मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 991–1000

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

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मार्क्स और आत्मा ९८९ स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात् आरोप करता है अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है, क्रमरहित है, फिर उसमें क्रमवर्ती ग्रहण और आरोपण कैसे सम्भव हो सकता है । इसलिये दूसरा पक्ष ही सम्भव है कि जिस समय ही अर्थशून्य आकारका ग्रहण करता है, उसी समय स्वसंवेदन - स्वाकारको बाह्य अर्थरूपमें आरोपण करता है, परंतु यह भी असंगत है; क्योंकि विकल्पका अपना स्वाकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष होनेसे अत्यन्त विशद है, बाह्य अर्थ आरोप्यमाण होनेसे अविशद है । अतः आरोप्य बाह्यको विशद स्वाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । अतः विकल्पका स्वाकार ही बाह्यरूपमें आरोपित है, यह पक्ष नहीं बन सकता, अर्थात् जब समकालमें ही स्वाकारग्रहण एवं बाह्यत्वेन आरोपण माना जाय तो सोचना होगा कि यहाँ आरोप क्या है । स्वाकार और बाह्यका ऐक्य- स्फुरण ही आरोप है अथवा– अख्यातिमतके समान विवेकाग्रहमात्र आरोप है । पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि स्वाकार- स्वप्रकाश बाह्य परप्रकाश है । अतः उनका भेदावभास स्फुट है, फिर ऐक्यस्फुरण किस तरह सम्भव है । अतः बाह्यको ज्ञानाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; भेदाग्रहमात्रको भी समारोप नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वैशद्य अवैशद्यरूपसे उनका भेद स्पष्ट ही है । यदि कहा जाय कि बाह्य अगृह्यमाण है तो भी गृह्यमाण आन्तर स्वलक्षणसे उसका भेद अगृहीत है, इसीलिये बाह्यमें प्रवृत्ति होती है । फिर तो यह भी कहा जा सकता है कि त्रैलोक्यसे ही ज्ञानके स्वाकारका भेदाग्रहण होनेसे जहाँ कहीं भी प्रवृत्ति हो जायगी । इस तरह परमार्थ ज्ञानाकारका बाह्य वस्तुरूपसे आरोप असम्भव ही है । इसी तरह वासनापरिप्रापित- कल्पित ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें आरोप होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह भी स्वप्रकाशज्ञानरूप है । अतः उसका भी बाह्यसे भेद प्रसिद्ध ही है । इस तरह आन्तर एवं बाह्य स्थिर पदार्थोंको बिना स्वीकार किये कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता । फलतः सादृश्यमूलक भी प्रत्यभिज्ञा

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९९० मार्क्सवाद और रामराज्य आदि व्यवहार नहीं बन सकते; क्योंकि उनमें ' तेनेदं सदृशम्' सादृश्यका ऐसा आकार होता है और ' तदेवेदम्' यह वही है, ऐसा प्रत्यभिज्ञाका व्यवहार होता है । यद्यपि यहाँ कहा जाता है कि जैसे दीपज्वाला या नदीप्रवाह आदिमें सादृश्यबुद्धि न होनेपर भी सादृश्यके कारण ही ' सैवेयं धारा, सैवेयं ज्वाला ' यह वही धारा है, यह वही ज्वाला है इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । वैसे ही विज्ञानधारामें भी सादृश्यके कारण ही ' सोऽहम् ' इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा बन जायगी, परंतु यह ठीक नहीं, कारण, कदाचित् बाह्य वस्तुमें विनम्रके कारण यह उसके सदृश अन्य है या वही है, इस प्रकार सन्देह हो भी जाय, परंतु स्वप्रकाश- संवेदनरूप आत्मामें ' मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ' इस प्रकारका संशय सर्वथा असम्भव है । जिसे मैंने कल देखा था, वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ, यहाँ निश्चित ही आत्माकी एकता प्रत्यभिज्ञात होती है । जो अपनेको पहचाननेके लिये अपने आपको विशिष्ट प्रकारके चिह्नसे अंकित करता है, जनसाधारण भी उसकी बुद्धिपर तरस खाते हैं । बौद्ध स्थिर - अन्वित कारण नहीं मानते, सुतरां उनके यहाँ अभावसे ही भावोत्पत्तिका प्रसंग आ जाता है । क्षणिक कारणवादी बौद्धसे यह प्रश्न होता है कि वह कारण सापेक्ष है या निरपेक्ष? पहले पक्षकी असंगति पीछे कही जा चुकी, दूसरा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि निरपेक्ष क्षणिक बीजादिसे यदि अंकुरादि उत्पन्न हो, तब तो किसान आदिका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा । क्षणिक कारणोंमें उपकार भी सम्भव नहीं होता । निरपेक्षताका निषेध होनेसे सापेक्षता ही आयगी; क्योंकि कोई प्रकारान्तर सम्भव नहीं । अस्थिर भावसे भावकी उत्पत्ति हो नहीं सकती, इसलिये क्षणवादमें अर्थतः - अभावसे ही भावकी उत्पत्तिका प्रसंग होता है । बौद्ध स्पष्टरूपसे अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । 'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' बीजका उपमर्द ( विनाश) हुए बिना अंकुरकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती । किंतु विनष्ट बीजसे ही अंकुरकी उत्पत्ति होती है । विनष्ट क्षीरसे दधि एवं विनष्ट मृत्पिण्डसे घटादिकी उत्पत्ति होती है । यदि

