मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1031–1040

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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मार्क्स और आत्मा १०२ ९ भी न सूक्ष्म हो सकता है, न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं । ज्ञान और अर्थ दोनों ही बाधित हो जाते हैं । अतः वे सत् नहीं कहे जा सकते । असत् भी नहीं हो सकते; क्योंकि असत् होनेपर उनका भान नहीं होना चाहिये । सत्- असत् उभयरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि उनका परस्पर विरोध होता है । अनुभवरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि सत्- असत् इस प्रकारके होते हैं कि एकका निषेध करेंगे तो दूसरेका विधान अनिवार्य हो जायगा । अत: विचारासहत्वइदं हीवस्तुबलायातंवस्तुओंका रूप हैयद्वदन्ति। अतः शून्यवादियोंनेविपश्चितःकहा । है— यथा यथार्थाश्चिन्त्यन्ते विविच्यन्ते तथा तथा ॥ अर्थात् ' वस्तुओंके स्वभावसे ही यह बात आ जाती है कि पदार्थोंका जैसे - जैसे विचार किया जाता है, वैसे - वैसे वे पृथक् - पृथक् विशीर्ण होते जाते हैं, सत्- असत् आदि किसी पक्षमें व्यवस्थित नहीं हो पाते । अतः शून्यता ही तत्त्व है । ' शून्यवादियोंका यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि यह सर्वप्रमाण विरुद्ध है । प्रमाणप्रसिद्ध लोक- व्यवहार अधिष्ठानभूत ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार बिना बाधित नहीं हो सकता । अपवादके बिना उत्सर्गकी स्थिति स्वाभाविक होती है । लौकिक- प्रमाण अपने - अपने विषय- सत्- असत्का बोधन करते हैं । उन्हीं प्रमाणोंके आधारपर सत्रूपसे यथाभूत अविपरीततत्त्वकी व्यवस्थापना होती है । इसी तरह असत्- असत् इस रूपसे यथाभूत अविपरीत तत्त्वकी व्यवस्थापना होती है । सत्- असत्‌को विचारासह कहनेवाले शून्यवादीका पक्ष सर्वप्रमाण विरुद्ध है । कहा जाता है कि ' इस विचारसे प्रमाणोंके तात्त्विक प्रामाण्यका ही खण्डन किया जाता है, सांव्यावहारिक प्रामाण्यका खण्डन नहीं किया जाता । तथा च भिन्नविषयक होनेसे प्रमाण विप्रतिषेध नहीं होगा, किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि प्रमाण स्वविषयमें प्रवर्तमान होते हुए ' यह तत्त्व है ' इस रूपसे ही प्रवृत्त होते हैं । बाधकज्ञानसे ही उनके विषयकी विपरीतता दिखाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है । जैसे यह शक्ति है

पृष्ठ 1032

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१०३० मार्क्सवाद और रामराज्य रजत नहीं, सूर्यकिरण है जल नहीं, एक चन्द्र है, दो नहीं, इत्यादि स्थलोंमें बाधका अधिष्ठान ज्ञानोंसे यह रजत है, यह जल है इत्यादि ज्ञानोंके विषयोंकी विपरीतता दिखलाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है । वैसे बाधकज्ञानके द्वारा समस्त प्रमाण-गोचर पदार्थोंके विपरीत तत्त्वान्तरकी व्यवस्थापना करके ही प्रमाणोंकी अतात्त्विकता सिद्ध की जा सकती है । ' निष्कर्ष यह है कि प्रपंचको अतात्त्विक सिद्ध करनेके लिये अधिष्ठानभूत वस्तुतत्त्व आवश्यक है, परंतु शून्यवादी तो भ्रमको निरधिष्ठान ही कहता है; क्योंकि उसके अनुसार तो प्रमाणोंके द्वारा तत्त्वकी उपलब्धि होती ही नहीं । इसी अभिप्रायसे भगवान् व्यासने कहा है—' नाभावोऽनुपलब्धेः ' अर्थात् अधिष्ठानभूततत्त्व शून्यवादमें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके अनुसार किसी प्रमाणसे तत्त्वका उपलम्भ होता ही नहीं । जो अप्रामाणिक होगा, उसे तत्त्व कैसे कहा जा सकता है? आजकलके बौद्ध बुद्धके मौनके आधारपर कहते हैं कि ' बुद्धको मनोवचनातीत एक अधिष्ठानतत्त्व अभिमत था । जैसे वैदिकोंके यहाँ कहा जाता है ' अवचनेनैव प्रोवाच ह ' अर्थात् आचार्यने अवचनसे ही तत्त्वका उपदेश कर दिया । '

