मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1021–1030
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030
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मार्क्स और आत्मा १०१ ९ निष्कर्ष यह है कि साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नहीं होता । जैसे निर्मल दर्पणमें सुख प्रतिबिम्बित होता है, वैसे भास्वर स्वभाववाले अन्तःकरणमें ही उसकी अभिव्यक्ति होती है । अन्तःकरण वृत्ति भी भास्वर ही है, अतः विषयाकार वृत्तिपर भी स्वभावसे ही अभिव्यक्त होता है । इसीलिये वृत्ति भी स्वभावतः प्रकट होती है, परंतु बाह्यार्थ अन्तःकरणसे व्यवहित रहता है, अतः स्वभावसे ही उसमें चैतन्यके अभिव्यंजन करनेकी क्षमता नहीं रहती है । यह देखा ही जाता है कि सम्बन्ध समान रहनेपर भी कोई व्यंजक होता है और कोई नहीं होता है । जैसे चाक्षुषी प्रमाके साथ समान सम्बन्ध रहनेपर भी वह रूपादिका प्रकाश करती है, वायु आदिका प्रकाश नहीं करती । घट और दर्पणका मुखसन्निधान समानरूपसे रहनेपर भी घटपर मुखका प्रतिबिम्ब व्यक्त नहीं होता, दर्पणपर प्रतिबिम्ब व्यक्त होता है । ठीक उसी तरह अन्तःकरण और तत्परिणामभेद वृत्तिपर साक्षि-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होती है, परंतु बाह्यार्थ घटादिपर उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती । अन्त: करण और वृत्तिका अभिव्यक्त नित्य साक्षि-चैतन्यसे साक्षात् प्रकाश होता है, परंतु अर्थका स्वाकार वृत्ति व्यंग्य चैतन्यसे प्रकाश होता है । इसी अभिप्रायसे कहा जाता है कि ज्ञान स्वयं ज्ञानान्तरका कर्म हुए बिना ही प्रमाताके प्रति प्रत्यक्ष होता है । कहा जा सकता है, जो प्रकाशमान होता है, वह स्वभिन्न प्रकाशसे ही प्रकाशमान होता है । जैसे ज्ञान और अर्थ अन्य ( साक्षी ) - से प्रकाशित होते हैं, इसी तरह साक्षीको भी किसी अन्यसे प्रकाशित होना चाहिये । तथा च साक्षी और ज्ञान दोनोंकी विषमता असिद्ध है । किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि साक्षी स्वयं सिद्ध होता है । उसका अपलाप करना विज्ञके लिये भी सम्भव नहीं है । साक्षीस्वरूप आत्माके सम्बन्धमें मैं हूँ या नहीं हूँ, इस प्रकारका संशय नहीं होता । ' मैं नहीं हूँ' इस प्रकारकी अभाव प्रमा या भ्रान्ति भी नहीं होती । यह तभी सम्भव है, जब कि साक्षी नित्य साक्षात्कार तथा अनागन्तुक प्रकाशस्वरूप हो ।
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१०२० मार्क्सवाद और रामराज्य यह सुस्पष्ट है कि प्रमाता अन्य वस्तुओंमें सन्देह करता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध रहता है । अन्य विषयोंमें विपर्यस्त भ्रान्त होते हुए भी स्वयं भ्रमका अविषय अविपर्यस्त रहता है, परोक्ष वस्तुओंका अनुमान करता हुआ भी स्वयं अपरोक्ष रहता है, अन्य वस्तुओंका स्मरण करता हुआ भी स्वयं अनुभवरूप होता है, ये सब बातें अन्याधीन प्रकाश होनेपर सम्भव नहीं होतीं । अन्याधीन प्रकाश होनेसे अनवस्था