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मार्क्स और आत्मा ९९ १ कूटस्थ स्थिर कारणसे कार्यकी उत्पत्ति हो तो अविशेषात् सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अतः अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है, इस पक्षका खण्डन करते हुए भगवान् व्यासने कहा है 'नासतोऽदृष्टत्वात्' अर्थात् अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो अभावत्वाविशेषात् कारणविशेषसे कार्यविशेषकी उत्पत्तिका सिद्धान्त व्यर्थ होगा । उपमृदित बीजोंके अभावमें और शशविषाणादिमें यदि निःस्वभावता समान ही है तो भेद क्या है? फिर क्या कारण है कि बीजसे ही अंकुर उत्पन्न हो, क्षीरसे ही दधि हो । यदि निर्विशेष अभावसे कार्य उत्पन्न होता तो शशविषाण आदिसे भी अंकुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये । पर ऐसा देखा नहीं जाता । यदि कमलादिमें नीलत्वादिके तुल्य अभावमें कोई विशेष माना जाय तो कमलादिके ही तुल्य अभाव भी भाव ही ठहरेगा । इस प्रकार अभाव किसी भावकी उत्पत्तिका कारण नहीं सिद्ध होता । बौद्धोंके अभावकारणवादका सार यह है कि यदि कूटस्थ कारणका कार्योत्पादन स्वभाव है, तब तो जितना कार्य करता है, उसे सहसा एक क्षणमें ही सब कार्य उत्पन्न कर देना चाहिये; क्योंकि समर्थ कालक्षेप नहीं कर सकता है । यदि कहा जाय कि समर्थ भी क्रमयुक्त सहकारियोंकी अपेक्षासे ही क्रमेण कार्य उत्पन्न करता है तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ प्रश्न होगा कि क्या सहकारीमूलकारणमें किसी उपकारका आधान करते हैं या नहीं । यदि नहीं तो अनुपकारक सहकारियोंकी अपेक्षा ही क्यों होगी । यदि आधान करते हैं तो वह उपकार मूल कारणोंसे भिन्न होता है या अभिन्न? यदि अभिन्न तो यह सिद्ध हुआ कि सहकारियोंद्वारा अहित उपकार मूलकारणसे अभिन्न है, अर्थात् मूलकारणरूप ही है । इस तरह सहकारियोंद्वारा उत्पन्न उपकारस्वरूप मूलकारण तटस्थ कैसे रह सकता है । उच्छूनता या उपमर्द आदि ही सहकारियोंद्वारा किया उपकार है । यदि सहकारिकृत उपकार कारणसे भिन्न है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उपकारके होनेपर कार्य होता है, उसके न होनेपर कार्य नहीं होता । भले