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा ।

गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥

अर्थात् ' वटवृक्षके नीचे एक आश्चर्य देखा गया है, वहाँ एक युवा गुरु तथा बहुत- से वृद्ध शिष्य बैठे हैं । गुरुके मौन व्याख्यानसे ही शिष्योंके सब संशय दूर हो गये । ' वस्तुतः वैदिकोंके इस मौनव्याख्यानको ही बुद्धके मौनके साथ जोड़नेका यत्न किया गया है । किंतु वैदिकोंने स्थल-स्थलपर असद्वाद, शून्यवादका निषेध किया है । विश्वकारणरूपसे एवं सर्वाधिष्ठानरूपसे तत्त्वका प्रतिपादन किया है । उसके सविषयत्व एवं मनोवचनगोचरत्वकी शंका दूर करनेके लिये ही कहीं भागत्यागलक्षणा, कहीं नेति नेति, अस्थूल, अनणु आदि अतद्व्यावृत्ति तथा कहीं मौनका अवलम्बन किया गया है । शून्यवादियों एवं बुद्धके उपदेशोंमें तो सबके मूल अधिष्ठान या

पृष्ठ 1033

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मार्क्स और आत्मा १०३१ किसी स्थायी वस्तुका सर्वथा खण्डन ही है । सर्वसाक्षी कोई स्थायी आत्मा भी शून्यवादियोंको मान्य नहीं है । फिर भी अगर बुद्धके मौनसे निर्विशेष ब्रह्मका बोध हो तो किसी प्रतिवचन दानासमर्थ पराजितवादीके भी मौनसे अथवा अज्ञमूकके भी मौनसे अधिष्ठानब्रह्मका बोध समझा जा सकेगा । लोकमें भी प्रसंगानुसार मौनसे तत्त्वबोध कराया जाता है । जैसे किसी नवोढासे उसके सभामें स्थित पतिको उसकी सखियाँ पूछती हैं । तो विभिन्न व्यक्तियोंपर अंगुलीसे निर्देशकर पूछती हैं कि इनमेंसे तेरे पति कौन हैं? सखियोंके विभिन्न अंगुलिनिर्देशपर नवोढा ' नेति नेति ' बोलती जाती है । जब ठीक उसके पतिपर ही अंगुलिनिर्देश होता है, तब वह लज्जित होकर मौन हो जाती है । बस, इस मौनसे ही सखियाँ समझ लेती हैं कि इसका पति यही है । इसी तरह विश्वकारण विश्वके अधिष्ठानका प्रत्यगभिन्न परमात्माका अनेक श्रुति, युक्ति आदि प्रमाणोंसे प्रतिबोधित कर देनेके बाद भागत्याग इतर निषेधके अनन्तर मौनद्वारा सर्वनिषेधावधि, सर्वनिषेधाधिष्ठान तथा सर्वनिषेधसाक्षीका बोध कराया जाता है । ये सब बातें शून्यवादमें सम्भव नहीं; बुद्धने किसी मूलकारण या मूलतत्त्वका प्रतिपादन नहीं किया, प्रत्युत उन्होंने सभी स्थायी पदार्थोंका सर्वथा निषेध किया है । आत्मातकका निषेध किया है, कारणभूत ईश्वरका ही खण्डन किया है । उन्होंने सभी सत्को क्षणिक माना है । उन्होंने तो अपने मौनका स्पष्ट अर्थ बतलाया भी है कि ' ऐसे विषयोंपर विचार करना व्यर्थ है । इनका विचार लाभदायक न होकर हानिकारक ही है । पुनर्जन्म होता है या नहीं, लोक शाश्वत है या नहीं, आत्मा देहसे भिन्न है या नहीं इत्यादि विचार व्यर्थ हैं । ' फिर भी बुद्धके मौनसे उनके स्पष्ट कथनके विरुद्ध कूटस्थ अधिष्ठान आत्माको स्वीकार करना शुद्धरूपसे बुद्धके नामपर उनके साथ बेईमानी करनी है । इसके अतिरिक्त प्रमाण बिना भी यदि कोई पदार्थ स्वीकार्य हो तो फिर प्रमा- प्रमेय - व्यवस्था ही व्यर्थ होगी । तब तो स्वानुभवके नामपर, समाधिके नामपर कोई कुछ भी मनमानी पदार्थ सिद्ध करता फिरेगा! यों तो कपिल, वसिष्ठ, व्यास, गौतम, कणाद सभी समाधिसम्पन्न