प्रसंग भी होगा ही । निष्कर्ष यह है कि साक्षीको ज्ञेय सिद्ध करनेके लिये ' आत्मा ज्ञेयः प्रकाशमानत्वाद् घटवत्' ( आत्मा ज्ञेय है, प्रकाशमान होनेसे घटकी तरह ) यह अनुमान उपस्थित किया जाता है । परंतु इस अनुमानके लिये ' जो प्रकाशमान होता है, वह वेद्य होता है ' यह व्याप्ति माननी पड़ेगी । इस सम्बन्धमें प्रश्न होगा कि व्याप्तिग्राहिका ( व्याप्तिको ग्रहण करनेवाली ) संवित् स्वसम्बन्धमें प्रकाशमान होती है या नहीं? यदि प्रकाशमान होती है तो कर्म ( विषय ) रूपसे अथवा स्वप्रकाशरूप ( अन्य संविद्की अपेक्षा न करके स्वव्यवहार हेतुरूप) -से? पहला पक्ष संगत नहीं हो सकता; क्योंकि स्वात्मवृत्तिताका विरोध होता है, उसी संविदूका वही संविद् विषय हो यह नहीं बन सकता । अन्तिम पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि व्याप्तिग्राहिका संविद् संविदन्तर निरपेक्ष स्वव्यवहारमें हेतु है ( स्वप्रकाश है) तो व्याप्तिग्राहिका संविदमें ही व्याप्तिका व्यभिचार होगा । कारण उसमें प्रकाशमानता रहनेपर भी वेधता नहीं । यदि व्याप्तिग्राहिका संविद् प्रकाशमान नहीं होती तो इसी संविके विशेषका अवभास नहीं हुआ, तब तो इस संविमें सकल विशेषोपसंहारवती व्याप्ति कैसे स्फुरित होगी? क्योंकि यावत् हेत्वाश्रयवर्ति साध्य समानाधिकरण ही व्याप्ति होती है । यदि सकलविशेषोपसंहारवती व्याप्तिका स्फुरण न होगा तो अनुमान क्या होगा? यदि संवित्का स्वतः स्फुरण मान्य है, तब भी व्याप्ति व्यभिचार होनेसे अनुमानका उदय कैसे होगा? तथा उक्त अनुमानसे आत्मा या साक्षीकी ज्ञेयता नहीं सिद्ध हो सकती । ' अज्ञेयत्वे सति प्रकाशमानता ' ही स्वप्रकाशता है ( यहाँ ज्ञेयताका तात्पर्य अपरोक्ष
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मार्क्स और आत्मा १०२१ ज्ञान विषयतासे है । तथा च अनुमानद्वारा आत्माके ज्ञेय होनेपर भी सिद्ध साधनता नहीं ) जो ज्ञानका अगोचर होकर प्रकाशमान हो, वह स्वप्रकाश होता है । प्रकाशमानता या भासमानता भी भानविषमता नहीं है, किंतु व्यावहारिक बाधरहित ' भासते ' इत्याकारक शब्दकी लक्ष्यता ही है । अर्थात् जिसका बाध नहीं होता है, ऐसे ' प्रकाशते ' इस शब्दका जो लक्ष्य है, वही भासमानता है । वेदान्तसे ज्ञेय होनेपर भी स्वप्रकाशतामें कोई विरोध नहीं होता; क्योंकि निरुपाधिक ब्रह्म वेदान्त महावाक्यजन्यवृत्तिका अविषय होनेपर भी वृत्तिके द्वारा आवरण भंग होनेमात्रसे भासमान होता है । वेदान्तवाक्यजन्य वृत्तिरूप उपाधिके द्वारा ही उसमें ज्ञेयता भी व्यवहृत होती है । अतएव जो कहा जाता है कि स्वप्रकाश ब्रह्म अनुमानज्ञेय होता है, यह भी निःसार है; क्योंकि यहाँ भी अनुमितरूप उपाधि रहनेसे ही ब्रह्ममें अनुमान ज्ञेयता होती है । नित्य साक्षात्कारता अनागन्तुक प्रकाशत्वमें हेतु है । संविद्से अभिन्नता ही साक्षात्कारता है । यहाँ संविद् शब्दका नित्यबोध अर्थ है, वृत्तिरूप ज्ञान नहीं । इन्द्रियजन्य प्रतीतित्व यहाँ साक्षात्कारता अभिप्रेत है । संविमें