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९९२ मार्क्सवाद और रामराज्य ही कूटस्थ विद्यमान रहे, तब तो उपकार ही कार्यकारी सिद्ध होता है । कूटस्थ कारण कार्यकारी सिद्ध नहीं होता । इसीलिये कहा गया है कि- वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्येव तयोः फलम्। चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यःअर्थात् वर्षा एवं आतपका प्रभाव चर्ममेंखतुल्यश्चेदसत्फलम्होता है, आकाशमें॥ नहीं । यदि कारण चर्मके तुल्य है तो उसे विकारी और अनित्य मानना ही पड़ेगा । यदि आकाशके तुल्य है, तब कार्यकारी ही नहीं होगा । यदि अकिंचत्कर कूटस्थ कारणसे कार्य उत्पन्न हो, तब तो सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परंतु बौद्धोंका यह कथन बिना विचारे ही अच्छा जँचता है, विचार करनेपर सर्वथा निःसार है । अभावसे भावोत्पत्तिके सम्बन्धमें दूषण कहे जा चुके हैं । वस्तुतः स्थिर कारण ही सहकारीके समवधानसे क्रमेण कार्यकारी होता है । स्थिरमें ही उपकार हो सकता है । क्षणिकमें न उपकार ही होता, न उसका ज्ञान ही हो सकता है । यदि क्षणिक पदार्थोंमें उपकार्योपकार्य भाव माना जाय तो प्रश्न होगा कि वह क्षणिक पदार्थ अन्यकृत उपकारका आश्रय होता है या नहीं? पहला पक्ष असम्भव है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुपकृत होकर पीछे उपकारसे सम्बन्धित हो, वही उपकृतरूपसे जानी जा सकती है । उपकृत पदार्थ एवं उसका ज्ञाता दोनों ही स्थायी हो, तभी वस्तुमें उपकृतत्व एवं ज्ञाताको उसका ज्ञान हो सकता है । यदि प्रथम अनुपकृतत्वका ज्ञान न हो तो उपकार वस्तुका स्वाभाविक धर्म समझा जा सकता है । सहकारियोंद्वारा कारणमें उपकार होता है, किंतु वह उपकार मूल कारणसे न भिन्न होता है, न अभिन्न, किंतु अनिर्वाच्य होता है । इसीलिये उससे उत्पन्न कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है । इसीलिये अनिर्वाच्य मायोपहित कूटस्थ ब्रह्म विश्वका कारण माना जाता है । घट मृत्तिकासे भिन्न नहीं है; क्योंकि अन्वयव्यतिरेकसे मृत्तिकासे भिन्न घटका उपलम्भ नहीं होता । अभिन्न भी नहीं है; क्योंकि मृत्तिकासे जलानयनादि कार्य नहीं होता, घटसे ही होता है, अतः वह अनिर्वाच्य ही है । फिर भी स्थिरको अकारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि

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मार्क्स और आत्मा ९९३ अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट मृत्तिकादि उपादानरूपसे स्थिर ही कारण होता है । उसीसे अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न होता है । इसीलिये श्रुति भी कारणको ही सत्य और कार्यको मिथ्या कहती है ( वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ) जैसे रज्जु -सर्पभ्रममें स्थिर रज्जु उपादान है, वैसे ही स्थिर कारण ही कार्यका उपादान होता है । जो लोग सर्वतो विलक्षण स्वलक्षणको ही सत् मानते हैं, उनके यहाँ यह विचारणीय है कि क्यों बीज जातियोंसे अंकुर जातियोंकी ही उत्पत्ति होती है । क्रमेलक (उष्ट्र) जातियोंकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती? जैसे बीजसे बीजान्तर विलक्षण है, वैसे ही क्रमेलक (उष्ट्र) भी विलक्षण है, विलक्षणतामें कोई भेद नहीं है । बीजत्व, अंकुरत्व, सामान्य जाति भी परमार्थ सत् नहीं है । इसीलिये इनका कार्य-कारण- भाव भी परमार्थ नहीं है । अतएव काल्पनिक स्वलक्षण बीजजातीय उपादानसे काल्पनिक ही अंकुरजातीय कार्यकी उत्पत्तिका नियम है यह मानना पड़ेगा । बौद्धसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि व्यक्तियोंका ही कार्य-कारणभाव होता है या सामान्य ( जाति ) -का भी अथवा सामान्योपहित व्यक्तियोंका? यदि व्यक्तियोंका कार्य-कारणभाव हो तो व्यक्ति अनन्त होते हैं, सबका ज्ञान असम्भव है । उनमें कार्य- कारणभावकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती । फिर कार्यहेतुक अनुमान ही लुप्त हो जायगा; क्योंकि अनुमान सदा ही सामान्योपाधिमें प्रवृत्त होता है । यदि सामान्योंका ही कार्य - कारणभाव मानें तो भी प्रश्न होगा कि बीजत्व, अंकुरत्व आदि सामान्य वस्तु सत् हैं कि असत्? पहला पक्ष बौद्धको मान्य नहीं है, साथ ही वस्तुओंका कार्य- कारणभाव भी विरुद्ध है; क्योंकि बौद्ध अर्थक्रियाकारिताको ही सत्य मानता है, फिर जो कारण है, वह असत् कैसा? यदि अवस्तुभूत सामान्यसे उपहित सत् स्वलक्षण वस्तुका कार्य- कारणभाव माना जाय तो जैसे काल्पनिक बीजत्व सामान्योपहित स्वलक्षण बीजसे अकुंरत्व जातीयकी उत्पत्ति मानी जा सकती है, उसी तरह अनिर्वचनीय शक्ति उपहित कूटस्थ कारणसे अनिर्वचनीय कार्यकी उत्पत्ति होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_32_1_Front

