मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1001–1010
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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मार्क्स और आत्मा ९९९ बाह्यालम्बन नहीं होते हैं । विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नहीं कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वयं विलीन ( अज्ञात ) रहकर ही अर्थका प्रकाशन करेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे इन्द्रिय अर्थविषयक ज्ञान उत्पन्न करती है, वैसे ही ज्ञान भी किसी अन्य ज्ञानको उत्पन्न करेगा; क्योंकि इस तरह समान होनेसे वह ज्ञान भी ज्ञानान्तर जनन करेगा तो अनवस्था प्रसंग होगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ज्ञान अर्थमें प्राकट्य लक्षण फलका आधान करेगा; क्योंकि अतीत- अनागत विषयोंमें अविद्यमानताके कारण प्राक्स्वरूप फलका आधान हो ही नहीं सकता, इसलिये यह मानना चाहिये कि ज्ञानस्वरूपकी प्रत्यक्षता ही अर्थकी प्रत्यक्षता है, वह ज्ञान अनाकार होनेसे स्वभावतः भेदरहित है, फिर उसके द्वारा अर्थभेद अवस्था कैसे हो सकती है? अतः अर्थभेद व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें आकार- भेद भी स्वीकार करना आवश्यक है । पीछे कहा जा चुका है कि ' वित्तिसत्ता ही अर्थवेदन नहीं हो सकती इत्यादि, परंतु आकार एक ही अनुभूत होता है । यदि यह विज्ञानका आकार है तो अर्थ सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं सिद्ध होता । ' एक रूपसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानोंमेंसे घटज्ञान, पटज्ञान आदि रूपसे प्रतिविषयोंमें पक्षपात प्रतीत होता है, वह ज्ञानगत विशेषके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; अतः ज्ञानमें विषय-सारूप्य मानना चाहिये । यदि ज्ञानमें विषयसारूप्य मान लिया गया तो ज्ञानकी विषयाकारता ज्ञानसे ही अवरुद्ध है, फिर बाह्यार्थ सद्भावकी कल्पना व्यर्थ ही है । इसी तरह सहोपलम्भ नियमसे भी विषय और ज्ञानका अभेद मालूम पड़ता है, इनमेंसे एक उपलम्भ हुए बिना दूसरेका उपलम्भ नहीं होता । यदि ज्ञान और अर्थका स्वाभाविक भेद हो तो यह नियम नहीं बन सकता । घट- पट आदि भिन्न हैं तो उनमें सहोपालम्भका नियम नहीं होता है । मृत्तिका और घटमें सहोपालम्भका नियम होता है, अतः मृत्तिकासे भिन्न घटकी सत्ता नहीं होती । यही स्थिति ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । जिसका जिसके साथ नियमेन सहोपालम्भ होता
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१००० मार्क्सवाद और रामराज्य है, वह उससे भिन्न नहीं होता । जैसे एक चन्द्रसे भ्रान्तिसिद्ध द्वितीय चन्द्रका भेद नहीं होता, उसी तरह ज्ञानके साथ अर्थका सहोपालम्भ नियत है । भिन्न-भिन्न घट- पटको एवं दो अश्विनीकुमारोंका भी ऐसा सहोपालम्भ नियम नहीं होता, अपितु पृथक् भी उनका उपालम्भ होता है । बादलसे एकके ढके रहनेपर भी दूसरा दिखता है । इस तरह भेद व्यापक अनियमके विरुद्ध सहोपालम्भ नियम तद् व्याप्यभेदको निवृत्त कर देता है, यही विज्ञानवादियोंका सिद्धान्त निम्नकारिकासे व्यक्त होता है— सहोपालम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । भेदश्चअर्थात् सहोपालम्भके नियमसेभ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वयेनीलज्ञेय और नीलज्ञानका अभेद॥ ही है । भ्रान्तिके कारण भेद उसी तरह प्रतीत होता है, जैसे अद्वितीय चन्द्रमें चन्द्रका भेद प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न, माया, रज्जु, सर्प तथा गन्धर्वनगरादि प्रत्यय बाह्यार्थके बिना ही ग्राह्य-ग्राहकाकार होते हैं, वैसे ही जागरितकालके घटादि- प्रत्यय भी बाह्यार्थ बिना ही ग्राह्य -ग्राहकाकार होते हैं; क्योंकि सभीमें प्रत्ययत्व समान है । अर्थात् जो-जो प्रत्यय है, वह सभी बाह्यार्थशून्य है । किसीका भी बाह्यार्थ आलम्बन ( विषय ) नहीं होता है । प्रत्ययत्व स्वभाव ही इसमें हेतु है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि- मात्रानुबन्धिनी वृक्षता होती है, उसी प्रकार प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी बाह्यानालम्बनता रहती है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि जहाँ हैं, वहाँ वृक्षता होती ही है, उसी तरह प्रत्ययत्व जहाँ है, वहाँ निरालम्बनता है ही । इसी तरह प्रत्ययत्व हेतुसे ही स्वप्नादि प्रत्ययोंके समान ही घटादि प्रत्ययकी निरालम्बनता सिद्ध होती है । इस सम्बन्धमें सौत्रान्तिक कहता है कि बाह्यार्थ न रहनेसे घटादि प्रत्ययोंमें विचित्रता किसी तरह उपपन्न नहीं हो सकती है, अतः बाह्यार्थका स्वीकार करना आवश्यक है । इस विषयमें निम्न अनुमान किया जा सकता है, जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं, वे
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मार्क्स और आत्मा १००१ तद्भिन्न हेतुकी अपेक्षा रखते हैं, जैसे मुझमें आलयविज्ञान जिगमिषा ( गमनेच्छा ) विवक्षा ( भाषणेच्छा ) न रहनेपर भी जब वचन, गमन प्रतिभास प्रत्यय होता है तो उन्हें मेरेसे भिन्न पुरुषान्तर संतानसापेक्ष मानना पड़ता है । इसी तरह ' अहं अहम्' इस रूपसे उदीयमान आलयविज्ञानसे जायमान शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और सुखादि प्रत्यय कादाचित्क होते हैं, ये छहों अर्थ प्रकृतिके हेतु होनेसे प्रवृत्ति विज्ञान कहे जाते हैं । ये आलयविज्ञानके रहनेपर भी कभी ही होते हैं, अतः ये भी ज्ञानातिरिक्त हेतुसे उत्पन्न होने चाहिये । जो आलय -विज्ञान संतानातिरिक्तका कादाचित्क प्रवृत्ति विज्ञान विशेषका हेतु है, वही बाह्यार्थ है । यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि वासनापरिपाक प्रत्ययमें कादाचित्क होनेसे प्रवृत्ति- विज्ञानका बाह्यार्थ -निरपेक्ष ही कादाचित्क उत्पाद बन जायगा; क्योंकि विज्ञानवादके अनुसार एक संतानवर्ती आलय-विज्ञानोंकी प्रवृत्ति विज्ञान जनन-शक्ति ही वासना है, उस शक्तिका स्वकार्य जननाभिमुखता ही परिपाक है । स्वसंतानवर्ती पूर्व क्षण ही उस परिपाकका प्रत्यय हेतु है । अर्थात् प्रवृत्ति-विज्ञानजनक आलय- विज्ञानसे पूर्व उसी आलय- विज्ञान संतानमें जब कभी उत्पन्न नीलादि प्रत्यय ही वासना परिपाकका हेतु ( प्रत्यय ) है । विज्ञानवादीके अनुसार स्वसंतानपतित नील प्रत्ययक्षण ही उत्तरवर्ती वासना परिपाकका हेतु माना जाता है । सर्वज्ञादि संतानवर्ती क्षण वासना परिपाकका कारण नहीं होता, इसपर सौत्रान्तिकका कहना है कि प्रवृत्ति विज्ञानजनक आत्मा-विज्ञानवर्ति -वासना परिपाकके प्रति आलय - विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंको हेतु कहना चाहिये, अन्यथा किसी भी क्षणको हेतु नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सभी क्षण संतानान्तः पाती हैं, फिर क्या कारण है कि कोई क्षण वासना परिपाकका हेतु बने और कोई न बने । यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि क्षणभेदसे शक्तिमें भेद होता है 1। इस प्रकार आलय - विज्ञान संतानवर्ती क्षणोंमें भेद है तथा प्रतिक्षणोंमें शक्ति भेद भी है । वह शक्तिविशेष कादाचित्क ही होता है । उस शक्त एक क्षणके अनन्तर उसका कार्य आलय- विज्ञान क्षणवर्तिवासना परिपाक भी कादाचित्क होगा । पुनश्च तज्जनित प्रवृत्ति विज्ञान भी कादाचित्क होगा । विज्ञानवादीके
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१००२ मार्क्सवाद और रामराज्य इस पक्षका खण्डन करता हुआ सौत्रान्तिक कहता है कि फिर तो आलय -विज्ञान संतानसे एक ही आलय- विज्ञानमें नीलादि प्रवृत्ति विज्ञानजनकता होगी और उसमें प्राक्तन-आलय -विज्ञानवर्ती एक नीलादि विज्ञान क्षणमें वासना परिपाक हेतुता होगी । उस तरह एक संतानमें एक ही आलय-विज्ञान प्रवृत्ति -विज्ञानजनन समर्थ होगा और उससे प्राक्तन-आलय- विज्ञानवर्ती नील विज्ञान क्षण ही वासना परिपाकका हेतु होगा । इस तरह एक आलय संतानमें दो ही क्षण कारण होंगे और कोई भी क्षण कारण नहीं होगा, परंतु होता है इसके विपरीत । अनेकों बार नील विज्ञान होते ही हैं । यदि तदितर पूर्व ज्ञानोंमें परिपाक हेतुता हो और उत्तरोत्तर आलय विज्ञानोंमें प्रवृत्ति विज्ञानजनकता हो तो यह कैसे कहा जा सकता है कि क्षण भेदसे शक्तिभेद मान्य है । ऐसी स्थितिमें यदि विज्ञानवादी आलय- विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंका प्रवृत्ति विज्ञान जनन समर्थ तथा सभी तत्संतानवर्ती प्राक्तन नीलादि ज्ञान क्षणोंको वासनापरिपाकका हेतु मानता है तो समर्थमें कालक्षेप होता नहीं । अतः सदा ही नीलज्ञान होते रहना चाहिये, नीलज्ञानको कादाचित्क न होना चाहिये । इस प्रकार विचार करनेपर स्वसंतान मात्राधीन होनेपर कादाचित्कत्वके विरुद्ध सदा तत्त्वकी प्राप्ति होती है । उससे नीलज्ञानका कादाचित्कत्व निवृत्त होगा, परंतु यह उपलब्धि विरुद्ध है । नीलज्ञानमें कादाचित्कत्व उपलब्ध होता ही है । इसलिये आलय विज्ञानसे अन्य बाह्यार्थ सापेक्ष होनेपर भी नीलज्ञानका कादाचित्कत्व बन सकता है और तब जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं, वे तदतिरिक्त सापेक्ष होते हैं । इस प्रकार सौत्रान्तिकके द्वारा कथित व्याप्यव्यापकका व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध होता है । यदि कहा जाय कि नीलविज्ञान हेत्वन्तर अपेक्षा रख सकता है, पर वह हेत्वन्तर अन्य आश्रय -विज्ञान संतान ही हो सकता है बाह्यार्थ नहीं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि विज्ञानवादी प्रवृत्ति विज्ञानोंको संतानान्तर निबन्धन नहीं मानते । जिस समय चैत्रसंतानमें गमन, वचन प्रतिभासप्रत्यय विच्छिन्न होते हैं, उस समय मैत्रसंतानमें रहनेवाले वचन, गमन प्रतिभास