संविदभिन्नता स्वतः होती है । अन्य विषय संविद्में अध्यस्त होनेसे संविदभिन्नता होती है । अधिष्ठानसत्तासे अतिरिक्त अध्यस्तकी सत्ताका न होना ही अध्यस्तकी संविद्से अभिन्नता है । इस सम्बन्धमें अनुमान भी है ' आत्मा स्वयं प्रकाशः शश्वदपरोक्षत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं यथा घटः । ' अर्थात् शश्वत् प्रत्यक्ष होनेसे आत्माको स्वयंप्रकाश मानना चाहिये । घटादि कभी अपरोक्ष होते हैं, शश्वदपरोक्ष नहीं होते । अतः वे स्वप्रकाश नहीं होते हैं । ' आत्मा शश्वदपरोक्षः शश्वदसन्दिग्धत्वात्, व्यतिरेके घटवत्' अर्थात् आत्मा सदा अपरोक्ष ही है; क्योंकि उसमें सदा ही संशय-विपर्यय - अज्ञान- शून्यता रहती है । घटादि ऐसे नहीं हैं, अतः वे अपरोक्ष भी नहीं हैं ( भले ही वेदान्तवेद्य अखण्डानन्द आकारसे आत्मा संदिग्ध होता है, अतएव वही शास्त्रका विषय होता है, तथापि ज्ञान, सुखादि साक्षिरूपसे आत्मा सदा ही असंदिग्ध रहता है ) ।
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१०२२ मार्क्सवाद और रामराज्य यहाँ अप्रसिद्ध विशेषता नहीं कही जा सकती है अर्थात् स्वप्रकाशत्वरूप साध्य अप्रसिद्ध है, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि निम्नोक्त अनुमानसे स्वप्रकाशता प्रसिद्ध हो जाती है । ' अयं घटः, एतदन्यज्ञेयत्वरहित-भासमानान्यः, द्रव्यत्वाद् घटवत् । ' यहाँ ' अयं घटः ' पक्ष है । यह यद्यपि ज्ञेय है, तथापि यह पक्ष ही है, अतः इसमें पक्षान्यत्व नहीं है । अतएव यह पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्व शून्य ही है और भासमान भी है । एतदन्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान है, उससे अन्य पट है । इस तरह दृष्टान्तसे साध्य प्रसिद्ध हुआ । पक्षसे अन्यत्वेन विशेषित जो ज्ञेयत्व होता है, उस ज्ञेयत्वसे रहित एवं भासमानसे अन्यता साध्य है, यह पटमें है । पक्षभूत घट ज्ञेय होनेपर भी पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वरहित है और भासमान भी है । उससे अन्य पट है । उसी तरह ' अयं घट: ' इस पक्षमें भी साध्य- सिद्धि अनुमानके द्वारा करनी है । पक्षमें अनुमान बिना साध्यसिद्धि नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह तो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान ही है, भासमानसे अन्य नहीं है, किंतु पक्षसे अन्य ही कोई वस्तु ऐसी होनी चाहिये, जो पक्षसे अन्य भी हो, ज्ञेयत्वरहित भी हो, भासमान भी हो । जब उस भासमानसे अन्य पक्ष होगा, तब पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमानान्यता पक्षमें आ सकेगी । पक्षसे अन्य घटादि प्रसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा कोई नहीं है, जो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वरहित भासमान हो; क्योंकि सभी भासमान पक्षान्यघटादि पक्षान्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वयुक्त ही है । उपर्युक्त अनुमानसे जो इस प्रकारकी