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९९४ मार्क्सवाद और रामराज्य इसी तरह काल्पनिक उपकारसे काल्पनिक कार्यकी उत्पत्ति वेदान्त सिद्धान्तमें उपपन्न होती है । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति मानी जाय तो सभी कार्योंको अभावान्वित होना चाहिये, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता । सभी कार्य अपने भावरूपसे अन्वित ही देखे जाते हैं । मृत्तिकासे अन्वित घटादिभाव मृत्तिकाके ही विकार माने जाते हैं, तन्तुविकार नहीं । उसी प्रकार भावान्वित विकारोंको भी अभावका विकार नहीं माना जा सकता । यह कहना संगत नहीं है कि स्वरूपोपमर्द बिना किसी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं होती । अतः कूटस्थ किसी कार्यका कारण नहीं हो सकता । इसलिये अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है; क्योंकि स्थिर स्वभाववाले एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात सुवर्णादि ही कटकादिके कारण देखे जाते हैं । उपमर्द तो पूर्व अवस्थाका होता है । उपमृदित पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है । किंतु अनुपमृदित अन्वयी बीजावयव ही अंकुरादिके कारण होते हैं । कारणमें युगपत् अनेक अवस्था नहीं रह सकती । इसीलिये अंकुरावस्थाको लानेके लिये बीजावस्थाको हटना पड़ता है । घटावस्था लानेमें पिण्डावस्थाको भी हटना पड़ता है । अतएव बीजावस्था या पिण्डावस्था अंकुरादिके कारण नहीं है । किंतु बीजादिके अवयव ही कारण हैं । अतएव उन्हींका कार्यमें अन्वय है, अवस्थाका अन्वय नहीं । शशविषाणादि असत्से उत्पत्ति नहीं होती । सुवर्णादि सत्से ही उत्पत्ति होती देखी जाती है, अतः अभावसे भावोत्पत्तिका सिद्धान्त सर्वथा असंगत है । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो प्रयत्नहीन लोगोंकी भी अभीष्टसिद्धिमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये; क्योंकि अभावरूपी साधन तो सबको सुलभ है । कृषकको बिना प्रयत्न ही व्रीहि- यवादिकी प्राप्ति होनी चाहिये । कुलालको भी प्रयत्न बिना ही घटादिकी निष्पत्ति होनी चाहिये । तन्तुवायके प्रयत्न बिना ही वस्त्रकी प्राप्ति होनी चाहिये । शिल्पियोंके प्रयत्न बिना ही विविध प्रकारके यन्त्रोंका निर्माण हो जाना चाहिये । स्वर्ग- अपवर्गके लिये भी किसीको कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिये । पर यह सब संगत नहीं । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_32_1_Back