पृष्ठ 1034

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१०३२ मार्क्सवाद और रामराज्य थे । सभी स्वानुभवकी बात कर सकते थे, परंतु प्रमाणविरुद्ध अर्थ कोई माननेको तैयार नहीं हो सकता है । वेदान्ती तो अनादि, अपौरुषेय पुरुषाश्रित भ्रमादि दोषशून्य वेद तथा वेदमूर्धन्य उपनिषद्रूप परम प्रमाणके आधारपर अधिष्ठान ब्रह्म सिद्ध करते हैं । विधिमुख भागत्याग एवं अतन्निषेधके द्वारा वेदान्तोंका ही नहीं; अपितु सभी वेदोंका पर्यवसान ब्रह्ममें ही कहा गया है । ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ' वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः । ' अर्थात् सभी वेदोंका महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है । प्रत्यक्ष -अनुमान आदिके द्वारा भी वेदान्ती अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं । निषेध आदिके द्वारा तो केवल अधिष्ठानकी निर्विशेषता आदि ही सिद्ध की जाती है । अस्तु! शून्यवादीसे यदि प्रश्न हो कि ' प्रपंचकी अतात्त्विकता धर्मिभूत प्रपंचग्राहक प्रमाणोंसे ही सिद्ध होती है अथवा प्रमाणान्तरसे? पहला पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि धर्मिग्राहक प्रमाण तो अपने विषयकी तात्त्विकताका ही प्रतिपादन करते हैं । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि बाधक प्रमाणज्ञान अधिष्ठानका ही ज्ञान हो सकता है, परंतु तात्त्विक अधिष्ठानगोचर कोई प्रमाण शून्यवादीको मान्य नहीं । उसके मतमें तो जो भी पदार्थ हैं, सभी निस्तत्त्व निःस्वभाव हैं । ' शून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परंतु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है । इसीके द्वारा प्रपंचकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी, किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि विचारासहत्व क्या है, यह भी विचार आवश्यक है । क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि ' यद्यपि सत्- असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है, तथापि वह विचारसह अथवा विचारासहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है? पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि सत्- असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है । फिर जो वस्तु परमार्थतः सत्- असत् आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमें ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे? जो सत् या असत् है, वह प्रमाण -गोचर होने विचारासह तो है ही? यदि वह विचार सहन नहीं कर