एतदन्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान वस्तु सिद्ध होती है, वही स्वप्रकाश आत्मा है । सुखादिका अनुभाविता साक्षी सर्वानुभवसिद्ध है । चार्वाक भी ' अहं ' इस अनुभवका अपलाप नहीं करता है । किंतु शरीरको वह इसका विषय बतलाता है । कहा जा सकता है कि ' स्वसत्ताके समय सुखादिमें भी सन्देह नहीं रहता है, फिर सुखादिको भी स्वप्रकाश क्यों न माना जाय, ' परंतु आत्मप्रकाशसे ही सुखका प्रकाश उत्पन्न हो सकता है । अतः आत्माकी स्वप्रकाशतासे भिन्न सुखकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जाती है । यदि आत्मामें नित्य साक्षात्कारता न होती तो कभी -न-कभी
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मार्क्स और आत्मा १०२३ आत्मामें सन्देह होता, किंतु आत्मामें सन्देह कभी देखा नहीं जाता है, अतः आत्मामें नित्य साक्षात्कारता ही सिद्ध होती है । इसी तरह यह भी कहना संगत नहीं है कि ‘ आत्मविषयक अन्य प्रत्यक्ष संविद् उत्पन्न होती है; ' क्योंकि उक्त रीतिसे अनवस्था प्रसंग होगा । अतः अनिच्छयापि बौद्धको आत्माकी स्वयं सिद्धता माननी पड़ेगी । पीछे कहा जा चुका है कि जिस तरह पाक स्वयं पक्ता नहीं होता, छिदिक्रिया स्वयं छेत्री नहीं होती, उसी तरह ज्ञान स्वयं ज्ञाता नहीं होता है । विज्ञानवादी बौद्ध प्रमाताका अस्तित्व नहीं मानता है । कहता है जैसे - प्रदीप प्रदीपान्तर निरपेक्ष स्वयं प्रकाशित होता है, वैसे ही विज्ञानान्तर निरपेक्षविज्ञान स्वयं प्रकाशित होता है । विज्ञानवादी बौद्धके इस कथनका निष्कर्ष यह निकलता है कि विज्ञान प्रमाणागम्य है और उसका कोई अवगन्ता या जानकार नहीं है । यह कथन उसी तरहका है, जैसे कोई कहे कि ठोस शिलाके मध्यमें सहस्र दीप प्रकाश है । यह भी न प्रमाणगम्य है, न किसी जानकारको इसका अनुभव है । अर्थात् शिलाघनमध्यस्थ सहस्र दीप प्रकाश प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृरहित होनेसे अमान्य होता है, वैसे ही विज्ञान प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृशून्य होनेसे अमान्य ही होगा । यदि विज्ञान किसी ज्ञाताको भासमान नहीं हो तो उस स्वप्रकाशका विज्ञानसे क्या प्रयोजन है? बौद्धोंकी ओरसे कहा जाता है कि ' विज्ञान ही ज्ञाता है । विज्ञानवादी बौद्धोंका विज्ञान अनुभवरूप ही है । वही साक्षी भी है । ' किंतु यह कथन संगत नहीं है; क्योंकि जैसे नेत्ररूपी साधनसे युक्त अन्य ज्ञाताको ही प्रदीपादिका प्रकाश होता है, वैसे अन्य ज्ञाताको ही विज्ञानका प्रकाश होना युक्त है । जैसे दीप ग्राह्य है । वैसे ही बौद्ध मतमें विज्ञान भी ग्राह्य है । फिर भी बौद्धका कहना है कि जब वेदान्ती साक्षीको स्वयंसिद्ध मानता है तो स्वयंसिद्ध विज्ञान माननेमें क्या आपत्ति है? वस्तुस्थिति यह है कि बौद्धके स्वयंसिद्ध विज्ञानको ही वेदान्तीने साक्षी नाम दे दिया है । तथा च नाममें ही विप्रतिपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि बौद्ध विज्ञानकी उत्पत्ति और प्रध्वंस मानता है तथा