पृष्ठ 997

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मार्क्स और आत्मा ९९५ विज्ञानवादी योगाचारका कहना है कि बाह्यार्थवादमें बुद्धका तात्पर्य नहीं था । कुछ शिष्योंका बाह्यार्थमें अभिनिवेश देखकर ही उन्होंने पंचस्कन्धका निरूपण किया है । वस्तुतः विज्ञानमात्र एक ही स्कन्ध बुद्धको अभीष्ट था । कहा जा सकता है कि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति– ये चार प्रकारके तत्त्व होते हैं । इनमेंसे एकके अभावमें भी तत्त्वका व्यवस्थापन नहीं बन सकता । अतः विज्ञानमात्रको तत्त्वसिद्ध करनेके लिये प्रमात्रादितत्त्वचतुष्टय मानना ही पड़ेगा । फिर जब चार वस्तुएँ माननी ही पड़ीं तो विज्ञानमात्र वस्तु है, यह कैसे कहा जा सकता है, परंतु विज्ञानवादीका कथन है कि यद्यपि विज्ञानरूप अनुभवसे भिन्न अनुभाव्य, अनुभविता एवं अनुभवन कुछ भी नहीं है, तथापि बुद्धिकल्पितरूपसे विज्ञानमें प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति आदिका व्यवहार बन जाता है । असत्य आकारयुक्त विज्ञानका स्वरूप प्रमेय है । प्रमेय प्रकाशन एवं प्रमाण फल है । प्रकाशनशक्ति ही प्रमाण है । बाह्यार्थवादमें भी बुद्धयारोहके बिना प्रमाणादि व्यवहार नहीं बन सकता । यदि प्रमाण और फलके भिन्न अधिकरण हों तो प्रमाण फलभाव हो ही नहीं सकता । इसलिये खदिरगोचर परशु व्यापार होनेसे भी पलाशमें द्वैधीभाव (टुकड़ा ) नहीं होता । जिसमें व्यापार होता है, उसीमें फल होता है । उसी तरह प्रमाण ( करण ) और प्रमिति फल दोनोंका एक ही अधिकरण होनेपर ही करण फलभाव हो सकता है । यद्यपि परशु स्वावयवोंमें समवेत है और द्वैधीभाव खदिरमें समवेत है तथापि व्यापाराविष्ट करणीभूत परशु- संयोग सम्बन्धसे खदिरमें रहता है और द्वैधीभाव भी खदिरमें है ही । इस तरह करणफलका एकाधिकरण्य सामानाधिकरण्य ही है, इसी तरह एक ज्ञानमें ही प्रमाणफलभाव मानना ठीक है । अब यहाँ विचार करना होगा कि ज्ञानमें प्रमाण और फल कैसे सम्भव होंगे । जैसे कुण्डमें बदर ( बेर ) -की अवस्थिति होती है, उसी तरह क्या ज्ञानमें प्रमाण और फलका अवस्थान हो सकता है? कहना होगा कि ज्ञान असंयोगी वस्तु है, अतः उसमें संयोग-सम्बन्धसे प्रमाण 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_32_2_Front

