यक् ज्ञान नहीं हो सकता । सभी विषय एक - दूसरेसे सम्बद्ध हैं । अतः पुस्तकको आदिसे अन्ततक पढ़ लेना आवश्यक है । अभीतक कोई ऐसी पुस्तक उपलब्ध नहीं थी, जिसमें प्राच्य और पाश्चात्य आधारभूत सिद्धान्तोंका इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवेचन किया गया हो । इस अभावकी पूर्ति इस पुस्तकसे हो जाती है । यह बहुत आवश्यक है कि इस पुस्तकका अंग्रेजीमें अनुवाद निकाला जाय, जिससे विदेशी विद्वान् और ऐसे भारतीय विद्वान् भी, जो हिन्दी नहीं जानते, लाभ उठा सकें । पुस्तकपर गम्भीर विचारकी आवश्यकता है । इसमें यह आग्रह नहीं कि अपना ही पक्ष माना जाय । श्रीस्वामीजी महाराजकी यह विशेषता है कि वे आलोचनाका सदा स्वागत करते हैं और विचार -विनिमयके लिये प्रस्तुत रहते हैं । अपने देशमें कम्युनिष्टोंकी संख्या कुछ कम नहीं, पर उनमेंसे कितने ऐसे हैं, जिन्होंने मार्क्सवादका अच्छी तरह अध्ययन किया है । केवल कम्युनिष्टोंसे ही नहीं, पाश्चात्यदर्शनके सभी विद्वानोंसे भी अनुरोध है कि वे एक बार यह पुस्तक पढ़कर विचार - विनिमयका मार्ग प्रशस्त करें । यदि आदिसे अन्ततक किसीने यह पुस्तक सावधानी तथा धैर्यपूर्वक पढ़ी, तो उसे ( आधुनिक वादोंसे प्रच्छन्न ) सत्यका प्रकाश अवश्य मिलेगा । सत्यके अन्वेषक इस पुस्तकके लिये श्रीस्वामीजी महाराजके सदा ऋणी रहेंगे । अस्तु! गीताप्रेसके संचालकोंने प्रेसमें कार्याधिक्य रहनेपर भी समय निकालकर जल्दीसे यह पुस्तक छापकर वस्तुतः बड़ा ही प्रशंसनीय कार्य किया है । ,,गंगातरंग नगवा काशी गंगाशंकर मिश्र महाशिवरात्रि २०१४ वि०

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आमुख

नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै ।

नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्रार्कमरुद्गणेभ्यः ॥

आजकल संसारमें दर्शन तथा राजनीतिकी बड़ी चर्चा है, उसमें भी पाश्चात्योंके दर्शन तथा नीतिकी तो बहुत ज्यादा । भारतीय जनताका भी इन दिनों जड़ विज्ञानके प्रभावसे उधर कम आकर्षण नहीं है । अपनी बात तो हम भूल ही गये । बहुतोंका तो यह अनुमान है कि भारतमें पहले कोई राजनीतिशास्त्र था ही नहीं । ऐसी दशामें एक ऐसी पुस्तककी बड़ी आवश्यकता थी, जिसमें एक ही साथ पाश्चात्य- दर्शन, राजनीतिके साथ भारतीय दर्शनों तथा राजनीतिका तुलनात्मक अध्ययन हो और मूल्य भी कम हो । पाश्चात्योंके दर्शन एवं नीति आदि ग्रन्थ स्वतन्त्र हैं, साथ ही उनका मूल्य भी अत्यधिक है, जिससे कोई साधारण व्यक्ति उन सबोंको प्राप्त नहीं कर पाता । हमारे सौभाग्यसे परमाराध्य अनन्तश्रीस्वामीजी श्रीकरपात्रीजी महाराजने बड़े अध्यवसायसे कृपापूर्वक यह पुस्तक लिख दी, जो आज पाठकोंके सामने है । इसमें पाश्चात्य दार्शनिकों एवं राजनीतिज्ञोंकी जीवनी, उनका समय, मतनिरूपण, फिर उनकी आलोचना तथा साथ ही अपने ऋषियोंके मतका तुलनात्मक अध्ययन एवं उनकी श्रेष्ठता प्रतिपादित की है । विकासवादके अध्यायमें तो अद्भुत युक्ति तथा अगणित वैज्ञानिकोंके मतद्वारा ही विकासवादका खण्डन एवं ईश्वरादिका मण्डन है । साम्यवाद (जिसकी आज सर्वाधिक चर्चा है ) के आचार्य मार्क्सके नामपर तो यह पुस्तक ही है । उसके प्रत्येक अंगपर इसके