पृष्ठ 1035

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मार्क्स और आत्मा १०३३ सकती तो सत्- असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती । यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है । जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है, वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपंचकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है, अन्यथा नहीं । ' यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं । तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है । जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमें किसका आरोप होगा? इस तरह निष्प्रपंच- परमार्थ सद्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपंचरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है । बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व- व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्थापित हो सकता है । अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिकी दृष्टिसे जितना देखा जाता है, उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है । बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेकी दृष्टिसे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है । इसी तरह नैरात्मवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधारभूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है । जैनियोंके मतानुसार संसारी और मुक्त- ये दो प्रकारके जीव हैं । संसारी भी समनस्क और अमनस्क- भेदसे दो प्रकारके हैं । कोई लोग जीव, अजीव, आसव, बन्ध, संवर, निर्जर और मोक्षरूप तत्त्व मानते हैं । इस तरह पंचास्तिकाय भी इन्हींका विस्तार है । उनमें और भी बहुत

पृष्ठ 1036

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१०३४ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रकारके भेद हैं । वे लोग प्रत्यक्ष और अनुमान- यही दो प्रमाण मानते हैं । ' सर्वत्र स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च स्यादवक्तव्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यः, स्यान्नास्ति चावक्तव्यः, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः ' ( सर्वदर्शनसं० आर्हत- दर्शन ४७) इस सप्तभंगि न्यायको मानते हैं । इसी प्रकार नित्यत्वादिमें भी इसी न्यायको प्रयुक्त करते हैं । वे शरीरपरिमाण ही आत्मा मानते हैं । कर्माष्टक जीवको बद्ध करता है । समस्त क्लेश और तद्विषयिणी वासनाएँ जिसकी विगलित हो चुकी हैं, जिसका ज्ञान आवरणरहित हो गया है और जिसे एकतान सुख प्राप्त हो गया है, ऐसे आत्माके ऊपरके देशमें अवस्थानको कोई मोक्ष कहते हैं । किन्हींके मतानुसार जीव गमनशील है और धर्माधर्मास्तिकायसे वह बद्ध है । उससे छूटनेपर उसका ऊपर जाना ही मोक्ष है । ‘ क्षित्यंकुरादिकर्तृत्वेन एक ईश्वर सिद्ध नहीं होता ' ऐसा किन्हींका कथन है; क्योंकि प्रपंचमें कार्यत्व सिद्ध नहीं है । यदि सावयवत्वेन कार्यत्वकी सिद्धि कही जाय, तो विकल्पासह होनेसे वैसा नहीं कहा जा सकता । जैसे कि वह सावयवत्व क्या है, अवयव- संयोगित्व, अवयव- समवायित्व, अवयवजन्यत्व, समवेतद्रव्यत्व या सावयवबुद्धिविषयत्व? आकाशमें अनैकान्तिक होनेके कारण अवयवसंयोगित्व नहीं कहा जा सकता । सामान्य ( जाति ) आदिमें अनैकान्तिक होनेसे अवयव -समवायित्व भी नहीं कहा जा सकता । साध्यसम होनेसे अवयवजन्यत्व भी सावयवत्व नहीं हो सकता । विकल्पासह होनेसे समवेतद्रव्यत्वरूप चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं । जैसे कि समवायसम्बन्धमात्रवत् द्रव्यत्व समवेतद्रव्यत्व है अथवा अन्यत्र समवेत द्रव्यत्व? आकाशादिमें व्यभिचार होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आकाशमें गुणादिसमवायत्व और द्रव्यत्व दोनों सम्भव हैं । साध्यसे अविशिष्ट होनेके कारण दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । संघीभूत तन्तु ही पट है, अतः तन्तुओंमें पटसे अन्यत्व सिद्ध नहीं है, साथ ही समवाय भी असिद्ध है । आत्मा आदिमें अनैकान्तिक होनेके कारण सावयवबुद्धिविषयत्वरूप पाँचवाँ पक्ष भी ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि सावयवत्वबुद्धिके विषय होनेपर भी आत्मामें कार्यत्व