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मार्क्स और आत्मा १००३ निमित्तक ही चैत्रमें गमनवचनादि गोचर प्रवृत्ति विज्ञान उत्पन्न होते हैं, किंतु विवक्षु, जिगमिषु चैत्रमें होनेवाले गमनवचन प्रतिभास चैत्र संतान हेतुक ही होते हैं । स्वसंतानहेतुक प्रवृत्तिविज्ञान माननेपर पूर्वोक्तरीतिसे नीलादिज्ञानका कादाचित्क नहीं बन सकता । अतः नीलादिज्ञानको बाह्यार्थ सापेक्ष मानना ही ठीक है । यदि प्रवृत्तिज्ञानको अन्यसंतान निमित्तक माना जाय तो भी वह सत्त्वान्तर संतान भी तो सदा सन्निहित ही रहता है । अतः प्रवृत्तिविज्ञानोंका कादाचित्कत्व बन नहीं सकता; क्योंकि चैत्रसंतानसे मैत्रसंतानका देश तथा कालद्वारा विप्रकर्ष ( दूरी ) सम्भव नहीं है । इसमें यह कारण है कि विज्ञानवादीको विज्ञानसे भिन्न देशकालादि अमान्य ही होते हैं । अमूर्त होनेसे विज्ञानोंको अदेशात्मक माना जाता है, अतः देशकृत विप्रकर्ष नहीं हो सकता । इसी तरह विज्ञान संतानोंका कालकृत विप्रकर्ष भी नहीं हो सकता; क्योंकि सादिता दोष प्रसक्तिके डरसे विज्ञानवादी नवीन सत्त्वों ( विज्ञानसंतानरूप आत्मा) -का आविर्भाव नहीं मानते हैं । जब देशकृत या कालकृत विप्रकर्ष सम्भव ही नहीं तो संतानान्तर सन्निधान भी सर्वदा रहेगा ही, फिर प्रवृत्तिविज्ञानको सदा ही उपपन्न होते रहना चाहिये, किंतु प्रवृत्तिविज्ञानकी कादाचित्कता ही प्रत्यक्ष है, अतः बाह्यार्थ मानना अत्यावश्यक है, उसके बिना कादाचित्क प्रवृत्तिविज्ञान नहीं बन सकता । सौत्रान्तिकके इस मतका खण्डन करता हुआ विज्ञानवादी कहता है कि वासनावैचित्र्यसे प्रत्ययवैचित्र्य उत्पन्न हो ही सकता है । उसका अभिप्राय यह है कि स्वसंतानसे ही प्रवृत्तिविज्ञानोंकी उत्पत्ति मानी जाय तो भी उसके कादाचित्कत्वकी उपपत्ति हो जायगी । अतः सौत्रान्तिकके बाह्यार्थ साधकहेतुकी विपक्ष व्यावृत्ति सन्दिग्ध है,जिससे वह अनैकान्तिक है । नीलादि ज्ञानको बाह्यनिमित्तक मान भी लें तो भी क्यों कभी नीलज्ञान कभी पीतज्ञान होता है । यदि बाह्यनील पीतके सन्निधान-असन्निधानसे यह व्यवस्था कही जाय तो भी प्रश्न होगा कि पीत सन्निधानमें भी नीलज्ञान क्यों नहीं होता, पीत ही ज्ञान क्यों होता है । यदि कहें कि पीतमें
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१००४ मार्क्सवाद और रामराज्य नीलज्ञानजननकी सामर्थ्य नहीं है तो भी प्रश्न होगा कि यह सामर्थ्य- असामर्थ्यका भेद कैसे होता है । यदि हेतुभेदसे कहा जाय तो इसी तरह क्षणों ( क्षणिक आलय विज्ञानों ) में भी स्वकारण भेदके कारण शक्तिभेद हो ही सकता है, संतानीक्षण ही कार्यभेदके हेतु होंगे, वे प्रति कार्य भिन्न ही होते हैं । संतान नामकी कोई एक वस्तु क्षणोंकी उत्पादिका नहीं होती, जिसके अभेदसे क्षणभेदमें बाधा पड़ सके । जो यह कहा जाता है कि आलय -विज्ञान क्षणोंमें स्वस्वहेतु वैचित्र्यसे सामर्थ्यभेद होनेपर भी एक संतानस्थ होनेके कारण सबमें एक ही प्रकारकी सामर्थ्य होगी, वह इसलिये ठीक नहीं कि यह कहा ही जा चुका है कि संतानके अभेद होनेपर भी क्षणोंमें सामर्थ्यभेद है । सौत्रान्तिकका कहना है कि क्षणके भेदाभेदसे शक्तिका भेदाभेद नहीं हो सकता; क्योंकि भिन्न क्षणोंमें भी एक सामर्थ्यकी उपलब्धि होती है, अन्यथा यदि एक ही क्षण नीलज्ञानजननसमर्थ हो तो पुनः कभी भी नीलज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये; क्योंकि इस दृष्टिसे जो समर्थ क्षण था, वह व्यतीत हो चुका और क्षणान्तरोंमें नीलज्ञानजनन सामर्थ्य है ही नहीं, इसलिये क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद होता है, यह पक्ष