पृष्ठ 998

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९९६ मार्क्सवाद और रामराज्य और फल नहीं रह सकते, किंतु तादात्म्य या अभेद सम्बन्धसे ही ज्ञानमें उनकी स्थिति कहनी पड़ेगी । यदि वस्तुतः प्रमाण और फल ज्ञानसे भिन्न हों तो उनका ज्ञानके साथ एकता या तादात्म्य असम्भव ही है । अतः ज्ञानमें ही कल्पित प्रमाण फलभाव मानना ठीक है । यदि प्रमाण और फल दोनों ही ज्ञानके अंश हों, तभी प्रमाण और फल ज्ञानस्थ हो सकते हैं, परंतु ज्ञान स्वलक्षण ( सर्वविशेषरहित ) अनंश होता है, अतः उसमें वस्तु सत्प्रमाण और फल नहीं रह सकते, वही ज्ञान अज्ञान व्यावृत्ति या अज्ञानापोहरूपसे फल है, वही अशक्ति व्यावृत्तिरूप आत्मस्वरूप अनात्म बाह्यार्थ प्रकाश शक्तिरूपसे प्रमाण है । ज्ञानका ही बाह्याकार बाह्य घटादि पदार्थ है । वैभाषिकोंके यहाँ बाह्य अर्थ प्रत्यक्ष होता है और सौत्रान्तिकोंके यहाँ ज्ञानगत आकारके वैचित्त्यसे बाह्यार्थका अनुमान होता है । ज्ञानमें जो बाह्य नीलादि सारूप्य भासमान होता है, वह अनीलाकारका अपोहरूप ही है, वही बाह्यार्थका व्यवस्थापन करता है, जैसे कि प्रतिबिम्ब बिम्बका व्यवस्थापन करता है । इस दृष्टिसे ज्ञान ही बाह्यार्थ व्यवस्थापक होनेके कारण प्रमाण है । अज्ञान ( अर्थात् ज्ञानभिन्न अन्य ) -की व्यावृत्तिरूपसे ज्ञानत्व सामान्य ही प्रमाण फल है; क्योंकि वह व्यवस्थाप्य है । इस मतमें भी प्रमेय परमार्थतः भिन्न है, यही बात सौत्रान्तिक यहाँ प्रसिद्ध है — ' नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदनायुक्ता, तस्याः सर्वत्राविशेषात् । तान् तु सारूप्यमाविशत्, स्वरूपं यद्घटयेत् । ' अर्थात् ज्ञानकी सत्ता ही अर्थकी वेदना नहीं हो सकती; क्योंकि वित्ति (ज्ञान) सत्ता तो सभी अर्थोंमें समान है । ज्ञानमात्र सर्व ज्ञेय साधारण है, अतः उस वित्तिमें प्रविष्ट होकर स्वसारूप्यघटित करनेवाला अर्थात् ज्ञानको स्वाकारसे आकारित करनेवाला बाह्यार्थ होना चाहिये । वही अपने रूपसे वित्तिको सरूप बनाता हुआ वित्तिको सविषय बनाता है, परंतु विज्ञानवादके अनुसार वस्तुतः सर्व व्यवहार पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानमें ही हो सकता है, ज्ञानभिन्न बाह्यार्थ नहीं हो सकता; क्योंकि बाह्यार्थ असम्भव है । यहाँ यह विचारणीय है कि क्या बाह्यार्थ घटादि परमाणुरूप ही हैं या परमाणुसमूह? परमाणुघटादि प्रत्ययके आलम्बन नहीं हो सकते; क्योंकि व्यवहारमें एक और स्थूल घटाद्याकाराभा 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_32_2_Back

पृष्ठ 999

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मार्क्स और आत्मा ९९७ ज्ञान होता है, परम सूक्ष्म परमाण्वाभास ज्ञान नहीं होता । अन्याभास ज्ञान अन्यको विषय नहीं कर सकता । अतः एक घटाद्याभास ज्ञान अनेक परम सूक्ष्म परमाणुओंको विषय नहीं कर सकता । यदि ऐसा नहीं मानें तो घटाभास ज्ञानके सर्वगोचर होनेसे सर्वज्ञतापत्ति हो जायगी । इसलिये एक-एक परमाणु घटादि प्रत्ययका परिच्छेद्य नहीं हो सकता है । परमाणुसमूह भी घटादि प्रत्यय परिच्छेद्य नहीं बन सकते; क्योंकि समूहका समूहियोंसे भिन्न या अभिन्नरूपसे निरूपण नहीं हो सकता । अभिन्न कहें तो पूर्वोक्त दोष ही होगा, भिन्न कहें तो समूहियोंके पृथक् हो जानेपर भी उसकी सत्ता रहनी चाहिये, भिन्न होनेपर भी दोनों किसी सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं या नहीं? यदि है तो कौन सम्बन्ध है । समवाय सम्बन्ध कहें तो वह समवायियोंसे सम्बन्धित हैं या नहीं? यदि नहीं तो वह स्वयं असम्बद्ध दूसरोंको कैसे सम्बन्धित करेगा । यदि स्वयं सम्बन्धान्तरसे सम्बन्धित है तो वह सम्बन्ध सम्बन्धान्तर सापेक्ष होगा, इस तरह अनवस्था प्रसंग होगा । यह भी विचारणीय है कि घटादिगत स्थूलत्वादि प्रतिभासमान ज्ञानका धर्म है अथवा प्रतिभासकालमें प्रतिभासित अर्थका । यदि पहली बात मान्य है तो ज्ञान स्वांशका ही अवलम्बन करता है । अतः ज्ञानभिन्न अर्थ नहीं है, यह पक्ष स्वीकृत हो गया, यदि कहा जाय कि रूपपरमाणु ही निरन्तर ( मिलकर ) एक विज्ञानके विषय होकर स्थूलरूपसे भासित होते हैं, ऐसा माननेमें भ्रान्तिको भी कोई स्थान नहीं । वे परमाणु नहीं हैं यह तो नहीं कहा जा सकता । इसी तरह वे सम्मिलित नहीं हैं, यह भी नहीं कहा जा सकता । एक विज्ञानोपारोही ( एक विज्ञानके विषय ) नहीं है, यह भी नहीं कहा जा सकता, अतः भले ही नीलत्वादिके तुल्य स्थूलत्व परमाणुका धर्म न हो; क्योंकि नीलत्वादिकी तरह वह प्रत्येक परमाणुमें नहीं, परंतु प्रतिभासदशापन्न परमाणुओंका स्थूलत्वादि बहुत्वादिके समान सांवृत्तिक ( मायिक ) धर्म हो सकता है ।