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१०२४ मार्क्सवाद और रामराज्य विज्ञानकी अनेकता मानता है और वेदान्तीका साक्षी नित्य तथा एक, असंग एवं अनन्त है । बौद्धका विज्ञान बुद्धिवृत्तिरूप ही है । उसकी उत्पत्ति, विनाश तथा अनेकता प्रसिद्ध ही है । घटादिके तुल्य ही उसकी अतिरिक्त साक्षिवेद्यता सिद्ध की जा चुकी है । जिस विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, वह स्वयं फलरूप है, फिर स्वयं ज्ञाता कैसे बन सकता है? वही कर्ता, वही फल नहीं हो सकता है, वही पक्ता वही पाक नहीं होता, यह कहा जा चुका है । आजकल भी बौद्ध यही कहते हैं कि ' विज्ञानवादीका विज्ञान नित्य विज्ञानस्वरूप आत्मा ही है और श्रीशंकराचार्यके समयमें भी कुछ बौद्धोंने ऐसा कहा था, किंतु यह सब बौद्धोंका अपसिद्धान्त ही है । ' जो कहा गया था कि स्वप्नादि प्रत्ययके तुल्य ही जागरित घटादि प्रत्यय भी बाह्यार्थके बिना ही उपपन्न हो जायँगे, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्वप्नादि प्रत्ययोंका जागरित प्रत्ययसे महान् अन्तर है । स्वप्नादिका बाध होता है, परंतु जागरित प्रत्ययका बाध नहीं होता । बौद्ध मतानुसार जागरित प्रपंच किसी अधिष्ठानके अज्ञानका कार्य नहीं है, जो अधिष्ठान ज्ञानसे शुक्ति रजतके समान बाधित हो जाय । स्वप्नकी वस्तु प्रबोध होते ही बाधित हो जाती है । इसलिये जागनेपर प्रतिबुद्ध प्राणी कहता है ' मैंने स्वप्नमें मिथ्या ही गज-रथादि देखा था । वस्तुतः गज-रथादि न थे । मेरा मन निद्रासे म्लान था । उसीसे ऐसी भ्रान्ति हुई थी । ' इसी तरह माया प्रत्ययका भी बाध होता है । यदि जागरित प्रत्यय भी बाधित हो तो वह स्वप्न प्रत्ययका बाधक नहीं हो सकता; क्योंकि जो स्वयं बाध्य है, वह बाधक कैसे हो जायगा? फिर तो स्वप्नप्रत्यय दृष्टान्त भी नहीं सिद्ध होगा । अतः स्वप्नप्रत्ययके दृष्टान्तसे जाग्रत् प्रत्ययकी निरालम्बनता नहीं सिद्ध की जा सकती है । तथा ' घटादिप्रत्ययो, निरालम्बनः, प्रत्ययत्वात् स्वप्नप्रत्ययवत्। ' ( घटादि प्रत्यय स्वप्नज्ञानके तुल्य ही ज्ञानत्व जातिमें होनेसे निरालम्बन- विषयशून्य है ) यह अनुमान भी बाध्यत्वरूप उपाधिसे दूषित है । जहाँ निरालम्बनता है, वहाँ बाध्यता है, जैसे स्वप्नादिमें । प्रत्ययत्व जागरित
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मार्क्स और आत्मा १०२५ प्रत्ययमें भी है, परंतु वहाँ बाध्यत्व नहीं है । इसलिये साध्यव्यापक तथा साधना व्यापकरूप उपाधिसे युक्त होनेके कारण उक्त अनुमान दूषित है । जहाँतक प्रमाता है, वहाँतक जाग्रत्प्रत्ययका बाधाभाव प्रमित ही है । साथ ही प्रमाणाजन्यत्व भी उपाधि है । अर्थात् स्वप्न प्रत्यय एक प्रकारकी स्मृति ही है, जो कि संस्कारमात्रसे उत्पन्न होती है । वह जाग्रत्प्रत्ययकी तरह प्रमाणजन्य नहीं होती । जाग्रत्प्रत्यय तो वर्तमान विषयेन्द्रिय सन्निकर्ष, लिंग, शब्द, सादृश्य, अन्यथानुपपत्ति, योग्यानुपलब्धिरूप प्रमाणोंसे उत्पन्न होते