उचित नहीं । एक ज्ञान संतानमें अनेकों बार नीलज्ञान होता ही है, किंतु संतानभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है । अतः आलय-विज्ञान संतानोंसे भिन्न बाह्य नीलादि संतानोंसे नीलादि प्रवृत्तिविज्ञानोंका उत्पन्न होना संगत होता है । इस दृष्टिसे बाह्यार्थ सिद्ध होता है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि भिन्न संतानोंमें सामर्थ्यभेद मान्य होगा तो यह भी कहना पड़ेगा कि भिन्न संतानोंमें एक सामर्थ्य नहीं है । ऐसी स्थितिमें विभिन्न नीलसंतानोंमें भी नीलाकारके आधानकी एक सामर्थ्य होनी चाहिये । फिर तो अन्य नील संतानोंका सन्निधान रहनेपर भी नीलज्ञान न होना चाहिये, परंतु यह सब अनुभवविरुद्ध है । अतः नीलपीतादि संतानोंके समान ही स्वकारणाधीन उत्पन्न होनेवाले क्षणान्तरोंमें भी किन्हींमें सामर्थ्य विशेष होता है, किन्हींमें नहीं । इस प्रकार एक आलयविज्ञान संततिपतित क्षणोंमें किसी ही ज्ञानक्षणमें सामर्थ्यविशेष होता है, किसीमें नहीं होता । स्वप्रत्यय ( पूर्वोत्पन्न
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मार्क्स और आत्मा १००५ नीलज्ञान) -से आसादित वही सामर्थ्यातिशय वासना है । किसीसे नीलाकार ही ज्ञान होता है, पीताकार नहीं और किसीसे पीताकार ही ज्ञान होता है, इस तरह वासनावैचित्र्यसे ही ज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । विज्ञानवादीके कहनेका सार यह है कि बाह्यार्थवादमें भी नीलादि अर्थ क्षणिक होते हैं । तथा च नीलसंतान भी अनेक होते हैं, उनमें भी संतानभेदसे यदि शक्तिभेद माना जाय तो नीलादि संतानोंमें भी एक प्रकारकी शक्ति न सिद्ध होगी, तथा च एक ही नील नीलाकार ज्ञान उत्पन्न कर सकेगा, संतानान्तरवर्ती नील नीलाकार ज्ञानका उत्पादक न हो सकेगा । अतः क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद माननेमें जो दोष आते हैं, संतान- भेदसे सामर्थ्यभेद माननेपर भी वे ही दोष हो सकते हैं । अतः कहना पड़ेगा कि जैसे किन्हीं संतानोंके परस्परभिन्न रहनेपर भी उनमें समान सामर्थ्य होता है, तभी अनेक नीलसंतानोंसे समानरूपसे नीलाकारज्ञान उत्पन्न हो सकता है । अतः सौत्रान्तिकको मानना पड़ेगा कि अनेक नीलपीतादि संतानोंमें स्वकारणभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है । तथा च कोई नीलज्ञानका जनक होता है, कोई पीत ज्ञानका । इसी तरह आलयविज्ञानपतित क्षणोंके सम्बन्धमें भी व्यवस्था हो सकती है । किन्हीं क्षणोंमें ही उस प्रकारसे आसादित वासनारूप सामर्थ्यातिशय होता है, जिससे नीलादि प्रवृत्तविज्ञान होते हैं । सबमें वह सामर्थ्य नहीं होता । अतः न तो यही कहा जा सकता है कि हर एक आलयविज्ञानसे नीलज्ञान होता रहेगा और न यही कहा जा सकता है कि एक ही आलयविज्ञानसे एक ही नील ज्ञान होगा । इस तरह वासनावैचित्र्यसे संज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । अतः प्रलयसे अतिरिक्त बाह्यार्थके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है । इस तरह आलयविज्ञान संतानपतित असंविदित पूर्वज्ञान ही वासना है । यद्यपि पहले शक्तिको वासना कहा गया था, पर यहाँ शक्ति- शक्तिमान्का अभेद समझकर पूर्व विज्ञानको ही वासना कहा गया है । वर्तमान ज्ञानसे विदित होता है, अनागत असिद्ध ही है । अतः पूर्वविज्ञानको ही असंविदित कहा