पृष्ठ 1037

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मार्क्स और आत्मा १०३५ नहीं है । फिर, एक कर्ताकी सिद्धि की जा रही है या अनेक कर्ताओंकी? यदि एककी, तो प्रासादादिमें व्यभिचार आता है; क्योंकि प्रासादादिका निर्माण एक कर्ताद्वारा निष्पन्न नहीं होता । अनेक कर्ता भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि बहुतोंमें कर्तृत्व माननेपर परस्पर मतभेदकी सम्भावना अनिवार्य होनेसे सामंजस्य नहीं बन सकता । सभीका सामर्थ्य यदि समान मानें, तो एकसे ही कार्यसिद्धि भी हो जायगी, फिर अन्योंका वैयर्थ्य सुतरां सिद्ध है, अतः अनेक कर्ता माननेसे भी लाभ क्या? तथा च आगम- सर्वज्ञपरम्परा अनादि होनेके कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्रसे आवरणक्षय होनेसे सर्वज्ञता होती है । यह सब कथन आपातरमणीय है । सत्त्व और असत्त्वके परस्परविरुद्ध होनेसे उनका समुच्चय न हो सकनेके कारण विकल्प होता है, किंतु वस्तुमें विकल्प सम्भव नहीं है । समस्त वस्तुओंमें निरंकुश अनेकान्तत्वकी प्रतिज्ञा करनेवालेके मतमें निर्द्धारण भी एक वस्तु ही तो मानना पड़ेगा । स्यादस्ति और स्यान्नास्ति- इन विकल्पोंका उपनिपात होनेसे अनिर्धारणात्मकता ही होगी । जीवको शरीर - परिणाम माननेपर उसे परिच्छिन्न मानना पड़ेगा, अतः आत्माकी अनित्यता भी स्वीकृत करनी पड़ेगी । शरीरोंका परिमाण भी अनवस्थित होनेसे एक मनुष्यजीव मनुष्यपरिमाणका होकर फिर कर्मवशात् जब उसे हाथीका जन्म प्राप्त होगा, तब वह समूचे हाथीके शरीरमें व्याप्त न हो सकेगा । यदि उसे चींटीका शरीर प्राप्त हुआ, तो वह उस चींटीके शरीरमें सम्पूर्णतया समाविष्ट न हो सकेगा । एक जन्ममें भी कौमार, यौवन, वृद्धावस्थामें भी उक्त दोष अनिवार्य होंगे । जीवको अनन्त अवयवयुक्त भी मानते हैं । ऐसी दशामें छोटा शरीर प्राप्त होनेपर उन अवयवोंका संकुचित होना और बड़ा देह मिलनेपर विकसित होना भी मानना पड़ेगा । यह भी विचार करनेपर संगत प्रतीत नहीं होता । अनन्त अवयवोंकी समानदेशता प्रतिहत होगी या नहीं? यदि प्रतिहत होगी, तो वे अनन्त अवयव परिच्छिन्नमें समाविष्ट न हो सकेंगे । यदि न होगी तो सबको एक देशमें ही अवस्थित मानना पड़ेगा । ऐसी दशामें उनमें