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( ८ ) पृथक् - पृथक् अध्याय हैं, जिनमें उनकी पोल खोलकर तर्कद्वारा ही उनकी धज्जी उड़ायी गयी है । साथ ही अपने गूढ़तम अकाट्य न्याय तथा वेद- वेदान्तके सिद्धान्तोंको भी विस्तारपूर्वक समझाया गया है । अन्तमें संक्षिप्त प्राचीन भारतीय निर्दोष शासन-प्रणाली भी दे दी गयी है । शीघ्रताके कारण पुस्तकमें आये हुए व्यक्तियों तथा पारिभाषिक शब्दोंकी वर्णानुक्रम-सूची नहीं बन पायी । विषय - सूचीमें केवल थोड़े- (" 11 ') - से नाम हैं । पाश्चात्योंका मत उद्धरणचिह्न या में रखा गया है । इसके बाद तुरंत ही भारतीय मत रखा गया है । पाश्चात्य ग्रन्थोंका उल्लेख पृष्ठोंमें न हो सका, उसकी सूची अन्तमें दे दी गयी है । अपने ग्रन्थोंका उल्लेख यथास्थान पुस्तकके पृष्ठोंमें ही है । इसी तरह इस एक ही पुस्तकमें इतनी अधिक सामग्री आ गयी है कि उसे दर्शन तथा राजनीतिका ' विश्वकोष ' कहना भी अनुपयुक्त न होगा । डिमाई साइजके ग्यारह सौसे भी अधिक पृष्ठोंमें सार- सार बातोंका संग्रह है । यह सब देखते हुए इसका मूल्य कम ही है । भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं धर्मके साक्षात् विग्रह श्रीस्वामीजी महाराजकी कृपा तथा गीताप्रेसकी तत्परता देखकर ऐसा लगता है कि इस कार्यके भीतर परम मंगलमय परमात्माकी ही शुभ प्रेरणा है । इसके अनुशीलनमें जो मेरा समय लगा, वह भी भगवत्कृपाका ही परिणाम है । मेरा विश्वास है कि जो सज्जन इसे एक बार ध्यानसे पढ़ लेंगे, वे तामस अविवेकके क्लेशसे मुक्त होकर सात्त्विक ज्ञान तथा हृत्प्रसादको निश्चय ही प्राप्त करेंगे, दर्शन एवं राजनीतिका निर्मल ज्ञान तो उन्हें प्राप्त होगा ही । -जानकीनाथ शर्मा

पृष्ठ 15

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नवीन संस्करणका प्राक्कथन ' मार्क्सवाद और रामराज्य ' पुस्तक प्रथम बार सं० २०१४ ( १ ९ ५७ ई० ) - में गीताप्रेसद्वारा प्रकाशित हुई थी । पूज्यपाद श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज अत्यन्त आस्तिक, मेधावी, दिव्य प्रतिभा सम्पन्न, दार्शनिक विद्वान् और महान् चिन्तनशील मनीषी थे । उन्हें प्राच्य- पाश्चात्य राजनीतिका भी सम्यक् ज्ञान था । प्रस्तुत ग्रन्थमें उन्होंने वर्तमान नास्तिकतापूर्ण राजनीति - दर्शनकी समालोचनाके साथ - साथ भारतीय राजनीति- दर्शनसे सम्बन्धित रामराज्यके आदर्श स्वरूपको प्रस्तुत किया है । अबतक इस महनीय ग्रन्थके कई संस्करण निकल चुके हैं । पुनः इस नवीन संस्करणको प्रस्तुत करते हुए हमें विशेष आनन्दका अनुभव हो रहा है । प्रातःस्मरणीय श्रीस्वामीजी महाराजने इस पुस्तकमें आजसे प्रायः ६० वर्ष पूर्व जो स्थापनाएँ प्रस्तुत की थीं तथा जो बातें लिखीं, वे आज भी सर्वतोभावेन सत्य सिद्ध हो रही हैं । मार्क्सवादी दर्शनको आधार बनाकर स्थापित किये गये तमाम राज्यों-साम्राज्योंका अस्तित्व छिन्न- भिन्न स्थितिमें है । जिन दिनों यह पुस्तक लिखी गयी थी; उस समय पूरे विश्वमें मार्क्सवादी दर्शनके सिद्धान्तोंकी धूम मची हुई थी । चतुर्दिक् उनका डंका बज रहा था । भारतमें बड़े जोर- शोरसे इस विदेशी मूलके पौधेको लगानेकी तैयारियाँ चल रही थीं । धर्म, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, राजनीति सभी क्षेत्रोंमें एक उच्छृंखल किंतु संगठित अराजकता और उच्छेदवादका भी प्रचार-प्रसार किया जा रहा था । भारतीय शास्त्र, धर्म, दर्शन आदिसे अपरिचित और अल्पपरिचित बुद्धिजीवियों; विशेषकर