हैं । निद्राकालमें उपर्युक्त कोई सामग्री नहीं रहती है, केवल संस्कार ही हेतु रहते हैं । अतः संस्कारमात्रजन्य होनेके कारण स्वप्नादि प्रत्यय स्मृति हैं । वह स्मृति भी निद्रादि दोष-परीत होनेके कारण विपरीत हो जाती है । तभी तो अवर्तमान पिता आदिको वर्तमानरूपसे ग्रहण करती है । स्मृति और उपलब्धिमें भेद होता है । स्वप्न तो विपरीत स्मृति ही है । अतः जाग्रत् कालके प्रमाणजन्य प्रमारूप प्रत्ययोंसे स्वप्न प्रत्ययमें महान् भेद है । अतः स्वप्नप्रत्ययकी तरह जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन नहीं हो सकते । प्रमाणोंका स्वतः प्रामाण्य होता है । जाग्रत्प्रत्ययोंकी यथार्थता अनुभवसिद्ध है । अनुमानके द्वारा उनका अन्यथात्व नहीं सिद्ध किया जा सकता; क्योंकि अनुभवविरुद्ध अनुमान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । यह नहीं कहा जा सकता कि स्वतः प्राप्त प्रामाण्यका अनुमानद्वारा अपोहन हो जायगा; क्योंकि अबाधित विषय होनेपर ही अनुमानका प्रामाण्य होता है । यहाँ तो प्रत्यक्ष बाध है । अतः अनुमान प्रमाजनक नहीं हो सकेगा । प्रत्यक्षके प्रामाण्यका अपवाद अनुमानसे नहीं हो सकता । अबाधित विषयता भी अनुमानोत्पादक सामग्रीसे ग्राह्य होनेसे प्रमाण होती है । यहाँ तो अनुमान सामग्री प्रत्यक्षसे अनुमानका विषय बाधित ही हो जाता है । स्मृति और प्रमामें पार्थक्य स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है । लोग कहते हैं कि ' हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यय अनुभव करना चाहते हैं । ' इस तरह अनुभवसिद्ध भेदके रहते यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्न प्रत्ययके 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_33_1_Front
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१०२६ मार्क्सवाद और रामराज्य तुल्य जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन है । स्वानुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता । बौद्ध भी स्वानुभवविरोध-प्रसंग उपस्थित होनेके कारण ही जागरित-प्रत्ययको निरालम्बन कहनेमें असमर्थ होकर ही उसे स्वप्न प्रत्ययके दृष्टान्तसे निरालम्बन कहनेका प्रयत्न करता है, परंतु जो जिसका स्वतः धर्म नहीं होता, वह अन्यके दृष्टान्तसे नहीं सिद्ध होता । जब अग्नि उष्णरूपसे अनुभूयमान रहता है तो जलके दृष्टान्तसे उसे शीत नहीं कहा जा सकता है । जल एवं अग्निके वैधर्म्यके समान ही स्वप्न एवं जागरितका बाध- अबाध आदि वैधर्म्य कहा ही जा चुका है । वस्तुतस्तु स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं है, अनिर्वचनीय प्रातीतिक पदार्थ स्वप्नादि प्रत्ययोंका भी आलम्बन है ही । उसी तरह व्यावहारिक सत्य पदार्थ जाग्रत् प्रत्ययके आलम्बन होते हैं । वेदान्ती जैसे पारमार्थिक ब्रह्मके अज्ञानसे व्यावहारिक सत्य प्रपंचकी सृष्टि मानते हैं, वैसे ही व्यावहारिक रज्ज्वादिके अज्ञानसे प्रातिभासिक सत्य सर्पादिकी उत्पत्ति