ग्रहेऽनेकस्य चैकेन किञ्चिद्रूपं हि गृह्यते ।

साम्प्रतं प्रतिभासस्थं तदेकात्मन्यसम्भवात्॥ १ ॥

न च तद्दर्शनं भ्रान्तं नानावस्तुग्रहाद्यतः ।

सांवृतं ग्रहणं नान्यत् न च वस्तुग्रहो भ्रमः ॥२ ॥

पृष्ठ 1000

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९९८ मार्क्सवाद और रामराज्य अर्थात् एक ज्ञानसे अनेक परमाणुओंका ग्रहण होनेपर सांवृत स्थूलरूप भासित होता है । विशकलित परमाणुतत्त्वको स्थूल बुद्धि ढक देती है, इसीलिये वह सांवृति है, एक-एक परमाणुओंमें स्थूल बुद्धि असम्भव है, इस तरह स्थूल दर्शनको भ्रान्त नहीं कहा जा सकता; क्योंकि नाना वस्तु परमाणु उसके विषयमें हैं ही । जो भिन्न बुद्धिसे गृहीत होते हैं, वे ही मिलित होकर एक बुद्धिगृहीत होकर स्थूलत्वाकारसे प्रतिभासित होते हैं । विज्ञानवादी बाह्यार्थवादीके इस पक्षका भी खण्डन करता है और कहता है कि परमाणुओंमें नैरन्तर्यकी प्रतीति भ्रान्ति ही है; क्योंकि रूप परमाणु गन्ध, रस, स्पर्श, परमाणुओंसे व्यवहित ही हैं, अव्यवहित ( निरन्तर) नहीं, जैसे दूरसे देखनेपर व्यवधानयुक्त अनेक वृक्षोंमें भी एक सघन वन प्रत्यय होता है । उसी तरह सान्तर व्यवहित परमाणुओंसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्ति ही है । इस घटादि प्रत्यय ' पीतः शंखः ' इस ज्ञानके तुल्य भ्रान्ति ही है । अतः परमाणु घटादि प्रत्ययके विषय नहीं हो सकते । कुछ लोगोंका कहना है कि स्थूल प्रत्यय स्वलक्षणविषयक है, अतः निर्विकल्पक प्रत्यय होनेसे भ्रान्त नहीं है । सविकल्प प्रत्यय अवस्तुभूत सामान्यविषयक होनेसे भ्रान्त होता है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यद्यपि ' स्थूलम्' यह ज्ञान व्यक्ति ज्ञान है, व्यक्तिमें सम्बन्ध ग्राह्य होनेसे वह शब्द वाच्य भी नहीं है तो भी पूर्वोक्त युक्तिसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्त है । अतः वह प्रत्यय नहीं ' कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम्' यही प्रत्यक्षका लक्षण है । अभिलापादि कल्पनारहित कल्पना पाठ होनेपर भी वह अभ्रान्त नहीं है । इस तरह यदि परमाणुसमूह घटादि परमाणुओंसे अभिन्न है तो परमाणु स्वरूप ही होनेसे वे घटाद्याभास प्रत्ययके गोचर नहीं हो सकते । यदि भेद है तो गवाश्वादिके समान अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनमें तादात्म्य नहीं बन सकता । समवायसम्बन्ध भी निराकृत ही है । इसी तरह जाति- गुण- कर्मादिका भी प्रत्याख्यान किया जा सकता है । जो-जो प्रतिभासित होता है, वह वह विचारसह है । अप्रतिभासमानके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है । अतः कोई भी प्रत्यय