पृष्ठ 16

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( १० ) नवयुवकोंपर इस विचारधाराका असर बढ़ता जा रहा था । ऐसे विषम वातावरणमें श्रीस्वामीजीने इस पुस्तकके द्वारा उन समस्त भ्रान्तियोंको अपने पुष्ट प्रमाणों और प्रखर तर्कोंद्वारा छिन्न- भिन्नकर भारतके ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व मानवताके हितमें एक महान् कार्य किया था, यही कारण था कि जिन विद्वानों, विचारकोंका श्रीस्वामीजीसे मतभेद था, उन्होंने भी अन्ततः उनके निष्कर्षोंकी सत्यता स्वीकार की । अब तो विश्व- धरातलपर मार्क्सवादी दर्शनकी असफलताने पुष्कल रूपोंमें यह प्रमाणित कर दिया है कि शान्ति और विकासका मार्ग वही है, जिसे श्रीस्वामीजीने प्रस्तुत पुस्तकमें ' रामराज्य ' के नामसे अभिहित किया है । उन्होंने लिखा है ' शास्त्र- धर्म -नियन्त्रित शासन ही रामराज्य है, इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है । ' स्वामीजी महाराजने यह विचार किया कि शासनके अधार्मिक और अनैतिक प्रवाहको बिना राजनीतिमें प्रवेश किये रोका नहीं जा सकता, तब महाराजने ' रामराज्य- परिषद्' की स्थापना की, जो पूर्ण राजनीतिक संस्था थी । भगवान् रामके राज्यमें जो नियम और कानून थे, वे ही इस संस्थाके नीतिगत सिद्धान्त थे । महाराजके मनमें यह कल्पना थी कि भारत- जैसे देशमें रामराज्य -जैसा शासन होना चाहिये, जहाँ सबको समानरूपसे न्याय सुलभ हो सके तथा यहाँकी जनता सर्वविध सुखी हो सके । अब हमें सर्वविध उसी पुनीत, पावन, शक्ति - शील -सौन्दर्य-समन्वित रामराज्यके संस्थापनार्थ कृतसंकल्प होना है । भगवत्कृपासे इस लोक- कल्याणकारी पवित्र ग्रन्थका यह नवीन संस्करण हम इसी संकल्पके साथ प्रस्तुत कर रहे हैं । -राधेश्याम खेमका