पृष्ठ 1038

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१०३६ मार्क्सवाद और रामराज्य स्थूलताका अभाव होनेसे जीव अणुपरिमाणपरिमित हो जायगा । शरीरमात्रमें परिच्छिन्नकी अनन्तता भी नहीं बन सकती । अवयवोंके आगम-अपगमसे उनकी छोटे - बड़े शरीरकी परिमाणताकी कल्पना भी असंगत है; क्योंकि अवयवके उपचय- अपचयवाला होनेपर उसे विकारवान् मानना पड़ेगा । अवयवोंमें भी प्रत्येक चेतयिता है या उनका समुदाय? इसपर लोकायतिकमतके निराकरणप्रसंगमें कही हुई आपत्तियाँ अनिवार्य हैं । बन्ध - मोक्षव्यवस्था भी उनसे सम्मत प्रत्यक्ष- अनुमानसे अवगत नहीं हो सकती । वैशेषिक तथा नैयायिक परमेश्वरकी भी सिद्धि करते ही हैं । प्रपंचके सावयव होनेसे उसकी कार्यता सिद्ध करके उस प्रपंचके कर्ता ईश्वरको सिद्ध करते हैं । ' पूर्वोक्त विकल्पासह होनेके कारण सावयवत्व असिद्ध है ' यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ' समवेतद्रव्यत्व सावयवत्व है ' ऐसा लक्षण करनेपर उक्त दोष प्रसक्त नहीं होते । आकाशके निरवयव होनेसे उसमें व्यभिचार सम्भव नहीं है । अवान्तर महत्त्वरूप हेतुसे भी कार्यत्वका अनुमान सुकर है । शरीरसे जन्य न होनेसे आकाशकी तरह क्षित्यंकुरादि अकर्तृक हैं- ऐसा सत्प्रतिपक्ष अनुमान नहीं हो सकता; क्योंकि शरीर विशेषण व्यर्थ है । केवल अजन्यत्वकी भी हेतुता नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह असिद्ध है । यदि कहा जाय कि शरीराजन्यत्व रहनेपर भी कर्त्रजन्यता न रहे, तो क्या हानि है, तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता । सोपाधिकत्वकी शंका भी नहीं की जा सकती; क्योंकि यदि अकर्तृक होगा, तो कार्य भी न होगा, ऐसा अनुकूल तर्क हो सकता है । यदि इतरकारकोंसे अप्रयोज्य होते हुए सकल कारकोंका जो प्रयोक्ता है, वह कर्ता होता है अथवा ज्ञानचिकीर्षा प्रयत्नोंका जो आधार है, वह कर्ता है - ऐसा कर्तृलक्षण कहा जाय, तो कर्ताकी व्यावृत्ति होनेपर तदुपहित समस्त कारकोंकी व्यावृत्ति होनेसे कारणके बिना कार्योत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा । यदि ईश्वर कर्ता हो, तो वह शरीरी होगा, ऐसा प्रतिकूल तर्क भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सिद्धि-असिद्धि दोनों अवस्थाओंमें व्याघात

पृष्ठ 1039

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मार्क्स और आत्मा १०३७ होगा । यदि ईश्वर असिद्ध होगा, तो आश्रयासिद्धि होगी और यदि आगमसिद्ध होगा, तो उसीसे उसकी कर्तृत्वसिद्धि भी हो जायगी । अवाप्तसमस्तकाम उस परमेश्वरकी करुणावशात् विश्वसृष्टिमें प्रवृत्ति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । वैसी दशामें ' सुखमय हो सृष्टिकी प्रसक्ति होगी ' यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सृज्यप्राणिकृत सुकृत- दुष्कृतके परिपाकविशेषसे सृष्टिवैषम्य उपपन्न है । कार्य होते हुए विलक्षण होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान भूत, भौतिक पदार्थ स्वोपादानगोचर अपरोक्षज्ञानवान्से जन्य हैं, इस अनुमानसे तथा प्रपंचके निमित्तोपादान होनेके कारण प्रपंचाधारत्व, शासकत्व, प्रकाशकत्व आदिसे परमेश्वर सिद्ध होता है । वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव— ये सात पदार्थ मानते हैं । नैयायिक लोग प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान-ये सोलह पदार्थ मानते हैं । वे आत्माको ज्ञानादिगुणवान्, नित्य और व्यापक मानते हैं । जीवात्मा और परमात्मा भेदसे आत्मा दो प्रकारका मानते हैं । जीवात्माओंको अनन्त और परमात्माको एक मानते हैं । नित्यज्ञानादिगुणवान् परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है, यह तर्क तथा आगमसे सिद्ध होता है, यह बतलाया जा चुका है । इनके मतानुसार अन्धकार तेजोऽभावरूप है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञानमें उत्तर-उत्तरका तत्त्वज्ञानसे नाश होनेपर पूर्व- पूर्वका नाश होनेसे अपवर्ग होता है । प्रमाणके विषयमें- चार्वाक लोग जैसे इन्द्रियजन्य ही ज्ञानको प्रमाण मानते हैं, वैसे ही उनके मतसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्दका ही बोधन करता है, शब्दार्थको भी नहीं । शब्दार्थ सत्य है या असत्य-इसका निर्णय नहीं किया जा सकता । अनुमान व्याप्तिज्ञानसापेक्ष होता है और व्याप्ति ‘ जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ- वहाँ अग्नि होता है ' इस प्रकार समस्त जगत्‌में अतीत, अनागत धूम- अग्नियोंको उपस्थापित करती है । कादाचित्क द्रष्टाको प्रत्यक्षद्वारा समस्त धूम एवं अग्नियोंका ज्ञान सम्भव नहीं है । अनुमानसे