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१००६ मार्क्सवाद और रामराज्य गया है । वासनाके वैचित्र्यसे ही नीलादि अनुभवोंमें भी विचित्रता बनती है । पूर्वविज्ञानमें विचित्रता कैसे हुई इस शंकाका समाधान यही है कि अनादि संसारमें पूर्व- पूर्व नीलादि अनुभवोंसे ही उत्तरोत्तर विज्ञानोंमें वासनावैचित्र्य सम्पन्न होता है । इस प्रकार पूर्व नीलादि अनुभवोंके वैचित्र्यसे वासनावैचित्र्य होता है और वासनावैचित्र्यसे अनुभवोंमें भी विचित्रता आती है । बीजांकुरके समान यह परम्परा भी अनादि ही है । अन्वय - व्यतिरेकसे भी यही मालूम पड़ता है कि वासनावैचित्र्य ही ज्ञान- वैचित्र्यका हेतु है; क्योंकि स्वप्नादिमें स्पष्ट है कि बाह्यार्थके बिना भी वासनाके कारण ही विचित्र ज्ञान उत्पन्न होते हैं । यह उभयसम्मत है, परंतु वासनाके बिना अर्थनिमित्तक ज्ञान- वैचित्र्य उभयसम्मत नहीं है । अतः बाह्यार्थका अस्तित्व नहीं सिद्ध होता । इस प्रकार विज्ञानवादीके बाह्यार्थापलापका श्रीव्यासशंकराचार्यादि वैदिक आचार्योंने निराकरण किया है-' नाभाव उपलब्धेः ।' अर्थात् बाह्यार्थका अभाव नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसका उपलम्भ होता है । यहाँ विज्ञानवादीसे प्रश्न हो सकता है कि क्या उपलम्भ न होनेसे बाह्यार्थका असत्त्व होता है या वह उपलम्भ ही बाह्यविषयक नहीं है । वाच्यार्थविषयक होनेपर भी बाधक प्रमाणके सद्भावसे बाह्यार्थाभाव है । प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं; क्योंकि घटादिका उपलम्भ सर्वजनप्रसिद्ध है । खम्भ, कुड्य, घट- पटादि बाह्यविषयक प्रत्येक ज्ञानोंमें स्पष्टतया बाह्यार्थ भासित होते हैं । यदि कहा जाय कि उपलम्भ तो अवश्य है, किंतु उपलम्भका विषय बाह्य घटादि असत् है तो यह भी ठीक नहीं, कारण कि जैसे कोई भोजन तथा भोजनसाध्य तृप्तिका अनुभव करता हुआ भी कहे कि ' न मैं भोजन करता हूँ, न तृप्त ही होता हूँ' तो उसका कहना अनर्गल है । इसी तरह इन्द्रिय- सन्निकर्षसे बाह्यार्थका उपलम्भ करते हुए भी विज्ञानवादीका यह कथन कि मैं बाह्यार्थका अनुभव नहीं कर रहा हूँ, सर्वथा अनर्गल है । यदि वह कहे कि मैं यह नहीं कहता कि मैं बाह्यार्थका अनुभव नहीं करता हूँ, अपितु यह कहता हूँ कि उपलब्धिसे
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मार्क्स और आत्मा १००७ भिन्न ही बाह्यार्थ नहीं है, परंतु यह भी उसका कथन ठीक नहीं, यतः उपलब्धिबलसे ही बाह्यार्थ स्वीकृत होता है । उपलब्धिग्राहक साक्षीसे जैसे उपलब्धि गृहीत होती है, वैसे ही उसकी बाह्यविषयता भी गृहीत होती है । घटादिके ज्ञानके साथ घटादि बाह्यविषय भी गृहीत होते हैं, इसीलिये बाह्यार्थका प्रत्याख्यान करनेवाला भी कहता है कि अन्तर्ज्ञेयरूप है । वही बाह्यवत् प्रतीत होता है । वे लोग भी लोकप्रसिद्ध बाह्यार्थविषयिणी संवित्को समझते हुए ही उसके प्रत्याख्यानके लिये बाह्यार्थको बहिर्वत् ( बाह्यतुल्य ) कहते हैं, अन्यथा बहिर्वत् कहनेका कुछ भी अर्थ नहीं रह जाता । अत्यन्त असत्के साथ उपमा-उपमेयभाव भी नहीं बन सकता । कोई यह नहीं कहता है कि विष्णुमित्र वन्ध्यापुत्रके तुल्य भासित होता है । इन सब दृष्टियोंसे अनुभवके अनुसार तत्त्व स्वीकार करनेवाले स्पष्टरूपसे कहते हैं कि घटपटादि बाह्य अर्थ ही भासित होता है बहिर्वत् नहीं । यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है, अत: बाह्यवत् कहा जाता है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है । सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती । जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है । जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो, वह असम्भव है । यहाँ तो यथायोग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है । ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोंको स्थान ही नहीं है । जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है, यह भी ठीक नहीं, कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा? विषय तो ‘ इदन्ता ' एवं बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है, फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है । सार यह है कि यद्यपि घटपटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं, परम सूक्ष्ममें नहीं । नाना दिशाओं एवं देशोंमें व्यापी होना ही अर्थकी स्थूलता
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१००८ मार्क्सवाद और रामराज्य है, अर्थात् युगपद्भिन्न देशव्यापित्व या भिन्न दिग्व्यापित्व ही वस्तुकी स्थूलता है । तथा च एकदिग्देशमें अर्थका आवरण और अन्य दिग्देशमें अनावरणरूप विरुद्धधर्मयोगसे एक ही स्थूलवस्तुमें भेदकी प्रसक्ति होती है, परंतु यदि वस्तु ज्ञानाकार ही हो तो उपर्युक्त दोष प्रसक्त नहीं होता । कारण ज्ञानका सदा अनावरण ही रहता है । जिस समय जिस रूपमें जितनी वस्तु दिखती है, वह उतनी है ही; क्योंकि विज्ञानसे भिन्न वह है ही नहीं, परंतु यदि वस्तु बाह्य है तो वह सर्वात्मना कभी गृहीत हो ही नहीं सकता । हाथमें रखे हुए भी आमलकका अधोभाग नहीं दिखायी पड़ता । इस तरह एक ही वस्तुका कोई अंश दृष्टिगोचर होता है, कोई नहीं । इस दर्शन- अदर्शनसे उसे आवृत्त-अनावृत दोनों ही कहना पड़ेगा, तथा च विरुद्ध धर्मके अध्याससे एक ही वस्तुमें भेद प्रसक्त होगा । विज्ञानवादमें यह दोष नहीं होता, कारण कि विज्ञानमें जितना आकार भासित होता है, उतनी ही वह वस्तु है । उनके यहाँ यदृष्ट आवृत पदार्थ है ही नहीं, तथापि विज्ञानवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं, कारण कि इस प्रकारका दोष तो उसके मतमें भी अपरिहार्य ही होगा । भले ही वस्तुका ज्ञानाकार मान लेनेसे उसमें अवभास- अनवभासरूप विरुद्ध धर्मका प्रसंग न हो, परंतु एक ज्ञानसे प्रकाशित अनेक तन्तु देशोंमें रहनेवाले चित्रपटमें तद्देशत्व अतद्देशत्व रूपविरुद्ध धर्म देखा ही जाता है । प्रदेशभेदसे उसीमें कम्प और अकम्प भी देखते हैं । रक्तत्व- अरक्तत्वकी उपलब्धि भी उसीमें होती है । इस प्रकार पटको ज्ञानाकार मान लें तो भी विरुद्धधर्मवत्ता तथा भेदप्रसक्ति समान ही है, उसका निवारण विज्ञानवादीके लिये अशक्य ही है । अर्थ और ज्ञानका अभेद माना जाय तो और भी अनेक दोष प्रसक्त होंगे, जैसे अवयवी अवयवोंसे भिन्न है या अभिन्न? यदि भिन्न है तो भी अवयवी समस्त अवयवोंमें रहता है या प्रत्येक अवयवोंमें । यदि प्रत्येक अवयवोंमें तो भी सम्पूर्णरूपसे रहता है या एक देशसे । यदि समस्त अवयवोंमें अवयवी रहता है तो अवयवीकी उपलब्धि न होनी चाहिये । कारण कि समस्त अवयवोंकी उपलब्धिसे ही अवयवीकी