पृष्ठ 17

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॥ श्रीहरिः ॥ -सूची विषय- - विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या -प्रथम परिच्छेद- *. व्यक्तिवाद.११० - *१. पाश्चात्य दर्शन.१५ उपयोगितावाद ११६ * वैयक्तिक स्वतन्त्रता........ १२३ * दर्शनकी परिभाषा १५ * - * एकसत्तावाद... १३४ यूनानी दर्शन १८ * - अन्य पाश्चात्य दर्शन ३१ * आदर्शवाद. १४२ - हींगेल दर्शन.४९ * जनवादी राजसत्ता. १४७ * -. * काण्ट... १५० मार्क्स दर्शन.५४ -द्वितीय परिच्छेद- *.. फिक्टे १५३ - *.२. पाश्चात्य राजनीति.६३ हीगेल १५५ *. *. यूनानका राज्यदर्शन ६३ बोदाँ १५६ * ( ).-*.... प्लेटो अफलातून.६५ टी० एच० ग्रीन १६० * एफ० एच० ब्रैडले....... १६३ * अरस्तू...६६ * मध्य युग.६ ९ * मार्क्सवाद. १६६ *. *.. कार्ल मार्क्स १६७ आल्यूसियस ७३ *. ग्रोशस.७३ * समष्टिवाद. १७१ -तृतीय परिच्छेद– *.. संघवाद १७४ ३. आधुनिक विचारधारा......... ७५ * बहुलवाद १७५ * राज्यका जन्म और * फॉसीवाद १७६ * जनवाद १७७. सामाजिक अनुबन्ध.७५ * * अराजकतावाद १७८ थामस हॉब्स ७६ -चतुर्थ परिच्छेद- जान लॉक,८४.*.. रूसोके विचार ९० ४. विकासवाद......... १८५ * महाभारतमें सामाजिक *..... डार्विनका मत १८५ *... स्पेंसरकी मीमांसा १ ९ १ अनुबन्ध १००

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- ( १४ ) - विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या * अर्थमूलक समाजमें * मूल, वस्तु या चेतना?.. ९ १२ सामाजिक सम्बन्ध........ ७८२ * आत्मा एवं भूत.९ १८ - द्वादश परिच्छेद- *. वर्गवाद ७८५ * व्यभिचारका उन्मूलन..... ७९० १२. मार्क्स और आत्मा.९ २२ * भूत और शक्ति............. ७ ९ ३ * - आत्मतत्त्व विमर्श ९५८ * क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति * स्मृति और प्रमामें ?.................. स्वाधीन है ७ ९५ पार्थक्य १०२५ ** द्वन्द्वन्याय और अन्तिम सत्य... ८०० * अहमर्थ और आत्मा.. १०४९ .......... १०८५ ** काण्टका ज्ञान-सिद्धान्त…... ८० ९ १३. मार्क्स- त्रयोदशऔर ईश्वरपरिच्छेद- व्यवहार और तथ्य ८१५ * द्वन्द्वन्याय और विकास... ८२२ * ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय --एकादश परिच्छेद- दर्शनोंके आधारपर मार्क्स-११. मार्क्स और ज्ञान......... ८२७ वादियोंके विचार....... ११०६ * मन और शरीर............ ८२७ - चतुर्दश परिच्छेद- *......... आदर्शवाद ८२९ १४. उपसंहार.१११५ ** विज्ञानसत्य. एवं समाजवाद.....८३१८३० * भारतीयदर्शन.... राजनीतिक.............. १११५ * शास्त्रीय शासन- * ज्ञानका मूल..........८३२........ * १११८ विकास ८३४ विधान * आवश्यकता एवं * राजनीतिमें किसका ?. स्वतन्त्रता.८३५ अधिकार ११३६ * सत्पुरुषोंसे एक * स्वतन्त्रताका अवबोध.८३६ * भारतीय दर्शनमें ज्ञान- निवेदन ११४० -परिशिष्ट- सिद्धान्त.८३७ * अनुभव और आत्मा....... ८७७ * भगवान् श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति....... ११४३ * -..... अनुभव विमर्श ८८० *. * रामराज्यका स्वरूप ११४६ ज्ञान और आनन्द ९०५

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॥ श्रीहरिः ॥ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रथम परिच्छेद पाश्चात्य-दर्शन मार्क्सवादको समझनेके लिये उसकी पृष्ठभूमिपर एक दृष्टि डालना बहुत आवश्यक है । मार्क्सवादमें दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र तीनोंका ही समावेश है । किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत या वादका स्थायी आधार उसका दर्शन ही होता है । मार्क्सने भी अपनी विचारधाराका आधार दर्शन ही बनाया । भूत, वर्तमान और भविष्यको एक- दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । यूरोपमें प्राचीनकालसे जो विचारधाराएँ चलती रहीं, उन्हींके विवेचनसे मार्क्सने अपने नये सिद्धान्त स्थिर किये । अतः यह बहुत आवश्यक है कि उन विचारधाराओंको भी पहले समझ लिया जाय । आरम्भमें ही यह प्रश्न उठता है कि दर्शन क्या है? इसलिये पहले हम इसीपर विचार करेंगे । दर्शनकी परिभाषा यूनानी ' फिलासफस ' शब्द ज्ञान और प्रेमके अर्थमें प्रयुक्त होता था । उसीके आधारपर अंग्रेजीका ' फिलासफी ' शब्द प्रचलित हुआ । यद्यपि सविस्तर मीमांसा या विवेचना ही इसका अर्थ है, फिर भी विषय-विशेषके संक्षिप्त विचार- दर्शनके लिये भी ' फिलासफी ' शब्द व्यवहृत होता है । आजकल तो दर्शनकी एक- एक शाखाके लिये भी ' फिलासफी ' शब्दका प्रयोग होता है । कई आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् विशेषकर कम्युनिस्ट, जीवनके दृष्टिकोणको ही दर्शन मानते हैं । उनके मतमें ' दर्शन ' युगधाराका परिचायक होता है । युगसंघर्षसे ही उसका जन्म हुआ है । दर्शनका उसके निर्माताओंके जीवनकी घटनाओंसे भी सम्बन्ध होता