पृष्ठ 1040

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१०३८ मार्क्सवाद और रामराज्य भी इनका ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि अनुमान व्याप्ति-ज्ञानसापेक्ष हुआ करता है । बारम्बार सहचारदर्शनसे भी व्याप्तिज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि ' अग्निके अभावमें भी कदाचित् धूम हो सकता है ' ऐसी व्यभिचार- शंकाका समस्त धूम तथा अग्नियोंका ज्ञान हुए बिना निराकरण नहीं हो सकता । बौद्ध, जैन, वैशेषिक अनुमानको भी मानते हैं । उनका आशय यह है कि अन्वय- व्यतिरेकद्वारा धूम तथा अग्निके कार्य-कारणभावका निश्चय होनेपर व्यभिचार- शंकाकी निवृत्ति हो जानेसे व्याप्तिज्ञान हो जायगा । उनके मतमें यद्यपि शब्द समादरणीय है, तथापि प्रत्यक्ष, अनुमानसे सिद्ध पदार्थका बोधक होनेसे उसका प्रामाण्य माना जाता है, उसका स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं माना जाता । वैशेषिकके मतानुसार भी शब्द सर्वत्र प्रमाण नहीं है; क्योंकि उन्मत्तप्रलपितादिमें उसका अप्रामाण्य स्पष्ट है । वैशेषिक प्रमाणभूत ईश्वर या अन्य आप्तपुरुषद्वारा उच्चरित शब्दको ही प्रमाण मानते हैं । तथा च वक्ताके प्रामाण्यसे शब्दके प्रामाण्यका अनुमान होता है, अतः शब्दप्रामाण्य अनुमानप्रमाण्यके अधीन होनेसे अनुमानसे पृथक् उसका प्रामाण्य नहीं है । अनुमान और शब्द - दोनों परोक्षसामान्यविषयक हैं, अतः उनकी प्रवृत्ति सम्बन्धग्रहाधीन है । साथ ही विशेष अनन्त होनेके कारण उसका सम्बन्ध दुरवगम है । अतः धूमको देखकर जैसे अग्निका अनुमान किया जाता है, वैसे ही शब्द सुनकर उसका अर्थ अवगत होता है । यहाँ भी लिंगकी ही तरह अन्वयव्यतिरेक होते हैं । जो शब्द जिस अर्थमें प्रयुक्त देखा जाता है, वह उस अर्थका वाचक होता है । धूमके वह्निमत्त्वके समान शब्दका अर्थवत्त्व है, अतः शब्दको अनुमानके अन्तर्गत ही मानना चाहिये । यथेष्ट विनियोज्यता हस्तादि, संज्ञादि लिंगमें भी दिखायी पड़ती है । दृष्टान्त- निरपेक्षता भी समभ्यस्त अनुमानमें स्पष्ट है । अनभ्यस्त होनेपर तो अनुमान और शब्द दोनोंमें सम्बन्धस्मृतिकी सापेक्षता होती है । कोई प्रत्यक्ष और शब्द - इन्हीं दोको प्रमाण मानते हैं । उनके मतमें अनुमान यद्यपि प्रमाण माना जाता है, तथापि वह यदि प्रमाणभूत शब्दसे