मानते हैं । अतएव जब व्यवहारमें बाधित होनेवाले स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं हैं, तब व्यवहारमें कभी बाधित न होनेवाले जाग्रत् प्रपंच प्रत्ययको निरालम्बन कैसे कहा जा सकता है? परंतु बौद्ध संसारको न तो अज्ञानका कार्य ही मानता है और न अधिष्ठान ज्ञानसे उसका बाध ही मानता है । बौद्धके यहाँ सम्यग्दृष्टि या प्रज्ञापारमितासे अविद्याकी निवृत्ति होती है, परंतु वह अविद्या विश्वका उपादान आदि नहीं है । किंतु असत्, क्षणिक आदिमें सत्, क्षणिक बुद्धि आदि ही अविद्या उन्हें मान्य है । अतएव वासना- वैचित्र्यसे वे विज्ञान - वैचित्र्यका उपपादन करते हैं । जैसे उनके यहाँ ज्ञान सत्य है, वैसे ही वासना भी सत्य ही है । वासनाका अधिष्ठान ज्ञानसे बाध नहीं होता है । किंतु सम्यग्दृष्टि, सम्यक् प्रयत्नसे वासना निरोधसाध्य होता है, जब कि वेदान्त मतसे ब्रह्मके सम्यक् ज्ञानमात्रसे निवर्त्य अज्ञान होता है । इस तरह वेदान्त- सिद्धान्तसे बौद्धमतका अत्यन्त भेद है । 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section 33_1_Back
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मार्क्स और आत्मा १०२७ जो बौद्धोंने कहा है कि अर्थके बिना ही वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान- वैचित्र्य उपपन्न हो जायगा, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब विज्ञानवादी बौद्धके मतमें बाह्यार्थकी उपलब्धि ही नहीं होती, तब वासना भी कैसे बनेगी? विविध अर्थोपलब्धिके अनुसार ही तो नाना प्रकारकी वासनाएँ होती हैं? जब बाह्यार्थका ज्ञान होता ही नहीं, तब किस आधारपर वासनाएँ बनेंगी? विज्ञानों और वासनाओंको अनादि माननेपर भी अन्ध परम्परा- न्यायसे वासनाओं और विज्ञानोंकी परम्परा अप्रतिष्ठित और अनवस्थित ही रहेगी । यहाँ विज्ञानवादीका कहना है कि अर्थोपलब्धिके अभावसे वासनाओंका अभाव नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि विज्ञानवादमें अर्थ नहीं मान्य है । अतः बाह्यार्थ एवं अर्थोपलब्धिकी व्याप्ति निश्चित नहीं हो सकती, किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानवादीको भी लोकसिद्ध अन्वय- व्यतिरेकके आधारपर ही स्वप्नकी अर्थोपलब्धिको वासनाजन्य मानना पड़ेगा । उसीके दृष्टान्तसे जाग्रत्के घटादि ज्ञानोंके भी वासनाजन्य होनेका अनुमान किया जाता है । तथा च बाह्यार्थरूप कारणके रहनेपर ही अर्थोपलब्धिरूप कार्य होता है, बाह्यार्थ न होनेपर अर्थोपलब्धि भी नहीं होती । इस अन्वय - व्यतिरेकके अनुसार अर्थोपलब्धि और बाह्यार्थका ही कार्यकारणभाव मालूम पड़ता है । अर्थानपेक्ष वासना और अर्थोपलब्धिका लोकसिद्ध अन्वय - व्यतिरेक नहीं है । स्वप्न प्रत्ययकी हेतुभूत वासना भी जाग्रत्कालकी अर्थोपलब्धिके ही पराधीन होती है । इस तरह कारणका कारण होनेसे स्वप्न प्रत्ययमें भी अर्थोपलब्धि मूल है । अतएव अर्थका उपलब्धिके साथ लोकदर्शनानुसारी अन्वय- व्यतिरेक गृहीत होता है । अर्थानपेक्ष