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१६ मार्क्सवाद और रामराज्य है । अफलातून ( प्लेटो ) राजकुलमें शिक्षक था, इसलिये उसके दर्शनमें राजसम्बन्धका असाधारण प्रभाव है । हेराक्लिटिस दलितवर्गमें पैदा हुआ, इसलिये उसका दर्शन परिवर्तनप्रवर्तक हो गया; क्योंकि दलित करनेवाली दूसरी श्रेणीका परिवर्तन आवश्यक था । हेलूमूसियस मध्यम श्रेणीका प्रतिनिधि था और कार्लमार्क्स उदीयमान श्रमिकोंका; इसलिये उन -उनके अनुसार उनके दर्शन भी बने । असाधारण विप्लवकालमें मार्क्सका जन्म हुआ । फलतः उसका जीवन क्रान्तिकारी रहा और वैसा ही उसका दर्शन भी । यद्यपि अंशतः यह ठीक है तथापि यह स्वाभाविक स्थिति है । ऐसे विचारोंका ' दर्शन ' नाम नहीं दिया जा सकता; क्योंकि इनमें भावनाओंका ही प्राधान्य है । पर भावनाएँ ' दर्शन ' नहीं होतीं । भावनाके प्राबल्यसे तो कभी विधुर - परिभावित कान्ताका भी साक्षात्कार हो जाता है । परिस्थितिका प्रभाव विचारोंपर होनेसे उनकी यथार्थतामें सन्देह होना स्वाभाविक ही है । स्पष्ट है कि पित्तरोगयुक्त रसनासे गुड़की मधुरताका ठीक अनुभव नहीं हो सकता । पित्तयुक्त नेत्रसे श्वेत शंख भी पीत प्रतीत होता है । सर्पदंष्ट व्यक्ति कटु निम्बको भी मिष्ट समझता है । नीले - पीले उपनेत्रों ( चश्मों ) - से वस्तु नीले - पीले रूपमें प्रतीत होती है । कामी संसारको कामिनीमय और ज्ञानी ब्रह्ममय देखता है । निम्बके कीटको मिश्रीकी मिष्टताके अनुभवमें पर्याप्त कठिनाई होती है । नमकके पर्वतपर रहनेवाली चींटी मिश्रीके पर्वतपर जाकर मिश्रीकी मिठासका तबतक अनुभव नहीं कर सकती, जबतक कि अपने मुँहसे नमकके कणोंको निकाल न दे । ठीक इसी तरह जबतक तपस्या, सदाचार, निःस्पृहता एवं योगाभ्यास आदिके सहारे राग-द्वेष, सम्पत्ति-विपत्ति, व्यक्तिगत परिस्थिति तथा वातावरणके प्रभावसे ऊँचा नहीं उठा जाता, तबतक सूक्ष्म विषयोंका यथार्थ ज्ञान कठिन ही नहीं, असम्भव भी है । भारतीय दृष्टिसे पवित्र विचार अर्थात् धर्म - ब्रह्मादि पवित्र वस्तुसम्बन्ध कल्याणकारी पवित्र विवेचन मीमांसा है— ' माने जिज्ञासायाम्। ' और वस्तुतत्त्व परम सत्यका निर्दोष प्रमात्मक अनुभव करानेवाला विचार