वासनाके साथ उपलब्धिका अन्वय- व्यतिरेक गृहीत नहीं होता । स्वप्नोपलब्धिकी कारणभूत वासनाका भी कारण जागरित अर्थोपलब्धि ही है । अतः अर्थ स्वप्नोपलब्धिका भी मूल है ही । बाह्यार्थापलापी विज्ञानवादी अन्वय- व्यतिरेकसे ज्ञानको वासनानिमित्तक मानता है, अर्थनिमित्त ज्ञान नहीं मानता है, परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे उसका खण्डन हो जाता है । अर्थोपलब्धि बिना वासनाकी उत्पत्ति होती ही नहीं, 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_33_2_Front
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१०२८ मार्क्सवाद और रामराज्य कई ऐसी नवीन वस्तुओंकी भी उपलब्धि हो सकती है, जिनकी वासना है ही नहीं । इस तरह वासना बिना भी अर्थोपलब्धि होती है, किंतु बिना अर्थोपलब्धिके वासना कभी नहीं होती देखी जाती है । इस तरह अन्वय- व्यतिरेकके द्वारा अर्थका सद्भाव ही सिद्ध होता है, बाह्यार्थका अपलाप नहीं सिद्ध होता है । वासना एक संस्कार ही है, वह संस्कार आश्रयके बिना नहीं रह सकता है । वासनाका आश्रय बौद्ध विज्ञानवादीके मतमें प्रमाणसिद्ध नहीं है । क्षणिक आलयविज्ञान भी वासनाका आश्रय नहीं बन सकता; क्योंकि विज्ञान और वासना यदि दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं तो जैसे साथ उत्पन्न दायें -बायें शृंगका आधाराधेय भाव नहीं बन सकता है, वैसे विज्ञान और वासनाका भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकेगा । यदि ज्ञान पहले उत्पन्न हो और वासना पीछे उत्पन्न हो तो भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकता; क्योंकि आधेयकी उत्पत्तिके समयतक तो क्षणिक विज्ञान नष्ट हो चुका होता है । यदि विज्ञान वासना -उत्पत्तिके समयमें भी रहेगा तो क्षणिकत्वकी हानि होगी । आश्रयके बिना ही एक सन्तति पतित समानाकार विज्ञान ही वासना है, यह विज्ञानवादियोंका स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है, प्रामाणिक नहीं । वस्तुतः वासना एक गुण है, उसका स्वसमवायी कारण ही आश्रय होता है । विज्ञानवादी जिस आलयविज्ञानको वासनाओंका आधार मानते हैं, आखिर वह भी तो क्षणिक ही होगा? अतः जैसे प्रवृत्ति विज्ञान वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता, वैसे आलयविज्ञान भी वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता । अतीत, अनागत, वर्तमानमें अन्वयी एक कूटस्थ सर्वार्थदर्शी साक्षी आत्माको स्वीकार किये बिना देश-काल- निमित्तापेक्ष वासना एवं तदधीन स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि कुछ भी नहीं बन सकते । यदि आलयविज्ञानको स्थिर माना जायगा तो विज्ञानवादीके सिद्धान्तकी हानि होगी । बाह्यार्थवादीकी तरह विज्ञानवादी भी क्षणिकवादी है, अतः बाह्यार्थवादके सम्बन्धमें कहे गये दूषण भी उसमें लागू होंगे ही । शून्यवादीका कहना है ' यदि साकारज्ञान सम्भव नहीं है और बाह्यार्थ 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_33_2_Back